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बालकथा / बन्दर और शीशा / शशांक मिश्र भारती

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सरयू रामगंगा के संगम के ऊपर एक बहुत बड़ा और घना जंगल था। जहां अनेक प्रकार के जानवर रहते थे। आस-पास छोटी -मोटी बस्तियां थीं। कभी-कभी गीदड़, खरगोश, हिरन जैसे जानवर गांवों के आस- पास भी दिख जाते थे। सामान्यतः गरमियों में जानवरों को पानी पीने के लिए नदियों की ओर आना पड़ता था।

उत्पाती बन्दरों का तो कहना ही क्या ?जब भी अवसर देखा गांव पर धावा बोल दिया इस पेड़ से उस पेड़, फल-फूलों, पत्तों को नोचते- खाते और जंगल की ओर वापस चले जाते। कई बार इनके छोटे- छोटे बच्चे गांव वालों के कपड़े टांगने के लिए बंधे तारों पर पूरा सरकस दिखाते। डिशों को नचा- हिला सिने प्रेमियों का मजा खराब करते। कपड़े व अन्य सामान भी उठा ले जाते।

एक बार किसी बन्दर के हाथ एक शीशा लग गया। उसने सोचा इसे ले चलता हूं। उसने गांव- घरों में लोगों को उसके सामने खड़ा देखा था। जब उसने भी ऐसा किया तो उसे अपनी तस्वीर दिखाई दी। सोचा यह तो बड़ी अच्छी वस्तु है साथ रखनी चाहिए। इसके बाद वह अपनी सूरत बार- बार देखता हुआ वापस जंगल की ओर जाने लगा। तभी पीछे से दूसरे बन्दर ने झपट्टा मरकर शीशा छीन लिया और भाग खड़ा हुआ। इस छीना झपटी में वह शीशा कहां गिर गया पता ही न चला।

उस बन्दर को भी अगले दिन किसी जरुरी कार्य से दूसरे जंगल जाना पड़ गया।

इधर गिरा हुआ शीशा लोमड़ी को मिल गया। उसने देखा तो उसे अपनी तस्वीर दिखाई दी। सोचा वह तो चित्रकार बन गई है। उसने खरगोश को दिखाया। खरगोश बोला तेरी नहीं इसमें तो मेरी तस्वीर है। तब तक बिल्ली आ गई। उसने छीनकर देखा तो चहक उठी -चुप रहो तुम दोनों पागल हो। इसमें तो मेरी तस्वीर है। इस तरह से जंगल में एक दो तीन चार अनेक जानवर देख- देख कर अपनी तस्वीर बताने लगे। कुछ ने आंखें कमजोर होने की बात कही, किसी ने जादू का खेल बताया। कुछ दूर भागने की बात करने लगे।

झगड़ा बढ़ जाने पर जानवरों ने सोचा क्यों न इसे जंगल के राजा बाघसिंह के पास ले चला जाये। वह दूध का दूध और पानी का पानी कर देगा।

ऐसा सोचकर सभी जानवर बाघसिंह के पास जा पहुंचे। एक साथ इतने जानवरों को देखकर बाघराज चौंक पड़े। उन्होंने अनेक अच्छी- बुरी बातें सोच डालीं। कहीं पड़ोसी राजा ने आक्रमण तो नहीं कर दिया अथवा लोभवश मानव जंगल काटकर या शिकार कर हम सबको पकड़ने आ रहा है आदि- आदि।

सेनापति चीता सिंह ने बाघसिंह का ध्यान भंग किया और बोले - राजा साहब एक वस्तु हाथ लगी है। जिसमें चित्र बना है। आप देखकर बताइये किसकी है। ऐसा कहते हुए सेनापति ने वह शीशा महाराज के सामने रख दिया।

बाघसिंह ने देखा तो भड़क गये और कहा -मूर्खों इतना पता नहीं, इसमें तो मेरी तस्वीर है तुम लोगों की आंखों की जांच करवानी पड़ेगी।

चीता सिंह ने कहा -महाराज, इसमें तो अभी मेरी तस्वीर थी, इधर दीजिए, ऐसा कहकर सेनापति चीतासिंह ने अपने हाथ में लेना चाहा कि हड़बड़ाहट में शीशा जमीन पर गिरकर टूट गया। अब उसमें कई तस्वीरें दिख रही थीं। यह देखकर बाघ चीख पड़ा, साथियों इसमें तो मैं कई जगह पूरा का पूरा दिख रहा हूं । जरूर किसी भूत- प्रेत का चक्कर है।

ऐसा सुनते ही सभी जानवरों की आंखों में चिन्ता की रेखाएं दौड़ गईं। कुछ तो डर से चीखने- चिल्लाने लगे।

इधर वह बन्दर दूसरे जंगल से वापस आया। तो उसे जंगल में कोई दिखलाई न पड़ा, सोचा कहीं कोई संकट तो नहीं, पूरे जंगल में सन्नाटा छाया हुआ है। एक भी जानवर नहीं दिखता है।

बाघराज के पास चलना चाहिए। वहीं से पता चलेगा। कुछ दूर चलने के बाद चीखने- चिल्लाने की आवाजें सुनायी दीं। लगता है जरूर कोई मुसीबत आ गई है। ऐसे में ही मन में सोचता हुआ बन्दर दौड़ लगाते हुए जा रहा था।

उसने सीधे जाकर बाघ से पूछा-

महाराज क्या बात है ? सभी लोग इतना भयभीत क्यों हैं ?

क्या बताऊं -बन्दर जी, हम सब बड़े संकट में हैं। महाराज मुझे बताये तो आखिर बात क्या है बन्दर ने जानना चाहा, ऐसा सुनकर बाघसिंह ने जमीन पर पड़े शीशे को की ओर संकेत कर कहा - देखो ,वहां बने चित्र को देखो। अवश्य किसी भूत- प्रेत का साया है।

बन्दर ने जब जमीन पर पड़े शीशे के टुकड़ों को देखा, तो समझते देर न लगी। वह उन टुकड़ों को हाथ में लेकर बोला- महाराज इनसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। यह कोई भूत-प्रेत का साया नहीं है। न नहीं इसमें कोई चित्र है। यह तो शीशा है। इसमें देखने वाले की ही तस्वीर दिखती है।

तुम्हें कैसे पता ? बाघराज ने सन्देह व्यक्त करते हुए पूछा, महाराज मैं कभी -कभी गांवों में जाता हूं। वहां मनुष्यों को इसमें अपना चेहरा देखते हुए देखता हूं। यह शीशा मैं उन्हीं के घर से उठा के लाया था। पर दूसरे बन्दरों की छीना- झपटी में यह रास्ते में कहीं गिर गया था और इसी बीच मैं कहीं बाहर चला गया।

ऐसा सुनना था, कि सभी की जान में जान आई। मटकू बन्दर बोला- बाघराज यह ठीक कह रहा है। मैंने इसको शीशा लाते हुए देखा था।

ठीक है ऐसा कार्य दुबारा न करना। खाने- पीने की वस्तुओं पर हाथ साफ करने तक तो ठीक है पर सामान की चोरी से बचना। बाघराज ने परामर्श दिया।

उसके बाद सभी के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। सभी खुशी- खुशी अपने घर लौट गये और आनन्द से रहने लगे। बन्दर तो जैसे हीरो बन गया था।

उपरोक्त बालकथा मेरा अपनी नितान्त मौलिक, स्वरचित व किसी भी अन्तरजाल पर अप्रकाशित हैं। अनेक पत्र -पत्रिकाओं में पूर्व प्रकाशित व प्रशंसित हैं ।

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शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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