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‘विरोध-रस’ विवादपूर्ण / डॉ. सुधेश व अन्य समीक्षाएँ

 

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आप की पुस्तक में आप द्वारा विवेचित ‘विरोध-रस’ भी विवादपूर्ण है। आपका वाक्य है-‘आक्रोश ऊपर से भले शोक जैसा लगता है क्योंकि दुःख का समावेश दोनों में समान रूप से है...।’ यह दोषपूर्ण धारणा पर आधृत है। शोक में दुःख की अनुभूति होती है, पर आक्रोश में क्रोध का अनुभव होता है, दुःख का नहीं। यह बात दूसरी है कि क्रोध का परिणाम दुःखद हो। कविता का जन्म दुःख से तो सारी दुनिया मानती है पर आप कविता का जन्म आक्रोश से मानते हैं, जिसके मूल में क्रोध होता है, दुःख नहीं। अपनी स्थापना में आप इस अति तक चले गए कि इस ‘विरोध’ को कविता का ‘आदि-रस’ घोषित कर दिया। यह शास्त्र-संगत और मनोविज्ञान समर्थित नहीं है। शास्त्र तर्काश्रित होता है और तर्क विवेक पर आधृत होता है। कोई कुतर्क बौद्धिक व्यायाम के बाद तर्क नहीं बन सकता। यदि आप मेरी बात को अन्यथा न लें तो रामचन्द्र शुक्ल की पुस्तकें ‘रसमीमांसा और ‘चिन्तामणि-भाग-1’ पढि़ए। दूसरी पुस्तक में शुक्लजी ने मनोविकारों के बारे में लिखा है। रस-चिन्तन जैसे गंभीर विषय पर पत्रकार की तरह नहीं लिखा जा सकता, जिसे कुछ भी लिखने की जल्दी होती है।

तेवरी में पूर्ण स्वदेशी भावना

|| ग़ज़ल आइलुन फाइलुन में लिप्त आयातित विधा।|

+ गौरीशंकर वैश्य ‘ विनम्र ’

उ.प्र. हिंदी संस्थान के पुस्तकालय में तेवरीपक्ष के ताजा अंक का अवलोकन कर आश्चर्य हुआ कि 32 वर्षों से प्रकाशित पत्रिका को तेवरी नाम की सार्थकता सिद्ध करने का दुसाध्य प्रयास करना पड़ रहा है। मेरी यह धारणा इसलिए बलवती हुई क्योकि “ तेवरी इसलिए तेवरी है “ मंच से पूरे 14 पृष्ठ में आत्ममंथन प्रस्तुत किया गया है। जब परिवार के शिशु का नामकरण कर देते हैं तब बाद में उसमें मीनमेख क्या निकालना। बल्कि किसी अन्य से तुलना न कर उसे पूर्ण और सक्षम बनाना ही उचित होगा। ग़ज़ल आइलुन फाइलुन में लिप्त आयातित विधा है , तेवरी पूर्ण स्वदेशी भावना से परिपुष्ट विचारभिव्यति `|

रमेशराज ने दिलायी तेवरी को विधागत पहचान

+विश्वप्रताप भारती

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रमेशराज छन्दबद्ध कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। रस के क्षेत्र में “ विचार और रस “, “ विरोधरस “ नामक दो पुस्तकों के माध्यम से रस के क्षेत्र में जहाँ आपने रस को व्यापकता प्रदान की है , वर्तमान विचारशील कविता को रस से जोड़ा है। वहीं ग़ज़ल से रोमानी पक्ष से व्यवस्था विरोध के तेवर को अलग कर उसे तेवरी के रूप में स्थापित किया है तथा हिंदी साहित्य में तेवरी के विधागत वैचारिक विमर्श को आगे बढ़ाया है।

रमेशराज ने तेवरी विधा को पहचान और स्थायित्व प्रदान करने के लिए “ तेवरीपक्ष ” पत्रिका के साथ साथ “ अभी जुबां कटी नही “, “कबीर ज़िन्दा है “, “इतिहास घायल है ” जैसे कई तेवरी संग्रहों का सम्पादन किया। हिंदी की प्रगतिशील जनवादी कविता में जिला अलीगढ से बहुत से नाम आगे आते हैं , उनमें रमेशराज शीर्षस्थ हैं। ये कहना गलत न होगा कि आलोचकों ने उनकी पुस्तकों को तो पढ़ा किन्तु उनकी चर्चा करने से कतराते रहे। उनकी इस चुप्पी के दौरान कुछ रचनाकारों ने तो तेवरी लिखने वालों को “तेवरीबाज़ ” तक कह डाला।

श्री रमेशराज अपनी लम्बी तेवरी (तेवर शतक ) “घड़ा पाप का भर रहा ” के माध्यम से एक बार फिर चर्चा में हैं।इस संग्रह की 100 से ऊपर तेवरवाली तेवरी को पढकर हर एक सामाजिक यह महसूस कर सकता है – “अरे ये तो हमारे मन की बात कह दी ” शायद तेवरीकार के लेखनकर्म की यही सफलता है।

सामान्यतया कविता दूसरों को कुछ बताने के लिए लिखी जाती है जो मानवीयता के पक्ष की मुखर आवाज़ होती है। मानवीयता के स्तर पर कविता में जो भाव आते हैं वे अद्भुत होते हैं। रमेशराज की कविता (तेवरी ) में ये भाव एक बड़ी सीमा तक विद्यमान हैं –

तेरे भीतर आग है , लड़ने के संकेत

बन्धु किसी पापी के सम्मुख तीखेपन की मौत न हो।

++ ++ ++

जन जन की पीड़ा हरे जो दे धवल प्रकाश

जो लाता सबको खुशहाली उस चिन्तन की मौत न हो।

दरअसल आज आदमी की ज़िन्दगी इतनी बेबस और उदास हो गयी है कि वह समय के साथ से , जीवन के हाथ से छूटता जा रहा है। सम्वेदनशून्य समाज की स्थिति तेवरीकार रमेशराज को सर्वाधिक पीड़ित करती है –

कायर ने कुछ सोचकर ली है भूल सुधार

डर पर पड़ते भारी अब इस संशोधन की मौत न हो।

समाज में जो परिवर्तन या घटनाएँ हो रहीं हैं वे किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं। घटनाओं के आकर प्रकारों में बीभत्सता परिलक्षित हो रही है। इन घटनाओं के माध्यम से नई अपसंस्कृति जन्म ले रही है फलतः लूट , हत्या , चोरी , बलात्कार , घोटाले , नेताओं का भ्रटाचार , सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी अब चरम पर हैं| रमेशराज के इस विद्रूप को उजागर करने और इससे उबरने के प्रयास देखिये –

लोकपाल का अस्त्र ले जो उतरा मैदान

करो दुआएं यारो ऐसे रघुनन्दन की मौत न हो।

++ ++ ++

नया जाँचआयोग भी जांच करेगा खाक

ये भी क्या देगा गारन्टी कालेधन की मौत न हो।

कविता में भोगे हुए यथार्थ की लगातार चर्चा हुयी है लेकिन उसके चित्रण तक। दलित लेखकों ने अपने लेखन में जहाँ समस्याओं को उजागर किया है वहीं उनका समाधान भी बताया है। रमेशराज दलित नहीं हैं किन्तु उनका जन्म एक विपन्न परिवार में हुआ , इस नाते दलितों के प्रति उनकी तेवरियों में वही पीड़ा घनीभूत है, जो दलित लेखकों के लेखन में दृष्टिगोचर हो रही है।

निस्संदेह आज दलितों ने निरंतर प्रयास से अपना जीवन-स्तर बदला है। अपने लिए अनंत सम्भावनाओं का आकाश तैयार किया है। किन्तु समाज में अभी भी कुछ ऐसा है जिससे तेवरीकार आहत है-

पूंजीपति के हित यहाँ साध रही सरकार

निर्बल दलित भूख से पीड़ित अति निर्धन की मौत न हो।

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लिया उसे पत्नी बना जिसका पिता दबंग

सारी बस्ती आशंकित है अब हरिजन की मौत न हो।

तेवरीकार ने आज़ादी की लड़ाई का चित्रण उन दोगले चरित्रों को उजागर करते हुए किया है, जिन्होंने आजादी के दीवानों की पीठ में छुरे घोंपे-

झाँसी की रानी लिए जब निकली तलवार

कुछ पिठ्ठू तब सोच रहे थे “ प्रभु लन्दन की मौत न हो”।

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास ‘गोदान’ के पात्र ‘गोबर्धन’ के माध्यम से युवा आक्रोश को इस प्रकार व्यक्त किया है-

झिंगुरी दातादीन को जो अब रहा पछाड़

‘होरी’ के गुस्सैले बेटे ‘गोबरधन’ की मौत न हो।

हिंदी साहित्य में नये-नये प्रयोग होते रहे हैं, आगे भी होते रहेंगे। कविता में “ तेवरी-प्रयोग “ एक सुखद अनुभव है जो सामाजिक सन्दर्भों से गुजरते हुए समसामयिक युगबोध तक ले जाता है। तेवरी की भूमिका कैसी है स्वयं तेवरीकार के शब्दों में अनुभव की जा सकती है-

इस कारण ही तेवरी लिखने बैठे आज

किसी आँख से बहें न आंसू , किसी सपन की मौत न हो।

स्पष्ट है, तेवरी नयी सोच, नयी रौशनी लेकर आयी है। अन्य तेवरी शतकों की तरह ‘ घड़ा पाप का भर रहा ‘ की लम्बी तेवरी आँखें खोलने वाली है। आशा है, हिंदी साहित्य के लेखक तेवरी को स्वीकारने, संवारने में हिचकेंगे नहीं।

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+विश्वप्रताप भारती , बरला, अलीगढ़

मोबा.-8445193301

|| तेवरीपक्ष के माध्यम से काव्य को नई दिशा।|

+डॉ. गौरीशंकर ‘पथिक ’

हिंदी के गीतकारों को उर्दू से सराबोर ‘ ग़ज़ल ’ के मोह से दूर रहना चाहिए। तेवरी के माध्यम से आप हिंदी काव्य को नयी दिशा प्रदान कर रहे हैं। समाज को प्रतुपन्न समस्याएं – आतंकवाद , भ्रष्टाचार ,बलात्कार एवं आरक्षणवाद से उबारने के हेतु तेवरी एक सशक्त माध्यम है।

काव्य का एक नया रस - “ विरोधरस “

+ डॉ. अभिनेष शर्मा

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शोध कृति क्रोध “ विरोधरस “ में श्री रमेशराज ने समझाया है कि क्रोध और आक्रोश में महीन अंतर है। क्रोध अपने विरोधी का विनाश करता है , आक्रोश केवल विनाश की कामना करता है। वह विचारों को बदलने की क्षमता रखता है। विरोध बर्बर आततायी पक्ष को वैचारिक रूप से परिवर्तन की ओर ले जाना चाहता है जबकि क्रोध शत्रु पक्ष का केवल और केवल विनाश करता है।

अब तक साहित्य में जितने रस विराजते हैं , उनकी आभा का एक अलग स्वरूप है , परन्तु “ विरोधरस ” जिसे साहित्य जगत में रमेशराज ने स्थापित करने का प्रयास किया है, स्तुत्य इसलिए है क्योंकि राज जी ने इस नये रस के प्रत्येक अंग पर विस्तार से चर्चा की है।

किसी भी व्यवस्था, विचार, विसंगति, चरित्र, व्यक्तिविशेष , या परम्परा का विरोध करना समाज की सनातन रीति रही है। इस रीति को पूर्ववर्ती रसाचार्यों ने स्थायी भाव साहस या क्रोध के साथ रखकर वीररस अथवा रोद्र्रस के रूप में स्थापित किया है। रसचिंतन को आगे बढ़ाते हुए श्री रमेशराज ने समीक्ष्य पुस्तक “विरोधरस” में बताया है कि वीररस , रौद्ररस से विरोध रस पूरी तरह प्रथक है। विरोध आक्रोशित असहाय, निर्बल आदमी का बयान है। विरोध का जन्म स्थायी भाव आक्रोश से होता है। डॉ. नरेशपाण्डेय चकोर के शब्दों में-

“ विरोधरस ” सचमुच शोधपूर्ण और स्व्गात्योग्य कृति है। इसे नये रस के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

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डॉ.अभिनेष शर्मा, देव हॉस्पिटल, खिरनी गेट , अलीगढ़

मोबा.-9837503132

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“ विरोधरस ” सचमुच शोधपूर्ण और स्व्गात्योग्य कृति है। इसे नये रस के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

+ डॉ. नरेशपाण्डेय चकोर

विरोधरस के सभी पक्ष ज्ञानवर्धक व उत्तेजक

+रामचन्द्र शुक्ल

“ विरोधरस ” , नया रस। इसे मान्यता मिलनी चाहिए।

+डॉ. स्वर्ण किरन

रमेशराज जी शोध कृति "विरोधरस" साहित्य जगत को अनुपम देन हैं । इस शोध कृति में गहन चिंतन , सोच और तार्किकता के साथ " विरोध रस " को स्थापित किया गया है।आने वाली पीढी "विरोधरस " पर डॉक्टरेट / डी.लिट्. की उपाधियाँ भी ग्रहण करे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

+ब्रह्मदेव शर्मा।|

“ विरोधरस : “ शोधपूर्ण उपलब्धि

इं. त्रिलोक सिंह ठ्कुरेला

“ विरोधरस ” पर विस्तृत जानकारी मन प्रफुल्लित करती ह। इस शोधपूर्ण उपलब्धि को साहित्य जगत द्वारा सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए।

+|| विरोधरस रचनात्मक कार्य।| +डॉ. मक्खनलाल पाराशर

समाज में जो विरोधीवृत्तियाँ बढ़ पनप फलफूल रहीं हैं, उनकी ओर आपने समाज का ध्यान आकर्षित कराने हेतु साहित्य क्षेत्र में विरोधरस के रूप में बेहद जरूरी रचनात्मक कार्य किया है।

+|| विरोध रस स्थापित होगा।| +भगवानदास जैन

‘विरोधरस’ को एक रस के रूप में स्थापित करने के लिए आप|| रामेशराज।| बेहद मशक्कत और जद्दोजहद कर रहे हैं। आपने इसके विविध अन्गों का भी भरपूर विश्लेषण किया है। आपको सफलता मिलेगी।

+|| विरोध क्रोध से सर्वथा भिन्न।| +परमलाल गुप

भारतीय समीक्षा में रस ही कविता का प्राणतत्त्व माना गया है। रसों की संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती है। इस कारण ही परम्परागत रसों के आलावा वात्सल्य , भक्तिरस और जुड़े। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रकृति रस को भी स्वीकारा। असल में कुछ भाव तो ऐसे हैं कि आलम्बन बदल जाने से वे स्वतंत्र रूप धारण कर लेते हैं।’ ‘प्रेम’ ऐसा ही मानो सत्य है। कुछ संचारी भी इतने सशक्त हो जाते हैं कि उनसे रस का परिपाक हो जाता है। परम्परत रूप से रमेशराज का ‘विरोधरस’ रौद्र रस के अंतर्गत आता है परन्तु वह विरोध जिसमें व्यवस्था के प्रति अथवा किसी सामाजिक बुराई के प्रति गुस्सा या आक्रोश हो वह व्यक्तिगत क्रोध से सर्वथा भिन्न होता है। +डॉ. परमलाल गुप्त

‘विरोध रस’ पर विस्तृत जानकारी मन प्रफुल्लित करती है। इस शोधपूर्ण उपलब्धि को साहित्य जगत द्वारा सहज भाव से स्वीकार कर लेना चाहिए।

+इं. त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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समीक्ष्य कृति “घड़ा पाप का भर रहा ” की पंक्तियाँ समकालीन समाज की विसंगतियों , विरोधाभासों और विद्रूपताओं पर करारी चोट करती प्रतीत होती हैं। काव्यकला निश्चय ही भाषा द्वारा भावों की साधना होती है , इस कला में आप (रमेशराज) निपुण हैं। आपकी यह लम्बी तेवरी मन को छूती है इसलिए आप बधाई के पात्र हैं।

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