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प्रेम न जानत कोय / मनीष कुमार सिंह

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क्या लिखूँ ? वह भी प्रेम पर। जिस पर न जाने कितने वर्षों से , न जाने कितने लोगों ने , न जाने कितना कुछ नहीं लिखा। संत-असंत , नर-नारी , ज्ञान...

क्या लिखूँ ? वह भी प्रेम पर। जिस पर न जाने कितने वर्षों से , न जाने कितने लोगों ने , न जाने कितना कुछ नहीं लिखा। संत-असंत , नर-नारी , ज्ञानी-अज्ञानी ,ज्ञात-अज्ञात ,जन्मा-अजन्मा सबने तो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से प्रेम का दर्शन कराया।

फिर चाहे मीरज़ापुर की कजरी हो -" अरे रामा पेंग बढ़ावें राधा प्यारी , पिया को लागी प्यारी री होरी।" या फिर बहराइच का लोकगीत -" अमावू बौरी -बौरी आवें ,बसावू बासुरी बजावें ,जियरा डोलि-डोलि जाय।" या फिर पूरे अवध में होली में गया जाने वाला फाग हो -"समय पर फगुवा खेलें भवानी ....!"

या सूरदास का वात्सल्य का शिखरस्थ पद – “जसोदा हरि पालनैं झुलावै , हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कुछ गावै। " या फिर मीराबाई का अथाह वियोग में डूबा पद – " हेरी म्हां दरदे दिवाणी , म्हरा दरद न जाण्यां कोय। " या रसखान का भक्ति का सर्वोच्च पद -" काग के भाग बड़े सजनी , हरि हाथ से ले ग्यो माखन रोटी।' इन सब में तो प्रेम का अनूठा अहसास छुपा है।

फिर क्या कारण है कि आज प्रेम महज एक मजाक का विषय बन कर रह गया है। कबीर ने जिस ढाई आखर वालें प्रेम को जानने वालों को 'पंडित' कहा। आज वह प्रेम परिजनों से विद्रोह से शुरू होकर ,खाप पंचायतों के रास्ते हॉनर किलिंग में बदल जाता है। या फिर कोर्ट-मैरिज के रास्ते से डाइवोर्स , सुसाइड , एसिड-अटैक , MMS के रूप में दुनिया के सामने आता है।

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वजहें गिनाने को तो बहुत हो सकती है पर हमे अनुभव(experience) और अनुभूति(realization) में फर्क सीखना होगा। अनुभव के आधार पर आप कह सकते हैं कि सिंगल-फैमिली , पेरेंट्स के झगड़े , उनका बिजी शेड्यूल और संसधानो का इतना सुलभ होना इस “आज कोई-कल कोई और” वाले प्रेम का जिम्मेदार है। पर अनुभूति के आधार पर मै कह सकता हूँ - हमारी पीढ़ी के सामने महज दूषित-प्रेम की परिभाषाये प्रस्तुत की गयी। नतीजा हमने 'दैहिक -प्रपंचो ' मे 'वास्तविक -प्रेम ' खो दिया। ठीक उसी तरह जैसे हमने ज्ञान मे से प्रज्ञा खो दी , और सूचनाओं में से ज्ञान खो दिया।

हम अपने को और अपने लोगों को प्रेम के उच्चतम आदर्शो जैसे -राम ,कृष्ण,नानक ,बुद्ध ,महावीर आदि के बारे में कभी सीखा ही नहीं पाये। राम मर्यादा के प्रतीक पुरुष है और गंगा भारतीय अस्मिता की। और कृष्ण जो सबको दीवाना बनाते है। चक्र धारी होने पर भी कृष्ण का नाम लेने पर बासुरी नज़र आती है। वही है जिनके पास मीरा भी है ,और महाप्रभु चैतन्य भी। और जो माँ यसोदा के साथ वात्सल्य की वह अनुपम बाल लीला रचते है। जो नास्तिको को भी सम्मोहित कर दे। और जो राधा के साथ ऐसा मोहक संसार रचते हैं कि याद ही नहीं रह जाता है कि राधा आयु में उनसे बड़ी है और उनकी संबंधी भी है। यहप्रेम का सच्चा स्वरूप है।

आज जब लड़को को उनकी सातवी गर्लफ्रेंड के चौथे बर्थडे पर उसकी ही कजिन से सेटिंग बनाते देखता हूँ तो सोचता हूँ क्या वाकई प्रेम अँधा ही होता है ? या Francis Bacon साहब ने सही ही लिखा है “it is impossible to love, and to be wise.(from ‘of-love’ essay)।” प्रगति की अंधी दौड़ ,पश्चिमी देशों के अंध–अनुकरण और फिल्म-मेकर ने हमसे हमारे मूल्य ही छीन लिए। हमें समझाना होगा की यह रोज-डे ,पर्पस-डे ,चॉकलेट-डे आदि -आदि उन लोगो द्वारा फैलाये गए चोचले है जो जो नकली गुलाबों , चॉकलेट ,टेडी-बियर ,और बियर का धंधा करते है। यहाँ मै एक बात और कहना चाहूंगा की अभिभावकों को भी अपना स्व-मूल्याङ्कन करने की जरुरत है।

पर पीवीआर में बैठकर चवन्नी का चॉकलेट खाने वालें प्रेमी-युगलों कभी तुम्हे ग्रैंड -मस्ती ,हंटर ,या क्या सुपर कूल है हम-३ जैसी फ़िल्में देखने से फुरसत मिले या फेसबुक पर अपनी तथाकथित प्रेमी/प्रेमिकाओं से चैटियाते-चैटियाते बोर हो जाओ तो गूगल बाबा की शरण में जाकर जय शंकर प्रसाद की कहानी " पुरूस्कार” या चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी ' की कहानी "उसने कहा था " पढ़ लेना। और गर समझ भी गए तो तुम्हारे दिमाग से ये 'लाइन मारना ','सेटिंग बनाना ' या ' बड़ा कंटॉप माल है ' जैसे शब्द हमेशा के लिए फॉर्मेट हो जायेंगे। तब तुम्हे पता चलेगा आखिर प्रेम होता क्या है।

प्रेम के उन मूल्यों को खोजिए जिसमे ठहराव , भरोसा , संयम और चरित्र हो। आपका प्रेम न तो इतना हल्का होना चाहिए की बीबी , बहन या गर्लफ्रेंड का फ़ोन बिजी जाने पर टूटने लगे। और न ही इतना सस्ता की उसमे हर कोई आ जाये। प्रेम सत्य ,सहज,सरल और जन- कल्याणकारी होना चाहिए।

कथा है की - एक राजकुमार ने बलपूर्वक किसी दूसरे देश के राजा को हराकर उसकी बेटी(राजकुमारी) का हरण कर उसे रानी बना लिया। राजकुमारी ने कहा -राजकुमार। तूने बल से मेरा तन भले ही हरण कर लिया हो ,पर तू मेरी आत्मा कभी नहीं जीत पायेगा।

राजकुमार ने उस दिन प्रण लिया , और अपना कोई दूसरा विवाह नहीं किया। नहीं राजकुमारी को कभी हाथ लगाया , वो दोनों शयन -कक्ष में जब सोतें तो राजकुमार मध्य में अपनी तलवार रख देते। और लगभग ६० वर्ष बाद एक दिन रानी ने वह तलवार उठकर फेंक दी। और राजन से कहा - प्रिये। आपके संयम ने मेरी आत्मा जीत ली। चलो , आज मै आपकी अर्धनगिनी बनकर आपके साथ यज्ञ करुँगी। और दोनों ने साथ में हवन -पूजन किया , और उसी दिन राजन ने वैराग्य धारण कर लिया।

कहने को तो यह महज एक पौराणिक कथा है पर सीखने में शायद आपका जीवन बीत जाये और आप इस कथा का मर्म न समझ पाएं। सोचिये , कोशिश कीजिये ,अच्छा करने की ,अच्छा बनाने की ,और अच्छे लोगों चुनने की।

आखिर में -


प्रेम धर्म का पर्याय है।
प्रेम असीम है ,अनंत है।
बंधन - मुक्त
एक छोर से दूसरे छोर तक
अतृप्त मानवता
छोर की तलाश में प्रयासरत है।
तलाश रही है उस छोर को
जहा आदि और अंत का एक रूप है।

 

लेख़क परिचय :

मनीष कुमार सिंह

जन्मस्थली बहराइच,उत्तर-प्रदेश ! कंप्यूटर साइंस परास्नातक में अध्यनरत ! शिक्षा,साहित्य,दर्शन और तकनीकी में रूचि ! संपर्क-811534301

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रचनाकार: प्रेम न जानत कोय / मनीष कुमार सिंह
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