पटकथा लेखन का तकनीकी तरीका डॉ. विजय शिंदे

पटकथा लेखन करना मेहनत, अभ्यास, कौशल और सृजनात्मक कार्य है। कोई लेखक जैसे-जैसे फिल्मी दुनिया के साथ जुड़ता है वैसे-वैसे वह पटकथा लेखन की सारी बातें सीख लेता है। पटकथा लेखक को उसकी बारिकियां अगर पता भी न हो तो कम-से-कम उसे ऐसा लेखन करने की रुचि होनी चाहिए। निर्माता-निर्देशक लेखक से अच्छी पटकथा लिखवा लेते हैं, कमियों को दुरुस्त करने की सलाह देते हैं। हिंदी की साहित्यकार मन्नू भंड़ारी ने कई टी. वी. धारावाहिकों के साथ फिल्मों हेतु बासु चटर्जी जी के लिए पटकथा लेखन किया। वे लिखती हैं कि "इस विधा के सैद्धांतिक पक्ष की ए बी सी डी जाने बिना ही मैंने अपना यह काम किया (कभी जरूरत हुई तो आगे भी इसी तरह करूंगी) और इसलिए हो सकता है कि मेरी ये पटकथाएं इसके तकनीकी और सैद्धांतिक पक्ष पर खरी ही न उतरें। फिर मैंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि मुझे इन पटकथाओं को प्रकाशित भी करना होगा।... मैंने तो इन्हें सिर्फ बासुदा के लिए लिखा था और उनकी जरूरत (जिसे मैं जानती थी) के हिसाब से लिखा था, सैद्धांतिक पक्ष के अनुरूप नहीं... (जिसे मैं जानती ही नहीं थी)।" (कथा-पटकथा, पृ. 11) खैर मन्नू भंड़ारी पटकथा लिखना नहीं जानती थी परंतु उनमें पहले से मौजूद प्रतिभा, रुचि और बासु चटर्जी का मार्गदर्शन सफल पटकथा लेखन करवा सका है। पटकथा लेखन के दो तकनीकी तरीकें जो आमतौर पर फिल्मी दुनिया में अपनाए जाते हैं। एक है घटना-दर-घटना, दृश्य-दर-दृश्य, पेज-दर-पेज लिखते जाना। इसे लेखन की गतिशील (रनिंग) शैली या क्रमबद्ध तरीका कहा जाता है, और दूसरा तरीका है स्थापित लेखन तरीका।

[ads-post]

अ. क्रमबद्ध तरीका – हमारे यहां फीचर फिल्म तथा टेलीविजन धारावाहिक हेतु यह तरीका अपनाया जाता है। इसके अनुसार पटकथा की शुरुआत दृश्य एक से की जाती है और वह लगातार, क्रमवार ढंग से, एक के बाद एक दृश्य के रूप में लिखी जाती है। जिस तरह किताब लिखी जाती है, वही तरीका यहां भी अपनाया जाता है। क्रमबद्ध (रंनिग) शैली में लिखते समय हर दृश्य स्वतंत्र पेज पर भी लिखा जाता है, या पेज की चिंता न करते हुए लगातार लिखा जाता है। (पटकथा कैसे लिखें, पृ. 141)

आ. स्थापित तरीका – दूसरे तरीके में पेज को उसकी लंबाई के हिसाब से दो समान हिस्से में बांटा जाता है। यानी ऊपर से नीचे तक एक साक्षात या काल्पनिक रेखा खिंच ली जाती है। एक हिस्से में शीर्षक के रूप में ऊपर लिखा जाता है – Visual यानी दृश्य। दूसरे हिस्से में शीर्षक के रूप में ऊपर लिखा जाता है – Audio यानी आवाज या ध्वनि। (आकृति देखें)

clip_image002

दृश्य के हिस्से में दृश्य का वर्णन लिखा जाता है। क्रियाकलाप या साक्षात्कार संबंधी संकेत लिखे जाते हैं। आवाज या ध्वनि के हिस्से में साक्षात संवाद या कमेंटरी लिखी जाती है। इस तरह माना जाता है कि अमुक हरकत के साथ अमुक संवाद जुड़ा है। दोनों को मिलाकर दृश्य (शॉट) बन जाता है। यह तरीका अभी तो हमारे यहां वृत्तचित्र और विज्ञापन लेखन के क्षेत्र में अपनाया जाता है। विज्ञापन लेखन हेतु प्रयुक्त शैली को स्टोरी बोर्ड (Story Board) कहा जाता है। विदेशों में अभी भी फिल्म, धारावाहिक, वृत्तचित्र तथा विज्ञापन क्षेत्र की पटकथा लिखने के लिए एक ही तरीका अपनाया जाता है। वह है दृश्य और ध्वनि को पन्ने के दो हिस्सों में बांटनेवाला। (पटकथा कैसे लिखें, पृ. 141-142)

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. कथा-पटकथा – मन्नू भंड़ारी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004, द्वितीय संस्करण 2014.

2. पटकथा कैसे लिखें – राजेंद्र पांड़े, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, आवृत्ति 2015.

3. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वजाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.

4. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

--

 

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

■■■

-----------

-----------

0 टिप्पणी "पटकथा लेखन का तकनीकी तरीका डॉ. विजय शिंदे"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.