रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

हास्य-व्यंग्य : कबीर का नगर भ्रमण / कुबेर

पिछले पाँच सौ साल से भी अधिक समय से कबीर समाघि में लेटे हुए थे। घुमक्कड़ प्रवृत्ति के कबीर को अपनी इस सुसुप्ता अवस्था पर आत्मग्लानि हुई। यह भी कोई समाधि हुई। इस तरह की नींद तो नेताओं और मंत्रियों को फबता है। कबीर को नहीं।

जीते-जी उन्होंने समाज में जाति, धर्म की रूढ़ि़यों और सामाजिक असमानता को दूर करने का अथक प्रयास किया था। कर्मकाण्ड, पूजापाठ जैसे आडंबरों का विरोध किया था। यद्यपि सुपरिणाम के प्रति वे आश्वस्त थे; पर जीते जी ऐसा होते हुए देख नहीं पाये थे। इसीलिए समाधि टूटते ही उन्हें फिर से दुनिया घूमने की और पाँच सौ साल पुरानी अपनी इस आश्वस्ति को जाँचने की जिज्ञासा हुई। समाधि त्यागकर वे उठ खड़े हुए। अपनी झीनी चादरिया को धारण किया और लुकाठी लेकर बाहर आ गये।

बाहर की दुनिया को देखकर उन्हें घोर आश्चर्य हुआ। लुकाठी लेकर कुछ देर वे इधर-उघर घूमते रहे। घूमते-घूमते नाचते भी रहे, गाते भी रहे -

’’कबिरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।

जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।।’’

पर किसी ने कबीर की ओर ध्यान नहीं दिया। वार्ड के कुछ शरारती बच्चे उन्हें देखकर पागल-पागल का शोर करने लगे। कुछ बच्चे उन्हें पत्थर भी मारने लगे। कबीर को उम्मीद थी कि लोग उन्हें देखते ही पहचान लेंगे। उनकी खतिरदारी में लग जायेंगे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। ऐसे में उन्हें अपने उस परम भक्त सज्जन की याद आई जो रोज उनकी समाधि पर आकर बड़ी श्रद्धापूर्वक आरती और भजन किया करता था। उन्होंने उस भक्त को ढूँढना शुरू किया। भक्त का पता ढूँढने में कबीर के पसीने छूट गए। कई घंटों की अथक कोशिश के बाद कबीर को उस भक्त का पता-ठिकाना मिल सका। तनिक खुशी हुई। चलो, कोई तो मिला जो उन्हें पहचान सकता है। उन्होंने उसके दरवाजे पर दस्तक दी।

[ads-post]

शेर के समान दिखनेवाला एक कुत्ता दहाड़ता हुआ बाहर आया। कबीर की चीख निकलते-निकलते बची। उनके हाथ में लुकाठी देखकर कुत्ता और बिगड़ गया। कुछ देर बाद कुत्ते को चुप कराती हुई अंदर से एक महिला आई। आजकल भिखारियों का अपग्रेडेशन हो गया है। दान में कोई भी अब अनाज नहीं लेता। इस बात को वह महिला अपने अनुभवों से जानती थी। इसीलिए वह हाथ में कुछ सिक्के लेकर आई थी। कबीर की ओर सिक्का बढ़ाते हुए उन्होंने कहा - ’’लो बाबा।’’

कबीर ने उस धर्मपरायण महिला को पहचान लिया। भक्त के साथ कभी-कभी वह भी समाधि पर चली जाया करती थी। कहा - ’’माई! नहीं पहिचाना हमें क्या? हम भिखारी नहीं हैं। हम कबीर हैं, कबीर। हम भीख नहीं मांगा करते हैं। मांगना बुरी आदत है। हमारी बातें भूल गईं क्या - ’मांगन मरन समाना।’ कपड़ा बुनकर अपनी रोटी कमा लेते हैं हम।’’

’’हाय दइया! क्या कहा आपने, आप कबीर हैं? कबीर, कौन?’’

’’वही, जिसकी समाधि पर आपके पतिदेव और आप फूल चढ़ाने के लिए जाया करती हैं।’’

कबीर की बातें सुनकर महिला को दहशत होने लगी। वह उल्टे पाँव अंदर भागीं।

उनकी घबराहट देखकर पतिदेव ने कहा - ’’क्या हुआ, घबरा क्यों रही हो?’’

महिला ने हाँफते हुए कहा - ’’चिंटू के पापा! लुकाठी लेकर कोई खतरनाक पागल खड़ा है दरवाजे पर। कहता है - हम कबीर हैं।’’

पतिदेव को भी जिज्ञासा हुई। झटपट वह भी दरवाजे पर आया। कबीर का हुलिया देखकर उसे भी दहशत होने लगी। कहा - ’’अरे आगे जाओ भाई! भीख नहीं चाहिए तो खड़े क्यों हो। और ये जलती हुई लकड़ी लेकर क्यों घूम रहे हो। कहीं आग लगानी है क्या?’’ ’’लगता है, आपने भी हमें नहीं पहचाना। हम कबीर हैं। हमारी समाधि पर आप रोज आते हैं। याद करो। और हाँ, इस लुकाठी से कहीं आग नहीं लगानी है हमें। इससे तो हम लोगों की अज्ञानता जलाते हैं -

कबिरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ।

जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।।’’

सज्जन को भी कबीर में किसी पागल की छबि दिखने में देर नहीं लगी। सोचा, इस पागल से मुँह लगना ठीक नहीं है। कहा - ’’अरे भाई! बैंक से लोन लेकर बड़ी मुश्किल से तो हमने यह घर बनाया है। अभी तक न तो बैंक के धक्के ही भूल पाये हैं और न ही किस्त चुका पाये हैं। पागल हैं क्या हम जो इसे जला लेंगे। नहीं जलाना है हमें अपना बसा-बसाया घर। जलाने का शौक ही चर्राया है तो आगे बढ़ जाओ। चैंक पर कबीरपंथी साधुओं का अखाड़ा है। आये दिन वहाँ से काले धुएँ का गुबार उठता रहता है, वहीं चले जाओ। हो सकता है, वहाँ तुमको कोई पहचान भी लें।’’ और उसने दरवाजा बंद कर लिया।

सज्जन के मुँह से कबीरपंथी साधुओं का जिक्र सुनकर कबीर चैंक गए। वे उस सज्जन से पूछना चाहते थे कि भइया! हमने तो कभी कोई पंथ-वंथ बनाया नहीं। तो फिर किस कबीर पंथ की बात कर रहे हो? परंतु तब तक दरवाजा बंद हो चुका था। कबीर को बड़ी निराशा हुई। दुखी मन से वे चैकवाले अखाड़े की ओर बढ़ गए। अखाड़े की भव्यता का यशोगान करता हुआ उसका प्रवेश द्वार भी बड़ा भव्य था। वहाँ के साधुगण भी बड़े दिव्य थे। प्रवेश द्वार पर ही एक दिव्य साधु खड़ा था। शायद दरबान ही हो। कबीर को अंदर आता देख उसने ललकारा - ’’ओये, पागल! भाग यहाँ से।’’

’’हम पगल नहीं है, भइया। हम कबीर हैं।’’ कबीर ने डरते हुए कहा।

उस दिव्य साधु ने एक दिव्य ठहाका लगाया और कहा - ’’आप जैसे बहुत कबीर आते हैं, भइया। हर पागल खुद को कबीर ही कहता है। पर यह साधुओं का अखाड़ा है। कबीरों का नहीं। समझे कि नाहीं। अब भागों यहाँ से।’’

’’काहे ठिठोली करते हो भइया। हम सचमुच के कबीर हैं, जिनके नाम पर तुम यह पंथ चलाते हो, वही कबीर।’’

उस दिव्य साधु की दिव्यता अब प्रचण्डता में बदलने लगी थी। कबीर को प्रवेश द्वार से बाहर धकियाते हुए उसने कहा - ’’सीधी बात काहे समझ नहीं आती तुम्हें। हाथ-पैर तुड़वाना है क्या?’’

’’ठीक है भइया, चले जाते हैं। पर एक बात बताते जाओ हमें। वो सामने बड़ा सा फोटू टंगा है, वह किसका है। यहाँ के मालिक का हैं क्या?’’

’’हाँ, मालिक का ही हैं। अरे पागल! खुद को कबीर कहता है और कबीर को नहीं पहचानता?’’

कबीर ने उस अखाड़े में जिस भी साधु को देखा, छाप-तिलक लगाया देखा, कंठी-माला धारण किए हुए देखा। और वैसा ही यह फोटो। कबीर से रहा नहीं गया, कहा - ’’छाप-तिलक लगाये, कंठी-माला धारण किए यह दिव्य फोटो हमारा कैसे हो सकता है। ऐसे तो हम कभी नहीं थे। हम तो अभी जैसा दिख रहे होंगे, वैसा थे। झीनी चादरिया ओढ़कर, लुकाठी लेकर चलनेवाले। कंठी-माला और छाप-तिलक से हमें क्या लेना-देना भाई?

टोपी पहिरे, माला पहिरे। छाप-तिलक अनुमाना।

साखी शब्दे गावत भूले। आतम खबर न आना।।’’

तभी उस दिव्य साधु का संकेत पाकर दो पहलवान साधु वहाँ और प्रगट हो गए और कबीर को उठाकर दूर नुक्कड़ के पास फेंक आये। वहाँ एक भिखारी बैठा था। उन्होंने कबीर पर सहानुभूति दिखाते हुए कहा - ’’आओ, भइया! बइठो। दुख मत मनाओ। हमको भी एक दिन ऐसे ही फेंक गए थे ससुरों ने। सुनाओ अपनी। कौन हो? कहाँ से आये हो?’’

’’भइया! तुमने भी हमें नहीं पहिचाना। अरे, हम कबीर हैं, कबीर। कहीं से नहीं आये हैं हम। यहीं हमारी समाधि है। दुनिया घूमने का मन हुआ, सो उठ आये हैं।

कबिरा को ना समझा कोई, आतम ना पहचाना।

बाहर-बाहर भटकै सबही, अंतर नहीं समाना।।’’

भिखारी ने सोचा, अपमानित होने के कारण लगता है बेचारे का सुध-बुध खो गया है। कहा - ’’होश में आओ भइया! हमारी भी यही गति हुई थी। इन मुस्टंडों का तो काम ही यही है। किसी न किसी को रोज ही फेंक जाते हैं यहाँ। तुम क्या समझते हो, यहाँ योगी लोग रहते हैं? कहते हैं, किसी जमाने में एक धर्मात्मा ने अपनी सैकड़ों एकड़ जमीन और महल अपने गुरू को दान में दे दिया था। तब तो सब कुछ ठीक ठाक रहा। बाद में आनेवालों ने साहबों को खिला-पिलाकर संस्था की जमीन अपने नाम करवा लिया। लोगों ने बड़ा विरोध किया। भारी आदोलन हुआ। कोट-कछेरी हुई। अब तक मुकदमा चल रहा है। इसीलिए तो, बाहरवाले किसी को भी अपने बीच आने नहीं देते हैं ये।’’

कबीर ने कहा - ’’भइया! दुनिया देखने के लिए निकले हैं। देख रहे हैं। देख-देखकर हमें तो हँसी आ रही है। हम काहे दुख मनायेंगे। किसी की धन-संपत्ति और महल-अटारी से हमें क्या लेना-देना?

कबिरा गरब न कीजिए, ऊँचा देख अवास।

काल परे भुँइ लोटिहैं, ऊपर जमिहैं घास।।’’

तभी अखड़े के अंदर से बिगुल और झांझ मजीरे की आवाजें आने लगी। मंगल पद गाये जाने लगे। कबीर ने पूछा - ’’भइया, ये क्या हो रहा है यहाँ?’’

भिखारी ने बताया - ’’चैंका-आरती हो रही है। और क्या।’’

कबीर ने आश्चर्य से पूछा - ’’चैंका आरती, यह क्या होती है?’’

’’अरे भाई, बड़े अहमक हो। चैंका आरती माने पूजा पाठ। खुशी के मौके पर या गमी होने पर, कबीर पंथी लोग ऐसा ही करते हैं।’’

’’पर हमने तो ऐसी कोई रीत बनाई नहीं थी। ऐसे सारे आडंबरों का तो हमने विरोध किया था। पूजा पाठ तो लोगों को ठगने का तरीका है। समाज के ऊपर एक बोझा है -

हम भी पाहन पूजते होते, हिन्दू बनके रोज।

सद्गुरू की कृपा भयी, डारया सिर के बोझ।।’’

’’हमें नहीं पता भइया। साल भर पहले यहाँ एक साध्वी आई थी। जवान थी। सुंदर थी। साधना करते-करते बेचारी सध गई। कोई असाध्य बीमारी लग गई थी उन्हें। सांसारिक बंधनों से मुक्त हो गई। आज उन्हीं की दशगात है।’’ फिर कबीर के कान में धीरे से उन्होंने कहा - ’’राज की बात है, किसी से कहना नहीं, बार-बार गरभ गिराने के कारण कमजोर होकर मर गई बेचारी।’’

कबीर ने एक गहरी साँस ली और कहा - ’’हमें क्या पता था भइया, कबीर नाम को भुनाने के लिए लोगों ने यहाँ कैसा-कैसा प्रपंच रच रखा है -

कबिरा नाम बिकावत जहँ-तहँ, बनियों का संसार।

ठगते और ठगाते देखा, दुनिया के बाजार।।’’

तभी वहाँ सायरन बजाती हुई पुलिस की गाड़ी आ धमकी। दरअसल किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था कि कोई पागल लुकाठी लेकर घूम रहा है। बहकी-बहकी बातें कर रहा है। खुद को कबीर बता रहा है। आगजनी और साम्प्रदायिक दंगे हो सकते हैं। पर इसके पहले कि पुलिस कबीर को पकड़ पाती, मारे भय के कबीर अंतध्र्यान हो गए और लौटकर पुनः समाधि में सुख की नींद सो गए।

विषय:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget