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“घड़ा पाप का भर रहा ” पठनीय तेवरी संग्रह / डॉ. हरिसिंह पाल व अन्य समीक्षाएँ

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समीक्ष्य कृति “घड़ा पाप का भर रहा ” की पंक्तियाँ समकालीन समाज की विसंगतियों , विरोधाभासों और विद्रूपताओं पर करारी चोट करती प्रतीत होती हैं। काव्यकला निश्चय ही भाषा द्वारा भावों की साधना होती है , इस कला में आप (रमेशराज) निपुण हैं। आपकी यह लम्बी तेवरी मन को छूती है

“घड़ा पाप का भर रहा ” नामक काव्य कृति तेवरी काव्य विधा को समर्पित कथ्य और शिल्प की दृष्टि से पठनीय कृति है। रमेशराज ने तेवरी विधा को प्रतिष्ठापित करने में जो सक्रिय भूमिका निभाई है वह सराहनीय है। आप मेरे गृह जनपद अलीगढ़ में रहकर साहित्य की सेवा कर रहे हैं , यह मेरे लिए आत्मीयता से परिपूर्ण तथ्य है , दूसरे आप और हम लगभग समवयस्क भी हैं। आपकी साहित्यिक उपलब्धियां आकर्षित करती हैं।

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“घड़ा पाप का भर रहा ” कृति की लम्बी तेवरी मन को छूती है इसके लिए रमेशराज विशेष बधाई के पात्र हैं। “मौत न हो ” विषय को लेकर आपने “तेवर शतक ” की रचना कर दी , यह हिंदी काव्य जगत की अनूठी घटना है। आपकी ये पंक्तियाँ तो तेवरी को ही व्याख्यायित कर देती हैं ....

शब्द शब्द से और कर व्यंग्यों की बौछार

यही कामना तेवरियों में अभिव्यंजन की मौत न हो।

साथ ही अपने ग़ज़ल और तेवरी का सीमांकन कर नयी दिशा दी है-

आलिंगन के जोश को कह मत तू आक्रोश

ग़ज़लें लिख पर कथ्य काफ़िया और वज़न की मौत न हो।

तेवरीकार श्री रमेशराज द्वारा रचित तेवरी संग्रह “ घड़ा पाप का भर रहा ” की तेवरियों में भाव की प्रवहमन्यता के आगे भाषा की दीवार भरभराकर गिर पड़ी है। हिंदी के तत्सम तद्भव और देशज शब्दों के साथ-साथ आंग्ल और अन्य विदेशी ( अरबी, फारसी, पुर्तगाली आदि ) के भी शब्द बेरोकटोक बहते चले आये हैं। यथा – टाई पेंट, सूट। जहाँ अंग्रेजी के शब्द – गारंटी, डिस्कोक्लब, शर्ट, ऑनरकिलिंग , सिस्टम , कमेटी आदि प्रयुक्त हुए हैं वहीं उर्दू के रहबर, दलाल, जुआ, यार , दावपेंच, शाद, रौशनी, जोश, काफिया, खाक , आफत , खिलवाड़ , बर्बर , फतह , जंजीर , तंगजहन आदि शब्दों के साथ –साथ नये-नये शब्द अपनी ओर से गढ़कर तेवरीकार ने तेवरी की आत्मा में जगह बनाये रखने में सफलता पायी है तथा नव चटकन , नव चिन्तन , वलयन, हिंदीपन , किलकन , घुटुअन , काव्यायन, शब्दवमन, आयन , जैसे शब्दों का प्रयोग निस्संदेह शब्दसाधना का ही सुपरिणाम है।

“ घड़ा पाप का भर रहा ” तेवरी संग्रह की लम्बी तेवरी के अंत में सर्प कुण्डली राज छंद में तेवरी प्रस्तुत कर श्री रमेशराज ने एक अभिनव प्रयोग किया है जो पूर्णतया सफल है।हिंदी का ‘सिंहावलोकन’ छंद भी लगभग इसी प्रकार का है। ‘सिंहावलोकन’ में जहाँ काव्यपंक्ति का अंतिम काव्यांश अगली काव्य पंक्ति का अंश बनता है वहीं सर्प कुण्डली में काव्यपंक्ति का अंतिम काव्यांश या अर्धाली अगली पंक्ति को बनाती है। अस्तु एक ही पुस्तकनुमा कृति में काव्य के दो दो छंदों से सहज ही परिचय हो जाता है।

श्री रमेशराज की पत्रिका ‘तेवरीपक्ष ’ मन को आनन्द प्रदान करती है। तेवरी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रहे , यही वाग्देवी से प्रार्थना है
" घड़ा पाप का भर रहा " तेवरी श्री रमेश राज जी का लाजबाब तेवरी शतक है। इसमें हिन्दी छंद का प्रयोगधर्मी स्वरुप आपको देखने को मिलता है। इस शतक के प्रत्येक तेवर की पहली पंक्ति दोहे की अर्धाली ( 13 , 11 पर यति ) व् दूसरी पंक्ति चौपाई छंद ( 16 मात्राएँ पर यति , व् 14 मात्राएं पर विराम लिए हुए हैं )| इस शतक का एक एक तेवर तलवार की धर से भी अधिक पैना है। इस शतक के तेवर एक ओर जहाँ कुव्यवस्था पर वार करते हैं वहीं दूसरी ओर सुव्यवस्था की राह भी सूझाते हैं। "हाथ उठा सबने किया , अत्याचार विरोध। जड़ने के संकल्प न टूटें, अनुमोदन की मौत न हो " इतना ही नहीं भोली भाली जनता को आगाह करते हुए कहते हैं कि - "ये बाघों का देश है , जन जन मृग का रूप। अब तो चौकस रहना सीखो , किसी हिरन की मौत न हो।" इतना ही नहीं आगे जनता को समझाते हुए कहते हैं कि "संसद तक भेजो उसे जो जाने जन -पीर। नेता के लालच के चलते , और वतन की मौत न हो "।

रमेशराज जी लम्बी तेवरी-तेवर शतक “घड़ा पाप का भर रहा ” की जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम है। रमेश जी गागर में सागर भर दिया है। जनमानस के सरोकारों को मुखरित करने के लिए रमेशजी की रचना धर्मिता प्रसंशनीय है। तेवरी विधा में यह शतक हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर साबित होगा। रमेश जी को एवं उनकी लेखनी को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।

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+डॉ. हरिसिंह पाल , प्रसारक – आकाशवाणी , दिल्ली

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स्वागतयोग्य तेवरी संग्रह –“घड़ा पाप का भर रहा ”

+ ज्ञानेंद्र साज़

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श्री रमेशराज किसी परिचय के मोहताज नहीं। ग़ज़ल के समक्ष एक नई विधा – “तेवरी “ को स्थापित करने में जी-जान से जो मेहनत की है वह स्तुत्य है। तेवरी को ग़ज़ल से बिलकुल अलग रूप में अपनी पहचान स्थापित करता सद्यः प्रकाशित उनका तेवरी संग्रह “ घड़ा पाप का भर रहा “ तेवरी के एक नये रूप की पहचान कराता है। लम्बी तेवरी की शृंखला में आयी इस कृति में दोहा का प्रथम पंक्ति तथा तांटक छंद का द्वितीय पंक्ति में प्रयोग कर एक तेवर के रूप में सामने आया है जो कि ग़ज़ल के कथित शेर से सर्वथा भिन्न है (क्योकि ग़ज़ल के शे’र की दोनों पंक्तियों में एक ही छंद प्रयुक्त होता है)— उदहारणस्वरूप –

“जन जन की पीड़ा हरे , जो दे धवल प्रकाश

जो लाता सबको खुशहाली, उस चिन्तन की मौत न हो।

+ ज्ञानेंद्र साज़ , जर्जर कश्ती , वर्ष -३२, सितम्बर-अक्तू.-15

तेवरी संग्रह –“घड़ा पाप का भर रहा ” में विलक्षण प्रतिभा के धनी श्री रमेशराज ने “सर्प कुण्डली राज छंद ” लिखी है। यह तेवरी, तेवरी की आधी पंक्ति को अगली पंक्ति में डालकर एक दुरूह – बाने में रचित होने के कारण रमेशराज को साहित्य क्षेत्र विशेष पहचान दिलायेगी , ऐसा मेरा विश्वास है। इस तेवरी का आनन्द आप भी उठायें ....

अब दे रहे दिखाई सूखा के घाव जल में

सूखा के घाव जल में , जल के कटाव जल में।

जल के कटाव जल में , मछली तड़प रही हैं

मछली तड़प रही हैं , मरु का घिराव जल में।

मरु का घिराव जल में , जनता है जल सरीखी

जनता है जल सरीखी , थल का जमाव जल में।

थल का जमाव जल में , थल कर रहा सियासत

थल कर रहा सियासत , छल का रचाव जल में।

छल का रचाव जल में , जल नैन बीच सूखा

जल नैन बीच सूखा , दुःख का है भाव जल में।

+ ज्ञानेंद्र साज़ , जर्जर कश्ती , वर्ष -३२, सितम्बर-अक्तू.-15

 

|| तेवरी संग्रह “ घड़ा पाप का भर रहा “ अभिनंदनीय।|

+डॉ. उमा पांडेय

“ घड़ा पाप का भर रहा “ तेवरीसंग्रह शास्त्रविधि से परम्परा का पालन करते हुए रचा गया है जिसमे सर्वजन हिताय की भावना सर्वोपरि है , इसीलिए यह कृति अभिनंदनीय है।

+ डॉ. उमा पाण्डेय

“ घड़ा पाप का भर रहा “ पर एक प्रतिक्रिया यह भी

“ घड़ा पाप का भर रहा “, फूटेगा हर हाल

अब कीचड़ में मित्रवर खिलता नहीं गुलाब।|

+हस्तीमल हस्ती

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