शुक्रवार, 31 मार्च 2017

रागिनी गर्ग की कविताएँ

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1.नारी शक्ति है....

पुराणों में पढ़ते आये हैं ..
नारी शक्ति है....
बुजुर्गों से सुनते आये हैं... नारी शक्ति है....
शक्ति है तभी देती है जन्म...
सींचती है अपने दूध से.. ..
रग रग में भरती है लहू...
फिर भी अबला और बेचारी है...
एक छोटी सी शक की चिंगारी....

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कर देती इसके दामन को तार तार.....
इस शक के आगे अहिल्या ; सीता भी हारी है.......
बहन बनकर ;माँ ;बनकर;बेटी
बनकर बीबी बनकर सब फर्ज निभाती है....
अपना जीवन अपने रिश्तों को सम्भालने में निकालती है....

तभी तो जीवनदेने वाले ने अपना अक्स उतारा है.....
पूजा करने के योग्य है....
फिर भी एक लड़की बोझ नजर आती है... ...
कोख में मौत की मजबूरी...
उसकी लाचारी है....
अब वक्त ने बदल ली है करवट...

ऩ तो वो अबला है ना ही बेचारी है....
आसमान से करती है बातें.....
उसने अंतरिक्ष में जगह बना ली है.....
जिसने उसके सतीत्व पर बुरी नज़र डाली है

उसने अपनी बरबादी लिखवा ली है....
दो घरों की लाज है...
दो कुलों को तारती है...
नारी से ही नर है... नारी से सृष्टि सारी है....

नारी शक्ति है... शक्ति ही नारी है.........
यह बात समझ में आयेगी...

पर तब आयेगी जब जीवनदायी नारी खत्म हो जायेगी....
अब भी वक्त है संभल जाओ...

उठो आगे बढ़ो...
नारी और इसके सम्मान को बचाओ...
नहीं तो ढूँढने से भी नारी नहीं मिल पायेगी....
नारी ना बची तो सारी सृष्टि नष्ट हो जायेगी...
नारी शक्ति है... शक्ति ही नारी है........
             रागिनी गर्ग

2.बस एक बार खुद से तू कर ले प्यार |

हौंसलों के पंख लिए उड़ने को बेकरार.....

पंख हैं बिंधे हुये परिवार के प्यार की सुई है आर -पार.....
बढ़ना चाहती है.. मंजिल को पाने के लिए...
पैर रूढ़ीवादिता और परम्परायें हैं जकड़े हुये....
क्या करेगी? कैसे मुकम्मल जहां पायेगी?
बिन पाँव और पंखों के चारदीवारी के पिंजरे में

हो कैद उसकी ख़्वाहिश भी मर जायेगी....
ख़्वाहिशों का घोंटकर गला कैसे खुश रह पायेगी..
नारी के आत्मसम्मान को अब खुद नारी ही बचायेगी.....
पीठ पछताने से हांसिल कुछ नहीं होगा....
अपना वजूद खुद तुझको ही ढूँढना होगा...
खुद पर कर यकींन तू ...

तुझे जहाँ मिलेगा....
मुकम्मल जमीं है तेरी ..

चाहे तो आसमान भी मिलेगा.............
क्यों वजूद भूल कर अपना...

तू खुद को मिटाती है?..........

क्यों तू भी नहीं जहाँ में किस्मत आजमाती है?.....
नहीं है तू किसी से कम..

यह समझना तुझ को ही होगा....

लुटाकर खुशियाँ अपनी हासिल कुछ नहीं होगा...
जीने का हक तुझको भी है...
तू जी ले ज़िन्दगी अपनी ..
खुद को भुलाकर....
तू कर रही है बन्दगी किसकी? ....
हक पाने का..

हक तुझको भी है मान मेरी बात..

आत्मा की बात सुन और उठा आवाज़ ...
तोड़कर बेड़ियां तुझको आगे को बढ़ना है.....
हर महिला दिवस पर सिर्फ आहें न भरना है....
खुशियाँ तेरे दामन में होंगी अपार...
बस एक बार... बस एक बार ..
.......खुद से तू कर ले प्यार
                    -Ragini Garg

3.दिन तय है ~
बच्चों से प्यार करने का दिन तय है ..
फिर रोज सितम ढाओ......
बच्चों के काम न करने का बाल श्रमिक दिन तय है..

फिर नन्हें हाथों से रोज काम कराओ... 
महिलाओं के सम्मान का दिन तय है..
फिर बेइज्जती पर उतर आओ....
नवरात्रों में कन्या पूजन के दिन तय हैं
फिर  बच्चियों को हवस का शिकार बनाओ...
माता -पिता का दिन तय है तोहफे ले लो.
.. फिर फोन से हटकर आपसे बात हो जाए तो शुक्र मनाओ.

मम्मी पापा सुनने को तरस जाओ...
शरा्द्ध के दिन तय हैं पण्डित को हल्वा पूरी रोज खिलाओ..

जब तक बुजुर्ग जिन्दा हैं उनको पानी को तरसाओ....
हिन्दी अपनाने का दिन तय है.....
फिर अंग्रेजी अपनाओ....
अपनी शादी में साड़ी लंहगा पहनना तय है........
फिर विदेशी कल्चर अपनाओ
शहीदों को नमन करने का दिन तय है
उसके बाद भूल जाओ.....
देशभक्ति दिखाने का दिन तय है..
फिर देश को भी बेच खाओ....
और तो और प्यार करने का दिन भी तय है...
फिर नफ़रत निभाओ.....
सब कुछ करने के लिये दिन तय है
उस दिन वो काम करो फिर हमेशा के लिए भूल जाओ....
वाह ;वाह ;वाह भारत क्या किस्मत पायी है
यहाँ कुछ भी करने के लिए दिन तय करके

बाकी के दिनों से पाबन्दी हटायी है...

सही मायनों में स्वतंत्रता की परिभाषा

भारत तूने ही अपनायी है


                  रागिनी गर्ग

4.यह जीवन रंगमंच है
        .............................
मौत ने ज़िन्दगी से कुछ यूँ कहा
ऐ ज़िंदगी एक बात बता
       तू सूरज का उजाला है
खिलता हुआ प्रसून है
      मैं काली अंधियारी रात
मेरे आगे बस शून्य है
     फिर तू क्यों करती है जफा
जबकी मैं हमेशा निभाती हूँ वफा
      तू छोड़ देती जीव को मझधार में
मैं साथ लेकर जाती शमशान में
ज़िंदगी बोली ऐ मौत बता
       इस में मेरी भी क्या है खता
सुबह का सूरज रात की गोद में छुप जाता है
        खिलता हुआ प्रसून मिट्टी में विलय हो जाता है

यह जीवन एक रंगमंच है
     यहाँ हर कोई अपना किरदार निभाता है
जो कुछ भी यहाँ होता है
      वो ऊपर बैठा नाटककार करवाता है
एक की साँस खत्म होती है
      तो दूजा नवजीवन पाता है
हर प्रभात में नया सूरज
       और नया प्रसून आता है।
क्यों करता है जीव साँसों से प्रीति?
        जबकि नहीं चलती यहाँ किसी की राजनीति
न ज़िंदगी हारी न मौत जीती
    जीवन - मरण, हार - जीत सब कुदरत की है रीति।

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी4:14 pm

    पूर्ण शशक्त और उत्तम कोटि की कविताएँ।
    भावानुकूल और सहज मन से रची गयी।

    अतीव सुंदर

    उत्तर देंहटाएं

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