शनिवार, 25 मार्च 2017

समीक्षा / प्रजा तंत्र के प्रेत के बहाने / यशवंत कोठारी

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हिंदी में उपन्यास कम लिखे जाते हैं, व्यंग्य –उपन्यास तो और भी कम.पश्चिम में जब उपन्यास के मरने की घोषणा जोर शोर से हो रहीं थी तब भारत में अच्छे व्यंग्य उपन्यासों के लिखने कि परंपरा की शुरुआत हो रही थी .राधा कृष्ण, श्रीलाल शुक्ल , हरिशंकर परसाई, शरद जोशी ,सुरेश कान्त ,यशवंत व्यास , शंकर पुणताम्बेकर ,मनोहर श्याम जोशी,भगवती चरण वर्मा,ज्ञान चतुर्वेदी ,हरी जोशी ,यशवंत कोठारी आदि ने नई जमीं तोड़ने की सफल कोशिश की.

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शशि कान्त का यह उपन्यास पढ़ते समय मुझे पुणताम्बेकर का एक मंत्री स्वर्ग लोक में व् ज्ञान का पादुका पुराण याद आये. कहानी हीरा बाबू नाम के एक व्यक्ति पर आधारित है,जो सभी प्रकार के कुकर्मों में फंसते हैं जूही से पिटते हैं. येन केन प्रकारेण मंत्री पद को प्राप्त कर मर कर चित्रगुप्त के सामने पेश होते हैं, वहीँ पर मुकदमे के दौरान हीरा के माँ , बाप व् गुरु को बुलाया जाता है, , लम्बी चौड़ी बहस के बाद नारद की अध्यक्षता में एक कमेटी बनती है, जो रिपोर्ट देकर हीरा बाबू को बचाती है.

हीरा बाबू के सम्मान में कवी सम्मलेन होता है.यह हिस्सा कमजोर है . वे स्वर्ग में जाने से पहले ही बहस में उलझ जाते है. मर कर भी आत्मा में फंस जाते हैं. कुल मिला कर उपन्यास पठनीय हैं.

यह कहानी वैसे तो देवलोक की है मगर सब कुछ इहलोक जैसा ही है. प्रजातंत्र के सूत्रधार हम सब हैं.आज़ादी के बाद की गिरावट से यह सब हो रहा है. हम सब इस के लिए जिम्मेदार है.नरक ,स्वर्ग इह लोक आदि कल्पनायें लेखक के श्रम को दिखाती है. है.व्यंग्य अनेक स्थानों पर मुखर है, सोचने को मजबूर करता है. आखिर यह सब क्यों हो रहा है.

एक पाठक के रूप में मैं शशि को बधाई देता हूँ बाकी तो मठाधीश लोग तय करेंगे . एक बात और इस उपन्यास में एक अच्छे नाटक बन ने की पूरी सम्भावना है, देखें किसी निर्देशक की नज़र इस पर पड़ती है क्या ?

कुछ तकनीकी बातें-
१-प्रेस लाइन में-one hundred seventy fifty only –गम्भीर गलती है
२-मोटे अक्षरों वाला बोल्ड फॉण्ट क्यों काम में लिया गया बहुत ज्यादा ख़राब लगता है.
३-प्रूफ रीडिंग की भी जरूरत है
४-कवर अच्छा है , लेकिन इसे और भी सुन्दर किया जा सकता था.
५-कागज बढ़िया और महंगा है और इस मूल्य में यह किताब सस्ती है


यह समीक्षा मैंने अपने पूरे होशो हवास में लिख दी है सो सनद रहे और हिंदी साहित्य में वक्त जरूरत कम आये .

 

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01 प्रजातंत्र के प्रेत ले. शशि कान्त सिंह शशि

02 प्रकाशक -अमन प्रकाशन , कानपूर

पेज-176 मूल्य -175 रु.

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