शनिवार, 4 मार्च 2017

व्यंग्य-बीमारी है वरदान -वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’

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एक पुरानी कहावत है-‘लीक लीक गाड़ी चले, लीकहिं चले कपूत । लीक छोड़ तीनों चलें शायर, सिंह, सपूत । इस कहावत को चरितार्थ करने की मेरी प्रबल इच्छा रही है, इसलिए मैं जो भी सोचता, कहता और करता हूँ वह लीक से हटकर होता है । जैसे लोग हर तरह की बीमारी को घातक मानते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता, बहुत सी बीमारियाँ ऐसी भी हैं जिनका संबंधित मरीजों के जीवन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि लाभ ही प्राप्त होता है । शायद आपको यह बात कुछ हजम नहीं हुई, लीक से हटकर जो है, लेकिन घबराईये नहीं, मैं राजनेताओं की तरह आपको टरकाऊंगा नहीं बल्कि अपनी बात स्पष्ट करूँगा ।

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हमारे पड़ोसी श्री बी एल गुप्ता जी हायर सेकेण्डरी स्कूल में गणित विषय के व्याख्याता हैं । आदरणीय गुप्ता जी नित्य जैसे ही स्कूल पहुँचते हैं, एक विचित्र सी बीमारी उन पर धावा बोल देती है, जिसके लक्षण इस प्रकार हैं-

            1. सुस्ती छाने लगती है, याददाश्त जवाब दे जाती है । तभी तो वे प्रार्थना के बाद निर्धारित क्लास में अपना पीरियड (कालखण्ड) लेने न जाकर स्टाफ रूम में जा बैठते हैं । जब कोई उन्हें याद दिलाता है कि सर फलां क्लास में आपका पीरियड है, तभी वे क्लास में जाते हैं वरना खोये खोये से स्टाफ रूम में ही बैठे रहते हैं । दीन-दुनिया से बेखबर ।

            2. हर पीरियड (कालखण्ड) शुरू होने की घंटी दस मिनिट बाद तथा पीरियड समाप्त होने की घंटी दस मिनिट पहले सुनाई देने लगती है और इसीलिए गुप्ता जी अपने हर पीरियड में दस मिनिट बाद पहुँच पाते हैं और पीरियड समाप्ति के दस मिनिट पहले मजबूरन बाहर आ जाते हैं ।

            3. बुद्धि कुंद पड़ने लगती है । अपनी बात ठीक से समझा नहीं पाते, सो छात्रों को पता ही नहीं चलता कि आखिर पढ़ाया क्या जा रहा है ।

लेकिन दोस्तो, स्कूल से छूटते ही आदरणीय गुप्ता जी की बीमारी धीरे घीरे ठीक होने लगती है । घर पहुँचते ही वे एकदम भले चंगे और चुस्त-फुर्तीले हो जाते हैं, जैसे हमदर्द का टॉनिक सिंकारा की पूरी बोतल फटकार गये हों ।उनकी याददाश्त कम्प्यूटर से मुकाबला करने लगती है और बुद्धि मुक्त कंठ से प्रशंसा करने लायक हो जाती है । फिर क्या दोस्तो, स्कूल में कुपोषण के शिकार किसी बच्चे की तरह बुझे बुझे और बेदम दिखने वाले हमारे गुप्ता जी घर पर ट्यूशन के चार-पांच बैच बड़ी आसानी से निबटा देते हैं । अब आप ही बताईये, यदि गुप्ता जी को रोज स्कूल पहुँचते ही बदमाशोलेरिया के दौरे न पड़ रहे होते तो क्या वे स्कूल में ही ठीक से न पढ़ाते? और जब स्कूल में ही ठीक से पढ़ाते तो पन्द्रह-बीस हजार रूपये की अतिरिक्त मासिक इनकम देने वाले इतने सारे ट्यूशन उन्हें क्यों मिलते? तो दोस्तो है न गुप्ता जी की बीमारी तगड़ा फायदा देने वाला वरदान ।

अब तो आपको मेरी बात हजम हो गयी होगी, अगर न हुई हो, तो हाजमोला की एक दो गोलियाँ और दूँ अब ले भी लीजिए संकोच कैसा ।

हमारे पड़ोस में जिला अस्पताल में पदस्थ मेडीकल स्पेशलिस्ट डॉ. वर्मा जी भी रहते हैं । ऊपर वाले की कृपा से उन्हें भी कुछ समय से एक बहुत शुभ बीमारी हो गयी है । साथियों, डॉ. वर्मा को जिला अस्पताल की आबो-हवा बिलकुल भी सूट नहीं करती ।  वहाँ पहुँच कर उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है । मरीज कहता है कुछ उन्हें सुनाई देता है कुछ । बीमारी होती है कुछ वे दवा लिख देते हैं कुछ । कई बार तो मरीज द्वारा सरदर्द की शिकायत किये जाने पर डॉ. वर्मा सर पत्थर से मार लेने जैसी सलाह भी मरीज को दे देते हैं । ऐसे में जिला अस्पताल में उनसे इलाज कराने वही जाता है जिसे आत्महत्या का कोई दूसरा तरीका हड़बड़ी में नहीं सूझता । लेकिन दोस्तों इसमें डॉ. वर्मा की क्या गलती  । अरे गलती तो उन मरीजों की है जो एक बीमार डॉक्टर को भी चैन से नहीं बैठने देते और उसे नाहक परेशान करते रहते हैं ।

कुछ लोग बिना सोचे समझे डॉ. वर्मा पर भ्रष्ट और मक्कार होने का बेबुनियाद आरोप लगाते रहते हैं । मैं पूछता हूँ इसमें कैसी मक्कारी और कैसा भ्रष्टाचार । एक बीमार आदमी की निष्क्रियता को निशाना बनाना क्या ठीक है ? अरे भाई एक बीमार दूसरे बीमार के लिए आखिर क्या कर सकता है । एक मित्र अक्सर कहा करते हैं ‘जिसकी हथेली में हों सुराख हजार, वो किसी को देना भी चाहे तो क्या देगा । ओफ्फो मैं कहाँ विषय से भटक गया । हाँ तो दोस्तों, घर पहुँच कर हमारे डॉ. वर्मा भी पूर्णतः स्वस्थ हो जाते हैं और अस्पताल में डियुटी टाइम में, बीमारी के कारण फुरसत बैठ कर मक्खी-मच्छर मार कर टाइम पास करने वाले ये जनाब घर पर मरीजों से घिरे रहते हैं और हर दिन पन्द्रह से बीस हजार रूपये की अतिरिक्त आय संटारते हुए चिकित्सा विज्ञान की उल्लेखनीय सेवा कर लेते हैं । अरे भाई अब डॉ. वर्मा की बीमारी लक्ष्मी-अर्जन में सहायक सिद्ध हो रही हो, तो इसमें उनका का दोष ।

दोस्तों, हमारे देश में बड़ी संख्या में लोगों को लाभ देने वाली इस तरह की भांति भांति की बीमारियाँ लगातार हो रही हैं और उन्हें लाभान्वित कर रही हैं । इस तरह की बीमारियाँ संबंधित व्यक्तियों के बहुमुखी विकास में भले ही सहायक हों, किन्तु इनके कीटाणु हमारे सांस्कृतिक वातावरण को अवश्य ही नुकसान पहुँचा रहे हैं । ये कीटाणु हमारे समाज और देश की व्यवस्था को धीरे धीरे खोखला कर रहे हैं, इसलिए मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि वह इन वरदान समझी जाने वाली लाइलाज बीमारियों के इलाज खोजने में हमारे चिकित्सा वैज्ञानिकों की मदद करे, वरना इन बीमारियों के बीमारों की निरन्तर बढ़ती संख्या एक दिन देश के लिए बहुत बड़ा संकट पैदा कर देगी ।

वीरेन्द्र खरे 'अकेला' का परिचय
जन्म : 18 अगस्त 1968 को छतरपुर (म.प्र.) के किशनगढ़ ग्राम में
पिता : स्व० श्री पुरूषोत्तम दास खरे
माता : श्रीमती कमला देवी खरे
पत्नी  : श्रीमती प्रेमलता खरे
शिक्षा :एम०ए० (इतिहास), बी०एड०
लेखन विधा : ग़ज़ल, गीत, कविता, व्यंग्य-लेख, कहानी, समीक्षा आलेख ।
प्रकाशित कृतियाँ :
1. शेष बची चौथाई रात 1999 (ग़ज़ल संग्रह), [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली]
2. सुबह की दस्तक 2006 (ग़ज़ल-गीत-कविता), [सार्थक एवं अयन प्रकाशन, नई दिल्ली]
3. अंगारों पर शबनम 2012(ग़ज़ल संग्रह) [अयन प्रकाशन, नई दिल्ली]
उपलब्धियाँ :
*वागर्थ, कथादेश,वसुधा सहित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं रचनाओं का प्रकाशन ।
*लगभग 22 वर्षों से आकाशवाणी छतरपुर से रचनाओं का निरंतर प्रसारण ।
*आकाशवाणी द्वारा गायन हेतु रचनाएँ अनुमोदित ।

*ग़ज़ल-संग्रह 'शेष बची चौथाई रात' पर अभियान जबलपुर द्वारा 'हिन्दी भूषण' अलंकरण ।
*मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं बुंदेलखंड हिंदी साहित्य-संस्कृति मंच सागर [म.प्र.] द्वारा कपूर चंद वैसाखिया 'तहलका ' सम्मान
*अ०भा० साहित्य संगम, उदयपुर द्वारा काव्य कृति ‘सुबह की दस्तक’ पर राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान के अन्तर्गत 'काव्य-कौस्तुभ' सम्मान तथा लायन्स क्लब द्वारा ‘छतरपुर गौरव’ सम्मान ।

सम्प्रति :अध्यापन

सम्पर्क : छत्रसाल नगर के पीछे, पन्ना रोड, छतरपुर (म.प्र.)पिन-471001

मोबा.  न.-9981585601

virendraakelachh@gmail.com

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