शनिवार, 11 मार्च 2017

शब्द संधान / रंग बरसे / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

होली आती है तो फिज़ां ‘रंगीन’ हो उठती है। सारे वातावरण में ‘रंग’ घुल जाता है। मिजाज़ तक में ‘रंगीनी’ छा जाती है। एक दूसरे को ‘रंगा जाता’ है। रंग बरसता है। रंग बरसता है तो लोग भीग भीग जाते हैं, और तो और साथियों के चेहरों तक की, ‘रंगाई’ कर दी जाती है। ‘रंगारंग’ होती है होली !

रंग, कोई भी एक वर्ण है। वर्ण केवल जाति सूचक या अक्षर सूचक ही नहीं होता। रंग--सूचक भी होता है, मूलत: रंग सात ही है, जिन्हें एक साथ इन्द्रधनुष में देखा जा सकता है। लेकिन इन सात रंगों की अनेक छटाएं (शेड्स) –हलकी या गहरी- हो सकती हैं। रंगों में रंग मिलाकर अनेक मिश्रित रंग बनाए जा सकते हैं। रंगों की कुल गणना करना मुश्किल ही है। ठीक इसी तरह ‘रंग’ शब्द जब अनेक अन्य शब्दों से संयुक्त होता है तो भी अनेक संयुक्त-पद बन जाते हैं। ‘रंगकार’ ‘रंगरेज़’ है, ‘रंग-भरिया’ है। ‘रंग-साज़’ रंग बनाने वाला है। वह जो अनेक रंगों वाला है, ‘रंग-बिरंग’ है। रंग आनंद है। ‘रंग-महल’ भोग-विलास का स्थान है तो ‘रंग-रस’ आनंदक्रीडा है। ‘रंग-रसिया’ विलासी पुरुष हैं, तो ‘रंग-रली’ मौज उड़ाना है। ‘रंग-रलना’ आमोद-प्रमोद है। होली का पूरा उत्सव ही ‘रंग-पाशी’ है। एक दूसरे पर रंग छिड़कने और रंग से सराबोर कर देने का पर्व है।

आनंद ही नहीं ‘रंग’ नाटक, नृत्य और अभिनय भी है। ‘रंग-क्षेत्र’ अभिनय स्थल है तो ‘रंग-गृह’ नाट्य-भूमि है। ‘रंग-भूमि’ का कल्पित अधिष्ठाता ‘रंग-देवता’ है। ‘रंग-मंच’ वह मंच है जहों अभिनय, नृत्य आदि, किया जाता है। नाट्यशाला ‘रंग-शाला’ है। यह ‘रंग-मंडप’ भी कहलाती है। अभिनेता, नृत्यप्रवीण, संगीतज्ञ और कुशल कलाकार आदि, ‘रंग-विद्याधर’ कहे जाते है। सभी नाटक करने वाले ‘रंगकर्मी’ होते हैं।

रंग रण-भूमि है। युद्धक्षेत्र है। युद्ध क्षेत्र में आम नागरिक नहीं ,’रंगरूट’ ही काम आते हैं।

रंग का क्या है ? वह आता है, चढता है, निखरता है। उतरता है, फींका पड़ता है, उजड़ता है, ढलता है। बरसता है, टपकता है, चूता है। खिलता है, रचता है। बिगड़ता है, रंग में भंग करता है। रंग उड़ता है, बदलता है। और सबसे बड़ी बात, रंग रंगता है।

रंग है तो ‘रंगीनी’ है। श्रृंगार है, सजाव है। चमत्कार है। विलासप्रियता है। ऐशपसंदी है। रंगीन मिजाजी है; रंग है तो ‘रंगीले’ हैं। मौज उड़ानेवाले प्रेमी हैं। ‘रंगीलापन’ है। रंग है तो ‘रंगोली’ है। अल्पना है। रंग है तो ‘रंजक’ हैं, मेहदी है, आलता है। रंग है तो मन प्रसन्न है। ‘मनोरंजन’ है। हल्का-फुलका रंजनकारी साहित्य है।

रंग हैं, ‘रंग-ढंग’ हैं। व्यवहार और आचरण के प्रारूप हैं। बाज़ार के अलग और घर के अलग रंगढंग हैं। इनसे अलग व्यक्ति के निजी अपने रंगढंग हो सकते हैं। कभी ये समाज को रास आते हैं तो कभी रास नहीं आते। अपने रंग-ढंग से ही हम अपना यश / अपयश कमाते हैं। अपना रंग जमाते / बिगाड़ते हैं। बादलों के रंग-ढंग से ही पता चलता है कि पानी बरसेगा या नहीं।

कई समाज उदार नहीं होते। रंग-भेद करते हैं। कालों और गोरों में व्यवहारगत अंतर करते हैं। लेकिन यदि ध्यान से देखें तो सभी इंसानों का रंग एक ही है –भूरा। केवल मात्रा का अंतर है। कुछ कम भूरे होते हैं कुछ अधिक भूरे होते है। बस। रंग नहीं, केवल ‘रंगत’ जुदा जुदा होती है।

दबंग लोग आम आदमियों से ‘रंगदारी” वसूल करने से बाज़ नहीं आते, भले ही कभी पकडे जाएं तो जेल ही क्यों न जाना पड़े। होली में रंगबारी कीजिए, रंगपाशी कीजिए। कृपया अपनी ‘रंगदारी’ न दिखाइए।

उर्दू भाषा में ‘रंग’ फारसी से आया है। फारसी में रंग के अनेक पद-बंध मिलते हैं जो हिन्दुस्तानी ज़बान में आत्मसात कर लिए गए हैं। “रंगपाशी” उनमें से एक है। होली के दिनों में ‘रंगफरोशी’ भी खूब होती है। रंग डालने वाले, ’रंग- अंदाज़’, पक्के रंग डाल कर चहरे और बदन की रंगत ही विचित्र कर देते हैं। ‘रंगीनिए जमाल’ (रूप-सोंदर्य) पर ‘रंगींनिगाहें’ और ‘रंगींनज़र’ पड़े बिना नहीं रहतीं। हर तरफ ‘रेंगे बहारां’ देखते ही बनती है।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद २११००१

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