मंगलवार, 28 मार्च 2017

शब्द संधान / ‘उत्तर’-कथा / डा. सुरेन्द्र वर्मा

राहुल मुखर्जी की कलाकृति

उत्तर से हमारा आशय सामान्यत: उत्तर दिशा से होता है। चार दिशाओं में एक दिशा ‘उत्तर’ भी है।

उत्तर का दूसरा प्रमुख अर्थ किसी प्रश्न के जवाब से है – ‘प्रश्नोत्तर’, प्रश्न का उत्तर।

पहले हम उत्तर दिशा की बात करते हैं। उत्तर दिशा, जैसा कि हम जानते हैं, दक्षिण दिशा के सामने वाली अथवा, दक्षिण के उलटी ओर की दिशा है। मान चित्र दिखाते हुए यदि आप किसी जानकार छात्र से पूछें, उत्तर कहाँ है तो वह बिना हिचक अपनी उंगली ऊपर उठा देगा। उत्तर दिशा अन्य दिशाओं की तुलना में ऊपर की ओर है। वस्तुत: शब्द,’उत्तर’ की व्युत्पत्ति ही “उद + तर” से है। ‘उद्’ का अर्थ ऊपर या उच्च से है, अत: ‘उत्तर’ का अर्थ ‘तुलनात्मक रूप से जो ऊपर या उच्च हो’ से है। जो सबसे उच्च हो वह ‘उत्तम’ है – उच्च- उच्चतर- उच्चतम। हिमालय उत्तर में है अर्थात,अन्य पहाड़ों की अपेक्षा उच्चतर है। यह उच्चतर ही नहीं, इसकी एवरेस्ट चोटी उच्चतम है। उच्चतम कहें या ‘उत्तम’ बात एक ही है।

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उत्तर अपेक्षाकृत ऊपर है। हम लोगों का सम्मान करते हुए उन्हें “उत्तरीय” पहनाते हैं। उत्तरीय ‘ऊपर से’ डालने वाला वस्त्र है। ‘उत्तर- पट’ ऊपर से पहनने वाली वस्तु है, जैसे, दुपट्टा या चादर। ‘उत्तरकुरु’ कुरु क्षेत्र का ऊपरी भाग है। उत्तर में, इस प्रकार, ऊपर होने का भाव समाहित है। भारत में ‘उत्तर-प्रदेश’ और ‘उत्तरांचल’ उत्तर, ऊपर, की ओर हैं। ‘उत्तरायण’ सूर्य का मकर रेखा से उत्तर या ऊपर (कर्क-रेखा) की ओर जाना है।

‘उत्तर’ में ‘ऊपर होने का भाव’ तो समाहित है ही, ‘बाद में आने/होने का भाव’ भी समाहित है। जैसा कि हम जानते ही हैं उत्तर का एक अर्थ जवाब भी है और जवाब हमेंशा सवाल के बाद ही आता है। पहले प्रश्न और उसके बाद उत्तर। प्रश्न के अभाव में उत्तर हो ही नहीं सकता – प्रश्नोत्तर। उत्तर -प्राप्त प्रश्न का, या समस्या का समाधान या जवाब है। उत्तर क्योंकि सदैव (प्रश्न के) ‘बाद में’ आता या होता है, अत: उत्तर में बाद का भाव भी जुड़ गया है| हमारी भाषा में न जाने कितने शब्द उत्तर की संधि से बने हैं जो ‘बाद के भाव’ की ओर संकेत करते हैं।

रामायण का ‘उत्तर-काण्ड’ सबसे बाद में आने वाला, सातवां, कांड है। ‘उत्तर-काल’ बाद में आने वाला समय है। “उत्तर-क्रिया” मृत्यु के बाद होने वाली अंतिम क्रिया, अंतेष्टि, है। “उत्तर-गुण” मूल गुण के बाद वाले गुण हैं जो मूल गुणों की रक्षा करते है। ‘उत्तर-मीमांसा’ भारत के षठ-दर्शनों में “मीमांसा” के बाद आने वाला दार्शनिक सम्प्रदाय है।हर भारतीय दार्शनिक सम्प्रदाय का एक पूर्व-पक्ष होता है और एक उत्तर-पक्ष। पूर्व-पक्ष पहलेवाला मूल-पक्ष है और उत्तर-पक्ष बाद वाला पक्ष है जिसमें मूल-पक्ष का मूल्यांकन किया जाता है। ‘उत्तर-वय’ किसी की भी आयु का बाद वाला हिस्सा, वार्धक्य, है। ‘उत्तर-कथा’ बाद वाली कथा, उप-संहार, है। पहले दायित्व है उसके बाद उत्तर-दायित्व है। युद्ध के बाद की स्थिति ‘युद्धोत्तर’ स्थिति है; इत्यादि|

उत्तर बेशक किसी सवाल का जवाब है। लेकिन क्या हर प्रश्न का उत्तर दिया जा सकता है? रसेल के लिए कहा गया है कि उन्होंने जीवन के हर प्रश्न का उत्तर पाने के लिए दर्शन-शास्त्र का अध्ययन आरम्भ किया। वे सोचते थे कि इसमें उन्हें अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जावेंगे। लेकिन उन्हें यह जानकर बड़ी निराशा हुई कि दर्शन-शास्त्र जीवन से संबंधित किसी प्रश्न का उत्तर उन्हें नहीं दे सका। पेड़ हरे क्यों हैं ? इस प्रश्न का उत्तर कि पेड़ हरे हैं क्योंकि वे हरे हैं, इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकता। प्यार क्या है? प्यार बस प्यार होता है, इसके सिवा इसका कोई उत्तर नहीं हो सकता। एक चिंतक का तो यहाँ तक कहना है कि इस प्रकार की वृत्तियों पर वस्तुत: प्रश्न उठाना ही नहीं चाहिए। उन्हें स्वाभाविक-निष्ठा (natural piety) के साथ स्वीकार कर लेना चाहिए। वस्तुत: ‘उत्तर’ इतने महत्त्वपूर्ण नहीं होते जितने कि प्रश्न होते हैं। अधिकतर विचारकों का तो यही कहना है।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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