शुक्रवार, 10 मार्च 2017

होली विशेष आयोजन : बुरा न मानो होली है - हिंदी व्यंग्य में बटुकवाद / यशवंत कोठारी

हिंदी व्यंग्य साहित्य में बटुक व्यंग्यकारों का दीक्षा संस्कार करने का एक नया चलन देखने में आया है .इस चलन के चलते कई बटुक उपनयन संस्कार हेतु यजमान, पंडित,आदि ढूंढ रहे हैं. वर्षों पहले मनोहर श्याम जोशी ने साहित्य में वीर बालक काल की स्थापना की थी उसी परम्परा का निर्वहन करते हुए मैं व्यंग्य में बटुकवाद की घोषणा करता हूँ .बटुक बिना किसी मेहनत के क्रांतिवीर कहलाने को आतुर रहते हैं.बटुकों का दीक्षा  संस्कार स्वयंभू बड़े मठाधीश, संपादक, प्रकाशक करते हैं, यदि आप स्वयं ही पत्रिका में मालिक ,संपादक प्रकाशक व् घरवाली प्रबंधक हो तो फिर कहना ही क्या, आप जैसा पंडित-यजमान कहाँ मिलेगा ?यदि बटुक स्वस्थ सुन्दर हो व् लिखने की प्रेरणा साथ रखता हो तो बटुक का दीक्षा संस्कार जल्दी होता है उसकी रचनाओं का संशोधन , परिमार्जन, परिवर्धन,संपादन व् प्रकाशन शीघ्र कर उसे साहित्य के आकाश में ध्रुव् तारे की तरह चमका दिया जाता है .यदि बटुक के बजाय बटूकी हो तो कहना ही क्या , उसका नख शिख तक संवार कर उसे स्थापित कर दिया जाता है, कई बार सामूहिक भोज, साँझा चूल्हे की भी खबरें आती हैं.बटुक यदि किसी उच्च पद पर हो तो मठाधीश जल्दी से स्वयं को लाभार्थी बना लेते हैं ,  इस चक्कर में  कई बटुक संस्थान से निलंबन को प्राप्त  करते हुए निर्वाण को प्राप्त हो जाते हैं.बटुक का दीक्षा संस्कार दाह संस्कार हो जाता है .

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बटुक को गुरु जनों का ऐसा आशीर्वाद मिलता है की वो जल्दी ही विपक्षी गुरु की कपाल क्रिया में निष्णात हो जाता है.साहित्य में भी नूरा  कुश्ती चलती रहती है, बटुक धीरे धीरे सब समझ जाता है और एक दिन गुरु के लिए मसान जगाने वाला बटुक मठ में आग लगा कर स्वयं का मठ बना कर खुद को मठाधीश घोषित कर देता है .सौदेबाजी भी चलती रहती है, समीकरण बनते बिगड़ते रहते हैं .बटुक अपनी रचना के प्रकाशन के लिए कई पापड़ बेलता  है. गुरु उसे कुछ मित्रों की रचनाएँ इकट्ठी कर खुद संपादक बनने  की सलाह देता है , मुफ्त का चन्दन घिस मेरे नंदन उनका वेद  वाक्य बन जाता है , वे किसी की भी धोती , साड़ी खोलने की हिमाकत कर सकते हैं . सेल्फ पब्लिशिंग के नाम पर प्रकाशकों के सलाहकार बन कर दलाली कमाते हैं .

बटुक रूपी सत्ता प्रतिष्ठान की लानत मलामत गुरु आज्ञा से करता है , लेकिन ज्योंही उसे या गुरु को सम्मान –पुरस्कार मिलता है , वो उसे जनता का पैसे मान कर रख लेता है, और दूसरों को मिलने पर जुगाड़-पंथी बताता है.एक बटुक ने कई राज्यों के स्थायी निवास प्रमाणपत्र बनवा लिए, जहाँ से इनामों की घोषणा वहां के लिए प्रार्थना पत्र तैयार.

नौकरी क राज्य में, निवास ख राज्य में , इनाम ग राज्य से बस गुरु कृपा बनी रहे. बटुकों को साहित्यिक राजनीति का कोर्स कराया जाता है. उनको कविता से ज्यादा फाउंडेशन की आन्तरिक कार्य प्रणाली समझाई जाती है.बटुक की पुस्तकों के लोकार्पण समारोह कराये जाते हैं, बटुक के खर्चे पर सायंकालीन आचमन की व्यवस्था की जाती है, लोकार्पण की विस्तृत रपट छापी जाती है, अन्यत्र न छपे तो अपना अख़बार जिन्दा बाद. विमोचन करता को पालकी में बिठा कर लाया जाता है, ये बात अलग है की विमोचन के बाद विमोचन करता को पैदल ही जाना पड़ता है.बटुक बोस के झूठे बिल विश्वविद्यालय से पास कराता है ,बेचारा बटुक.

साहित्य में इन बटुकों की पोजीशन क्रातिवीरों की नहीं अपितु क्रांति भीरुओं व् पेड़ों के इर्द गिर्द उछल कूद कने वाले बंदरों की तरह  हो जाती है.वे अकादमी के दफ्तर के बाहर तब तक उछल कूद करते हैं जब तक सफलता को प्राप्त नहीं होते.

कई बटुक नौकरी धंधे के लिए किसी से भी भिड़ जाते हैं , लेकिन एक बार एक से ही लड़ते –झगड़ते है. गुरु के निर्देशानुसार कई बटुक खुद भी जूतों में डाल बाँटने लग जाते हैं . बटुक फटे जूतों की कीमत भी यजमान से वसूलता है.सच्चा बटुक मान मर्यादा, नौकरी आदि को ठेंगे पर रखने की घोषणा करता रहता है, लेकिन मौका मुनासिब देख कर ये चीजें अपने खीसें में डालता रहता है. बटुकों को अपने कब्जे में करने लिया यजमान , पंडित यज्ञोपवीत का खर्चा उठाने का नाटक करते हैं , फिर किसी फेलोशिप से या नौकरी से वर्षों कमीशन वसूलते रहते हैं. बटुक गुरु आज्ञा से अन्य लेखकों को गाली देता है, उनकी रचनाओं को नकल सिद्ध कर देता है,उनकी थीसिस को झाली बता देता है.फिर निष्ठा बदलने पर पूर्व गुरु व् गुरु आनी की पोल सार्वजनिक रूप से चौराहे पर खोलता है, .ये बटुक कायर भी हो जाते है, वायर भी हो जाते है और टायर भी हो जाते हैं .

बटुक पुरस्कारों की राजनीति में भी जम कर भाग लेता है , पैसा निर्णायकों का प्रमाण पत्र मेरा या मेरे गुरु का .हिंदी साहित्य में बटुकों का दीक्षा समारोह जारी है.

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यशवंत कोठारी

८६, लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार जयपुर-३०२००२मो-९४१४४६१२०७

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