शुक्रवार, 24 मार्च 2017

संस्मरण / किताबों वाली वो लड़की.... / मनोज कुमार झा

वीणा भाटिया

वीणा भाटिया से हमारे संबंध बहुत पुराने रहे। तब से जब मैं दिल्ली पढ़ने गया था। वीणा जी अध्ययन के साथ ही बुक स्टाल का संचालन करती थीं मण्डी हाउस में। बाद में 35, फिरोजशाह रोड स्थित आईसीएचआर और आईसीएसएसआर कै कैम्पस में भी बुक स्टाल संचालित करती थी। मेरी उनसे पहली मुलाक़ात वहीं हुई। फि़र मुलाक़ातों का सिलसिला चल पड़ा। साहित्यिक गोष्ठियों में हमेशा मुलाक़ात होती रही। मैं अक्सर ओल्ड कैम्पस, जेएनयू स्थित गोरख पाण्डेय के छात्रावास के कमरे में मिलने जाया करता था। कई बार वीणा जी भी आती थीं। हम साहित्यिक चर्चा में मशगूल रहते थे। गोरख जी कई बार भोजपुरी के अपने गीत सुनाते थे। जन संस्कृति मंच की गोष्ठियों के संबंध में विचार होता था। बहुत मधुर स्मृतियाँ हैं। पर वीणा जी जिस खास बात के लिए अपनी मित्र-मण्डली में जानी जाती थीं, वह था पुस्तकों के प्रति उनका असाधारण प्रेम। यह ईश्वर-कृपा से अभी भी बना हुआ है और उम्मीद है आगे भी बना रहेगा। मैंने गोर्की की किताब 'मेरा बचपन' इंटरमीडिएट के दौरान ही पढ़ ली थी, पर वीणा जी ने 'मेरा बचपन' का एक खास ही संस्करण मुझे भेंट किया, जिस पर उन्होंने अपने हस्ताक्षर किए। वह पुस्तक आज भी मेरे पास मौजूद है। यही नहीं, और न जाने कितनी किताबें उपहार में दी, जो मेरे लिए अमूल्य थाती हैं।

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प्रसंगवश कहना चाहूँगा कि एक बार वीणा जी ने मण्डी हाउस में फुटपाथ पर किताबें लगा रखीं थीं। तभी दो पुलिसवाले आए और किताबें हटाने को कहा। वीणा जी अड़ गईं। उन्होंने कहा कि जब शाक-भाजी, कपड़े और जूते फुटपाथ पर बिक सकते हैं, तो किताबें क्यों नहीं। यह मामला ऊपर तक पहुँचा और वीणा जी की जीत हुई, पर बाद में टेबल पर किताबें रखी जाने लगीं।

वीणा जी के साथ खास बात ये है कि वह अपने जानने वालों के बीच में उस समय किताबों वाली लड़की कही जाती थीं। एक बार उन्होंने मुझे श्रीराम सेंटर पर बुलाया। मैं गया तो दिखी नहीं। मैंने एक जानकार से पूछा तो उसने कहा - अरे, वह किताबों वाली लड़की! यहीं कहीं होगी। फिर वे मिलीं। वीणा जी अपने साथ हमेशा एक थैला रखती थीं, जिसमें किताबें भरी रहती थीं। वह किताबें दिखातीं और चलते-फिरते उन्हें बेच देतीं। कई बार जब पैसे न हों तो पढ़ने दे देती थीं। महाश्वेता देवी की किताबों का उन्होंने काफी वितरण किया।

इसके अलावा, वो एक बार में डेढ़ सौ-दो सौ पोस्टकार्ड खरीदती थीं और दूर रहने वाले अपने साथियों को नई किताबों के बारे में जानकारी देती थीं। मैं जब डेहरी ऑन-सोन अपने घर रहने लगा तो वीणा जी हर हफ्ते ही पोस्टकार्ड लिखती थीं, जिसमें किताबों और साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधयों के बारे में सूचना होती थी। कई बार जब वह समझ जाती थीं कि छोटे कस्बे में किताब नहीं मिलेगी तो डाक से भेज देती थीं अपने हस्ताक्षर के साथ। वे पोस्टकार्ड और किताबें मेरे लिए अनमोल हैं।

यही नहीं, जब हमें किसी किताब की ज़रूरत होती और वह आसानी से नहीं मिलती, तो हम सब कुछ वीणा जी पर ही छोड़ देते। हमें विश्वास रहता कि कहीं न कहीं से वे किताब उपलब्ध करा ही देंगी। इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ कि मुझे उनके संपर्क में रहने का मौका मिला। साथ ही, उनसे कई बातें सीखीं भी। समय के साथ यह संपर्क कटता चला गया। आगे चल कर मैं बहुत गर्दिश में रहा। 2012 में जब भोपाल आया तो फेसबुक ज्वाइन किया। तब फेसबुक पर इनसे मुलाक़ात हुई। तब से हम साथ साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े। दिल्ली में रहने के दौरान हमने कुछ समय तक सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ इंस्ट्रक्शनल टेक्नोलॉजी संस्था में लोकचेतना साहित्य प्रोजेक्ट पर काम किया। चार खण्डों में सामग्री तैयार की। आगे चल कर वीणा जी यूनाइडेट नेशन्स डेवलपमेंट प्रोग्राम की फेलो बनीं। यूनिसेफ के साथ जुड़ी रहीं। झुग्गी बस्तियों में बच्चों के लिए लाइब्रेरी स्थापित करने का काम किया। कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद किया है। बच्चों के लिए बहुत ही सुन्दर कविताएँ लिखती हैं। साहित्य चयन संस्था की कई महत्त्वाकांक्षी योजनाएँ हैं। वीणा जी का स्वभाव बच्चों की तरह सरल है। मैंने इनके लिए दो पँक्ति लिखी थी सन् 12 में जिसे मैं समस्त स्त्री जाति के प्रति अपनी सच्ची भावना मानता हूँ।

ममता की मूरत मन में साकार
ज़हरबुझे समय में अमरित की धार

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Email- manojkumarjhamk@gmail.com

Mobile - 7509664223

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  1. वीणा भाटिया। साहित्य और समाज के प्रति समर्पित एक ऐसी महिला जो हमेसा अपने आसपास की घटनाओं को लेकर संवेदनशील रहती हैं और वो हमेशा इस प्रयास में होती हैं कि साहित्य के द्वारा आने वाली पीढ़ी को हम कुछ अलग दे सकें। बहुत ही कर्मठ और सुशील महिला हैं। मैं इनकी रचनाओं को काफी दिनों से पढ़ता रहा हूं। दैनिक भास्कर.कॉम भोपाल ज्वाइन करने के बाद पहले से ज्यादा पढ़ा और जानने की कोशिश की। आप एक ईमानदार और सज्जन महिला हैं। विभिन्न समाचारपत्रों, मैगजीन में छपे आपके लेख व कविताओं का हम सभी रसास्वादन करते रहते हैं। आपकी लिखी हुई कविताओं से आपके शानदार व्यक्तित्व व सोच का पता चलता है। विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष तौर पर ये कविताएं छपी थीं।
    1. पॉलिथीन
    प्लास्टिक की थैलियां
    रंग-बिरंगी आकर्षक थैलियां
    सामान लाने-ले जाने में
    काम दिन भर आती थैलियां।

    हमारे इस पर्यावरण को
    नुकसान पहुंचाती थैलियां
    थैली को जब गाएं खाएं
    फिर तो वो मर ही जाएं।

    अपने आप नहीं नष्ट होती
    नाले-नालियां बंद कर देती
    आओ एक अभियान चलाएं
    पॉलिथीन को हम सब भगाएं।

    हम बच्चे जिद पर अड़े हैं
    पॉलिथीन से भिड़े हैं
    कल हमारा हो सुंदर
    यही प्रण लिए खड़े हैं।

    2. मित्रता का बिगुल बजाएं
    दिन भर आंगन में आते
    आवाजें मोहक निकालते
    हम इंसानों से होते
    हमसी बातें करते पक्षी।

    अगर पक्षियों को देखना चाहें
    अल सुबह उठ ही जाएं
    सुबह से ही शुरू हो जाती
    इनकी चीं-चीं काएं-काएं।

    राष्ट्रीय पक्षी हो मोर अगर
    तो दर्जी भी गौरैया है
    बाज है अपना शक्तिशाली
    प्यारी लगती सोनचिरैया है।

    कठफोड़वा लकड़ी काट कऱ
    लकड़हारा कहलाता है
    बया हमसा ही बुनती
    गिद्ध सफाई कर्मचारी है।

    दाना-पानी रख कर
    वर्ड हाउस भी बनाएंगे
    फल के पेड़ लगा कर
    मित्रता का बिगुल बजाएंगे।

    3. नीम का पेड़
    सीढ़ि‍याँ चढ़ कर आया मैं उपर
    खुली थी खिड़कियाँ हवा
    आ रही थी फर-फर
    झांका जब बाहर
    दिखा एक लहराता पेड़।

    सुन्दर था
    स्वस्थ था
    चिड़ि‍यों का घर था।
    चहकती थी चिड़ि‍या
    फुदकती थी चिड़ि‍या
    गाती थी चिड़ि‍या
    खुश था नीम का पेड़।

    आया पतझड़
    उड़ गए पत्ते
    रह गई डालियाँ
    नहीं रही छाया
    नहीं रही शीतलता
    तब भी...
    चहकती थी चि‍ड़ि‍या
    गाती थी चि‍ड़ि‍या
    और...
    खुश था नीम का पेड़।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर संस्मरण। पढ़कर बहुत अच्छा लगा। वीणा जी का किताबों के प्रति प्रेम और दोस्तों के प्रति व्यवहार सचमुच प्रेरक है।

    उत्तर देंहटाएं

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