मंगलवार, 14 मार्च 2017

सुशील सिद्धार्थ--कुछ बेतरतीब नोट्स / ज्ञान चतुर्वेदी




सुशील सिद्धार्थ पर लिखना इतना आसान काम भी नहीं।

किसी बहुत अच्छे लेखक के बारे में यह जानने और लिखने की कोशिश करना कि वह इतना अच्छा क्यों है, वास्तव में एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। विद्वान व्यंग्य विशेषज्ञ लोगों की शिकायत भी है कि व्यंग्य को समझने और समझा पाने वाली कोई शास्त्रीय आलोचना शब्दावली और पद्धति नहीं बनी है। जो है भी, वह या तो इतनी क्लिष्ट है कि हम जैसे सामान्य आदमी की समझ में नहीं आ पाती या फिर वह ऐसी है जो व्यंग्य में सपाटबयानी को ढकने में इत्ती ज़्यादा काम आई है कि अब वह कुछ भी ढंग की और चीज़ को उघाड़ने के क़ाबिल नहीं रही। सरोकार, प्रहार, चोट, व्यंग्यार्थ, विडंबना, विसंगति और ऐसे ही अन्य भदरंग से रंगबिरंगे तागों से बुनी भाषा की यह मैली चादर इतनी झीनी और घिसी हो चुकी है कि वह न तो ओढ़ने के काबिल रही, न ढांकने के। गो कि उसी चादर को दुशाले की तरह सम्मानपूर्वक ओढ़ाने में ही हिंदी व्यंग्य का एक बड़ा मंच शहर शहर मुब्तिला है।

मेरे से व्यंग्य के अलावा हिंदी आलोचना की प्राध्यापकीय धारा में कचरे की तरह तैरते अललटप्पू शब्द भी कभी याद नहीं हो सके। मैंने पूरा जीवन कोशिश की पर ऐसा लिखना नहीं सीख पाया जहां किसी का बाप भी पता न कर सके कि बात लेखक की तारीफ़ में की जा रही है, या बुराई में। मैं किसी को अच्छा लिखते हुए उसे बुरा सिद्ध करने की बारीक होशियारी सीखने से रह गया। मुझे तो कोई लेखक, कोई किताब, कोई रचना अच्छी भर लग जाए तो अपनी सीमित शब्दावली में ही बताने लगता हूं कि इसमें मुझे क्या अच्छा लगा। यहां मेरे भाषा कौशल से ज़्यादा मेरी ईमानदारी काम आती है। सुशील सिद्धार्थ जैसे अपने पसंदीदा व्यंग्यकार के बारे में लिखने से पूरव यह सब एकदम शुरूआत में ही लिख देना मुझे न जाने क्यों बड़ा आवश्यक लगा। मैं कोशिश करूंगा कि सुशील के व्यंग्य को जैसा , जितना तथा जिस तरह से मैंने समझा है उसे बयान भी उसी शिद्दत से कर सकूं जैसा महसूस करता रहा हूं। पर कोई गारंटी नहीं दे पा रहा कि मेरी यह बात किस हद तक मुकम्मल कहाएगी या बन पाएगी। बहरहाल।

कई बातें बेतरतीब नोट्स की तरह मन में आ रही हैं। वैसी ही लिखे भी दे रहा हूं। कई बार किसी तरतीब का न होना भी बेहतर ही होता है।
---तो पहली बात जो मुझे सुशील के सारे व्यंग्य लेखन में रेखांकित करने योग्य लगती है वह यही है कि वे अब तक हुए अपने पूर्वज, अग्रज, समकालीन तथा अपने बाद कई पीढ़ी के व्यंग्य लेखन से एकदम अलग लिख रहे हैं। वे श्रीलाल जी के साथ लंबे समय तक शिष्यवत् रहे हैं पर श्रीलाल जी से एकदम अलग हैं। वे ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य के मुरीद हैं, पर ज्ञान चतुर्वेदी से एकदम अलहदा तेवर हैं उनके। और सुशील सिद्धार्थ उस विराट 'सपाटबयानी संप्रदाय ' से तो इतने जुदा हैं कि एकदम ही अलग नज़र आते हैं। अपनी विधा में सर्वश्रेष्ठ से प्रेरणा लेकर, उसे आत्मसात करके फिर एकदम ऐसा कुछ लिखना जिस पर आपकी ही अनोखी छाप हो, ऐसा करने वाला ही फिर विधा में अपनी पहचान बना पाता है। सुशील ने बनाई है। वे रोज़ यह पहचान बनाए जा रहे हैं। उनका व्यंग्य एकदम अलग से पहचाना जा सकता है। उनका नाम न भी लिखा हो, पाठक जान जाएगा कि यह सुशील सिद्धार्थ का व्यंग्य होना चाहिए। ...या जब कुछ लोग सुशील सिद्धार्थ जैसा लिखने की अच्छी बुरी कोशिश भी करते दिखने लगें, तब जान लो कि सुशील सिद्धार्थ ने जो व्यंग्य लिखा है वह लंबे समय तक याद रखा जाने वाला है।

एकदम अलग होते हुए अपनी श्रेष्ठता को कायम रखना ऐसा सरल काम भी नहीं है। बड़ा परिश्रम अध्ययन, धैर्य, विधा की समझ और रचनात्मकता की दरकार होती है। प्रतिभा तो चाहिए ही। एकाग्रता भी। और विधा के प्रति खांटी ईमानदारी भी। लिखने की भूख भी। मुमुक्षा की हद तक भूख। और अंदर अंदर गहन असंतोष भी --अब तक के लिखे के प्रति असंतोष--चाहे वह ख़ुद का लिखा हो, या दूसरों का। सुशील में कमोबेश यह सब है। तभी तो बहुत कम समय में उनकी एकदम अलग सी पहिचान बनती लग रही है। समकालीन व्यंग्य लेखन में एकदम अलग तरह का व्यंग्य लिखकर वे बिलकुल अलग खड़े दिखने लगे हैं।

मेरी नज़र में यह एक बेहद महत्वपूर्ण बात है, वर्ना तो लोग दशकों से व्यंग्य लिख रहे हैं, (तथाकथित)व्यंग्य उपन्यास तक लिखते रहे हैं, कॉलम गोड़े जाते हैं...पर उन्हें उस तरह से कभी किसी के द्वारा नोटिस नहीं किया गया जैसा सुशील को हाल के समय में किया गया है। यह तभी हो पाता है जब आप अपनी विधा में कोई नया रास्ता बनाने का माद्दा रखते दीखते हों। भाषा, कहन, मुहावरे और तेवरों में सुशील का व्यंग्य इतना अलग है कि सबका ध्यान आकर्षित कर रहा है। वे एकदम अलग हैं। और यह बहुत बड़ी बात है। बहुत ही बड़ी। बेहद महत्वपूर्ण।

तब अगली बात। वह ये कि वे इतने अलग कैसे हैं?
क्या है जो सुशील सिद्धार्थ को ऐसा अनोखा व्यंग्यकार बनाता है? उनकी एक रचना 'लोकसाहित्य के अहेरी' का उदाहरण ले लें। उनके बेहद महत्वपूर्ण व्यंग्य संग्रह 'नारद की चिंता' की यह पहली व्यंग्य रचना है। हिंदी साहित्य और बुद्धिजीवियों का भ्रष्ट संसार यूं भी सुशील का प्रिय क्षेत्र है। उनके बहुत से व्यंग्य इसी पृष्ठभूमि में रचे हैं। वे अपनी कहन के सर्वश्रेष्ठ तेवरों में इन रचनाओं में दिखते हैं। 'मालिश महापुराण' नामक व्यंग्य संग्रह की पहली बहुचर्चित व्यंग्य रचना 'उत्पादन का डिब्बा और विवरण' भी साहित्यिक संसार की उठापटक को लेकर है। सुशील इन रचनाओं को जिस आनंद से लिखते हैं वह इन रचनाओं में पंक्ति दर पंक्ति छलकता है। बहरहाल। वह बात अभी तनिक देर बाद।

'लोकसाहित्य के अहेरी' नामक इस रचना में सुशील लोकसाहित्य पर शोध के बहाने अपने स्वार्थ साधने वाले हिंदी के चंद नाकारा, आलसी तथा लंपट से प्राध्यापकों की गांवयात्रा के छोटे से बहाने से बड़ा व्यंग्य रचते हैं। मज़े लेकर वे एक शोध यात्रा को इन विद्वानों द्वारा अकादमिक दिशाओं से विशुद्ध लंपटई की दिशा में जानबूझकर ले जाने की कथा कहते हुए कहन के अपने नितांत निजी शोख़ अंदाज़ में हैं।

हिंदी के तीन 'महापुरुष' एक 'महास्त्री' को साथ लेकर लोकसाहित्य की संभावनाएं तलाशने गांव जा रहे हैं। दरस्ल, वे शोध करने नहीं , ' लोकसाहित्य के शिकार ' पर निकले हैं। सबके अपने इरादे हैं। इरादे नेक हैं। एक विद्वान 'लोकसाहित्य का सिर अपने ड्राइंगरूम में लगाना' चाहता है। दूसरे लोकसाहित्य की खोज के बहाने महास्त्री में सखीभाव खोज रहे हैं। एक विद्वान ग्रामीण युवती के लोकगीतों को नोट करते हुए उनमें तथा उन्हें सुनाने वाली युवती में वही लुभावनी गंध, वही भराव, वही कसाव नोट करके 'अहोभाव' से भर उठे हैं। एक और शोधार्थी वहां भी अपनी जाति के थोथे गौरव बोध से सने हुए, नीची जात वालों को दुलारते घूम रहे हैं। एक आम से लगते विषय को सुशील धीरे से बड़ी ऊंचाइयों पर ले जाते हैं।
यहां तक लिखते लिखते अचानक ही मेरे मन ने मुझसे ही यह प्रश्न किया है कि मैंने सुशील के ' लोकसाहित्य के अहेरी' को ही क्यों चुना?मुझे तो सुशील के विचार, शैली, कहन और व्यंग्य तलाशने की प्रक्रिया को समझते हुए अपनी बात उठानी थी। मैं उनकी किसी भी रचना के बहाने यह बात कर सकता था। तो 'लोकसाहित्य...' तो निमित्त मात्र है। यह तो बस यूं ही। उनकी किसी भी रचना को उठाता तो उसको ही सुशील के रचना संसार में प्रवेश का मार्ग बना लेता। इस एक रचना में कई ऐसी बातें हैं जिन्हें नोट करो तो सुशील के व्यंग्य की गहराई के कारक तत्व पकड़ में आते हैं। यहां मैंने इसी रचना को पढ़ते हुए उनकी रचना प्रक्रिया को समझना चाहा है। इस रचना में जो एक सहज प्रवाह और कहन है, वही एक विशेषता की तरह सुशील के पूरे लेखन में एक मज़बूत धागे की तरह अंतर्निहित महसूस किया जा सकता है। यह ऊपर से दिखाई नहीं देता, परंतु मानों सुशील का सारा लेखन इसी धागे में पिरोया हुआ है।
वे व्यंग्य कहने में सायास नहीं हैं। उन्हें व्यंग्य में बात करने का शऊर है। व्यंग्य नैसर्गिक प्रवाह में आता है उनके पास। मैंने इस रचना के बहाने उनके इसी तागे को परखा है जिसे आप रचना प्रक्रिया कह सकते हैं। इसी तागे की पड़ताल--इसकी रंगीनियत, इसकी मज़बूती, व्यंग्य के इसके सरोकारी तंतुओं की शक्ति तथा इसकी अनोखी बुनावट--सबको समझना मानो व्यंग्य के सौंदर्यशास्त्र की बारीकियों से गुज़र जाने जैसा है।

'लोकसाहित्य के अहेरी' के पुनर्पाठ के ज़रिए मानो सुशील के पूरे व्यंग्य का सिंहावलोकन किया जा सकता है। सुशील के व्यंग्य में कुछ बातें ख़ास हैं। एक तो यह कि साहित्य, लोकसाहित्य, लोककला, समाजशास्त्र के बहुतेरे पक्ष , लेखक विचारक बुद्धिजीवियों की विसंगतियां और विडंबनाएं उनके प्रिय व्यंग्य विषय हैं। इस रचना की भी मूल धारणा वहीं से जन्म लेती है। 'नारद की चिंता' तथा 'मालिश महापुराण' के अनेकानेक व्यंग्य इसी संसार के इर्द गिर्द हैं। उन रचनाओं के नाम नहीं गिना रहा। आपने पढ़े ही होंगे। यह शायद इसलिए है कि सुशील का जीवन पत्रकारों प्रकाशकों लेखकों की दुनिया के बीच डूबते उतराते हुए ही बीता है। बीत रहा है। वे जानते हैं इस जन्नत की हक़ीक़त। सुशील ने सुंदर पंखों वाले इस मोर के बदसूरत पांव देखे हैं क़रीब से। बड़ी बड़ी बातें करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों की तिकड़मों, चालाकियों, ओछेपन, भय, घबराहट, असुरक्षाबोध तथा थोथे दंभ को देखकर वे आहत भी हुए हैं और आश्चर्यचकित भी। वे उनकी बड़ी बड़ी बातों तथा दावों के निरे कच्चेपन को ख़ूब पहिचानते जानते हैं। वे अपनी रचनाओं में हर ऐसे की पूंछ उठाकर उसकी असलियत उघाड़ने का काम कर रहे हैं। कुछ लोग इसे 'अश्लील हरकत' भी मान सकते हैं। सुशील जब जब किसी ऐसे विषय के दोमुंहेपन पर लिखते हैं वे अपना सबसे बढ़िया रच डालते हैं। रम जाते हैं वे इन रचनाओं में। उनका वृहद अध्ययन और प्रकाशन संसार में जीविकायापन करने के उनके अच्छे बुरे अनुभव बड़े काम आए हैं। वे इन रचनाओं में बतरस का मज़ा लेते हैं।
ख़ुद पर व्यंग्य सबसे कठिन होता है। इन रचनाओं में सुशील यहां वहां स्वयं को भी नहीं बख़्शते। वे यहां ऐसी 'व्यंग्य की इंप्रोवाइज़ेशन कला' का ऐसा उदाहरण पेश करते हैं, और हर रचना में करते हैं, कि पाठक सारी विसंगतियों को पहिचानने के साथ ही बेहद मज़े लेता जाता है। यहां उनके लेखन का खिलंदड़ा अंदाज़ और बारीक शरारत की हरारत पूरी रचना को यूं पकड़े रहती है कि विषय एकदम नये आलोक में दमकने लगता है। ...और यह आसान काम नहीं है।

सुशील की अगली विशेषता है, समाज की विसंगतियों की उनकी गहरी समझ और निर्ममता से उनको उघाड़ने की उनकी ईमानदार चिंता। उनकी चिंताओं के दायरे में--स्त्री है, जातिवाद है, सामंती सोच है, ऊंच नीच है, मज़दूर वर्ग है, मालिकों का दोगला व्यवहार है, नेता है, बुद्धिजीवी है, राजनीति है, मीडिया है। सब है। सामाजिक समस्याओं तथा दोहरी मानसिकता के घटाटोप में बेहद गहरे उतरकर जैसा प्रहारात्मक लेखन सुशील का है , वह अपने आप में अद्भुत है।

मैं आगे उनकी एक बेहद महत्वपूर्ण रचना ' भले घर की लड़की' की बात करके इसे और स्पष्ट करूंगा। फिलहाल तो हम 'लोकसाहित्य के अहेरी ' को ही लें। रचना के मुख्य पात्र ऊंची जाति के शहराती महाविद्यालयीन शिक्षक हैं। वे लोक साहित्य की तलाश में शोध के बहाने गांव पहुंचे हैं। सुशील पूरी रचना में इन पात्रों की जाति नहीं बता रहे, पर आज़ादी के इतने दशकों बाद भी भारतीय सामाजिक संरचना में जाति , ऊंच नीच और सामंती सोच को वे मात्र दो या तीन संवाद डालकर वे रचना का तेवर बदल डालते हैं--
1.सरऊ दिमाग खराब है। ..ये तेरे हाथ का पानी पिएंगे, ठाकुर होकर।

2.छोटकन्ने सिंह सच्ची कहते हैं बड़कऊ कि सालों को मोटाई सवार है। किसी को परंपरा का ध्यान नहीं। इनके बाप दादा...सौ सौ जूते खाए, मगर परंपरा नहीं त्यागी।
3.जब तक हमारा बस चला जूतों के जोर पर इसे बचाए रखा। अब क्या होगा। ...
सुशील लोकगीतों की खोज के लिए गांव पहुंचे तिकड़मी बुद्धिजीवियों की ख़बर लेते हुए गांव के पूरे सामाजिक परिदृश्य की विसंगतियों को भी समेटते चलते हैं। जिससे व्यंग्य एकरेखिक न होकर ज़्यादा संपूर्ण और बड़ा बन जाता है। इस तरह विसंगति का एक बड़ा कैनवास खुलता है पाठक के सामने और एक छोटी सी लग रही रचना अचानक बड़ी बन जाती है। यहीं सुशील भी अचानक ही 'बड़े' बन जाते हैं।

अब यहां सुशील की रचना ' भले घर की लड़की ' का पूरा ज़िक्र तनिक मौज़ूं होगा।

हमारे समाज में, मध्यवर्गीय परिवार में एक 'भले घर' की 'लड़की' की स्थिति वास्तव में कितनी दारुण है और यथार्थ कितना जटिल, भयावह और स्त्री विरोधी है--इसकी पड़ताल करती रचना है उनकी। ऐसी रचना में हमेशा यह डर लगा रहता है कि पलक झपकते ही व्यंग्यकार उपदेशात्मक, समाजसुधारक मुद्रा में आ सकता है। ऐसी रचना लिखते हुए व्यंग्यकार प्रायः मनहूसियत की शैली में इतना गंभीर होकर बयानबाज़ी करने लगता है कि रचना एक शुष्क निबंध सा बनकर रह जाती है। प्रायः ऐसे विषय पर 'व्यंग्यकार' इतनी मिकदार में रचना में यत्र तत्र सर्वत्र सिर घुसाता दीखता है कि व्यंग्यकथा के पात्र दोयम दर्जे के रह जाते हैं। व्यंग्य तिरोहित हो जाता है और बयानवीर व्यंग्यकार की सपाटबयानी रचना को कसके गर्दन से यूं पकड़ लेती है कि वह छटपटाकर दम तोड़ देती है। स्त्री विमर्श पर व्यंग्य यूं भी कम हैं। हैं तो वे मात्र बयान जैसे ही हैं। ऐसे माहौल में 'भले घर की लड़की'एकदम ताज़ा हवा की तरह है।

इस भले घर की लड़की की समस्या यह है कि ससुराल में मारपीट, दुर्व्यवहार के विरोध में लड़की अपने मायके वापस आ गई है। मायके का यह 'भला' सा घर अब इस चिंता में है कि भले घर की पुत्री शादी के बाद ससुराल में ही 'सनातन धर्म की मर्यादा का पालन ' करते हुए रहती हुई अच्छी लगती है। मायके आ गई तो 'बेचारे' लड़की के मायके वाले किस किस को जवाब देते फिरेंगे?पतिगृह में मारपीट तो चलती रहती है। रचना में लड़की का पिता, उसके दो सलाहकारनुमा दोस्त, लड़की का भाई और ख़ुद लड़की इसी 'प्राब्लम'को ' डिस्कस' कर रहे हैं। बात 'यथासमय यथासंभव ' पिटकर आई लड़की के भविष्य की चल रही है। पूरी रचना में हर पात्र का एक एक संवाद पुरुष सत्ता से ग्रस्त समाज की सारी सड़ांध उघाड़कर रख देता है। भाई परम स्वार्थी है। पिता डरपोक। उसका ही एक मित्र नितांत लंपट। लड़की पर नज़र है उसकी। उसकी मुसीबत में वह अपनी भ्रष्ट संभावनाएं तलाश रहा है।

....'कुलदीपक पुत्र', बहिन में 'कुलबोझक स्त्री' देखकर लफ्फाजियां कर रहा है। पर भले घर की यह बेटी हार नहीं मानती। रचना में लेखक कहीं भी उपदेशात्मक नहीं होता। किसी पर कोई आरोप भी नहीं लगाता। वह तो बस जो जैसा है वैसा चित्रित कर देता है। पर इसका चित्रण पूरी रचना में इतनी निर्मम तटस्थता से करता है कि पाठक डरने लगता है कि यह क्या हो रहा है! इस तरह के विषय में लेखक को यह तेवर कायम रखना सरल नहीं था। लेखक रचना के अंत में कहीं आता है। और रचना का यह अंत आरोपित या थोपा हुआ नहीं लगता। लड़की का हार न मानना पूरी रचना को अपने नैसर्गिक समापन पर ला देता है। सामाजिक सरोकारों की बड़ी बड़ी सपाटबयानियां झाड़ते हुए तथाकथित' व्यंग्य' रचने वाले कभी एक रचना को खुले दिल से पढ़कर तो देखें।

वैसे भी सुशील के सामाजिक सरोकार तो उनकी हर रचना में यहां वहां से आ ही जाते हैं। यह उनका अपना तरीका है। बाज़ारवाद किस तरह हमारे गांव तक पैर पसार चुका है, यह बात भी वे ' लोकसाहित्य के अहेरी' में मात्र दो या तीन पंक्तियों में इतनी सहजता से लाते हैं कि वह मूलकथा में घुलमिल जाता है। और यह एक इसी रचना में हो ऐसा नहीं है। उनकी लगभग सभी रचनाओं में पूरा समाज (जिसमें राजनीतिक समाज भी शामिल है) अपनी समस्त विद्रूपताओं के साथ इतने हौले से मौजूद है कि पाठक उनको ठीक से जान भी जाए और यह बात मूलपाठ में निरर्थक क्षेपक की भांति अनगढ़ता भी पैदा न करे। यह चमत्कार वही रचनाकार पैदा कर सकता है जिसके अवचेतन में समाज के अंतर्विरोध के प्रति जेनुइन विद्रोह निरंतर खदबदा रहा हो।

सुशील सामाजिक सरोकारों के घोषित उद्घोषित व्यंग्यकार नहीं, पर वे सामाजिक सरोकारों के बड़े व्यंग्यकार हैं । आप यदि अपनी संरचना में ही वैसे हों तो आपको अलग से बताना और कहना नहीं पड़ता। जताना पड़ जाए तो वह रचनाकार ही क्या। तभी तो सरोकार सुशील के निकट एक जुमला या मुहावरा मात्र नहीं। सरोकार उनके व्यंग्यकार होने की एक अनिवार्य शर्त है। मानो नियति के तौर पर उनके सरोकार उनके व्यंग्य में यूं घुले मिले हैं कि अलग से रेखांकित करने की कोई कोशिश उन्हें नहीं करनी पड़ती। जब हिंदी में व्यंग्यकारों की बड़ी वरिष्ठ तथा युवा पीढ़ी सायास कांखती, कराहती, कूदती हुई सरोकारों का बोझ उठाए हुए अपनी रचना में दोहरी होती हुई हलकान होती दिख रही है, तब सुशील की यह सहज रचनात्मकता मुझे बहुत आश्वस्त करती है। वे किसी फ़ैशन या हो हल्ले के साथ नारेनुमा सरोकारों के व्यंग्य लेखक नहीं हैं। वे तो कदाचित इसे अपना व्यंग्य लेखक होने का अनिवार्य मगर सहज हिस्सा मानते लगते हैं। व्यंग्य लिखोगे तो सरोकार तो होंगे ही और सरोकार उस समाज में ही दिखेंगे जिसकी व्यंग्यकार स्वयं ही इकाई है।

बेटियां, पिता, भाई, स्त्री, नेता, पुलिस, चिंतक, ज्ञानी, बाबा, महापुरुष, संपादक, पत्रकार, लेखक, आत्मान्वेषी, दलित, सामंत, महंगाई, समलैंगिक, साहब, चमचे, किसान, क्रिकेट, अध्यक्ष, लोककला, लोकगीत, संस्कृति, पढ़ाई, पौराणिक चरित्र , तीज त्योहार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, तुलसी, कबीर, ग़ालिब, कहावतें, जाति प्रथा, सुख दुख, फिल्मी गीत, धर्म, ज्योतिष, निराला, स्कूल, बेरोज़गारी, निंदा, प्यार, ईर्ष्या, जुगाड़, मठ, चेले, आलोचना, लफ़्फ़ाज़ी, आयोजक, संसद, प्रेमिका, पत्नी, जय, पराजय, भय--समाज में जहां जो है, जो भी समाज की संरचना को बनाता, बिगाड़ता, बदलता, संवारता है, सब पर सुशील की नज़र है।

सुशील लीक पर नहीं चलते। वे आसान पगडंडियां भी नहीं पकड़ते। वे विषय में सीधे ही धंसते हैं। और रास्ता मानो अपने आप बनता जाता है। एक संभावनाशील रचनाकार होने की यही प्रथम शर्त है, वर्ना आप लीक पीटते रह जाते हैं। लीक पीटना बड़ा सरल काम है। यह बैठे बिठाए कमाई करने जैसा है। सुशील इस तरह के लेखन के विरुद्ध हैं।

हमने बात , पहली बात से शुरू की थी। फिर दूसरी पर चल रहे थे कि यह तीसरी बात मन में आ गई है और चैन नहीं लेने दे रही। इस तीसरी बात में सुशील सिद्धार्थ के लेखन की कई बातें एक साथ लीन हैं। उनका हास्यबोध, विट, भाषा और कहन का खिलंदड़ापन ऐसा मारक तथा अनोखा है जो पंक्ति दर पंक्ति जगमग करता है। उनकी जुमलेबाज़ी की कला मुझे दूसरी तरह से उर्दू की समृद्ध हास्य परंपरा की स्मृतियों में ले जाती है। समकालीन हिंदी व्यंग्य में यह कला प्रायः दुर्लभ है।

सुशील सिद्धार्थ ने हिंदी में एम. ए. किया है। वैसे बहुत सारे व्यंग्यकारों ने यही एम. ए .किया है। हिंदी को इस हद तक अकादमिक तौर पर भाषा के स्ट्रक्चर के तौर पर जानना या तो आपको इस भाषा की संभावनाओं से उस हद तक मित्र बना देगा जैसे सुशील सिद्धार्थ के साथ हुआ। ...या आपको ठस जड़ पंडितनुमा मूढ़ भाषाशास्त्री बना देगा जैसा अन्य बहुत से हिंदी प्राध्यापकों के साथ और उनके व्यंग्य लेखन के साथ हुआ है। ऐसे लेखकों का व्यंग्य भाषा ज्ञान के बोझ तले दबकर सपाट होकर रह गया। सुशील ने हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा और भाषा को अपने व्यंग्य के प्राणों में उतार लिया। इसीलिए उनकी व्यंग्य भाषा के तेवर अपने पाठक को पहली पंक्ति से पकड़ लेते हैं। उनका विट जटिल है, फिर भी सरल है। उनके हास्यबोध में लोकजीवन का पारंपरिक मिट्टी से जुड़ा हास्यबोध भी है, शहराती काइयांपन से उपजा हास्यबोध भी और हिंदी की लंबी परंपरा की भूमि पर उपजा अपना हास्यबोध भी। तभी उनके लेखन में एक निरंतर खिलंदड़ापन है जो बेहद शरारती सा तो है पर पाठक को मूल मुद्दे से छिटकाने की जगह उसमें गहरे उतारने में कारगर किस्म का होशियार खिलंदड़पन है।

जो दुर्भाग्यशाली आलोचक यह मान बैठे हैं कि व्यंग्य रचना में हास्य का होना व्यंग्य की ताक़त को छीजता है, उन्हें सुशील को पढ़कर देखना चाहिए। सुशील अपनी कई रचनाओं में लगभग बदमाशी पर आमादा प्रतीत होते हैं ('क्रॉनिक कवि की सुहागरात' पढ़कर देखें) , परंतु भाषा के साथ कोई इस कौशल के साथ खेलकर तो दिखाए। व्यंग्य की भाषा कैसे कविता की तरह सुंदर प्रतीत होने लगती है, सुशील की रचनाएं बार बार इसका सटीक उदाहरण देती हैं। वे शैली, कहन और भाषा में नये प्रयोग के हामी हैं।

सुशील की रचनाओं से कुछ आप्त वाक्यनुमा विटी वाक्य यूं ही चलते चलते उठाए हैं। चलते चलते क्यों?क्योंकि वे उनकी रचनाओं में बिखरे पड़े हैं। कहीं से भी उठा दो और पेश कर दो। इन वाक्यों की विट, कला और तुर्शी को देखिए तो। जुमलेबाज़ी की आर्ट क्या होती है और कैसे एक छोटा सा वाक्य बड़ी रचना जैसा प्रभाव डाल जाता है, इन उद्धरणों से जाना जा सकता है।

सुशील के ये वाक्य देखिए--
' साहब की आंखों में ख़ुशी का कीचड़ आ गया। /इस पुराण ने हमें भव्य से भांड़ बना दिया । /साधना करनी पड़ती है कि ऐसे जुतियाएं कि जूता और फूल में फर्क न किया जा सके। /उनकी कुंठा के कुंड में अगर के मगर पले रहते हैं। /श्रोताओं के संयम का बांध टूट रहा था। कई श्रोताओं की तो नींद भी टूट रही थी। /वह वक्ताओं को इस तरह निहार रहा था जैसे कोई नवाब मुर्गों की लड़ाई देख रहा हो। /मैं भारतीय दर्शन की गुत्थी हूं। /देर तक पहने रहो तो जूता भी देह का अंग लगने लगता है। /मौके पर मौन का हुनर काम आता है। /धीरे धीरे असहमति की दुकान चल निकलती है। /आपका वक्तव्य सांस्कृतिक रूप से इतना सुचिंतित और सुरक्षित है कि बजाय चाय के, आप पंचामृत या नारियल का आदेश ही दें। /किसी लिखने वाले की मजाल कि नये लिखने वाले को अपूर्व, अद्भुत और अहा से कम कह दे--यह स्थिति सब धान बाईस पसेरी का नवीनतम भावानुवाद है। /जातिवाद और जनवाद का कपड़ा लपेटकर साथ रखनेवाले साहित्यिक। /कितना अच्छा समय है कि लोग विचारों को बनियान की तरह पहने घूम रहे हैं। /ज्योतिष एक ऐसी नदी है जिसमें असंख्य नाले खुले पड़े हैं। /अपने शिविर में सुअर भी हो तो ऐरावत बताना है। /उन्होंने लड़की की शारीरिक संरचना को देखा। वे उड़ती चिड़िया के पर गिन सकते थे...लड़की उड़ नहीं रही थी, इसीलिए गिनना आसान था। /साहित्य समाज का दर्पण है, मगर असंतोष साहित्य का दर्पण है। /वह जीवन ही क्या जो आपको गच्चा न दे दे। /ये मील के पत्थर हैं, समीक्षाओं में इन्हें गाड़ देते हैं...रचना से ज़्यादा महत्व पत्थर और फोटो का है। /हमारा तो धंधा ही कुंठाओं की कंठी पहनाने पर टिका है। /प्रेम खाला का घर नहीं है, यह कबीर ने बताया...किसका घर है इसकी खोज जारी है। मुझे लगता है प्रेम निठल्लों का घर है। /प्रेम जूता खाने का सर्वोत्तम उपाय है। /इस देश में कुछ लोगों ने दुख और संघर्ष की अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे हैं। /अधिकारी ने सरलता, आत्मीयता और भावुकता को महीन महीन कतर कर भाषा के बेसन में फेंट लिया था...उपलब्धियों की कड़ाही में लच्छेदार पकौड़ी तल रहे थे। /आप जिसे तेल लगा दें वह आपके हांथों से फिसल नहीं सकता। /मैं 'दीनता ऐट द रेट ऑफ हीनता डॉट कॉम' हो गया था। /दुनिया का कोई भी यंत्र तुम्हारी आंखों में तैरती टुच्चई की मछलियों का फोटो नहीं खींच सकता। /ऐसे ही उच्च विचारों से धीरे धीरे एक चिथड़ा संस्कृति का निर्माण होगा। /मुसली पावर युक्त व्यक्ति। /परस्पर प्रशंसा वाली हिंदी की विराट मुर्दहिया में शवसाधना। /वे किसी कथाकार के लंबे, उलझाऊ और थकाऊ वाक्य की तरह शिथिल दिखे। /साहित्य का एक मानव बम/तुम किसी भी तरह बोलो मगर अपनी तरह न बोलो। /यह ज़िम्मेदारी मुर्गे की है कि वह जान से भी जाए और पक्का करे कि पार्टी को मज़ा भी आ जाए। वरना वफ़ादारी पर शक होगा। /आपको भय है कि अगर गंगा जमुना प्यार से बहने लगीं तो आपके एजेंडे का क्या होगा। /मजा मारें घासी राम लहंगा धोवैं हुलासी राम--मैं हुलासी राम की भूमिका से मुक्ति चाहता था। /वे मेरुदंड झुकाने की ट्रेनिंग देते हैं। /जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल से उत्पन्न एक चिकना जीव जिसपर बुद्धिमानी की बूंद नहीं ठहरती। /बेसिकली शब्द में सृष्टि का रहस्य छिपा है--ईश्वर तो बेसिकली लीला कर रहा था। और क्रमशः हमसब पैदा होते गये। /दूसरे के दुख की कहानी सुनाने में समकालीन सिद्धि। /दुख सबको मांजता है, तू मांजा जा रहा है ताकि चमक सके नये भारत में। /जिन मित्रों से काम निकल चुका वे तेल निकाली सरसों की तरह हैं...खली ढोकर क्या करना?'

...ऐसे और भी कई सौ वाक्य मिल जाएंगे आपको सुशील के लेखन में। इन वाक्यों की विशेषता पर ध्यान दें। व्यंग्य को रचने का पूरा शास्त्र समझ में आएगा। ऐसी जुमलेबाज़ी यूं ही नहीं बन जाती। इनमें अपनी ही एक व्यंग्य लय है। व्यंग्य के वाक्यों की एक अंतर्निहित लय होती है। कविता की तरह। यही व्यंग्य की काव्यात्मकता भी है। और ये वाक्य पूरी रचना पर यहां वहां थिगली की तरह चस्पां नहीं हैं। ये तो पूरी रचना के स्ट्रक्चर में एकदम घुले मिले हैं। क्योंकि ये सायास रचे गये आप्तवाक्य नहीं हैं। व्यंग्य रचना के हिसाब से मानो इनका वहां होना तय सा था। ये न होते तो रचना कमज़ोर होती। वे लोग जो 'याद कर कर के रचना के बीच बीच में सायास विटी होते हैं' और इस चक्कर में न तो विट पैदा कर पाते, न ही रचना के व्यंग्य को कोई सार्थक ऊंचाई दे पाते हैं, वे सिद्धार्थ की रचनाओं के इस पक्ष से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

इन वाक्यों से यह भी ज़ाहिर होता है कि सुशील में जो व्यंग्य है वह उनके व्यक्तित्व का नैसर्गिक सा हिस्सा है। उन्हें फालतू की कोशिशें नहीं करनी पड़तीं। व्यंग्य का संगीत उनकी सोच, भाषा और रचनाकर्म में इतना सहज है कि वह पार्श्वसंगीत के तौर पर भी तब भी चलता रहता है जब रचना के मुख्यपात्रों या विषय की ' व्यंग्य गायकी ' चल रही हो। ये वाक्य उसी रचना की मौसिकी में पार्श्वसंगीत रचने वाले संगीत के अनोखे टुकड़े हैं।

अभी जुमलेबाज़ी की बात करते हुए मैंने सुशील की भाषा का ज़िक्र किया। सुशील ने व्यंग्य को अपना ही मुहावरा तथा भाषा दी है। उनकी रचना को उनकी भाषा के तेवरों से पहिचाना जा सकता है। यह भाषा हिंदी कविता, कहानी और आलोचना की भाषा की समृद्ध परंपरा से ली गई भाषा है। जिसमें लोकसाहित्य की गंध, शहरी जीवन का काइयांपन, थोड़ा खिलंदड़पन, थोड़ी बदमाशियां, बहुत सा हरामीपना और श्रीलाल शुक्ल वाली परंपरा की समृद्ध सोच इस तरह रच बस गये हैं कि सुशील सिद्धार्थ की एक अपनी ही भाषा बन गई है। अब यह अपनी एक पहिचान ख़ुद बनाती है।
रचना की भाषा पढ़कर ही पाठक जान जाए कि यह रचना अमुक लेखक की हो सकती है, ऐसी पहिचान बनाना 'ख़ाला का घर' नहीं है। बहुत प्रतिभा हो, फिर ऐसा प्रतिभावान लेखक विभिन्न विधाओं में गहरे उतरे तब जाकर भाषा का ऐसा नायाब मोती मिला करता है। एक सजग व्यंग्य लेखक समाज में विभिन्न पात्रों द्वारा बोली जा रही भाषा से नित्य ही कुछ न कुछ नया सीखता है। उसके कान खुले हों और दिमाग भी, वह सजग हो..तो लेखक के चारों तरफ हर पल नये शब्द, नयी कहन तथा प्रयोग के भाषाई आविष्कार लोगों की दैनंदिन बातचीत में नित्य हो रहे हैं। मुहावरे वहां से ही उठाने होते हैं। कहन में खिलंदड़ापन वहां से ही सीखा जाता है। वास्तव में लेखक के लिए भाषा दुतरफा रास्ता है। वह लेखक का अपना एकांगी मार्ग नहीं, जहां लिखकर वह अपने समाज को बस कुछ दिये ही चला जा रहा है। नहीं। बिलकुल नहीं। लेखन के लंबे रास्ते पर शब्द, बिंब, अलंकार, रस , कहन आदि सब दुतरफा आवागमन कर रहे हैं। जो इसे इकतरफा बना देते हैं, उनका लेखन ठस हो जाता है।

वे अपनी भाषा के सुशील सिद्धार्थ नहीं बन पाते।
सुशील सिद्धार्थ ने अपनी ही व्यंग्य भाषा का आविष्कार किया है। यह एक बड़ी उपलब्धि है। भाषा के प्रति ऐसी सतर्क सोच के कारण ही उनका लेखन उनके चहुंतरफा फैले सपाटबयानी वाले बौने व्यंग्य के बीच अपने क़द के साथ दीखता है। उनका लेखन अपने नितांत निजी मुहावरों, बिम्बों, जुमलेबाज़ी, शैली और भाषा के लिए जाना, सराहा जाएगा।

...तो क्या सुशील सिद्धार्थ का लेखन इस हद तक अच्छा है कि उसमें कमियां ही नहीं? नहीं, अभी कमियां तो हैं। अभी ख़तरे भी हैं। अभी ख़ुद उनके सामने ख़ुद उनकी चुनौतियां भी कम नहीं।
सुशील को याद रखना है कि अभी तो यह शुरुआत भर है। रास्ता लंबा है। मेरा डर है कि कहीं सुशील, अभी तक के लिखे को ही दुहराते तिहराते न रह जाएं। कारण यह कि हमारे कई प्रतिभाशाली व्यंग्यकार यात्रा की जगह कदमताल करते रह गये हैं। उदाहरण कई हैं। कई बार हमारी अपनी भाषा शैली और अपनी स्टाइल ही हमारी दुश्मन हो जाती है। ख़ास तौर पर जब वह हमारी पहिचान बन जाए। ...तब हम अपनी रचना के सुनहरे पिंजरे में क़ैद हो जाते हैं। फिर हमारी रचनाएं एक सुनिश्चित खांचे से बनकर निकलने लगती हैं।

सुशील को एक अच्छा लेखक से आगे बढ़कर यदि बड़ा लेखक बनना है तो निरंतर इन खांचों को तोड़ना होगा। अपनी ही क़ैद से निकलना लेखक के बड़ा होने का रास्ता है। यह काम बेहद परिश्रम, एकाग्रता और निरंतर असंतोष मांगता है। सुशील के लेखन में ऐसा बहुत कुछ देखना अभी बाकी है।

पर मैं आशान्वित हूं। मैं समकालीनों में सबसे ज़्यादा आशान्वित सुशील से ही हूं। वे यदि अपने राजनीतिक लेखन में और गहरे उतर सकें , तत्कालीन विषयों पर लिखते हुए भी रचना को और बड़ा अर्थ देने की कोशिश करें, अपनी जानी पहिचानी शैली से परे जाकर कभी कभी विषय के अनुसार कुछ नया प्रयोग करने की हिम्मत जुटाएं और अपनी रचनाओं में कथातत्व को भी महत्व दें तो ज़रूर ही उन ऊंचाइयों को छुएंगे जिसके लिए वे बने हैं।

अभी सुशील के पास व्यंग्य कथाएं लगभग नगण्य हैं, राजनीतिक चिंतन प्रायः ऊपर ऊपर का है(शायद राजनीति में उनका मन नहीं रमता), भाषा भी हर बार लगभग वही है। इसलिए अब उनको निरंतर कुछ नया करना होगा। निरंतर कुछ नया करना ही एक लेखक को बड़ा बनाता है।

सुशील में तमाम संभावनाएं हैं। ...बस और और बेचैनी चाहिए। बस घनघोर आत्मालोचना की निरंतर दरकार है। बस आसमान नापने की दुर्दम्य इच्छा चाहिए। काबिलियत तो उनमें बहुत है। अभी तक का उनका लेखन इतनी आशाएं एक साथ जगा रहा है कि मैं उनकी हर रचना को किसी नये चमत्कार पाने की उम्मीद से पढ़ता हूं, आजकल।

सुशील सिद्धार्थ मुझे अपना गुरु मानते हैं, कहते रहे हैं। वे मुझे गर्व करने के मौक़े बार बार देते रहेंगे, यह मैं जानता और मानता हूं। आमीन।
(सुशील सिद्धार्थ के फ़ेसबुक पेज से साभार)

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