बुधवार, 1 मार्च 2017

पाँच कविताएं - राजेन्द्र नागदेव

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सत्यम सुंदरम


जिस दीपक से तेल निकाल लिया गया हो
उसकी तड़पती हुई लौ से
सुगंध-बौराई हवा को कोई सरोकार नहीं होता
अनमनी सी मँडरा कर निकल जाती है
और अंधकार में बचा रहता है घुटा-घुटा रुदन,
यह समय का नग्न सत्य है
इस सत्य की सीडी को समय
दिन में कई बार मेरे आसपास चलाता है

साधो! उधर देखो
सूखी टहनी दोनों हाथों से मरोड़ रहा है कोई लगातार
कुछ तो बुरी तरह ध्वस्त हुआ है उसके अंदर
वरना टहनियों को इस तरह बेसबब नहीं मरोड़ता कोई

उस आदमी की आँखों में मोतियाबिंद नहीं है

उसकी मजबूरी,
जो घटता है
नितांत आदिम स्वरूप में निरावृत दिखता है

तुम जब से गुनगुना रहे हो सत्यम शिवम सुंदरम
वह तब से उसमे अपनी जग़ह ढूँढ रहा है

उस आदमी के अंदर कहीं समुद्र मंथन चल रहा है
और अमृत के साथ विष उफन कर सतह पर आ रहा है,
तुम्हें विष को भी पीना होगा ही
इस युग के बड़े-बड़े सत्य असुंदर हैं

साधो! कुछ प्रश्न पूछूँ?
सत्य कहना, सत्य के सिवा कुछ नहीं,
तुम्हारा मन कभी दुविधाग्रस्त नहीं हुआ?
किस योग से साध रहे हो सुंदर और सत्य को एक साथ?
सत्य यह है कि तुम सदियों से भ्रम में हो
जहाँ खड़े हो, एक दोराहा है
दोराहा ही सनातन महासत्य है

जो असुंदर है उस सत्य के लिए कौनसी श्मशानभूमि है तुम्हारे पास?
किस तंदूर में काट कर उसे डालोगे कि निर्धूम जले?
सत्य जब जलता है धुआँ आकाश तक जाता है

मुझे तुमसे कुछ और सवालों के उत्तर चाहिएं
बेलबूटे वाली वह कौनसी उज्जवल चादर है धरती पर
जिसमे छिपा दोगे ‘खैरलांजी’?*
वह असहाय माता, पुत्र और पुत्री याद हैं
जिन्हें मार कर
पशुओं की तरह शवों को बैलगाड़ी में डाल
पूरे गाँव में घुमाया गया था?
उस बैलगाड़ी पर लगे रक्त के धब्बों को
कौनसी सुंदर उपमा दोगे?
सरोवर में खिले लाल कमल कहोगे?

‘निर्भया’ की दिगंबरता छिपाने
झलमल करती कोई रेशमी साड़ी
सौंदर्य के किस करघे पर बुनोगे?

तुम सृजन में चाहते हो सत्यम शिवम सुंदरम?
क्षमा करना
उस दर्पण को पहले तोड़ना होगा
जिसमे समाज का सच्चा चेहरा दिखाई देता है।
. . . . . . . . . . . . . . . . .
* महाराष्ट्र का एक गाँव जिसमे जघन्य हत्याकांड हुआ था.

---------------

अकेली

वह जो बैठी है वहाँ
टूटे हत्थे वाली कुर्सी पर
अभी-अभी लौटी है एक समुद्र की नमकीन यात्रा से अपने घर
कंधे पर पर्स
और पूरे तन पर आफिस की थकान सम्हाले,
कोइ फ़र्क नहीं पड़ता
इस जग़ह को आप घर कहें या रेगिस्तान
कब्रिस्तान या फिर गिलास
जिसे भरा होना था पानी से इस समय
पर खाली है

स्त्री अपने को सात-पच्चीस की लोकल में ढोकर
छोड़ आती है समुद्र की हिलोरों पर
और डूबती-उतराती है
जबतक कि उसकी पावडर-सुवासित देह पर
चिनचिनाती नमकीन पर्त न चढ़ जाए
स्त्री चिनचिनाहट में बैठी है
नल में है केवल हवा का सरसराना

सहज नहीं होता होगा
किसी स्त्री का
अपने लिये मरुभूमि चुन लेना
फिर जलती रेत पर
फफोलों वाले पाँव रखते चले जाना,
मैं सफ़र का मात्र अनुमान कर सकता हूँ
जानता हूँ अनुमान कभी सही नहीं होते

स्त्री, पता नहीं किन सुरंगों से गुज़र कर पहुँची है
बोरिवली की चाल के इस घोंसले में
जहाँ तिनकों के सिवा और कुछ नहीं
कोई घोंसला केवल तिनकों से नहीं बनता,
स्त्री शायद यह भी नहीं जानती
लौटने के लिए कोई सुरंग अब खुली है कि नहीं

स्त्री देर तक बैठी रहेगी यूँ ही
फिर उठा लेगी रिमोट्कंट्रोल
और रख देगी वापस
कि टीवी सीरियल का जाने कौनसा रंग
अतीत के किसी चिथड़े के रंग से मेल खा जाए
और समान तरंगों वाली ध्वनियों के मिलन की तरह
अकस्मात विस्फोट हो जाए
जी उठे कोई दबी हुई आग,
स्त्री जानती है
उसके मेमोरीकार्ड में किसी फ़ायरब्रिगेड का नम्बर नहीं
बल्कि सच यह है कि उसकी दुनिया में
कोई फ़ायरब्रिगेड है ही नहीं

कितनी अकेली हो सकती है एक अकेली स्त्री
स्वयं नहीं जानती
जबतक वह अकेली नहीं होती।
* * *

पृथ्वी के लिए दयामृत्यु



पृथ्वी के लिए जब भी सोचता हूँ
सामने प्रलय ही आता है
जब भी करता हूँ पृथ्वी के लिए प्रार्थना
विनाश की याचना होती है
मुझे आभास न था
प्रार्थना का यह रंग भी हो सकता है
पर हुआ,
मेरी प्रार्थना धीरे-धीरे
एक साँचे में ढलती गई

मैंने यीशू के सलीब को छुआ था
तथागत के साथ अश्वत्थ की छाया में बैठा रहा था देर तक
राम, कृष्ण, मोहम्मद, महावीर सभी के पीछे चला
मेरे उलझे हुए सवाल
मकड़जाल की तरह बढ़ते गए,
सब मौन रहे
अधरों पर केवल अस्पष्ट, अश्रव्य बुदबुदाहट
उस बुदबुदाहट का डिकोड होना असंभव था
वरना कई हजार वर्ष थे होने के लिए

मुझमे सूर्य की तरह स्पष्ट परिणामों की
तृष्णा है
और नदियाँ सभी सूखी हैं

अपार हैं पृथ्वी के दुख
मैं अपनी पृथ्वी के लिए दयामृत्यु चाहता हूँ
कि वह फिर जन्मे अबोध बच्चे की तरह,
अपनी प्रार्थना में इसीलिए
प्रलय को सहेज कर रखता हूँ।
* * *

बीच संवाद में


पुराना था मित्र
पर इतने से शिष्टाचार को नहीं निभा सका

कि कह देता- जा रहा हूँ
बीच संवाद में ही उठ कर चला गया
जैसे जाने से बस उसी का संबंध हो

बहुत से धागे टूट जाते हैं

अचानक किसी के चले जाने से
भूल गया शायद

फिर चुना भी उसने वह रास्ता
जिस पर किसी के लिए
यू-टर्न नहीं होता

पाताल में गया
ग्रह पर चला गया किसी
अंतरीक्ष में भटक गया
कहाँ गया?
घुल गया धुंध में लुप्त होते रास्ते के साथ

आखिर गया कहाँ?

उसे बताना है

कप में छूट गई काफी ठंडी हो गई है
मेज पर उसकी अधूरी ग़ज़लों के पन्ने
बेचैनी से फड़फड़ा रहे हैं,
कहाँ होगा इस समय?
किस पते पर लिखूँ खत?

नहीं, कुछ नहीं लिखूँगा

हो सकता है इस समय वह
अपनी बिटिया के कंधे पर स्नेहिल हाथ रख पूछ रहा हो-
“बेटी! चट्टान से उस दिन जब तू फिसली थी

और नदी में बह गई थी निर्जीव
उसके बाद सत्ताईस लंबे वर्ष

तूने अकेले
कहाँ, किस तरह बिताए?”
* * * *

बूढ़ा पीपल



आँधियों में उड़ रहे थे पत्ते

डालियाँ हवा की हल्की छुअन से थरथराती थीं
झुर्रियों के जाल में जकड़ा बूढ़ा पीपल

फिर भी खड़ा था धरती में पाँव रोपे

अपनी मिट्टी का मोह भयानक होता है

पीपल सोचता था
एक दिन पत्ते आएँगे लौट कर
यह सिर्फ़ उसका सोचना था

पत्ते झेल रहे थे

अज़ीब इलेक्ट्रानिकी नामों वाले
इक्कीसवीं सदी की आँधियों के थपेड़े
जिनकी जग़ह शब्दकोश तक में अभी खाली थी
उनके साथ बहुत दूर
दूसरी दुनिया में उतरे पत्ते
उस मिट्टी में जड़ें फूटीं
तो फिर फूटती चली गईं

सांय-सांय करती तप्त हवा
नंगी डालियाँ

झुक रही रीढ़ के साथ आधा खड़ा पेड़
लगभग रेगिस्तान-सी धरती

कल रेत के नीचे एक नामहीन कब्र होगी

अग़र पत्ते लौटे कभी
बदलती हवा के साथ
पीपल को कहाँ खोजेंगे?
जिन पतों पर चिठ्ठियाँ नहीं लिखी जातीं
वे गुमनामी की अँधेरी गुफा में चले जाते हैं

परास्त विवशता में
बंद दरवाजे के पीछे

बूढे पीपल की पसलियाँ उठती हैं गिरती हैं
दो चार साँसों के साथ

समय के इस पड़ाव पर

शेष साँसों को भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता
कि दरवाजे की घंटी कितनी देर से बज रही है।
* * *

राजेन्द्र नागदेव
डी के 2 – 166/18, दानिशकुंज
कोलार रोड , भोपाल- 462042
फो 0755 2411838 मो 8989569036

ईमेल raj_nagdeve@hotmail.com

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