रविवार, 19 मार्च 2017

शिगाफ़: विस्थापन का दर्द और विवशताएं / कल्पना गवली

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नई शताब्दी का सूत्रपात होते ही जिन कथाकारों, विद्वानों ने हिन्दी गद्य के विशेष विन्यास में अपनी उपस्थिति का अहसास करवाया उसमें मनीषा कुलश्रेष्ठ का भी नाम उल्लेखनीय है। “विविध वैविध्य सरोकारों की बहुआयामिता, चिंतन की बारीकियां, वैश्विक भाव भूमि से परिचय बदलती सामाजिकता का ज्ञान और भाषा का अत्यंत सर्जनात्मक साथ कुछ ऐसी विशेषताएं है जिसके कारण लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी और आकर्षित किया है।“ 1

मनीषा कुलश्रेष्ठ के ‘शिगाफ और ‘शाल मंजिका’ महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। ‘शिगाफ’ मनीषा कुलश्रेष्ठ का एक ऐसा उपन्यास है. जिसमें कई संवेदनाएं मिलकर एक कर दी हो. कश्मीर की धरती से जुड़ा यह उपन्यास एक नई भूमिका तैयार करता है. पीड़ा भोगते हुए हजारों लोग और उनसे जुड़े सपने को दहशत में परिवर्तित किए जाते है. लेखिका ने अमिता के ब्लॉग, यास्मीन की डायरी मानव बम जुलेखा का मिथकीय कोलाज, अलगाव वादी नेता वसीम के एकालाप के जरिए कश्मीर और कश्मीरियत की विदीर्ण कथा को अलग कोण, नए शैलीगत प्रयोगों तथा ताजगी भरी भाषा के साथ अपना उपन्यास प्रस्तुत किया है। कश्मीर के विस्थापित हजारों कश्मीरियों की पीड़ा  तथा वहां जीवन व्यतीत कर रहे लाखों के दर्द, घुटन और छटपटाहट की वास्तविक तस्वीर की उजागर भी करता है : ‘शिगाफ’ यानी दरार। “शिगाफ विस्थापन का दर्द महज एक सांस्कृतिक, सामाजिक विरासत से कट जाने का दर्द नहीं है बल्कि अपनी खुली जड़े लिए भटकने ओर कहीं जम न पाने की भीषण विवशता है, जिसे अपने निर्वासन के दौरान सेन सबेस्टियन (स्पेन) में रह रही अमिता लगातार अपने ब्लॉग में लिखती रही है। डॉन किहोते की ‘रोड दू ला मांचा’ कश्मीर वादी में लौटने की अमिता की भटकावों तथा असमंजस भरी इस यात्रा को अद्भुत तरीके से समेटता हुआ यह उपन्यास विस्थापन और आतंकवाद की कोई व्याख्या या समाधान नहीं प्रस्तुत करता वरन् आस्था-अनास्था की बर्बर लड़ाइयों के बीच कुचले जाने से रह गए कुछ जीवट पलों को जिलाता है और जमीन पर गिर पड़े उस दिशा संकेतक बोर्ड को उठाकर फिर-फिर गाड़ता है जिस पर लिखा है। शिगाफ यानि एक दरार जो कश्मीरियत की रुह में स्थायी तौर पर पड़ गई है।“2

‘धड़कन समझ सुन रही थी जिसे

महज मेरी मुहब्बत की गूंज थी

हालात के जलजले ने जौहिर किया

उसके सीने में शिगाफ है दिल नहीं।“

उपन्यास की नायिका अमिता कश्मीर से निर्वासित हुई है। तीन वर्षों से स्पेन में रह रही है। उसके संस्मरण में, उसकी चेतना में बचपनवाला घर ही जिंदा रहता है, कोशिश के बाद भी उसे भूला नहीं पाती है। स्पेन में अमिता की मुलाकात इयान बोर्ड से होती है, वह अमिता को फ्रेंको की तानाशाही जीवन मूल्यों में आई गिरावट, स्पेन का युद्ध, बास्क संघर्ष आदि अनेक किस्से, घटनाएं सुनाकर उसे ‘भोगा हुआ सच’ के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित करता है. जिस प्रकार बास्क संधर्ष से निकला जा सका है, वैसे ही कश्मीरी मसला भी सुलझाया जा सकता है. जिस प्रकार से कश्मीर की बात आते ही यहां उलझन ही उलझन में दुबारा फंसते हुए मुद्दे नजर आते है- “हमारे यहां हल निकालना इतना आसान नहीं है- कश्मीर अकेले में हम तीन तरह के कश्मीरी हैं। कश्मीरी हिंदू, कश्मीरी सुन्नी और कश्मीरी रिया, सूफी और खानाबदोशों की बात अलग से कई-----फिर लेह बौद्ध बहुल और जम्मू हिंदू बहुल है। यहां धार्मिक पहचान ज्यादा बड़ा मसला है। हल बेहद मुश्किल(3) अमिता अपने ब्लॉग में लिखती है, उसका प्रति उत्तर में डा.वाइ.एन.रैणा कहती है -कश्मीरी तो चार तरफ से मार पड़ी है। पाकिस्तान से भारत की नीतियों से। फिर फौजी घेरा.... एनकॉउंटर...ब्युरोक्रेसी। अब यह अब यह तो तय है... एक तरफ वह भारतीय सुरक्षा-बलों से भी खुश नहीं है तो दूसरी तरफ दहशतगर्दी से भी तंग आ चुका है। वह मुजफ्फराबाद के हालात देख पाकिस्तान से भी खौफ देखना उसकी मजबूरी है सच्चाहत (दूरिज्म) का जो बहुत बड़ा कारोबार है कश्मीर का.... वही उसकी जान की लगा कीड़ा है।“(4) मुजहब हसनैन जो मूलत: कश्मीर का है अब लंदन में रहता है ब्लॉग पर टिप्पणी करता है...”मैं दो साल पहले कश्मीर लौटा था, मगर वहां जाकर लगा कि मैं भगोड़ा हूं। लोगों ने मिलिट्री ने सभी ने मुझे शक से देखा। मैं वापस यहां आया और यहीं बस गया। अब मैं कश्मीर के बारे में पढ़ने से बचता हूं, मैं अपनी पहचान से बचता हूं वे सारी चीजें जिनसे मैं बना हूं, उन्हें मैं नकारता हूं मगर मैं उस दु:ख का क्या करुं, जो मैं अपने साथ ले आया हूं। ”(5) ‘के इश्यु’ पर अमिता का ब्लॉग अलग-अलग विचारों को  प्रस्तुत करता है- ‘कश्मीर की असली समस्या क्या है?’ फिर भी समझ नहीं पाती है।

लेखिका ने इंटरनेट पर ब्लॉग जैसी तकनीकी माध्यम का शानदार इस्तेमाल किया है। विस्थापन से पीड़ित अमिता अपने दर्द का बयान करती हुई द्रष्टिगत होती है। कश्मीर को लेकर लेखिका ने अपनी वेदना और दु:ख व्यक्त किए है। “मैं आज निर्वासित हूं....क्योंकि तुमने चुना था निहत्थों को मारना। मैं आज निर्वासित हूं... मैंने चुना सम्मान से जीना.... हथियार न उठाना। मैं आज निर्वासित हूं... क्योंकि पूरा संसार चुप रहा... महज कुछ लोग ही तो मर रहे थे।“(6) तमाम बिंदुओं को सामने रखकर कश्मीरी समस्याओं को हल करने की विशेषता रही है। आज भी कश्मीर में कुछ हो रहा है वह उचित नहीं है ‘मैं आज निर्वासित हूं... क्योंकि मेरा भारतीय होने में विश्वास था।‘ “यकीन है कि हमारा कल्चर, जिन्हें हम कश्मीरियत कहते हैं, वह इतनी कमजोर नहीं है कि कट्टरपंथी इसे कुचल दें। तुम लोग लौटोगे तो वक्त के बीतने के साथ इसकी चमक लौट आएगी। और यह फिर अमन और भाई चारे से गुजार होगी।‘(7) उपन्यास में धर्म, जाति संस्कृति और आवाम की पीड़ा दर्शायी है। विचारधाराओं और मनुष्य के गहराते दर्द को लिखा है, शायद उनकी रुह तक कांप उठी थी वह भयानक वक्तको अंकित किया है। अनेक कहानियां जो जुड़ती चली गई है।

लेखिका ने वहां की औरतों के दर्द को भी बखूबी दर्शाया है. नसीम की कहानी से वहां की औरतों की स्थिति हमारे सामने आई है। इन औरतों का वहां के हालात से कोई वास्ता नहीं है फिर भी झेल रही है, दु:खों का पहाड़ और मार वह भी बार-बार झेलती रही है। “युद्, सियासी दांव पेच, छद्म युद्ध और आतंकवाद से कोई वास्ता नहीं है।“(8) अमिता अपने ब्लॉग में बताती है कि “कश्मीर की स्थिति यह है कि ‘सात औरतों में एक कमाने वाला मर्द आता है। आए दिन जान की आफत्। महंगाई इतनी कि बस.... नौकरी नहीं मिलती। उस पर पहरेदारी अलग से और डर... ऐसा कि औरतें सोए बिना महीनों से रह रही है कि आंख सुर्ख हो जाती है मगर नींद तुम।”(9) औरत को श्रृंगार का पर्याय माना जाता है, हर औरत का जीवन तालिबानी फतवों के बीच गुजर रहा है सर से पांव तक पने आप को ढंककर रखती है। फैशन, सौंदर्य और उसके प्रसाधनों से उसे कोसों दूर कर दिया गया है। आधुनिक युग में जहां नारी ने आसमान छू लिया है तो दूसरी ओर नारकीयता और एक महज खिलौना बन के रह गई है जिसकी चाबी किसी और के पास है। लेखिका कहते हैं- ‘देखिए न, मजलूम और पिछड़े परिवारों की नाबालिग लड़कियां थी.... कितनी अजीब बात थी कि जिस हालात में वे बड़ी हुई हैं.... उन्होंने पिक्चर हॉल का मुंह तक न देखा होगा.... महिलाओं की फैशनबल किताबें उन्होंने छुई तक न होगी... और बिना पार्लर जाए भी वे इस किस्म के स्कैंडल में जा उलझी थीं। वह ब्यूरोक्रेसी का सडा हुआ चेहरा था जिसने नौकरी का लालच देकर उन मजलूम लड़कियों को जाल में फंसाया था... वह भी चाय सैंडविच मिलाकर “(10) उपन्यास में लेखिका ने सारी घटनाओं को तारीख के साथ दिया है जो उस घटना कि वास्तविकता को दर्शाती है। ‘कश्मीर में एथानिक क्लीजिंग के पैरोकार यही थे जो आज उपवास रख रहे हैं। हिटलर मानो गांधी का चोला पहनकर आ गया हो। ये आज कहते हैं कि कश्मीर मुसलमान कभी नहीं वो आदेश जो मस्जिदों के इमामों ने जारी किए थे, 19 जनवरी, 1999 को।“

उपन्यास में विस्थापितों की दास्तां है, अपनी ही जड़ से उखड़ जाने की पीड़ा व्यक्त हुई है। आधुनिक तकनीकी का अच्छा प्रयोग करके लेखिका ने दर्द को बयां किया है। आज तक कश्मीर मसले का कोई मुकम्मल हल नहीं निकला है। कश्मीरियों की एक महागाथा है। कश्मीर निर्वासितों की सबसे बड़ी समस्या भी यही है। वह न चाहकर भी अपने अतीत में उलझा हुआ है। विस्थापन,धर्मनिरपेक्ष और साँस्कृतिक आदि सभी समस्याओं और दर्द का खुलासा है ‘शिगाफ’.

 

संदर्भ सूची:

(1) लमही:प्रधान संपादक: विजय राय: संपादकीय : पृ: 5, जनवरी-मार्च: 2013

(2) Rajkamal prakashan.com/default/novels/shigaf-1093

(3) शिगाफ : मनीषा कुलश्रेष्ठ: पृ. 38

(4) शिगाफ : मनीषा कुलश्रेष्ठ: पृ. 24

(5) शिगाफ: मनीषा कुलश्रेष्ठ पृ.61

(6) लमही: प्रधान संपादक: विजय राय:जनवरी-मार्च: 2013 पृ. 16

(7) शिगाफ: मनीषा कुलश्रेष्ठ: पृ-57

(8) शिगाफ: मनीषा कुलश्रेष्ठ: पृ. 79

(9) शिगाफ: मनीषा कुलश्रेष्ठ: पृ. 78

(10)शिगाफ: मनीषा कुलश्रेष्ठ: पृ. 134

डा.कल्पना गवली

एसोसियेट प्रोफ़ेसर,

हिंदी विभाग,

कला संकाय,

महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ोदा

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