आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

शब्द संधान / वास प्रवास / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

image

जब से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हुए हैं, वहां दूसरे देशों से आए प्रवासी कामगर बहुत दहशत में हैं। यह दहशत कैन्सस शहर में हैदराबाद के युवा इंजीनियर श्रीनिवास की ह्त्या के बाद और भी बढ़ गई है। काम की तलाश में दुनिया भर से लोग अमेरिका में आते हैं। इनमें से कुछ लोग वहाँ स्थाई रूप से बस जाते हैं, और अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर तेते हैं। कुछ इस कोशिश में लगे रहते हैं की वे अपना स्थाई वास अमेरिका को बना लें। बहुत कम ऐसे होते हैं जो कुछ दिनों वहां काम करने के बाद वापस अपने देश आ जाना चाहते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि अमेरिका में इन्हीं प्रवासियों की वजह से, योग्य देशवासियों के लिए काम के अवसर कम होते जारहे हैं। अत: अब अमेरिका प्रवासियों का स्वागत करने के लिए तैयार नहीं है।

हिन्दी में ‘प्रवासी’ शब्द नया नहीं है लेकिन जब से भारत में नौकरी के लिए विदेश में जानेवाले लोगों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई है, ‘प्रवासी’ शब्द एक बहुप्रयुक्त शब्द बन गया है। प्रवास और प्रवासी, शब्द संस्कृत से हिन्दी में आए हैं और इनका अर्थ है, परदेश में रहना, या परदेश में रहने वाला। मजेदार बात यह है कि आज-कल समाचार पत्रों में प्रवासी के लिए ‘अप्रवासी’ शब्द भी धड़ल्ले से प्रयुक्त हो रहा है। जब की ऐसा कोई शब्द है ही नहीं। सच तो यह है कि “प्रवासी” में ‘अ’ प्रत्यय लगाने से प्रवासी का अर्थ ही बदल जाता है – अप्रवासी का अर्थ होगा, वह जो प्रवासी नहीं है। लेकिन पता नहीं क्यों आज प्रवासी के अर्थ में ‘अप्रवासी’ शब्द गढ़ लिया गया है। अगर इसको मान्यता मिल जाती है तो यह एक ठेठ हिन्दी का ही शब्द होगा, इसके बचाव के लिए हम कहीं कोई तर्क ढूँढ़ नहीं सकते।

प्रवास, जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है, “वास’ शब्द से बना है। वास भी संस्कृत का ही शब्द है जिसे हिन्दी ने अपना लिया है। वास का अर्थ निवास या रहने से है। घर, मकान हमारा वास है। हमारा देश हमारा वास है। जब हम अपने रहने की जगह में परिवर्तन करते हैं तो यह ‘वास-पर्याय’ है। वास पर्याय में या किसी वैकल्पिक वास में चले जाना एक तरह से अपने मूल वास को छोड़ कर ‘प्रवासी’ हो जाना है। लेकिन वास- पर्याय आमतौर पर वैकल्पिक घर या मकान होता है, अपना देश नहीं। किसी दूसरे देश में चले जाने का सामान्यरूप से मतलब प्रवासी हो जाना ही लगाया जाएगा।

‘प्रवास’ शब्द स्पष्ट ही “वास” में ‘प्र’ प्रत्यय लगा कर बना है। प्र एक ऐसा उपसर्ग है जो किसी शब्द के पहले लगकर कभी आरंभ (जैसे, प्रयाण), कभी शक्ति जैसे (प्रभु), कभी आधिक्य (जैसे प्रवाद), कभी उत्पत्ति (जैसे प्रपौत्र), कभी वियोग (जैसे प्रोषित), कभी उत्कर्ष (जैसे प्राचार्य), कभी शुद्धि (जैसे प्रसन्न जल), कभी इच्छा (जैसे प्रार्थना) कभी शान्ति (जैसे प्रशम), कभी पूजा (जैसे प्रांजलि) आदि, का द्योतक है। ‘वास’ में ‘प्र’ प्रत्यय मूल ‘वास’ से वियोग या उसका विछोह दर्शाता है। यह एक जानी-मानी बात है कि जितने भी प्रवासी हैं वे कभी अपने मूल-वास को भूल नहीं पाए हैं और उससे बिछोह का दर्द उन्हें सालता रहता है।

वास में अलग अलग प्रत्यय लगा कर कई शब्द बने हैं, निवास, आवास आदि। निवास और आवास, इन दोनों का ही अर्थ वास-स्थान से ही है। निवास करने वाला भी वासी, आवासी या निवासी है। हम कहीं भी मारे मारे फिरें लेकिन रात बित्ताने के लिए हम अपने निवास या आवास पर ही आ जाते हैं। इसीलिए वास रात में रहने के स्थान को भी कहा गया है। राजा-महाराजा जिस महल में अपनी रानियों महारानियों को रखते थे, उसे ‘रनिवास’ या ‘रनवास’ कहा जाता था। उनके महल में ‘सह्वास’ के लिए वे रात में वहां जा जाया करते थे। दूसरी तरफ जो लोग संन्यास ले लेते थे वे अपना घर-बार छोड़ कर ‘वन-वास’ के लिए चले जाते थे। आज कल तो शायद ही कोई वनवास लेता हो। माघ मेले में ‘कल्पवासी’ गंगा तट पर ब्रह्मचर्य पूर्वक धार्मिक कर्तव्यों को विधि-विधान से संपन्न करने वाले लोग होते हैं। ‘रनिवास’ हो या ‘वनवास’, ‘सहवास’ हो ‘कल्पवास’ सभी में ‘वास’ सम्मिलित है।

एक शब्द है, ‘उपवास’। उपवास व्रत के रूप में भोजन का त्याग है। (गांधी जी ने तो उपवास को एक राजनैतिक हथियार के रूप तक में इस्तेमाल किया था।) उपवास में ‘वास’ निहित तो ज़रूर है लेकिन ‘वास’ शब्द में जो रहने का भाव है, वह इसमें नहीं है। वास में ‘उप’ उपसर्ग लगा कर उपवास को भोजन का त्याग कैसे मान लिया गया, शायद कोई भाषा-विज्ञानी बता सके। पर मेरे एक मित्र ने विनोदपूर्वक इसकी एक अद्भुत व्याख्या की। कहा, जब आप अपने घर रात बिताते हैं तो यह ‘वास’ है, और यदि कहीं और बिताते हैं तो इसे उपवास कहा जा सकता है!!

एक ‘उपवासी’ बेशक भोजन का त्याग करता है। लेकिन यह शब्द उन निम्न-जातीय ग्रामीणों के लिए भी इस्तेमाल किया गया है जो समाज में सामान्य नागरिक अधिकारों से रहित हैं। वे मानों वासी नहीं हैं ‘उपवासी’ हैं।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.