शनिवार, 18 मार्च 2017

शब्द-संधान / तेरे संग यारा / डॉ.सुरेन्द्र वर्मा

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यार का संग भला कौन नहीं चाहता? लेकिन इस ‘संग’ से आशय क्या है? ज़ाहिर है “संग” का मतलब मित्रता से है, मेल और मुहब्बत से है, साथ और संसर्ग से है। ‘संग’ सामीप्य और निकटता है। लेकिन कैसी विडम्बना है की यही “संग” फारसी भाषा में पत्थर या पाषाण के लिए इस्तेमाल होता है। संगदिल –जिसका दिल पत्थर के समान कडा और निर्दय हो। वैसे पाषाण के इस अर्थ में भी हिन्दुस्तानी ज़बान ने शब्द, ‘संग’ को पूरी तरह से अपना लिया है।

‘संग’ मूलत: संस्कृत का शब्द है। संस्कृत में साथ और संसर्ग के अतिरिक्त इसे ‘आसक्ति’ के अर्थ में भी, जो संग की चाहत के लिए व्याकुलता को जन्म देती है, प्रयोग किया जाता है। वह जो ‘संगकर’ है आसक्ति जनक है। संग-त्याग विरक्ति है।

हिन्दी में ‘संग’ का उपयोग हम कई तरह से करते हैं। हम संग ‘करते’ हैं; ‘निभाते’ हैं; ‘छोड़ते’ हैं; ‘लेते’ और ‘देते’ हैं; संग ‘होते’ हैं ‘हो जाते’ हैं। संग ‘लगते’ हैं, ‘लग लेते’ हैं। संग ‘चलते’ हैं, ‘चल देते’ हैं। इत्यादि।

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संग है तो ‘संगत’ है, ‘संगति’ है। हम सभी चाहते हैं कि हमाँरे निर्णय ‘न्याय-संगत’ हों और हमारे तर्क,‘तर्क-संगत’ हों। ‘संगत तर्क’ या ‘संगत न्याय’ में संगतता होती है। वे अवसरानुकूल तो होते हैं पर ज़रूरी नहीं वे तर्क-संगत भी हों।

इलाहाबाद में गंगा, जमुना और अदृश्य सरस्वती का “संगम” है। इलाहाबाद में वे संग-संग बहती हैं। यहाँ उनका मिलन होता है, वे एक दूसरे से जुड़ जाती हैं। उनका योग हो जाता है। यही ‘संगम’ है। पर संगम केवल नदियों का ही नहीं होता। चौराहों और तिराहों पर रास्तों का भी संगम होता है। काल और ग्रहों का संगम भी होता है। वहां भी योग और संधि होती है। सांध्यकाल रात और दिन का संगम है। संगम मिलन है; मिलन दो व्यक्तियों का भी हो सकता है – बोल राधा बोल संगम होगा की नहीं।

किसी भी व्यक्ति की पत्नी या उसकी महिला मित्र उसकी संगिनी है। किसी भी स्त्री का पति या उसका पुरुष-मित्र उसका संगी है। आप जिसके संग-साथ रहते या कार्यालय आदि में काम करते हैं वह भी आपका संगी / संगिनी ही है।

संग का जब गठन किया जाता है तो वह ‘संगठन’ कहलाता है। यह बिखरी हुई शक्तियों को परस्पर मिलाकर, किसी कार्य विशेष कार्य की सिद्धि के लिए, किसी उद्देश्य हेतु, बनाया जाता है। संगठन वह संस्था है जो किसी विशेष प्रयोजन के लिए निर्मित होती है। कार्य सिद्ध हो जाने पर संगठन समाप्त हो जाता है।

हिन्दुस्तानी ज़बान ने संस्कृत भाषा का ‘संग’, जिसका अर्थ साथ से है, और फारसी से उर्दू में आया ‘संग’ जिसका मतलब पत्थर या पाषाण से है – दोनों को ही बखूबी अपना लिया है। हम अच्छी तरह से जानते हैं कि ताजमहल की भव्य इमारत संगमरमर से बनी हुई है। संगमरमर (या संगमर्मर ) एक ख़ास तरह का संग (पत्थर) है जो सफ़ेद होता है। लेकिन पत्थर कई रंगों और किस्मों के होते है। संगेसुर्ख (लाल) भी होते हैं और संगमूसा (काले) भी होते हैं। पत्थरों को तराश कर उन्हें आकृति देने वाले, या, मूर्तियाँ बनाने वाले ‘संग तराश’ या ‘संग साज़’ कहलाते हैं।

किसी ज़माने में अपराधी को पत्थर मार मार कर मार डालने की सज़ा दी जाती थी। ऐसी सज़ा में पत्थर फेंकने वाला ‘संग-अंदाज़’ कहलाता है। पत्थर से घायल व्यक्ति ‘संगखुर्द:’ (संगखुर्दा) होता है। ‘संग सार’ वह व्यक्ति है जो पथराव करके मार डाला गया हो। संगअंदाज़ किले के उस सूराख को भी कहते हैं जिससे बंदूख चलाई जाती है।

पत्थर, ज़ाहिर है एक मज़बूत, सुदृढ़ और कड़ी चीज़ है। हर मजबूत और सुदृढ़ वस्तु को इसीलिए ‘संगबस्त’ कहते हैं। पत्थर का कडा होना निर्दयता का प्रतीक बन गया है; अत: निर्दय व्यक्ति को ‘संग-दिल’ या ‘संग-जिगर’ कहा गया है। लेकिन ‘संग-दस्त’ सुस्त और कामचोर आदमी को कहते हैं। पत्थर भी तो निठल्ला ही पडा रहता है। ‘संगपा’ पाँव साफ़ करने वाला खुरदरा पत्थर, झाँवा या झमा, है।

इमारत की बुनियाद में जो पत्थर रखा जाता है, वह ‘संगेबुनियाद’ है। मज़ार में लगाया गया पत्थर ‘संगे-मज़ार’ है। रास्ते में आने वाले पत्थर ‘संगे-राह’ हैं। रास्ते की दूरी बताने वाला हर मील पर लगा पत्थर ‘संगे-मील’ होता है। फर्श पर बिछने वाले पत्थर ‘संगे-फर्श’ हैं। पत्थर जिसका सुरमा बनाया जाता है ‘संगे-सुरमह’ है| हर दुष्कर कार्य “संगीन’ हो जाता है। दुष्कर जुर्म ‘संगीन-जुर्म’ है। संग के और भी न जाने कितने भाषाई उपयोग हैं। गिनाना मुश्किल है।

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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