आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

शब्द-संधान / धारा की धार / डा, सुरेन्द्र वर्मा

image

वह धारा ही क्या जिसमें पवाह न हो। धारा एक धार है। किसी भी द्रव्य पदार्थ का बहाव है। सबसे पहले तो जल-धारा ही है, और इस जल-धारा के भी कितने ही रूप हैं। नदी या सरिता है। नाले हैं, नालियां हैं। सभी में पानी की धारा बहती है – कभी रुक-रुक कर, कभी तेज़ी से अविरल धारा बहती है। नदी की धारा में नावें बहती हैं। मंझधार आकर, जहां पानी की धारा (का बहाव) बहुत तेज़ होती है नाव आगे बढाने में बड़ी सावधानी बरतने पड़ती है, कहीं डूब ही न जाए !

वर्षा भी तो जल-धारा ही है। कभी थोड़ी थोड़ी रुक रुक कर होती है तो कभी हमें वर्षा की ‘अविरल धार’ का सामना करना पड़ता है। ओलों का लगातार गिरना भी ‘ओलों की धार’ है। जमा किया हुआ वर्षा का जल बड़ा गुणकारी होता है। संस्कृत भाषा में इसे भी ‘धारा’ ही कहते हैं। ‘समुद्री जल-धारा’ तो अथाह है। तभी तो इसमें ज्वार-भाटे आते हैं।

[ads-post]

कभी गहरी चोट लग जाती है तो ‘खून की धार’ बहने लगती है। कभी इंसान बहुत दुखी होता है तो ‘आंसुओं की धार’ बहती है। बिजली का नंगा तार यदि आप छू लें तो वह करंट मारे बिना नहीं रहता। आखिर उसमें ‘बिजली की धारा’ जो बह रही है।

“तेल देखो तेल की धार देखो”। तेल की धार यदि बंध जाए तो वह एक लकीर सी बना देती है जिसमें बहाव का पता ही नही चलता। हमारे अविचल, अविछिन्न ध्यान की उपमा तेल की धार से ही दी गई है। न जाने ऐसी कितनी चीजें हैं कि जो तरल पदार्थ नहीं हैं लेकिन प्रकारांतर से उनकी भी धार की हम कल्पना कर लेते हैं। दूर-दर्शन और रेडियो पर प्राय: “धारावाहिक” नाटक प्रसारित होते रहते हैं। नाटक एक ही होता है किन्तु वह किश्तों में दिखाया जाता है, अत: धारावाहिक। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली कई रचनाएं किश्तों में प्रकाशित होती हैं, वे भी ‘धारावाहिक’ कहलाती हैं। और तो और नियम और ‘संविधान की धाराएं’ भी होती हैं। नियमावली और संविधान तो एक ही होता है लेकिन उसमें अंकित अनुच्छेदों में अलग अलग बातें कही गईं हैं। ये सभी संविधान या किसी भी नियमावली की धाराएं हैं। अपराधियों को किसी न किसी धारा में ही गिरफ्तार किया जाता है।

‘विचार-धाराएं’ भी तो होती हैं। पूंजीवादी विचारधारा, साम्यवादी विचारधारा, गांधीवादी विचारधारा, इत्यादि। ये विचार-धाराएं बेशक समय समय पर बदलती तो रहती हैं, लेकिन ये अपने मुख्य विचार या आदर्श को नहीं छोड़तीं। जो विचार धाराएं स्वयं को समयानुकूल ढाल नहीं पातीं, वे केवल “वाद” होकर रह जाती हैं। अपने शास्त्रीय महत्त्व तक ही सीमित हो जाती हैं। ‘वाक् धारा’ भी होती है कुछ लोग ‘धारा-प्रवाह’ भाषण करते हैं। पर कुछ का वाक्-प्रवाह धारा प्रवाह नहीं होता।

समाज में जो भी प्रचलित है, ‘समाज की धारा’ का अंग है। तमाम व्यक्ति इस ‘धारा में (बिना सोचे समझे) बह जाते और उसका उपयोग करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो यदि प्रचलित धारा को ठीक नहीं समझते ‘धारा के विरुद्ध’ खड़े हो जाते हैं। समाज की धारा यदि कुछ लोगों के लिए आक्रामक होती है तो वे लोग ‘धारा से बचाव’ का उपाय ढूँढ़ने लगते हैं। “धारा में बह जाना”, “धारा के विरुद्ध खड़े हो जाना” या “धारा से बचाव करना” – यही वे तीन प्रतिक्रियाएं हैं जो किसी भी धारा के प्रति अपनाई जाती हैं। जब पानी की धार बरसती है तो या तो हम उसका ‘उपयोग’ कर उसमें नहाने लगते हैं, या उसके ‘खिलाफ’ छाता लेकर खड़े हो जाते हैं अथवा घर में घुस कर अपना ‘बचाव’ करते हैं।

‘धारा’ कहें या ‘धार’ कोई ख़ास अंतर नहीं है। लेकिन धार शब्द किसी वस्तु के किनारे की तीक्षता के लिए भी इस्तेमाल होता है – जैसे चाकू या तलवार या ब्लेड की धार। जब इन चीजों की धार कुंठित हो जाती है, धार दुबारा ‘चढ़ाई’ जाती है। एक नट तनी हुई रस्सी की ‘धार पर चल’ लेता है। कुछ लोग ‘धारा-पथ’ अपनाते हुए सदैव लीक पर ही चलते रहते हैं। होली में लोग पिचकारियों से रंगों की धार ‘फेंकते’ और ‘मारते’ हैं। भाषा में धार का उपयोग कई तरह से किया जाता है। अवसरानुसार धार चढ़ाई जाती है, धार तेज़ की जाती है, फेंकी जाती है, मारी जाती है। इत्यादि।

--डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -१

टिप्पणियाँ

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.