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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग - गिलहरी पर श्रीराम का आशीर्वाद / मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

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राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहि सत कोटि अहिसा ॥

श्रीरामचरितमानस उत्तरकांड 104-2

श्रीराम के चरित का वर्णन अत्यन्त ही अपार है । सौ करोड़ शेषनाग भी अपने अनेकों मुखों से वर्णन नहीं कर सकते । अतः अनेक भारतीय भाषा के साहित्यों में यत्र-तत्र सर्वत्र श्रीराम कथा में उनके इन चरित्रों एवं लीलाओं का वर्णन प्राप्त होता है । श्रीरामकथा का भारतीय धार्मिक ग्रन्थों में विशिष्ट स्थान है । उनके चरित्र के अनेक प्रसंगों का वर्णन तेलुगुभाषा के रंगनाथरामायण में भी प्राप्त होता हैं जो यहाँ रामायण प्रेमी भक्तों के लिए प्रस्तुत है ः-

तेलुगुभाषा में श्रीराम कथा का अपना विशिष्ट महत्त्व है । ऐसा माना गया है कि तेलुगु भाषा में श्रीराम कथा साहित्य का प्रादुर्भाव तेरहवीं सदी में प्रारम्भ हुआ है । रंगनाथरामायाण तेलुगु भाषा का एक अत्यन्त ही लोकप्रिय महाकाव्य है । जिसे सन् 1380 ई0 के लगभग श्री गोनबुद्धराज ने देशज छन्दों में लिखा है जो श्रीराम-कथा तेलुगु साहित्य का सबसे प्राचीन काव्य है। श्रीगोनबुद्धराज संस्कृत एवं तेलुगु भाषा के मर्मज्ञ थे । अतः उन्होंने रंगनाथरामायण में महर्षि बाल्मीकि की रामायण को आधार मानकर श्रीरामकथा को अपनी कल्पना-शक्ति के साथ ही साथ प्रचलित लोक कथाओं तथा अन्य रामकथा साहित्य के प्रसंगों के अनुसार अपनी इस रामायण में अत्यन्त ही रोचक-प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया है। यहाँ एक ऐसी लघु-कथा प्रसंग का वर्णन उन्होंने इस रामायण के युद्धकाण्ड में श्रीराम को गिलहरी के द्वारा सेतुबन्ध कार्य में सहायता करने का किया है।

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श्रीराम लंका विजय हेतु समुद्र पर सेतु निर्माण का कार्य करवा रहे थे । वानर बड़े-बड़े पहाड़ों से शिला खण्ड उठा-उठा कर तथा बड़े-बड़े वृक्षों को लाकर नल के हाथ में दे रहे थे । नल के हाथ का स्पर्श होते ही पत्थर समुद्र पर तैरने लगते थे और पुल (सेतु) का निर्माण कार्य शीघ्रता से आगे बढ़ रहा था। श्रीराम और लक्ष्मण सेतु के पास खड़े होकर इस निर्माण कार्य का बड़ी सूक्ष्मता से निरीक्षण कर रहे थे। उस समय एक गिलहरी ने यह देखकर सोचा कि सेतु का निर्माण कार्य अत्यन्त ही शीध्रतापूर्ण होना चाहिये ।

 

अतः मैं भी उस कार्य में अपनी यथाशक्ति श्रीराम के इस कार्य में सहायता करूँगी। श्रीराम का स्मरण कर उस गिलहरी ने बड़ी श्रद्धा-आस्था-भक्ति के साथ समुद्र में गोता लगाया और फिर तट पर आकर बालू पर लेट गई , पुनः वह सेतु के पास गई और अपने शरीर पर लगी बालू रेत को झटका देकर गिराने लगी । बार-बार गिलहरी ने ऐसा किया श्रीराम की दृष्टि उस गिलहरी पर गई तो उन्होंने कहा- देखो लक्ष्मण ! यह नन्हीं गिलहरी अपनी शक्ति अनुसार पुल निर्माण में तट की बालू रेत को पुल तक पहुँचाकर मेरी सहायता कर रही है । श्रीराम ने सुग्रीव से कहा कि बड़े प्रेम से इस गिलहरी को मेरे पास ले आओ। सुग्रीव उसे पकड़कर श्रीराम के पास ले आये और उनके हाथों में दे दिया । श्रीराम ने उसकी प्रशंसा की और अपना दाहिना हाथ उसकी पीठ पर फेरा और फिर उसे वहां से सुन्दर स्थान पर छोड़ आने को कहा ।

आज भी श्रीराम के आशीर्वाद स्वरूप गिलहरी की पीठ पर तीन अंगुलियों के चिह्न तीन श्वेत रेखाओं के रूप में दिखलाई देते हैं । गिलहरी की कथा से हमें हमेशा दूसरों की निस्वार्थ सहायता करने का संकल्प लेना चाहिए । निस्वार्थ सहायता का फल ईश्वर अवश्य ही किसी न किसी क्षण अवश्य देता है ।

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मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति Sr. MIG-103, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड- 456010

Ph.:0734-2510708,Mob:9424560115 Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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