शनिवार, 11 मार्च 2017

रश्मि शुक्ल की कविताएँ - मेरा अनोखा अनुभव

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मेरा अनोखा अनुभव

आज जब हम गंगा दर्शन को जा रहे थे,
पैर न जाने क्यों इतना घबरा रहे थे,
महसूस हो रही थी एक अजीब सी थकान,
मन ढूंढ रहा था बस बैठने का कोई स्थान,
कुछ दूर तक हमने घुमाई निगाहें,
एक बूढ़ा व्यक्ति थकावट से भर रहा था आहें,
शायद उसको किसी सवारी की थी तलाश,
कोई बैठेगा उसके रिक्शे पे उसको थी आस,
पूछा हमने उसके पास जाकर,
क्या लाओगे हमें गंगा घाट घुमाकर,
मानो उस बुजुर्ग को मेरा ही था इन्तजार,
और वो हो गया हमें ले जाने को तैयार,
बहुत छोटी सी रकम मांगी उसने हमें मंजिल तक ले जाने की,
और हमें भी कुछ ज्यादा ही परेशानी थी आने जाने की,
बैठ गए हम उसके रिक्शे में अपनी थकान को मिटाने के लिए,
और वो रिक्शा खींच रहा था बस थोड़े से पैसे कमाने के लिए,
कुछ दूर चलते चलते हमें हुआ ये अहसास,
की हम अनजाने में न जाने करते हैं कितने गलत काम,
हम सिर्फ अपने शरीर को साथ लेकर चल नहीं पा रहे थे,
और इस बुजुर्ग को हम अनजाने में जाने कितना सता रहे थे,
पसीने में तर बतर जब वो बुजुर्ग होने लगा,
मानो उसको देखकर मेरा दिल कितना रोने लगा,
पहुंचकर मंजिल तक मैंने उससे तय की हुई रकम निकाली,
और उसने मुस्कुराते हुए उन पैसों पे निगाह डाली,
मानो वो कितना खुश था उसे पाकर,
मैंने भी रकम को दिया उसे थोड़ा बढ़ाकर,
इस पूरी घटना ने मुझे इतना कुछ सीखा दिया,
मेरी साड़ी थकान को दो पल में मिटा दिया.

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मेरा सफर

जब भी हम सफर में जाया करते हैं,
हर बार कुछ नया पाया करते हैं,
आज देखा एक बूढ़ी औरत को इतना लाचार,
न थी पैरों में चप्पल न था कोई घर बार,
सोचा रुक कर पूछूं उनसे एक सवाल,
पास जाकर पता चला की उनके पास तो थी ही नहीं आवाज,
कितना बेबस था उन बूढ़ी माँ का संसार,
जिनके जीवन में ग़मों की थी बौछार,
उनकी इतनी तकलीफ देखकर हम कुछ भी न कह पाए,
मगर घर आकर एक पल भी सुकून से न रह पाए,
बार बार उनका बेबस चेहरा आंखों में आता था,
और उनके साथ कुछ न करने का गम मुझे खाता था,
उस दिन से आज तक जब भी हम सफर में जाते हैं,
कुछ जोड़ी चप्पल और कुछ कपड़े साथ में ले जाते हैं,
मांगता नहीं वो कभी जिसमें होता है स्वाभिमान,
और हम ऐसे लोगों को न देकर गिराते हैं अपना ईमान,
मदद करो सबकी इससे आपका कुछ नहीं जायेगा,
शायद घर आकर आपको थोड़ा सा सुकून जरूर मिल जायेगा,

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मौत के बाद

मौत के बाद का भी अजीब नजारा होता है,
अचानक से सारा जहाँ हमारा होता है,
न जाने कितने अफ़साने  सामने आते हैं,
लोग अपने इस हुनर से कहाँ बाज़ आते हैं,
मेरी तारीफ के इतने सारे पुल बनाते हैं,
जैसे न जाने हमे कितना चाहते हैं,
जिन्दा पे तो कभी सहारा दिया नहीं,
मरने के बाद मुझे मंजिल तक पहुचाते हैं,
ये देखकर बाग  बाग दिल हमारा होता है,
मौत के बाद का भी अजीब नजारा होता है,
जिनको याद न था मेरा जन्मदिन कभी,
मेरी बरसी को वे हर साल याद से मनाते हैं,
मौजूदगी में कभी खाने को न पूछा हमे,
मेरे बाद मेरी ही पसंद का सब बनवाते हैं,
काश मुझे महसूस होती सबकी इतनी मोहब्बत,
मगर मेरा दिल  उस वक़्त बेचारा होता है,
मौत के बाद का भी अजीब नजारा होता है,-रश्मि 

RASHMI SHUKL

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