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छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा के पर्याय-मंदराजी / वीरेन्द्र बहादुर सिंह

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1 अप्रैल को 106वीं जयंती पर विशेष

छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा के पर्याय-मंदराजी

वीरेन्द्र बहादुर सिंह

छत्तीसगढ़ की पहली संगठित नाचा पार्टी के जनक स्व. दाऊ दुलार सिंह मंदराजी का जन्म राजनांदगांव से पांच किलोमीटर दूर स्थित ग्राम रवेली में सन् 1911 में एक संपन्न मालगुजार परिवार में हुआ था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव की पाठशाला में ही प्राप्त की। उच्च शिक्षा की व्यवस्था गांव में नहीं होने के कारण वे आगे नहीं पढ़ सके। स्कूल का साथ छूटने पर दाऊजी समय व्यतीत करने के लिए गांव के कुछ लोक कलाकारों के संपर्क में आये और उन्हीं से चिकारा एवं तबला बजाना सीखा तथा गाने का भी अभ्यास किया।

सम्पन्न मालगुजार परिवार के चिराग का नाच- गाने की ओर रमना दाऊजी के पिता को बिल्कुल भी पसंद नहीं था लेकिन पिता के विरोध के बावजूद मंदराजी दाऊ गांव में होने वाले सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़- चढ़कर हिस्सा लेते थे। बाद में उनकी यही रूचि और ललक ने जुनून का रूप धारण कर लिया और वे पूरी तरह लोकरंगकर्म के प्रति समर्पित हो गये।

नाचा के प्रति पूरी तरह समर्पित और नाचा को परिष्कृत करने को अपने जीवन का उद्देश्य बना लेने वाले मंदराजी ने सन् 1928-29 में कुछ लोक कलाकारों को एकत्रित कर अपने गांव में रवेली नाचा पार्टी की स्थापना की। रवेली नाचा पार्टी के 1928 से 1953 तक लगभग पच्चीस वर्षों के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ के अनेक मूर्धन्य एवं नामी कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। पच्चीस वर्षों में मंदराजी दाऊ ने नाचा में युगान्तरकारी परिवर्तन किये। रवेली नाच पार्टी के प्रारंभिक दिनों में खड़े साज का प्रचलन या यानि वादक पूरे कार्यक्रम के दौरान मशाल की रोशनी में खड़े होकर ही वादन करते थे। दाऊजी ने इसमें परिवर्तन करके नाचा को वर्तमान स्वरूप में लाया। इसके अलावा मध्यरात्रि को समाप्त हो जाने वाले नाचा के समय सीमा को उन्होंने प्रातः काल तक बढ़ा दिया। उसी प्रकार पूर्व में चिकारा नाचा का प्रमुख वाद्य था। उसके स्थान पर दाऊजी ने नाचा में हारमोनियम का प्रयोग शुरू किया। नाचा में हारमोनियम का प्रयोग सन् 1933-34 में हुआ। 1936 के आते- आते नाचा में मशाल के स्थान पर पेट्रोमैक्स का प्रयोग शुरू हो गया था। रवेली नाचा पार्टी में 1936 में एक पेट्रोमैक्स आ गया था। सन् 1940 के दशक में नाचा के मंच पर एक पेट्रोमैक्स के स्थान पर चार- चार पेट्रोमैक्स का प्रयोग शुरू हो गया था।

सन् 1940 के आते- आते रवेली नाचा पार्टी ने समूचे छत्तीसगढ़ में धूम मचा दी थी। इस पार्टी के कलाकारों की ख्याति दिन- दुनी, रात चौगुनी की दर से बढ़ रही थी। उन दिनों इसके समकक्ष छत्तीसगढ़ में कोई भी पार्टी नहीं थी। सन 1940 से 1952 तक का समय रवेली नाचा पार्टी का स्वर्ण युग माना जाता है। इस अवधि में पूर्णतः व्यवसायिक रूप से उभरकर आने वाली इस पार्टी ने गांव ही नहीं वरन शहरों में भी अपार ख्याति अर्जित कर अपनी कला का डंका बजाया था।मंदराजी दाऊ ने रवेली नाचा पार्टी में अपने गम्मत के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक बुराईयों पर जमकर प्रहार किया तथा जन जागरण लाने में अपनी सार्थक भूमिका निभायी। मद्यपान, बहुपत्नी प्रथा, विवाह में फिजूल खर्ची, सामन्ति प्रवृत्ति, ढोंग जैसे विषयों पर जमकर कटाक्ष किया। इसके अलावा परिवार नियोजन, छुआछूत, औद्योगीकरण, पर्यावरण, स्वास्थ्य एवं साक्षरता जैसे विषयों के माध्यम से जनचेतना जगाने का प्रयास किया। उन्होंने मेहतरीन गम्मत में छूआछूत को दूर करने का प्रयास, ईरानी में हिन्दू- मुस्लिम एकता, बुढ़वा बिहाव में बाल विवाह पर रोक एवं मरारिन में देवर भाभी के रिश्ते को मां और बेटे के रिश्ते में परिभाषित किया। इसके साथ ही उन्होंने कुछ राष्ट्रीय गीतों को भी नाचा में शामिल कर अंग्रेजी राज के खिलाफ जनजागरण का शंखनाद करने का प्रयास किया।

रवेली नाचा पार्टी के उत्तरार्द्ध में 1948-49 में भिलाई के समीप स्थित ग्राम रिगनी में रिगनी नाचा पार्टी का जोर- शोर से अभ्युदय हुआ था। सन् 1951-52 तक यह पार्टी भी प्रसिद्ध के शिखर पर पहुंच चुकी थी। तब समूचे छत्तीसगढ़ में सिर्फ रवेली और रिंगनी नाचा पार्टी का डंका बज रहा था। लोककला मर्मज्ञ दाऊ रामचंद देशमुख ने फरवरी सन् 1952 में अपने गृहग्राम पिनकापार में दो दिवसीय मंड़ई का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के बाद रवेली एवं रिगनी नाच पार्टी का एक- दूसरे में विलय हो गया। यही से रेवली नाचा पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया। बाद में रिगनी- रवेली नाचा पार्टी के प्रमुख कलाकार दाऊ रामचंद देशमुख की सांस्कृतिक संस्था छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंच में शामिल हो गये। कालांतर में प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर के आग्रह पर रिंगनी- रवेली नाचा पार्टी के छह कलाकार क्रमशः मदन निषाद, लालूराम, ठाकुरराम, बापूदास, भुलऊराम एवं शिवदयाल नया थियेटर में शामिल होकर नई दिल्ली चले गये। आर्थिक प्रलोभनों के कारण मंदराजी दाऊ के कलाकार धीरे- धीरे बिखरे गये और कुछ बेहतर करने की तलाश में कुछ कलाकारों ने छत्तीसगढ़ से पलायन भी किया। इन बीते वर्षों में तीन सौ एकड़ के स्वामी मंदराजी दाऊ अपनी सारी संपत्ति नाचा के पीछे होम कर चुके थे। इस कारण वे अपनी नई टीम भी नहीं बना पाये, लेकिन कलाकरों के छोड़कर जाने के बाद भी नाचा के प्रति उनका मोह मृत्युपर्यन्त बना रहा।

24 सिंतबर 1984 को नाचा के इस महान सर्जक एवं हजारों लोक कलाकारों के प्रेरणास्त्रोत ने अंतिम सांस ली। बाद में छत्तीसगढ़ सरकार ने दाऊजी की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए उनके नाम पर दो लाख रूपये का दाऊ मंदराजी सम्मान देना शुरू किया है। दाऊ जी ने अपनी जिंदगी में धन नहीं कमाया बल्कि अपनी संपत्ति को गंवाया। इसके एवज में उन्होंने सिर्फ नाम कमाया जो बहुधा लोगों के लिए मुश्किल होता है। श्री मंदराजी दाऊ समर्पण और साधना के पर्याय थे।

 

(लेखक लोक संस्कृति के अध्येता एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

पताः- 4/5बल्देवबाग वार्ड क्रमांक-16

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