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शब्द संधान / बौछारें / डा० सुरेन्द्र वर्मा

कहाँ कहाँ, कितनी कितनी, कैसी कैसी बौछारें – कोई हिसाब नहीं हो सकता। गालियों की बौछार, फूलों की बौछार, तिरछी बूंदों की बौछार, रंगों की बौछार, तारीफों की बौछार, आलोचनाओं की बौछार, व्यंग्य की बौछार, दुखों की बौछार, घूंसों /थप्पड़ों की बौछार, गोलियों की बौछार, रूपए/ पैसों की बौछार, वर्षा की बौछार, बूंदों की बछार, यहाँ तक कि धूप तक की बौछार – बकौल शायर कैसर-उल जाफरी के –

फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी / मैं जहां पे छुपा था वहीं दीवार गिरी !

लेकिन होली का मौसम हैं। ऐसी कष्टप्रद, दुखी कर देने वाली बौछारों की भला बात क्यों करें। रंग भरी पिचकारियों से भिगोने वाली तिरछी धारों की बात कीजिए। बसंत ऋतु की बहारों की बात कीजिए। प्रेम से पगी गालियों की उन बौछारों की बात कीजिए जो देवरों और जेठों को मिलीं, जीजाओं और नन्दोईयों पर पडीं।

गालियों की बौछार सिर्फ होली तक ही सीमित नहीं रहतीं। विवाह के अवसर पर भी गीतों के ज़रिए ऐसी ऐसी गालियों की बौछार होती हैं कि तबियत हरी हो जाए। कोई बुरा नहीं मानता। घराती बाराती सभी बस मज़े लेते हैं। गालियों की बौछार दिल दुखाने के लिए नहीं, बस मज़े के लिए !

पता नहीं कि होली नज़दीक थी इसलिए, या फिर, चुनाव काले कुछ फितरत ही ऐसी हो जाती है कि इस बार नेता-गण अपने विरोधी नेताओं और पार्टियों को अपने व्यंग्य बाण की बौछारों से खूब आहात करते रहे। कहना चाहिए, होली खेलते रहे। कहीं विभिन्न प्रदेश के गधों में फूट डालते हुए गुजरात के गधों और अन्य प्रदेशों के गधों में भेदभाव किया गया तो कहीं रेन कोट पहन कर नहाने की कला को रेखांकित किया गया। ये तो सिर्फ बानगियाँ हैं। संसद तक में व्यंग्य बौछारें माननीय सदस्यों को भिगोती रहीं।

गालियों और व्यंग्य की बौछारें, ज़ाहिर है, केवल लाक्षणिक बौछारें हैं। ये शब्दकेन्द्रित बौछारें हैं। तारीफों की बौछार भी शब्द केन्द्रित ही होती है। अधिकतर इनमें चापलूसी ही होती है। नेताओं का यदि फूलों के हारों से स्वागत न किया जाए तो उसे अपने वजूद पर ही शायद शक होने लगे। सो उसके खैरमकदम पर तारीफों और फूलों की मानों बौछार ही कर दी जाती है।

लेकिन असली बौछारें तो बारिश में तिरछी बूंदों की बौछारें ही होती हैं। हाए! इन बौछारों के हिन्दी सिनेमा में क्याक्या दृश्य नहीं फिल्माए गए हैं। प्रेमी प्रेमिकाएं गाते-भीगते फिसलते-इठलाते इन बौछारों में भीग-भीग जाते हैं। अपने को बचाने के लिए वे रेनकोट का इस्तेमाल नहीं करते। बस भीगते रहते हैं।

आतंकवाद के लिए गोलियों की बौछार हर तरह से ज़रूरी मानी गई है। गोलियों की बौछार से ही आतंक फैलाता है और आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए भी गोलियों की ही बौछार ही काम करती है – दोनों बातें गलत हो सहती हैं, गलत ही हैं शायद, लेकिन हमारे ज़हन में बसी हुई हैं। कोई क्या करे ! छोटी छोटी बातों पर ही हम घूसों और थप्पड़ों की बौछार कर देते हैं।

कितनी नाइंसाफी हैं। कुछ लोग गरीब हैं, इतने गरीब कि उनके पास दो वक्त भोजन तक के लिए पैसे नहीं है; लेकिन कुछ ऐसे भी हैं कि जिनके ऊपर पैसों की बौछार होती है। बौछार से इकट्ठा पैसा वे आसानी से उड़ा और बहा देते हैं।

बौछार के लिए हिन्दी में शायद ही कोई दूसरा समानार्थक शब्द मिल सके। (देशज, ‘बौछाड़’ है )। उदाहरण ज़रूर मिल जाएंगे। निकटतम उदाहरण वर्षा है, वर्षा की झड़ी है, वर्षा की भरमार है। हवा के झोंके से लगातार तिरछी होकर गिरने वाली पानी की बूँदें है। बौछार किसी भी चीज़ की ढेर सारी मात्रा है। बौछार ‘करी’ और ‘कराई’ जाती है। बौछार ‘हो’ जाती है। न चाहते हुए भी बौछार ‘पड़’ भी जाती है - कभी कभी।

--डा० सुरेन्द्र वर्मा (मो० – ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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