शुक्रवार, 24 मार्च 2017

व्यंग्य / आहत होने की चाहत / अमित शर्मा

उमेश बलवरदराजू की कलाकृति

आहत होने की सघनता, आहत व्यक्ति द्वारा अपनी टाइमलाइन पर मचाए गए उधम (आउटरेज) के समानुपाती होती है। जितना ज़्यादा आउटरेज उतनी ही ज़्यादा लाइक, कमेंट और फॉलोवर्स रूपी प्रसादी। असली आहत वही होता जो अपने संपर्क में आने वाले,मतलब अपनी टाइमलाइन पर आने वाले हर व्यक्ति को अपने जितना ही आहत कर सके। आहत धर्म के विस्तार और सुचारू रूप से इसके क्रियान्वयन के लिए इसके अनुयायियों द्वारा अपनी टाइमलाइन पर आए हर श्रद्धालु को आहत धर्म का टीका लगाना ज़रूरी होता है।

आहत होना स्वाभाविक मानवीय (दु)र्गुण है। जटिल मानवीय स्वभाव के विभिन्न कारकों में आहत होना प्रमुखता से सम्मिलित है। भारत में आहत होने के लिए कोई न्यूनतम अर्हता निर्धारित  नहीं की गई है। अर्हता के साथ-साथ आहत  होने का कोई कोटा भी फिक्स नहीं किया गया है, मतलब आहत होने की वैलिडिटी अनलिमिटेड और आहत-टाइम अनलिमिटेड भी हो सकता है और इसकी "प्राइम मेंबरशिप" लेने के लिए केवल "हम विहीन" अहम की ज़रूरत होती है। संविधान में "आहत होने के अधिकार" का कोई जिक्र नहीं किया गया है क्योंकि संविधान निर्माता दूरदर्शी थे ,वे इस अधिकार का जिक्र करके किसी को आहत नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने इस अधिकार को संविधान में ठीक उसी तरह से साइलेंट रखा, जिस तरह से विनाशक Tsunami (सुनामी) में T साइलेंट रहता है।

हमारे यहाँ, कोई भी, कभी भी, किसी भी दिशा से, कितनी भी डिग्री से आहत होने के लिए स्वतंत्र है और इसके लिए उसे केवल अपनी कोमल भावनाओं को थोड़ी  तकलीफ देते हुए उन्हें "तुष्टिकरण की बगिया" से "असंतुष्टि के कोप-भवन" में शिफ्ट करना होता है। ये शिफ्टिकरण इतना नियमित होता है कि भावनाओं की लोडिंग-अनलोडिंग अपने "ईगो" को "लेटस- गो" कह देने मात्र से हो जाती है।

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पिछले कुछ सालों में आहत होने की चाहत में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया ने सारी मुसीबतों से "कोप" (Cope)  करते हुए आहत होने के स्कोप का वृहद विस्तार किया है। सोशल मीडिया आने के बाद से आहत होने की प्रवृति हताहत होने से बची है, क्योंकि सोशल मीडिया ने उन सभी "आहतातुर प्राणियों" को ऐसा प्लेटफार्म दिया जहाँ वो अपनी "आहत-एक्सप्रेस" को कभी भी गंतव्य स्थान के लिए रवाना कर सकते हैं। सोशल मीडिया आने के पहले,ना जाने कितने "आहातातुर-प्राणी" गुमनामी का जीवन बसर कर रहे थे और उनकी "आहत-वाणी" सुनने के लिए पर्याप्त संख्या में कान उपलब्ध नहीं होते थे लेकिन सोशल मीडिया आने के बाद से ये प्राणी अपनी वाणी को आराम-विराम दिए बिना बाकी लोगों को इससे उपराम कर रहे है। मतलब पूर्णकालिक आहत होने के लिए पहले "ऑनलाइन" होना ज़रूरी है। सोशल मीडिया आने के बाद से आहत होना आहतातुरों की नित्य क्रिया में शामिल हो चुका है, अगर गलती से एक दिन ये आहत होने से रह जाए तो भयंकर वाली  कब्ज़ियत का शिकार हो जाते है जिससे कायम चूर्ण के सेवन से भी आराम मिलना मुश्किल होता है। 

राजनीति, खेल, बॉलीवुड,धर्म या अन्य किसी भी क्षेत्र से जुड़ी कोई भी घटना हो या इन से जुड़े किसी सेलेब्रिटी या किसी भी व्यक्ति का कोई भी बयान हो वो रोज़ सोशल मीडिया की भट्टी में ईंधन रूपी कच्चे माल के रूप में झोंक दिया जाता है जो "ट्रेंड" की शक्ल में बाहर निकल कर लोगों को कोमल भावनाएं आहत करने का अपना क़र्ज़ और फ़र्ज़ अदा करता है। 

आहत होने की सघनता, आहत व्यक्ति द्वारा अपनी टाइमलाइन पर मचाए गए उधम (आउटरेज) के समानुपाती होती है। जितना ज़्यादा आउटरेज उतनी ही ज़्यादा लाइक, कमेंट और फॉलोवर्स रूपी प्रसादी। असली आहत वही होता जो अपने संपर्क में आने वाले,मतलब अपनी टाइमलाइन पर आने वाले हर व्यक्ति को अपने जितना ही आहत कर सके। आहत धर्म के विस्तार और सुचारू रूप से इसके क्रियान्वयन के लिए इसके अनुयायियों द्वारा अपनी टाइमलाइन पर आए हर श्रद्धालु को आहत धर्म का टीका लगाना ज़रूरी होता है।

जैसे इंसान रोज़ एक ही सब्ज़ी नहीं खा सकता है उसी तरह से आहत धर्मप्रेमी भी रोज़ किसी नए मुद्दे से आहत होना पसंद करते हैं जिससे उनकी आहत होने की प्रतिभा बहुआयामी हो सके। रोज़ रोज़ किसी ना किसी मुद्दे पर आहत होने वाले व्यक्तियों को देखकर हम जैसे कभी कभार वास्तविक मुद्दों पर ही आहत होने वालों को हीन भावना महसूस होती है कि हम इतने "ऑफेंडातुर" मतलब आहतातुर क्यों नहीं है। 

समाजवाद के पैरोकारों और अन्य बुद्धिजीवियों को इस विषय पर विचार कर, उन भौगोलिक , सामाजिक और भूगर्भीय तत्वों का विश्लेषण कर उन कारणों का पता लगाना चाहिए जिससे पता चल सके कि आखिर समाज  में इतनी असमानता क्यों है। गरीबी-अमीरी के अलावा आहत होने की आवृत्ति और प्रवृति में अंतर भी सामाजिक समानता जैसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य में बाधक है।

 

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