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होली विशेष : शशांक मिश्र भारती की कविताएं

 

होली


नये नवीन रंगों को लिए
स्तरंगी परिवेश से निर्मित
स्वर्णिम वसन पहने
शीतऋतु के अवसान में
ग्रीष्मऋतु के प्रारम्भ से पूर्व
ऋतुराज में
आयी है होली।
बिखरती है हरियाली
बौर आता
आम्र विटपों पर
बोलती हैं कोयल
खिलते हैं फूल उपवनों में
शुभ सन्देश देने के लिए
तेरा, होली।
तेरे आने पर
चलती है
रंगों की बौछार
फाग की फुहार
मिलते हैं जन-जन
मित्र और बान्धवों से
भूल जाते हैं बैर सभी जन
तेरे आने से,
होली।
आती है-
तू वर्ष में एक बार
आकर प्रत्येक दिवस तू
जाग्रतकर
हम सभी में समता का भाव
बड़ा अनुग्रह हो
तेरे प्रतिदिवस आने पर
मुझ पर
होली।

 

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बसन्त


बसन्त-
वह गीत है
जिसमें लगी है सभी की प्रीत
आते ही जिसके
खिल जाते हैं कोमल पुष्प
महक उठते हैं उपवन
झूम उठते हैं सभी के मन,
मौसम-
बन जाता है सुहावना
नूतन सौन्दर्य छा जाता है चहुंओर
कई तरह के सतरंगी पुष्प खिलकर
बढ़ाते हैं शोभा
बगीचों की, और-
आकर्षित करते हैं
अपनी ओर मधुकरों को-
खिल-खिलाकर हंस पड़ती है
सरसों-
मधुआ के गेहूं के खेत में,
बोलती हैं कोयलें
हरिया के आम्रमंजरी से
झूंमते बाग में,
तेा कहीं निकल पड़ते हैं
मस्तानों के झुण्ड
पीताम्बर डाले, गीत गुनगुनाते
मादकता, सरसता के मोहक
ऋतुराज के स्वागत
अभिनंदन को।
बसन्त के वंदन को!!

 

 

कोयल


-------
वह
स्वच्छन्द विहंगिनि
छोटी सी कोयल
जिधर चाहती उड़ती
मधुर ध्वनि करती
जहां चाहती
वहीं बसेरा लेती,
वह
लघु विहंगिनि सी
पहुंची अपने देश में।
उसका पथ
शुचि सम,स्वच्छ, सत्कर्म युक्त
जो ल ेजाता था
गंगा-यमुना के देश में,
वेदना होने पर
गीत सुनाती
बसन्त ऋतु आने पर
रंगेलियां मनाती।
मत हो निराश! मत हो निराश!!
यह वाक्य देश वासियों को सुनाती,
न माता-पिता ने
इसको बांधा है
अपने प्रेम-परिणय में
बल्कि इसने ही बांधा है
अपनी स्वच्छन्द विचार धारा को
बसन्त ऋतु के
मोहक सौन्दर्य में।

सरसों के फूल


मैंने देखा-
सरसों के कोमल पुष्प
जो अभी तक पीले थे
आज-
नीले हो रहे हैं,
अपनी व्यथा लोगों से
रो-रोकर कह रहे हैं,
वह-
समझ चुके हैं
जो स्थान पहले उनका था
वह आज-
अनाज ले चुका है;
मनुष्य उनकी ओर से विमुख हो
गेहूं की ओर
भाग चुका है।

 

उद्बोधन


---------
उठो,
तुम फिर एक बार
बुलाती है भारत मां तुम्हे-
कलरव कर जगाते विहग हारे तुम्हें
खोल कर द्वार,
उठो-
तुम फिर एक बार
मंहगाई, आ`िर्थिक संकट से
लड़ने के लिये
राजनीतिक-धार्मिक संकट से
बचाने के लिए
पुकारती है भारत मां
तुम्हें फिर एक बार!

 


राष्ट्रमाता

नारी
नर से बढ़कर
मात्राएं अधिक
पर पीड़िता कौन?
किसके द्वारा
कब- कब और कहां- कहां
विचारणीय प्रश्न ?
कल से आज तक
वर्तमान से भविष्य के गर्त तक
परिवर्तन
कहां किसका और किसलिए
अधिकारों की मांग
स्वतंत्रता मर्यादाओं की
सपेक्षता
अथवा-
अन्धानुकरण, स्वच्छन्दता हेतु
सावधान! राष्ट्रमाता!!
समाज निर्माता
कदम बढ़ाओ, परन्तु-
संभल -संभल के
देना ही है यदि तो दो-
नेतृत्व क्षमता
नैतिकता का आधार
अपनी सन्तानों को
हाँ अपनी सन्तानों को।

 

 

वृक्ष क्यों काटते हैं!


पर्यावरण के रक्षक
प्रदूषण के भक्षक होते हैं वृक्ष
लेकर के कार्बन देते हैं आक्सीजन
जीवन को बनाते हैं सुलभ यह वृक्ष,
गिरने से एक पेड़
फैलता है प्रदूषण हजार गुना
जीने से एक पेड़
लाभ होता है लाखों का;
यह सिर्फ प्रदूषण ही नहीं रोकते
मनुश्य को सिर्फ आक्सीजन ही नहीं देते
बल्कि-
अपने द्वारा मौसम में बदलाव भी लाते हैं
वर्षा के साध्य बन
पृथ्वी की आर्द्रता बढ़ाते हैं
भयंकर ग्रीष्म ऋतु से
व्यथित पथिकों का आश्रय बनते हैं यही वृक्ष
इसलिए-
एक पल जीवन का वृक्ष
हजार पल का लाभ लाता है मानव जीवन में
और यदि-
वही वृक्ष मनुष्य द्वारा स्वार्थवश नष्ट किया जाता है
तो फैलता है प्रदूषण
छिन जाता है पशु-पक्षियों का आश्रय
क्षय होता है मृदा का
उड़ती है धूल
इसलिए-
यह प्रश्न उठता है कि-
वृक्ष क्यों काटते हैं?

 


     
शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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