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April 2017
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आजादी के बाद पिछले करीब सात दशकों के दौरान देश का विकास तो काफी हुआ है लेकिन इसमें सभी तबकों, समूहों की समुचित भागीदारी नही हो सकी है. देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह मुसलिम समुदाय की दोहरी त्रासदी यह रही कि वह एक तरफ तो विकास की प्रक्रिया में हाशिये पर पहुँचता गया तो दूसरी तरफ असुरक्षा, भेदभाव, संदेह और तुष्टीकरण के आरोपों का भी शिकार रहा. आजादी के करीब 60 सालों बाद मुसलिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिणक स्थिति की पड़ताल करने के लिए जस्टिस राजेन्द्र सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया. सच्चर समिति ने अपनी रिर्पोट के जरिये मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन सम्बंधी उन सच्चाइयों को आकंड़ों के ठोस बुनियाद पर रेखाकिंत करते हुए उन्हें औपचारिक स्वीकृती दिलाई है जिन पर पहले ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था, साथ ही साथ इस रिर्पोट ने बहुत सारे ऐसे मिथकों, भ्रामक दुष्प्रचारों व तुष्टीकरणी के आरोपों को झूठा साबित किया है जिसे एक बड़ा जनसमूह सच माने बैठा था. सच्चर रिपोर्ट को जारी हुए दस साल बीत चुके हैं, इस बीच देश और सूबों के राजनीतिक पटल पर मुसलमानों के कई ऐसे स्वयंभू राजनीतिक मसीहा उभरे हैं जिन्होंने हालात सुधारनें के वायदे और दावे किये लेकिन अभी भी इस समुदाय का सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा और अपने जान-माल की हिफाज़त ही बना हुआ है. सवाल यह है कि उम्मीद जगाने वाले इस रिपोर्ट के जारी होने के दस सालों में क्या मुसलमानों के हालत बदले हैं ? अगर नहीं तो इसके क्या कारण है ?

क्या कहता है सच्चर रिपोर्ट

2005 में देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक दशा जानने के लिए जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था. 30 नवंबर, 2006 को जब कमेटी द्वारा तैयार इस बहुचर्चित रिपोर्ट ''भारत के मुस्‍लि‍म समुदाय की सामाजि‍क, आर्थि‍क और शैक्षि‍क स्‍थि‍ति‍'' को लोकसभा में पेश किया गया तो संभवत आजाद भारत में यह पहला मौक़ा था जब देश के मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक स्थिति को लेकर किसी सरकारी कमेटी द्वारा तैयार रिपोर्ट संसद में पेश की गई थी. अब यह रिपोर्ट भारत में मुसलमान समुदाय की सामाजिक-आर्थिक हालत की सबसे प्रमाणिक दस्तावेज बन चुकी है जिसका जिक्र भारतीय मुसलामानों से सम्बंधित हर दस्तावेज के सन्दर्भ में अनिवार्य रूप से किया जाता है.

समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मुसलमान आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं,सरकारी नौकरियों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है और बैंक लोन लेने में मुश्किलात का सामना करना पड़ता है, कई मामलों में उनकी स्थिति अनुसूचित जाति-जनजातियों से भी खराब है, फिर वो चाहे शिक्षा, रोजगार का मसला हो या अन्य मानव विकास सूचकांक. रिपोर्ट में बताया गया था कि मुस्लिम समुदाय में साक्षरता की दर भी राष्‍ट्रीय औसत से कम है जहाँ 6 से 14 वर्ष की आयु समूह के एक-चौथाई मुस्लिम बच्‍चे या तो स्कूल नहीं जा पाते या बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं, 17 वर्ष से अधिक आयु के बच्‍चे के लिए मैट्रिक स्‍तर पर मुस्लिमों की शैक्षणिक उपलब्धि 26 प्रतिशत के राष्‍ट्रीय औसत के मुकाबले 17 प्रतिशत है, केवल 50 प्रतिशत मुस्लिम ही मिडिल स्‍कूल पूरा कर पाते हैं जबकि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर 62 प्रतिशत बच्चे माध्‍यमिक शिक्षा पूरा करते हैं, शहरी इलाकों और ग्रामीण अंचलों में केवल 0.8 प्रतिशत और शहरों में 3.1 प्रतिशत ही स्नातक हैं. शहरी इलाकों में तो स्कूल जाने वाले मुस्लिम बच्चों का प्रतिशत दलित और अनुसूचित जनजाति के बच्चों से भी कम है यहाँ 60 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे स्कूलों का मुंह नहीं देख पाते हैं. आर्थिक कारणों के चलते समुदाय के बच्चों को बचपन में ही काम या हुनर सीखने में लगा दिया जाता है.

इस रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व केवल 4.9 प्रतिशत है, इसमें भी ज़्यादातर वे निचले पदों पर हैं, उच्च प्रशासनिक सेवाओं यानी आईएएस, आईएफएस और आईपीएस जैसी सेवाओं में उनकी भागीदारी सिर्फ़ 3.2 प्रतिशत थी. पुलिस कान्सटेबल में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 6 प्रतिशत, स्वास्थ्य क्षेत्र में 4.4 प्रतिशत, परिवहन क्षेत्र में 6.5 प्रतिशत तथा भारतीय रेल के नौकरियों में मुसलमानों का प्रतिशत 4.5 थी. बैकिंग सेवा और शिक्षा क्षेत्र में भी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में नगण्य पायी गयी थी. राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और असम जहाँ मुस्लिम आबादी क्रमश: 25.2 प्रतिशत, 18.5 प्रतिशत और 30.9 प्रतिशत थी वहाँ सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी क्रमश: सिर्फ़ 4.7 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 10.9 प्रतिशत पायी गयी थी.

सम्पति और सेवाओं की पहुँच के मामले में भी स्थिति कमजोर पायी गयी थी. सच्चर कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम आबादी के 62.2 प्रतिशत के पास कोई जमीन नहीं है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 43 प्रतिशत है. इसी तरह से सेवाओं की पहुंच को देखा जाए तो 1.9 प्रतिशत मुस्लिम परिवार ही सरकारी अनुदान वाले खाद्य कार्यक्रमों से लाभान्वित होते थे और केवल 3.2 प्रतिशत को ही सब्सिडी वाला लोन मिल पाता था .

इन हालात को देखते हुए सच्चर समिति द्वारा मुस्लिम समुदाय की स्थिति को सुधारने के लिए कई सुझाव भी दिए थे जिनमें से कुछ प्रमुख सुझाव इस तरह से हैं -मुस्‍लि‍म बहुल क्षेत्रों में स्‍कूल,आईटीआई और पॉलि‍टेक्‍नि‍क संस्‍थान खोलना, छात्रवृति‍यां देना, बैंक शाखाएं खोलना, ऋण सुवि‍धा उपलब्‍ध कराना, वक्‍फ संपत्‍ति‍यों आदि‍ का बेहतर इस्‍तेमाल, सामान अवसर आयोग, नेशनल डाटा बैंक और असेसमेंट एंड मॉनि‍टेरी अथॉरि‍टी का गठन आदि.

रिपोर्ट दर रिपोर्ट

सच्चर के बाद तो जैसे मुस्लिम विमर्श का दौर सा चल पड़ा, इसी कड़ी में 2007 में रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट आयी. आयोग की सिफारिश थी कि केंद्र और राज्य सरकार की नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यकों को 15 फीसदी आरक्षण दिया जिसमें 10 फीसदी हिस्सा अकेले मुसलमानों को दिया जाए. इसके बाद 2013 में सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के क्रियान्वयन की हक़ीक़त को जानने के लिए प्रोफेसर अमिताभ कुंडू की अगुवाई में एक कमेटी बनाई गई थी जिसने 2014 में अपनी रिपोर्ट अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को सौंप दी थी. इसमें पता चला कि इस दौरान मुसलमानों के हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है. कुंडू कमेटी ने डाइवर्सिटी आयोग बनाने, अत्यंत पिछड़ी मुसलमान जातियों (अजलाफ) को ओबीसी कोटे में और मुस्लिम दलितों (अरजाल) को ओबीसी से एससी कोटे के दायरे में रखने का सुझाव दिया.

कदम जो उठाये गये

तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा अलग से अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का गठन किया गया और ‘अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री के 15 सूत्री कार्यक्रम’ की शुरुआत की गयी, इसका उद्देश्य मुसलमानों को शिक्षा और नौकरी के लिए बेहतर अवसर मुहैया कराना है, इसी तरह से 90 अल्पसंख्यक बहुसंख्यक आबादी वाले ज़िलों को ‘मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ के लिये चुना गया था. जाहिर है सिफारिशें ज्यादा थीं और पहल नाकाफी. जो थोड़े बहुत कदम उठाये भी गये उनका जमीन पर कोई ख़ास प्रभाव देखने को नहीं मिलता है.

दस साल हाल बेहाल

दस साल का फर्क – आंकड़ों की नजर में

जनसंख्या

मुस्लिम

देश की कुल आबादी

मुस्लिम आबादी प्रतिशत

2001

13.81 करोड़

102.8 करोड़

13.43%

2011

17.22 करोड़

121.08 करोड़

14.2%

साक्षरता

मुस्लिम साक्षरता

देश की कुल साक्षरता

2001

59.1%

64.8%

2011

68.5%

73.0%

6-14 वर्ष की आयु वाले ऐसे बच्चे जो कभी स्कूल नहीं गए

मुस्लिम बच्चे

देश के कुल बच्चे

2004-05

15.3%

10.2%

2011-12

8.7%

4.4%

मदरसों में नामांकित बच्चे

2001

10.3%

2011

17.1%

स्नातकों की संख्या

मुस्लिम

औसत वृद्धि

कुल

औसत वृद्धि

2001

23.9. लाख

98.8%

3.76 करोड़

64%

2011

47.52 लाख

6.2 करोड़

भारतीय पुलिस बलों में मुस्लिमों की भागीदारी

मुस्लिम भागीदारी

कुल
पुलिस बल

औसत भागीदारी

2005

1,00,634

13,18,295

7.63%

2013

1,08,602

17,31,537

6.27%

स्रोत - इंडियन एक्सप्रेस

सच्चर समिति की रिपोर्ट आने के दस साल बाद भी आज मुसलमानों के हालात में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिलता है, शिक्षा, नौकरियों और मानव विकास के अन्य सूचकांकों में हालत कमोबेश वैसे ही बने हुए हैं. आँकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि कुछ मामलों में तो उनकी स्थिति पहले के मुकाबले और भी बदतर हो गई है. 2001 की जनगणना के अनुसार, देश में मुस्लिमों की आबादी 13.43 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना में मामूली बढ़ोतरी के साथ 14.2 प्रतिशत के स्तर पर पहुँच गई है. आज भी मुस्लिम समुदाय की आमदनी दूसरे समुदायों से कम है. बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों की मदद भी उन तक कम पहुँचती है, उनके बच्चे स्कूलों में कम साल गुजारते हैं और उनमें साक्षरता दर भी कम है. अपनी आबादी के बरक्स वे बेहद थोड़ी मात्रा में सेना या पुलिस बलों में पहुंच पाते हैं.

रोजगार की बात करें तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक केवल 33 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के पास रोजगार है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 40 फीसदी है. प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में भी मुस्लिम समुदाय अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों के मुकाबले अभी भी बहुत पिछड़ा है. जून 2013 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एन.एस.एस.ओ.) द्वारा “भारत के बड़े धार्मिक समूहों में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति” नाम से जारी रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न धार्मिक समुदायों में मुसलमानों का जीवन स्तर सबसे नीचे है और वे रोज औसतन महज 32.66 रुपये (प्रति व्यक्ति) में जीवन गुजारते हैं. शहरी इलाकों में सबसे बड़ी संख्या में करीब 46 फीसदी मुसलमान स्व-रोजगार पर निर्भर हैं और यहाँ केवल 30.4 फीसदी मुसलमान ही वेतनभोगी नौकरियों में हैं, जो दूसरे समूहों के मुकाबले सबसे कम तादाद है. एन.एस.एस.ओ. के मुताबिक 2004-05 और 2011-12 के बीच मुसलमानों की प्रति माह प्रति व्यक्ति खर्च क्षमता 60 फीसदी बढ़ी है जबकि यह हिंदू आदिवासियों में 69 फीसदी, हिंदू दलितों में 73 फीसदी, हिंदू पिछड़ों में 89 फीसदी और ''ऊंची जाति के हिंदुओं" में 122 फीसदी बढ़ी. यह फर्क खासकर शहरी इलाकों में बढ़ता जा रहा है, जहां गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों में मुस्लिम पिछड़ों का अनुपात हिंदू दलितों से बढ़ता जा रहा है.

मुस्लिम बच्चों के स्वास्थ और पोषण की बात करें तो स्थिति यहाँ भी ठीक नहीं है. नेशनल फैमली हैल्थ सर्वे -3 के अनुसार भारत में अन्य धार्मिक समुदायों की तुलना में मुस्लिम समुदाय में टीकाकरण की दर कम है. 12 से 23 माह आयु समूह के कुल मुस्लिम बच्चों में टीकाकरण 49.6 प्रतिशत है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 58.8 प्रतिशत है. इसी प्रकार शिशु मृत्यु दर (IMR) की स्थिति देखें तो मुस्लिम समुदाय में शिशु मृत्यु दर 52.4 प्रतिशत है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 57 प्रतिशत है.

मुस्लिम बसाहटों में स्वच्छता/साफ सफाई की स्थिति तो जगजाहिर है, “आक्सफेम” द्वारा जारी रिर्पोट –“सहस्राब्द्वी विकास लक्ष्य और मुस्लिमस आफॅ इंडिया 2013” के अनुसार देश में लगभग 50 प्रतिशत मुस्लिम परिवारों में अलग से शौचालय की व्यवस्था नही है. इसी तरह से केवल 36 प्रतिशत मुस्लिम परिवारों में ही नल के पानी की व्यवस्था है जो कि राष्ट्रीय औसत से 4 प्रतिशत कम है.

शिक्षा की बात करें तो वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत के धार्मिक समुदायों में निरक्षरता की दर सबसे ज्यादा मुस्लिमों में (43 प्रतिशत) हैं, सात साल से ज्यादा उम्र की श्रेणी में भी निरक्षरता की दर सबसे ज्यादा मुसलामानों में (42.72 प्रतिशता) ही है . इसी तरह से 2011 जनगणना ही बताते हैं कि मुसलमानों में ग्रेजुएट्स सबसे कम हैं. जहाँ हिंदुओं में 6 फीसदी ग्रेजुएट हैं, तो मुसलमानों में यह दर केवल 2.8 फीसदी का है. 2014-15 में उच्च शिक्षा पर किये गये अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नामांकित छात्रों में मुसलामानों की हिस्सेदारी केवल 4.4 फीसदी ही है.

लेकिन इन सबके बीच अच्छी खबर यह है कि मस्लिम समुदाय में पढ़ने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है, 2001 से मुकाबले 2011 के बीच मुस्लिमों में 60 फीसदी की तेजी से ग्रैजुएट बढ़े हैं जबकि देश में ग्रैजुएट होने की दर 54 फीसदी है इसी तरह से तकनीकी शिक्षा के मामले में देश की पढ़ाई की दर 68 फीसदी है जबकि मुसलामानों में यह दर 81 फीसदी का है.

मुसलमानों का केन्द्र व राज्य के सरकारी नौकरीयों में प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत कम है. दस साल पहले 2006 में जारी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के कुल 3209 आईपीएस अधिकारियों में से केवल 4 प्रतिशत यानी 128 ही मुस्लिम थे. लेकिन दस साल बाद भी हालात देखिए,कुछ भी नहीं बदला है। 2016 में यह आंकडा कुल 3754 आईपीस अधिकारियों में 120 मुस्लिम अधिकारियों का यानी महज 3.19 प्रतिशत ही है. 2006 में 3 प्रतिशत ही मुस्लिम आईएएस थे, 2016 में इसमें .32 की मामूली बढ़त हुई और यह आंकड़ा 3.32 प्रतिशत हो गया, इसी तरह से उस समय पुलिस सेवा में 7.63 प्रतिशत मुस्लिम थे जो साल 2013 में घटकर 6.27 प्रतिशत रह गए हैं.

मेहरबानों की मेहरबानियाँ

भाजपा को छोड़ कर इस देश की ज्यादातर सियासी पार्टियां मुसलामानों का हितेषी होने का दावा करती है. सच्चर समिति का गठन करने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह ने एक बार बयान दिया था कि “समाज के सभी पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों विशेषकर मुसलमानों को विकास के लाभ में बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए उनका सशक्तिकरण किए जाने की ज़रूरत है. देश के संसाधनों पर पहला हक़ उन्हीं का है” उनके इस बयां पर काफी हंगामा हुआ था खासकर बयान के आखिरी हिस्से पर. लेकिन बुनियादी सवाल यह उठता है कि मुसलमानों की बदतर स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट तो खुद कांग्रेस पार्टी के लिए एक आईने की तरह होनी चाहिए थी. इस मुल्क में कांग्रेस पार्टी ही सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रही है. मुसलामानों की इस हालत में सबसे ज्यादा जवाबदेही उनकी बनती है लेकिन कांग्रेस पार्टी द्वारा मुसलमानों को एक वोट-बैंक की तरह ही देखा गया और उनके लिए कोई ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाये गये. यह जनता पार्टी सरकार थी, जिसने इस देश में 1977 में अल्पसंख्यकों के लिए अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की थी. 1994 में जाकर नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार द्वारा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम (एनएमडीएफसी) का गठन किया गया. इसके बाद 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा सच्चर कमेटी का गठन किया गया. इसी दौरान अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग (एनसीएमसीआईज़) भी बनाया गया. 2006 में अल्पसंख्यक मामलों के विशेष मंत्रालय का गठन किया गया और प्रधानमंत्री के अल्पसंख्यक कल्याण के लिए 15 सूत्रीय कार्यक्रम की भी घोषणा हुई.

2013 में मशहूर अर्थशास्त्री अबू सालेह शरीफ ने ‘सिक्स इयर आफ्टर सच्चर-अ रिव्यू ऑफ इनक्लूसिव पॉलिसीज इन इंडिया’ नाम से एक रिपोर्ट तैयार किया था. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि सच्चर रिपोर्ट आने के छह साल बाद भी मुसलमानों की हालत में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया था हालांकि इस दौरान केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ही थी.

पश्चिम बंगाल में लगभग 29 फीसदी मुस्लिम आबादी है. यहाँ लम्बे समय तक वामपंथियों की हुकूमत रही है और वर्तमान में सत्तारूढ़ ममता बनर्जी भी अपने आप को अल्पसंख्यक हितैषी साबित करने का कोई मौका नहीं चूकती हैं. पिछले साल मशहूर अर्थशास्त्री व नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन द्वारा ‘पश्चिम बंगाल में रहने वाले मुस्लिमों की हकीकत’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की गयी थी जिससे वहां के मुसलामानों की बदहाली का पता चलता है. रिपोर्ट के मुताबिक, महज 3.8 फीसदी मुस्लिम परिवार ही हर महीने पंद्रह हजार रुपये कमा पाते हैं, महज 1.54 फीसदी मुस्लिम परिवारों के पास ही सरकारी बैकों में अकाउंट हैं और राज्य के 6 से 14 वर्ष की उम्र के बीच के 14.5 फीसदी मुस्लिम बच्चे स्कूल तक जा ही नहीं पाते है.

उत्तर प्रदेश में करीब 19 फीसीदी मुस्लिम आबादी है, और वहां की राजनीति के केंद्र में मुसलमान जरूर शामिल रहते हैं, वहां सपा, बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियाँ मुसलामानों का हितैषी होने का दंभ जरूर भरती हैं लेकिन वहां मुद्दा अभी भी तरक्की का नहीं बल्कि सुरक्षा और जान-माल की हिफाज़त का ही हैं. हालांकि यूपी में सांप्रदायिक दंगें फिर भी नहीं रुके हैं. अखिलेश सरकार के दौर में सूबे में करीब 400 छोटे-बड़े दंगे हो हुए हैं. 2012 में समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में 18% आरक्षण,रंगनाथ मिश्रा और सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाब डालने जैसे वायदे किये थे और जैसा की हमेशा से होता आया है यह महज कोरे वायदे ही रह गये.

वोट बैंक के कैदी

देश में चुनावी नगाड़ा बजते ही मुस्लिम समुदाय चर्चा के केंद्र में आ जाता है. राजनीतिक पार्टियाँ भारत के इस सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के असली हितैषी होने का दम भरने लगती हैं. मुसलमानों के सामने एक तरफ तो वो सियासी जमातें होती है जो उनके हक़ में काम करने की कसमें खाती नहीं थकतीं तो दूसरी तरफ दक्षिणपंथी जमातें होती हैं जो उनके तुष्टिकरण का आरोप लगाती हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछडे दूसरे समुदायों की तरह मुस्लिम समुदाय की दशा सुधरने के लिए अलग से प्रयास करने की कोई जरूरत नहीं है.

दरअसल खुद को मुसलमानों की हितैषी बताने का दावा करने वाली सियासी पार्टियों ने मुसलमानों को “वोट बैक” से ज्यादा कभी कुछ समझा नहीं हैं इसलिए उनकी तरफ से इस समुदाय के उत्थान और विकास के लिए गम्भीर प्रयास नहीं दिखाई देता है. मुस्लिम समुदाय के वास्तविक मुद्दे / समस्याएँ कभी उनके एजेंडे में ही नहीं रहे हैं, उनकी सारी कवायद दक्षिणपंथी ताकतों का डर दिखाकर कर मुस्लिम वोट हासिल करने तक ही सीमित रहती है. गौर करने की बात यह है कि साम्प्रदायिकता को लेकर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की लड़ाई ना केवल नकली साबित हो रही है बल्कि कभी–कभी इनका “दक्षिणपंथी ताकतों” के साथ का अघोषित रिश्ता भी नज़र आता है, यहाँ तक कि ये एक दूसरे को बनाये रखने में मदद करती भी नज़र आती हैं ताकि देश के दोनों प्रमुख समुदायों को एक दूसरे का भय दिखा कर अपनी रोटी सेंकी जाती रहे. इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सियासी पार्टियों का जोर या तो इनकी असुरक्षा को भुना कर उन्हें महज एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने की है या फिर उनके नागरिक अधिकारों को स्थगित करके उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना देने की है .

एक तथ्य जिसे नजरअंदाज किया जाता है

आमतौर पर इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि मुसलमान समुदाय एकरूप नहीं है. भाषाई क्षेत्रीय और जाति-बिरादरियों के आधार पर उनमें बहुत विविधता है.बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने 1940 में लिखित अपनी किताब “पाकिस्तान एन्ड पार्टीशन ऑफ इंडिया” में भारतीय मुसलामानों में व्याप्त जातिगत व्यवस्था के बारे में लिखते हुए अशराफ, अजलाफ और अरजाल की चर्चा की है. अशराफ मुस्लिमों की अगड़ी जातियां हैं जबकि अजलाफ श्रेणी में पिछड़े वर्ग की जातियां आती हैं, वही अरजाल मुस्लिमों के अंदर के दलित तबके हैं. चूंकि मुस्लिम दलित समुदायों को संविधान द्वारा मान्यता नहीं है, इसलिए आमतौर पर अजलाफ और अरजाल को मिलाकर एक श्रेणी के अंदर रखते हुए इन्हें पसमांदा यानी पीछे रह गए समुदाय कहा जाता है.1983 में केंद्र सरकार द्वारा 'गोपाल सिंह कमेटी' बनाई गई थी जिसने मुसलमानों को भारत में पिछडे वर्ग का दर्जा दिए जाने की वकालत की थी. भारतीय मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण के प्रोजेक्ट पीपुल्स आफ सीरिज के तहत के.एस सिंह के सम्पादन में प्रकाशित ‘इंडियाज कम्युनिटीज” के अनुसार भारत में कुल 584 मुस्लिम जातियाँ और पेशागत समुदाय हैं. मंडल कमीशन द्वारा पेशे के आधार पर पिछड़े मुस्लमानों का वर्गीकरण किया गया और 80 पेशागत समूहों को पिछड़ा घोषित किया गया है जिसमें जुलाहे,तेली,बढ़ाई और धोबी जैसी जातियां शामिल हैं इनमें से ज्यादातर अपना जातिगत पेशे के कार्यों को करते हैं इनमें से ज्यादातर समुदायों की सामाजिक आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति हिन्दू दलितों एवं आदिवासियों से भी बदतर है. पसमांदा मुसलामानों की कुल जनसंख्या मुसलमानों के आधी आबादी से भी अधिक है लेकिन जब मुस्लिम समुदाय की बात होती है तो आमतौर पर इस विविधता को नजरअंदाज कर दिया जाता है .

दोहरी मार

भेदभाव की एक दूसरी तस्वीर भी है जो बहुसंख्यकवादी राजनीति से निकली है. इसने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को और तीखा किया गया है. धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित अल्पसंख्यक ही होते हैं. 'वे और हम' की ये भावना ने समाज को इस कदर विभाजित किया है कि आज स्थिति यह हो गयी है कि शहरों और अब तो कस्बों में भी मुसलमानों के लिए मुस्लिम आबादी के बाहर प्रापर्टी खरीदना या किराये पर लेना बहुत मुश्किल हो गया है, उन्हें बैकों से उधार मिलने में दिक्कत आती है तथा सरकारी तन्त्र एवं कर्मचारी मुसलमानों को सन्देह की नजर से देखते है. वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ तथाकथित युद्ध के बाद से तो मुसलमानों पर सन्देह और बढ़ा है.

झूठे मुकदमों में फंसाने और मुठभेड़ में मार गिराने की घटनायें भी आम हैं. पिछले दिनों बीबीसी की एक रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि ‘भारत की 1387 जेलों में 82 हजार से ज़्यादा क़ैदी मुसलमान हैं जिनमें से लगभग 60 हज़ार विचाराधीन क़ैदी हैं.’ सरकार ने हाल ही में संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि भारत की 1387 जेलों में 82 हजार से ज़्यादा क़ैदी मुसलमान हैं जिनमें से लगभग 60 हज़ार विचाराधीन क़ैदी हैं.

मौजूदा सरकार का रुख

मौजूदा समय में जो पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ है उसकी विचारधारा इस बात को बार-बार दोहराती रही है कि इस देश में मुसलमानों का तुष्टीकरण होता है और हिंदू उपेक्षा के शिकार हैं. भाजपा द्वारा शुरू से ही सच्चर रिपोर्ट का विरोध किया गया है. मध्यप्रेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो बाकायदा विधानसभा में इस रिपोर्ट को “साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली” करार देते हुए इसकी सिफारिशों को लागू कर्न्ने से एलान कर दिया था. आज मोदी सरकार के मंत्री गिरिराज सिंह खुलेआम एलान करते हैं कि मुसलमानों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त कर देना चाहिए. संघ मुखिया मोहन भागवत थोड़े अंतराल पर दोहराना नहीं भूलते हैं कि देश में रहनेवाले सभी लोग हिंदू हैं. अगर मौजूदा सरकार के रुख को समझना हो तो पिछले साल सितम्बर माह में केरल के कोझिकोड में आयोजित बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है जिसमें उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय को याद करते हुआ कहा था कि “दीनदयाल जी मानते थे कि मुसलमानों को न पुरस्कृत करो न ही तिरस्कृत करो बल्कि उनका परिष्कार किया जाए”. यहाँ “परिष्कार” शब्द पर ध्यान देने की जरूरत है जिसका मतलब होता है “ प्यूरीफाई ” यानी शुद्ध करना. हिंदुत्ववादी खेमे में “परिष्कार” शब्द का विशेष अर्थ है, दरअसल हिंदुत्व के सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर मानते थे कि ‘चूकिं इस्लाम और ईसाईयत का जन्म भारत की धरती पर नहीं हुआ था इसलिए मुसलमान और ईसाइयों की भारत पितृभूमि नहीं हैं, उनके धर्म, संस्कृति और पुराणशास्त्र भी विदेशी हैं इसलिए इनका राष्ट्रीयकरण (शुद्धिकरण) करना जरुरी है.पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने “परिष्कार” शब्द का विचार सावरकर से लिया था जिसका नरेंद्र मोदी उल्लेख कर रहे थे. मुसलामानों के प्रति मौजूदा सरकार के नजरिये को संघ प्रमुख , प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री के बयानों के सन्दर्भ में आसानी से समझा जा सकता है.

वोट बैंक से पोलिटिकल फोर्स बनने की जरूरत

किसी भी लोकतान्त्रिक देश के विकास का पैमाना है कि वह अपने अल्पसंख्यकों के साथ किस तरह का सलूक करता है, जिस देश का एक बड़ा तबका पिछड़ेपन और असुरक्षा के भावना के साथ जी रहा हो वह इस पैमाने पर खरा नहीं उतर सकता है,हिंदुस्तान की जम्हूरियत की मजबूती के लिए जरूरी हैं कि अकलियतों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाने / भुनाने और “तुष्टिकरण” के आरोपों की राजनीति बंद हो और उनकी समस्याओं को राजनीति के एजेंडे पर लाया जाए,सच्चर और रंगनाथ मिश्र कमेटी जैसी रिपोर्टो की अनुसंशाओं पर खुले दिल से अमल हो, समुदाय में बैठी असुरक्षा की भावना को खत्म करने के लिए मजबूत कानून बने जो सांप्रदायिक घटनाओं पर काबू पाने और दोषियों के विरूद्ध कार्रवाई करने में सक्षम हो. दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय को भी भावनात्मक मुद्दों के बहकावे में आना बंद करना होगा और अपनी वास्तविक समस्यायों को हल करने के लिए राजनीति को एक औजार के तौर पर इस्तेमाल करना सीखना होगा। यह काम मज़हबी लीडरान से पिंड छुड़ाकर उनकी जगह नये सामाजिक- राजनीतिक नेतृत्व पैदा किये बिना नहीं किया जा सकता है. उन्हें वोट बैंक नहीं बल्कि पोलिटिकल फोर्स बनना होगा.

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सोहना के हर रोज़ रात को नौ-साढ़े नौ बजे कस्बे की परिधि में घुसते ही गली-मुहल्ले के सभी कुत्ते बिना नागा इकट्ठा हो कर उस पर भौंकने लग जाया करते थे-- भौं!भौं!भौं! न जाने कैसे वे सोहना की पदचाप पहचान लेते थे और उस पर भौंकने लग जाया करते थे। सोहना को मरगिल्ले कुत्तों से डर नहीं लगा करता था।जैकी को भी सोहना पुचकार लिया करता था। पर शेरू?वो तो एक ही था।कान खड़े हुए।पूंछ उठी हुई।कितना खुरार्ट।कितना कटखन्ना काला कुत्ता! मां बचपन में सोहना को कुत्तों के बारे में बताया करती थी कि वे भैरों के वाहन होते हैं। सपने में कुत्तों का दिख जाना शुभ होता है। भूत-प्रेत सबसे पहले कुत्तों को दिखाई देते हैं।भूत-प्रेत! हूं! बेरोजगार भूत! सोहना जैसे बेरोजगार भूत से कस्बेवालों की रक्षा करने के लिए ही शायद कुत्ते भौंकते होंगे...।

सोहना ने अपने कंधे पर बस्ता लटकाया हुआ था।उसमें प्रतियोगिता दर्पण का ताज़ा अंक, सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल का इतिहास विशेषांक,रैन एंड मार्टिन अंग्रेजी व्याकरण तथा उपकार प्रकाशन की सामान्य अध्ययन की कुछ किताबें थीं।हमेशा की तरह उसकी गर्दन झुकी हुई थी। वह कुनमुना रहा था और 'धीर तुम बढ़े चलो' की तर्ज़ पर अपनी मंज़िल की ओर बढ़ा चला जा रहा था। कॉलेज से निकलने के एक-डेढ साल में ही उसके चेहरे पर दायित्वबोध व परिपक्वता की चादर चढ़ गई थी। कॉलेज की मस्ती और बेफिक्री तथा उसके ढाबों की बेतकल्लुफ़ी उसके सिर से हवा हो गई थी। उसकी जगह पर एक अंतहीन चुप्पी उसके अंतस में पसर गई थी।

पीर बाबा की मज़ार आने पर उसने मन में उन्हें सलाम कहा।फिर वह अपने कदमों को गिनने के साथ-साथ आस-पास लगे पेड़ों की गिनती करने लगा ।कटहल के पेड़ के बाद जामुन के दो, आम के पांच,बेल पत्थर के छह,मौलसिरी के दो,आंवले के दो,बड़े शहतूत का एक और छोटे शहतूत का भी एक ही पेड़ तथा नीम के चार पेड़ आते थे और उसके बाद उसका घर आ जाता था।आम के पेड़ के नीचे टपके पड़े होते थे।पहले पेड़ की अमिया खट्टी होती थी।वह सबसे छोटा पेड़ था।तीसरे और चौथे पेड़ की अमिया मीठी हुआ करती थी।इनके नीचे बच्चों की सवार्धिक भीड़ रहा करती थी।जो बच्चे पेड़ पर नहीं चढ़ पाते थे,वह पत्थर मार-मार कर अमिया तोड़ लिया करते थे। कमोबेश यही दृश्य बेल के पेड़ों के नीचे भी दिखाई दे जाता था। डेढ हज़ार डग भरने के बाद सोहना नीम के पेड़ों के नीचे पहुंच जाता था। इन चारों पेड़ों की बुनावट अलग-अलग थी।पहले पेड़ का तना ऊंट के आकार का था।इस पर पीपल का एक पेड़ भी लगा हुआ था।सावन के महीने में औरतें नीम के इसी पेड़ पर झूला डाल कर पींगें भरा करती थीं।दूसरे पेड़ का तना बहुत ऊंचा था।तीसरे पेड़ का तना दो मीटर की ऊंचाई पर था।बचपन में सोहना इस पेड़ पर खूब चढ़ा करता था।चौथे और अंतिम पेड़ का तना त्रिशूल की तरह था।पता नहीं किस अंधविश्वास के चलते औरतें उसके चारों ओर रौली बांधने एवं चढ़ावा चढ़ाने लगी थीं। सोहना की पड़ोसन नेपालन थी। वह विधवा थीं। उनका नाम कुंती था। वह उन्हें मौसी कह कर बुलाया करता था। मौसी सुबह-सुबह नीम के इस पेड़ पर जल चढ़ाया करती थीं।

पौने दस बज चुके थे।कारखाने के घडि़याल में नौ का घंटा कब का बज चुका था।पड़ोसियों की खाटें नीम के पेड़ों के नीचे बिछने लगी थीं।शांतिमोहन भैजी,राम ब्वाडा,बिजेन्दर सिंह चाचा,विमल दादा और विजयसिंह डलैवर भैजी की चारपाइयां बिछ चुकी थीं।लेकिन चबूतरे पर बैठे हुए किशोरी धोबी और जौहरी धोबी के किस्से-कहानी सुने बिना,उन्हें सोने की अनुमति नहीं थी।इसलिए उनके इर्द-ग़िर्द महफ़िल जमी रहती थी।थोड़ी देर में पूरा गढ़वाल समाज उठ कर शांति भैजी की चारपाई पर सिमट आया।शांति भैजी की चांद बिल्कुल सफाचट थी।बस ब्रह्मरंध्र के ठीक ऊपर एक कान से दूसरे कान तक उनका 'बालसेतु' गया हुआ था।राम ब्वाडा ने कच्छा पहना हुआ था और उसका नाड़ा नीचे लटक रहा था।उन्होंने नाभि के ऊपर तोंद तक अपनी बनियान चढ़ा कर रखी हुई थी। ब्वाडा पसीने से तर-बतर हो रखे थे और काफी बेचैन भी दिखाई दे रहे थे।डलैवर भैजी का तो कहना ही क्या- कमीज़ की जेब में उनके तंबाकू,घर में उनके कांटीन(कैंटीन) की बोतल तथा ज़बान पर उनके निंदा रस हुआ करता था।वह होश में कम,सुरूर में अधिक रहा करते थे। उनके बारे में यह उक्ति फिट बैठती थी कि सूरज अस्त, गढवाली मस्त।

शांतिमोहन भैजी को मीटिंग की चिंता हो रही थी।आनंद दादा किश्त देने में कोताही बरत रहे थे।इस माह पांच-छह लोगों की किश्तें नहीं आई थीं।किसी ने ब्याज दे दिया था,तो मूलधन चुकाने से वह कन्नी काट गया था।काफी लोग गर्मियों की छुट्टी में गांव चले गए थे।इसलिए उनका हिसाब-किताब गड़बड़ा गया था।गांव की बात चलने पर डलैवर भैजी कैसे पीछे रह सकते थे।विजय सिंह भैजी को काफल से लदी हुई गुमखाल की डांडियां याद आने लगीं।वह किंगौड़े,बेड़ू,तिमला,हिसरा,काकड़ी और माल्टा को याद कर बिसूरने लगे।उन्हें याद आया कि वह दो साल से गांव नहीं गए हैं।उनके खानदान के सारे देवता नाराज़ हो रखे हैं।उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें।रूठे हुए देवताओं को मनाने जाएं कि उजड़ते हुए घर की देखभाल करें।फिर वह अपनी धाक जमाने के लिए फेंकने लग गए कि उन्होंने तिमला के फूल को देखा है।तिमला का फूल रात में ही खिलता और फट जाता था।गढ़वाल में प्रचलित मान्यता के अनुसार तिमला का फूल अभी तक किसी ने भी नहीं देखा है।डलैवर भैजी के तिमला के फूल की बात छेड़ने का मकसद केवल अपनी धाक जमाना होता था।वह यह बात अच्छे से जानते थे कि जब किसी ने तिमला का फूल देखा ही नहीं है,तो वह उनकी बात की काट किस तरह से कर पाएगा।अत:,अक्सर वह तिमला के फूल की खूबसूरती की तारीफ़ करते हुए कह दिया करते थे कि "आह!क्या तो खूबसूरत नज़ारा होता है उस वक्त।तब ऐसा लगता है मानो कि कोहिनूर हीरा प्रकृति के खजाने में चमक रहा है।"

आमतौर पर शांति भैजी डलैवर भैजी की बातों को दिल पर नहीं लिया करते थे क्योंकि उनका मानना था कि जो आदमी होश में है ही नहीं, तो भला उसकी बातों पर क्या ध्यान धरना। विजय सिंह तो शराब के सुरूर में बकझक करता ही रहता है। इसलिए वह उसकी बातों को इस कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देते थे। मगर अब बात कारखाने की बदहाली और कामगारों की बेदखली पर आ टिकी थी जिससे गढ़वाल सभा का माहौल अनायास ही ग़मग़ीन हो चला था। पिछले कुछ समय से कारखाने के हर खासोआम के बीच यह चर्चा जोरों पर थी कि कारखाने में छंटनी होने जा रही है। लेकिन आज बात कर्मचारियों की छंटनी से बढ़ कर कारखाने की तालाबंदी होने, ज़मीन खाली कराए जाने के नोटिस भेजे जाने औऱ बस्ती में नींव खुदने की कवायद शुरू होने तक पहुंच गई थी। विजय भैजी को मैनेजमेंट के इस फैसले की खबर लग गई थी कि कारखाने को बंद करके उसकी जगह पर एक भव्य आधुनिक विद्यालय की नींव रखे जाने के लिए यह सब ताना-बाना बुना जा रहा है। दरअसल, अंग्रेजों के जमाने के मशहूर व्यापारी लाला धान सिंह के पोते लाला वीर सिंह ने कारखाने और उसके आस-पास की ज़मीन खरीद ली थी। लाला जी की वणिक बुद्धि ने यह भांप लिया था कि महानगर से सटा होने के कारण आगामी कुछ वर्षों में कस्बे की डिमांड बहुत बढ़ने वाली है। इसकी एक वज़ह तो यह थी कि महानगर की सीमा में मेट्रो ने पंख पसार लिए थे। उसकी सीमा में धडल्ले से बहुराष्ट्रिक कंपनियों व सेवा क्षेत्र के दफ्तर खुल गए थे। नवधनाढय मध्यम वर्ग के कुलदीपकों की शिक्षा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए स्कूल का खोला जाना सर्वथा उपयुक्त फैसला था। फिर शिक्षा का व्यवसाय एक मीठे ज़हर की तरह होता है जिसमें अभिभावकों को गुमान ही नहीं होता कि कितनी सफाई से उनकी जेब ढाली की जा रही है।

सोहना वैसे ही गढ़वाल समाज से कटता रहता था। इसलिए गढ़वाल समाज में पसरी गंभीरता को अनदेखा करते हुए सोहना अपने घर में घुस गया। छिड़े हुए मस्ले की संज़ीदगी और उस पर सोहना की बेअदबी देख कर भला बतोडू बिजेन्दर सिंह चचा की जबान भला कैसे रूक पाती। इसलिए अपने जामे से बाहर निकलते हुए उन्होंने कह दिया--" देखो!घरघुस्सू आ गया है।क्या तो हो गए हैं आज कल के बच्चे!न आंखों में शर्म,न दुआ-सलाम!देख कर भी देखो कैसे मुंह फेर लेता है।कुछ मुंह से बोलता भी नहीं।आंखें देखो इसकी-ऐसा लगता है कि जैसे कि हमें खा ही जाएगा यह।पिताजी तो नहीं हैं इसके ऐसे।कितने सज्जन आदमी हैं वे।कितने मिलनसार हैं वे।सबसे हंस-हंस कर बोलते-चालते हैं वे।इसे देखो एक ही घुन्ना है यह सोहना।इससे तो बात करते हुए भी भय लगता है। हम सब इनके भविष्य को ले कर परेशान हो रखे हैं और इन्हें ज़माने से कोई लेना-देना नहीं है। हम तो बेवकूफ़ ठहरे। पहले हमने इनके लिए अपनी जवानी बर्बाद की और अब हम अपना बुढ़ापा इनके लिए होम कर रहे हैं।"

मां डयोढ़ी पर दरवाजे की ओट ले कर मानो सदियों से सोहना का इंतज़ार कर रही थी।सोहना की झलक मिल जाने पर मां ने अपने मन में कहा कि चलो, सुबह का गया हुआ सोहना शाम को सही-सलामत लौट तो आया।इतना ही काफ़ी है।इस वक्त सोहना की शक्ल का दिख जाना ही जैसे उनके लिए संसार की सबसे बड़ी नेमत थी।उनके मायूस चेहरे से तनाव एवं चिंता की मिली-जुली रेखाएं मिट गर्इं।अब हड़बड़ी में मां दो-तीन काम निबटाएगी। पहले-पहले वह पिताजी को खबर करेंगी कि सोहना लौट आया है।इसके बाद मां पीतल की डेकची(पतीले)से भात और कलई की हुई कढ़ाई से आलू की धबड़ी(साग) निकाल कर थाली में परोस देंगी।तांबे के बंठे(घड़े) से पानी का एक गिलास निकाल कर रख देंगी।ये तीनों चीज़ें वे गैस के चूल्हे के ऊपर रख देंगी।गैस के चूल्हे,स्टोव और चूल्हे में ही उनकी ज़िंदगी तमाम हो गई है।स्टोव की पिन लगाने में अब मां को दिक्कत होती है। उसकी भक-भक की ध्वनि मां के ज़हन में चुभने लगती है जिससे उनकी सांस फूलने लगती है। शायद उन्हें अस्थमा रहने लगा है। नहीं, नहीं, उन्हें अस्थमा लकड़ी के चूल्हे का प्रयोग करने से हुआ था।सिर के नीचे ऊंची तकिया रख कर लेटने पर भी कभी-कभी उन्हें आराम नहीं मिल पाता था।एक रात तो उनकी सांस उखड़ने लग गई थी। औंधा मुंह करके लेटने पर भी वे सांस नहीं ले पा रही थीं।उस रात मां को खैराती अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में ले जाना पड़ गया था।एस्थलीन की गोली खाने के साथ-साथ डॉक्टर दवे ने उन्हें इनहेलर लेने की भी सलाह दी थी।मगर इनहेलर खरीदने के लिए पैसे कहां से आते?डॉक्टर साहब की सलाह पर ही मां की सांस की बीमारी की गंभीरता को देखते हुए कुछ समय पहले गैस का चूल्हा लिया गया था।लेकिन घर में उसका इस्तेमाल बहुत कम हो पाता था।इसका एक कारण तो आर्थिक था।दूसरा कारण मां की आशंका थी।मां को यह भय लगा रहता था कि गैस का सिलेंडर कभी भी फट सकता है।इस शंका के चलते गैस का सिलेंडर घर में काफी दिनों तक चल जाया करता था क्योंकि जब गैस इस्तेमाल ही नहीं होगी,तो वह ख़त्म भी कैसे हो पाती।

सोहना के घर के अंदर आने पर आंगन में सिलाई की मशीन ले कर बैठे हुए पिताजी ने एकबारगी उसे देखा और उससे कुछ कहे बिना वह मशीन की सुई में धागा डालने का प्रयास करने लगे।पिताजी की यही दृष्टि सोहना को बेध जाया करती थी।वह मन में सोचता कि पिताजी को ऐसी नज़रों से उसे नहीं देखना चाहिए। इससे तो कहीं अच्छा होता कि पिताजी उसे जली-कटी सुना देते। मगर वह ऐसा कुछ भी नहीं करते। बस अपने काम में लग जाते। यही सोहना को अखरता रहता। तब वह अपने आपसे सवाल-ज़वाब करने लगता कि कौन कहता है इन्हें कि काम करें।सुई में धागा डाल पाते नहीं।आंखें इनकी हर दम सूजी रहती हैं।चश्मे का नम्बर इनका कितना बढ़ गया है।क्यों नहीं अब वे आराम से अपने स्कूल की टीचरी करते और एक साल बाद रिटायर हो जाते?नहीं,ऐसा तो वह कर ही नहीं सकते न।वह घर की साफ-सफाई भी करेंगे।अपने लिए कपड़े भी सिलेंगे।अपने और हमारे कपडे़ धोएंगे भी और फिर यह शिकवा-शिकायत भी करेंगे कि बुढ़ापे में अब उनसे काम नहीं हो पाता।जब काम नहीं हो पा रहा है उनसे,तो काहे नहीं केवल अपनी टीचरी पर ध्यान देते?सोहना अक्सर यह सोचता कि उसके पिताजी दूसरे लोगों जैसे क्यों नहीं हैं?क्यों दिन भर खटते रहते हैं वे?क्या जरूरत है इस उम्र में भी उन्हें काम करने की?लेकिन जिद पर अड़े हैं,तो अड़े हुए हैं।खुद दुखी होते हैं और घरवालों को भी सुखी नहीं रहने देते।ठीक पांच बजे उठ भी जाएंगे।घूमने भी जाएंगे।थोड़ी दंड-बैठक भी करेंगे।वापस आ कर स्नान और पूजा भी करेंगे।मां को चाय भी पिलाएंगे। नाशता बनाने में उनकी मदद भी करेंगे।फिर अपनी साईकिल पर स्कूल के लिए निकल भी जाएंगे ।ठीक सात बजे अपने स्कूल पहुंच भी जाएंगे।उनकी इस नैमित्तिक दिनचर्या में कोई व्यतिक्रम नहीं आता।ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह स्कूल देर से पहुंचे हों।यहीं तक सीमित रहें न फिर वे,क्यों हर काम में फिज़ूल में अपनी चोंच मारते रहते हैं?

सोहना ने खूंटी पर अपना बस्ता टांग दिया था।उसने अपने कपड़े बदल लिए।अपनी कमीज़ और पतलून को उसने तह करके अटैची के नीचे रख दिया। वह जल्दी से रसोई में अपना फोल्डिंग बैड ले आया।उसने भोजन करने से पहले अपना जेबी ट्रांजिस्टर चला दिया।विविधभारती में दस बजे छायागीत कार्यक्रम शुरू हो चुका था।अब सोहना एक साथ तीन-तीन काम करेगा।उसकी नज़र अपना फिल्मी ज्ञान बढ़ाने पर रहेगी।छायागीत में पहला गीत शुरू हो चुका था। दूसरा काम सोहना को खाने का करना था।वह खाने के लिए नहीं,जीने के लिए खाता था।तीसरा और इस वक्त सबसे जरूरी काम सोहना को टिन की छत से टपकती हुई काली-काली बूंदों से अपने भोजन को बचाने का करना था।रसोई में अभी तक भी मिट्टी के तेल की बास आ रही थी।मिट्टी के तेल के स्टोव के भभके वाष्प बन कर छत पर चले जाया करते थे तथा पानी की बूंदें बनने के बाद गरीबी रूपी वर्षा करने लगते थे।जंक लगी टिन की छत से रह-रह कर बुकना गिरता रहता था। भोजन भकोसने के बाद सोहना हाथ धोने के लिए मुहल्ले के नल पर गया।उसे ध्यान आया कि पानी की सप्लाई रात आठ बजे बंद हो जाती है।अब तो रात के दस बज चुके हैं।आंगन में लौटने पर उसे लोहे की बाल्टी खाली होने के बावज़ूद कुछ-कुछ भारी लगी।शायद बाल्टी रिसने लगी होगी।इसलिए मां ने उसके तलवे पर कोलतार चिपका दिया था। इसके बाद 5 लीटर के शालीमार पेंटस का प्लास्टिक का डिब्बा उसने उठाया। उसमें से पानी निकाल कर उसने मग्गे में डाल दिया और अपना हाथ धोने लगा।

सोहना ने अब रसोई में फोल्डिंग बैड बिछा दिया था।अपना बस्ता निकाल कर वह बैड पर बैठ गया।ट्रांजिस्टर बज रहा था।उसने उसका वॉल्यूम धीमा कर दिया। 'गमन' फिल्म का गाना शुरू हो चुका था-सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है..(जयदेव, सुरेश वाडेकर, शहरयार)। सोहना पढ़ रहा था।सिविल सर्विसेज़ क्रॉनिकल का इतिहास विशेषांक उसने निकाल लिया था।वह इतिहास के गढ़े मुर्दे उखाड रहा था।पूर्व-पाषाण युग,पाषाण युग--सोहना के जीवन का प्रस्तर युग अभी तक चल रहा था।वह न जाने कब खत्म होगा?न जाने और कितने पत्थर उसे खाने होंगे अपने इस जीवन में। उसके सिरहाने की तरफ पैडस्टल फैन लगा हुआ था। उसकी ओर जब पंखे की हवा आती थी,तब पत्रिका के पन्ने कबूतर के पंखों की मानिंद फड़फड़ाने लग जाया करते थे --फड़-फड़-फड़-फड़...। कैसी बेकली है सोहना की यह! सोहना का मन एकाग्र नहीं हो पा रहा था जिसके कारण पढ़ाई करने में उसका मन नहीं लग पा रहा था। इसलिए रसोई की लाइट बंद कर सोहना अपनी फोल्डिंग चारपाई को उठा कर नीम के पेड़ के नीचे ले आया। आंगन में बाबूजी और छुटकी पसरे हुए थे।मां करवट बदल रही थी।भैया-भाभीजी का कमरा बंद हो चुका था।सोहना की जेब में रखा हुआ ट्रांजिस्टर बज रहा था।

बिस्तर पर लेट कर सोहना आकाश तकने लगा।आसमान में पूर्णिमा का चांद निकला हुआ था।तारामंडली बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी। चांद की रोशनी में कटहल, जामुन, आम, बेल, मौलसिरी, आंवले, शहतूत और नीम के पेड़ों को देख कर सोहना ने एक आह भरी। इन पेड़ों के नीचे उसके बचपन की न जाने कितनी कही-अनकही यादें दफन हो रखी थीं। मगर फिलहाल वह अपनी यादों को ताजा नहीं कर पा रहा था। इसका कारण यह था कि अपने बिस्तर पर से उसे आम का छोटा पेड़ नज़र नहीं आ रहा था। नहीं, नहीं आम का छोटा पेड़ काट नहीं दिया गया था। बस उसके सामने शुरू हुई मिट्टी की खुदाई के कारण मिट्टी के ढेर ने उसे पाट दिया था। इस तरह छोटा होने की उसे खूब सजा मिली थी। आम के बड़े पेड़ अभी भी अपनी गर्दन उठा कर खड़े हो रखे थे। पर हां, ईंट-गारा-चूना-रोड़ी-बजरी का ढेर लगते रहने के कारण उनका भी दम घुटना शुरू हो गया था। सोहना ने सोचा कि शायद अब पेड़ों से बिछुडने की बेला पास आ गई है। एक पल के लिए वह मायूस हो गया। उसकी बस्ती की चिता पर नवनिर्माण होने जा रहा था। अपने इस अंधकारमय भविष्य से संघर्ष करने के इरादे से उसने अपने मन में संकल्प किया कि अब उसे जल्द से जल्द अपने पांवों पर खडा होना पडेगा।

लेकिन उसकी यह मन:स्थिति अधिक समय तक बनी न रह सकी। कुछ ही देर में उसके माथे पर पडी त्यौरियों ने उधेडबुन का दामन छोड कर चिंता के साथ संगसार होने का फैसला कर लिया। उसके मन में कल की अपनी दिनचर्या के बारे में कच्ची-पक्की सी रूपरेखा बन गई।कल वह नहा-धो कर और नाशता करके घर से फुट लेगा। दोपहर का भोजन उसे करना होता नहीं है।पूरा दिन पानी पर या चाय की चुस्कियों में गुज़ार देने की आदत उसकी हो चली थी।तीन घंटे उसके लाइब्रेरी में बीत जाएंगे।तीन घंटे उसके टयूशन में निकल जाएंगे।एक घंटा टयूशन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में उसका निकल जाएगा।एक घंटा भी उसे तभी लगेगा जबकि सभी बसें उसे टाइम से मिल जाएंगी।टयूशन निबटाने के बाद उसके पास पांच घंटे का समय बचता है।दिन के यही पांच घंटे उसके अस्तित्व के लिए सबसे ज़रूरी होते हैं।इनमें वह कस्बे के एक कोने से दूसरे कोने में साक्षात्कार देने के लिए जाता है।तब उसे लगता है कि उसकी सारी उम्र इंटरव्यू देने में ही गुज़र जाएगी।

आज वह एक जगह साक्षात्कार दे कर आया था। उस प्रकाशन गृह में एक साहित्यकार ने उसका इंटरव्यू लिया था।उन्होंने छूटते ही सोहना से बोल दिया कि जगह भरी जा चुकी है।आप देर से आए हैं।इंटरव्यू कल ही खत्म हो गए थे।हमने उसमें एक आदमी को रख लिया है।नौकरी की बात तो खत्म हो गई थी जिससे सोहना का मन उदास हो गया।कहानीकार तुरंत भांप गया कि सोहना एक ज़रूरतमंद और संघर्षरत युवक है। उन्होंने सोहना का दिल रखने के लिए उससे बात करनी आरंभ कर दी।सोहना की प्रिय पुस्तक, शौक, लेखन,परिवार आदि के बारे में वह पूछने लग गए। सोहना ने उन्हें बताया कि गोदान के अलावा हिमांशु जोशी का उपन्यास 'तुम्हारे लिए' उसे बेहद पसंद है। 'तुम्हारे लिए' की सादगी का वह कायल है।उसका एक मित्र है गौतम,उसने उसे 'तुम्हारे लिए' पढ़ने के लिए दिया था।गौतम 'तुम्हारे लिए' का बहुत बड़ा दीवाना है।वह अब तक 150 बार यह उपन्यास पढ़ चुका है।उसे लगभग सारा उपन्यास ज़बानी याद हो चुका है।इस पर कहानीकार महोदय ने कहा कि 'तुम्हारे लिए' का एक खास तरह का पाठक वर्ग है।तुम युवा हो,तो हो सकता है कि इसलिए तुम्हें यह उपन्यास पसंद आ रहा हो।मेरी स्वयं की एक कहानी खासी चर्चित हुई थी।मुझे एक पाठक ने खत लिख कर बताया था कि वह उस कहानी को लगभग चालीस बार पढ़ चुका है।तुम्हारे मित्र की दीवानगी तो ईर्ष्या करने लायक है।उसने तो आगे-पीछे के सारे रिकार्ड ही तोड़ डाले हैं।सोहना की उनसे और भी कई बातें हुर्इं।अंत में साहित्यकार ने उसे हिम्मत न हारने की सलाह दी।

सोहना को हिम्मत नहीं,नौकरी चाहिए थी।वह आज भी उसे नहीं मिली थी।वह खुद से लड़ने लगा।हूं! हिम्मत न हारना।जेब में किराए के रूप में केवल बीस रूपल्ली का एक नोट है।सुबह जो नाशता किया था,उसके बाद से कुछ पेट में गया नहीं है। कहते हैं कि हिम्मत बांध कर रखो। किससे बांद कर रखूं हिम्मत? अंग्रेजी आती है नहीं, हिन्दी से नौकरी मिलता है नहीं। अगर अंग्रेजी में थोडी गिटपिट करनी ही आती होती, तो कम से कम किसी कॉल सेंटर में ही लग गए होते या होटल की लाइन ही पकड़ ली होती। माना कि साहित्य मानव मस्तिष्क की सर्वाधिक सुंदर अभिव्यक्ति होती है।लेकिन उस साहित्य का क्या उपयोग जो आपके लिए दो जून रोटी का प्रबंध भी न कर सके?भूखे मां-बाप को रोटी न दे सके?अपनी जिद की सूली पर अपने परिवार के सदस्यों को लटका देने का अधिकार आप लोगों को किसने दे दिया?सोहना के मन का ग़ुबार चाय की केतली के मुंह से निकल रही भाप की तरह उड़ रहा था। थोड़ा सा दिमाग पर जोर डालने पर सोहना को वे लोग याद आने लगे जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के साहित्य की बलिवेदी पर अपना जीवन होम कर दिया था।क्या वे लोग सिरफिरे थे?उन लोगों ने क्या तुमसे कम कष्ट उठाए थे अपने जीवन में?जरा सा कांटा पांव पर लग जाने से तुम इतना तिलमिला रहे हो,उन लोगों ने तो तलवार की धार पर चल कर साहित्य की सेवा की थी। तुम शहीद दिखने की कोशिश मत करो। तुम्हारा यह आक्रोश बेबुनियाद है। मन के इन सवालों के बाद से सोहना थोड़ा शांत हो गया।हालांकि अब भी वह झड़ ही रहा था--क्षण-प्रतिक्षण—दीमक लगी लकड़ी के बुरादे की तरह,पर अब वह उतना हताश नहीं था जितना नौकरी न मिलने की बात से वह हो गया था।अब उसे यह लगने लगा था कि साहित्यकार गलत नहीं बोल रहा था।बात तो यह सही ही थी कि सुख-दुख,आशा-निराशा,सफलता-विफलता जीवन के अंग हैं।सफलता मिलने पर आदमी को इतराना नहीं चाहिए और विफलता हाथ लगने पर घबराना नहीं चाहिए।उसे हिम्मत से काम लेना चाहिए।सोहना को भी अपने लक्ष्य के हासिल हो जाने तक मेहनत करते रहनी चाहिए।देर-सबेर उसके जीवन का अंधा दौर समाप्त हो ही जाएगा। इस वैचारिक उठा-पठक से सोहना के माथे की नसें फडफडाने लगीं और उसके माथे पर पहले से पड़े हुए बल कुछ और गहरे हो गए.....।

आंगन में मां अभी भी करवट बदल रही थी। सोहना की चिंता उन्हें दीमक की तरह खाए जा रही थी। वह यह सोच-सोच कर खासी परेशान हो रही थी कि न जाने उनके बेटे को किसकी नज़र लग गई है-उसने हंसना-गाना-बोलना-रोना बिल्कुल छोड़ दिया है।सोहना पहले कितना खिलंदड़ था। सचिन तेंदुलकर का कितना बड़ा फैन हुआ करता था वह। दिन भर क्रिकेट और क्रिकेट ही खेलता रहता था वह। सुबह-सुबह घर से निकल जाया करता था और शाम को लौटा करता था वह। दोपहर में जुराब के अंदर टेनिस बॉल डाल कर और उसे कपड़े टांगने की लोहे की तार पर रस्सी से बांध कर बौटिंग की प्रैक्टिस करता रहता था वह।बैट पर लगती हुई गेंद की धप्प-धप्प से तथा तार की छन-छन से हमारी नींद में खलल पड़ता रहता था। तेंदुलकर के रिकार्डों की उसने कितनी खूबसूरत फाइल बना कर रखी हुई थी।वही सोहना अब क्रिकेट के समाचारों को पढ़ता तक नहीं है।

मुझे याद नहीं पड़ता कि सोहना ने पिछली बार मुझसे या पिताजी से या फिर अपने बड़े भैया, भाभी, छुटकी या भतीजे-भतीजी से कब हंस-हंस कर बातें की थीं?कब वह अपने भतीजे-भतीजी के साथ खेला था?कैसा हो गया है सोहना?सुबह निकल जाता है घर से और रात को लौटता है।न जाने क्या करता है वह, कहां आता-जाता है वह,कहां खाता-पीता है वह,कुछ पता नहीं चलता।एक कमीज़ में अपना पूरा सप्ताह निकाल लेता है वह।हफ्ते बीत जाते हैं जूतों में पॉलिश किए हुए उसे।दाढ़ी बनाना कब से छोड़ रखा है उसने।माथे पर हरदम कितने बल पड़े रहते हैं उसके।आंखों के नीचे कितने गहरे काले गड्ढे हो गए हैं उसके।आंखें भी कितनी लाल-लाल रहने लगी हैं उसकी।ऐसा लगता है कि सोहना की आंखों में से कोई तूफान गुज़र रहा है। क्या हो गया है सोहना को?किताब! किताब! किताब! बस यहीं तक सीमित हो गई है सोहना की ज़िंदगी।किसी से बातचीत नहीं, बस अपनी गर्दन नीचे किए हुए पढ़ता रहता है वह,न जाने क्या-क्या सोचता रहता है वह....अरे पिताजी को रिटायर होने में अभी एक साल तो बचा है।क्यों वह सोचता रहता है कि पिताजी को रिटायरमेंट के बाद मिलनेवाली धनराशि से छुटकी के हाथ पीले कैसे होंगे ?हम लोग कैसे गुज़र-बसर करेंगे?भाई-भाभी क्या करेंगे?भतीजे-भतीजी कहां पढेंगे? गांव का पुश्तैनी मकान कैसे ठीक होगा?ईश्वर की कृपा से अभी हमारे हाथ-पांव तो सही-सलामत हैं न--कुछ न कुछ तो हम करेंगे ही।खाली थोड़े ही बैठे रहेंगे। फिर क्यों कर अपनी जान हलकान करता रहता है वह ? जैसे बड़े भैया अपने बीवी-बच्चों में मस्त हो गए हैं,क्यों नहीं अपनी उम्र के दोस्तों में मस्त हो जाता है वह? हमारे लिए प्राणोत्सर्ग क्यों करता रहता है वह? हमारे लिए ज़ाननिसारी क्यों करता रहता है वह?उसकी उम्र के ही हैं -सूरज, दीपक, दयाल और सुधीर।देखो वे लोग कितने मस्त रहते हैं।सूरज की तो शादी भी हो चुकी है।फिर भी फुटबाल खेलता रहता है वह।इन सब बातों को देख कर मुझे तो यही लगता है कि मेरा बेटा सोहन सिंह जवान तो हुआ ही नहीं है-वह बचपन से सीधे बुढ़ापे में पहुंच गया है।

पिताजी के साथ सोहना ने कभी ऊंचे स्वर में बात नहीं की।पिताजी ने भी कभी सोहना को डांटा नहीं।उनके बीच नई पीढ़ी एवं पुरानी पीढ़ी जैसी भी कोई खाई नहीं है। उल्टे वह उनका बहुत आदर-सम्मान करता है।उसे यह बात चुभती रहती है कि पिताजी को इस उम्र में भी उसकी नालायकी की वजह से मेहनत करनी पड़ रही है।उसका आक्रोश पिताजी के प्रति उतना नहीं है,जितना अपने प्रति है।उसकी खुद से यह नाराज़गी ही मेरी चिंता का सबसे बड़ा कारण है।इसके अलावा सोहना किसी लड़की के इश्क-विश्क के चक्कर में पड़ने के कारण पागल भी नहीं हो रखा है।फिर क्यों कर बोलना छोड़ दिया है उसने हमसे? घर में आता है तो कितना बदहवास रहता है वह -मानो किसी पराए घर में घुस आया हो।उसके आने पर घर में एक रेगिस्तानी उदासी पसर जाती है।उस वक्त घर सन्नाटों का मरूथल बन जाता है जहां पर ग़र्दो-ग़ुबार के रेतीले तूफान आ-आ कर घर रूपी ढूहों को गिराने की कोशिश करते रहते हैं।क्यों नहीं पहले की तरह चहकता-महकता अब वह?क्यों नहीं रफ़ी-किशोर के गाने सुनता-गाता अब वह?किशोर के गानों वह कितना नाचता-कूदता था।लेकिन अब देखो वह कैसे-कैसे गाने सुनता है--तुम अपना रंज़ो-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो, सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है ---भरी जवानी में वह कैसा हो गया है?क्या यह उम्र है उसकी ऐसे गाने सुनने की।

दरअसल, सारा कुसूर इस वक्त का है। समय ही मेरे परिवार का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है। क्या कभी मैंने यह सोचा था कि ऐसा भी एक दिन मेरे जीवन में आएगा जब मैं अपने ही घर में अपने ही कलेजे के टुकड़े से बात करने के लिए तरस जाऊंगी। उससे बात करते हुए मुझे डर लगने लगेगा और उसकी कुशल-क्षेम जानने के लिए मुझे चोरी-छिपे उसकी डायरी पढ़नी पड़ेगी। उसकी डायरी में भी क्या होता है सिवाए रिक्तियों की कतरनों के, प्रकाशन संस्थानों के पतों के, ठेके पर अनुवाद करने के विज्ञापनों के या फिर ट्रेनी पत्रकार की सूचनाओं के। हैं भी वे कितनी-कितनी दूर...एक संस्थान से दूसरे संस्थान तक जाने में ही सारा वक्त निकल जाता है। नौकरी इससे क्या ख़ाक मिलेगी?

बेटा मैं तेरी मां हूं। मुझे मालूम है कि तेरे मन में यह आशंका घर कर गई है कि पिताजी की रिटायरमेंट के बाद तेरे और तेरे बड़े भैया के बीच बंटवारा हो जाएगा। धरमेन्दरा अलग हो जाएगा,तो हो जाने दे।इसमें बुरा क्या है। उसे भी अपनी ज़िंदगी के बारे में फैसला लेने का पूरा-पूरा हक है। बहू को भी अपने आसमान में पंख फैलाने का पूरा-पूरा अधिकार है। मगर एक बात का ध्यान रखना बेटा कि तुम दोनों भाइयों में जब तक बनी है,तब तक ठीक है।बिगाड़ हो जाने पर बेटा लड़ाई-झगड़ा हरगिज़ न करना।हंस-हंस कर अलग हो जाना-तभी तुम्हारे बीच प्यार-मोहब्बत बनी रह पाएगी।पिताजी ने तो चलो जैसे-तैसे गांव की जिम्मेवारी भी निबाह दी और तुम्हें भी पाल-पोस दिया।अब तुम्हारी सोच है बेटा-वो तुम्हें जिस तरफ ले जाए।हमारी फिक्र तुम मत करना।हम जितना कर सकते थे,उतना हमने कर दिया।

सोहना तुझे याद है न कि रात में जब तुझे पेशाब आती थी, तब पिताजी तेरी अंगुली पकड़ कर बाहर आते थे और तुझे पेशाब करा कर लाते थे। उस समय कस्बे में यह बात फैली हुई थी कि वीरवार की रात को बारह बजे पीर बाबा की सवारी हमारे घर के सामने से गुज़रा करती है। तब तू कितना डर जाया करता था। अब देख तू कितना बड़ा हो गया है-खुद उसी नीम के पेड़ के नीचे सोने जा रहा है और अपने पिताजी की ओर देख भी नहीं रहा है। यक़ीन कर बेटा मेरा।मुझे यह जान कर बहुत खुशी हो रही है कि तू अब इतना बड़ा हो गया है कि अपने पांवों पर खड़ा हो कर दुनिया से लड़ने चला है।पर बेटा हम भी तो तेरे मां-बाप ही हैं न,कोई दुश्मन थोड़ी हैं न तेरे।तू हमसे बात न करके,हमें क्यों जीते जी मार रहा है?हमें तेरी सफलता पर तो तुझसे ज्यादा खुशी होगी ही न। देख बेटा त्याग करने की उम्र तो हमारी है।हम देह भी त्याग देंगे तेरे लिए।देख तेरे पिताजी ने तेरी पढ़ाई के लिए अपने फंड से तीस हजार रुपये भी निकाल लिए हैं।तू बेटा हम पर अपनी ज़ाननिसार मत कर।हमें अपना फर्ज़ पूरा कर लेने दे रे तू।

आजकल समय कितना ख़राब चल रहा है।हमारे आस-पास के सारे परिवार टूट रहे हैं।शांतिमोहन भैजी का बेटा कुसंगति में पड़ कर स्मैक खाने लगा है।काफ़ी समय तक उन्हें इसका पता ही नहीं चला।स्मैक खाने के बाद वह बहकी-बहकी बातें करने लग जाता था जिसे अपनी अज्ञानता के कारण उसके घरवाले ऊपर की हवा का कोई चक्कर समझाते रहते थे।विजयसिंह भैजी की बेटी ने भाग कर एक डूम से शादी कर ली क्योंकि उसे अपनी जाति में कोई पढ़ा-लिखा नौकरीपेशा युवक नहीं मिल पा रहा था।बिजेन्दर सिंह चाचा के बेटों में अलगौझा हो गया है। राम ब्वाडा की तो पूछ ही मत-आए दिन उनके घर में सास-बहू की रार मची रहती है।

हमारे देखते-देखते अब के बच्चे कितने बड़े हो गए हैं।वे इतने बड़े हो गए हैं कि अपनी ज़ान से खेलने लग गए हैं-उनमें से कोई नदी में डूब रहा है,तो कोई पंखे से लटक कर जान दे रहा है,कोई ज़हर खा ले रहा है,तो कोई इमारत की छत से कूद जा रहा है। ऐसे में बेटा हम चैन से कैसे बैठ सकते हैं।...तू तो...कहीं...हे देवी मां!...आतंकवादी भी आजकल जगह-जगह पर ट्रांजिस्टर बम रख कर बेकुसूर एवं मासूम लोगों को मार रहे हैं...तू भी बेटा न जाने क्यों नया ट्रांजिस्टर खरीदने की बात करने लगा है..इस ओर ध्यान जाने पर रूह कांप उठती है मेरी...।

अब तक मां की चिंतातुर आंखों में से टूटी हुई माला के धागे से एक-एक कर गिरते हुए मोतियों की तरह आंसू ढरकने लग पड़े थे। साढ़े दस तो बज चुके ही थे। उस वक्त बस छायागीत का अंतिम गीत बज रहा था-

आई ज़ंज़ीर की झनकार खुदा ख़ैर करे, दिल हुआ किसका गिरफ़्तार खुदा ख़ैर करे।

जाने यह कौन मेरी रूह को छू कर गुज़रा, एक कयामत हुई बेदार खुदा ख़ैर करे...।

(रज़िया सुल्तान, ख़य्याम, कब्बन मिर्ज़ा, ज़ान निसार अख्‍़तर)

गाना सुनते-सुनते सोहना सो गया। सवा ग्यारह के करीब विविध भारती की प्रसारण सेवा भी समाप्त हो गई। तब तक उसका जेबी ट्रांजिस्टर धीमे-धीमे स्वर में खड़-खड़-खड़-खड़ करने लगा था।सुबह होते-होते उसकी यह खड़खड़ाहट भी बंद हो गई।संभवत: ट्रांजिस्टर के पेंसिल सैल कमजोर हो गए थे।मगर सोहना की मां ट्रांजिस्टर नहीं थी,पूरी रात जागती रही थी वह.....।

(महेन्द्र सिंह)

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परिचय

जन्म : 26.06.1969 (नई दिल्ली)

भाषा: हिन्दी

मुख्य कृतियां : दीया बनाम तूफान ('हाशिये पर भविष्य' विशेषांक नया ज्ञानोदय); कहानी 'क' और कहानी 'ख' (नया ज्ञानोदय); नाटक जारी है (हंस); मैं पावेल नहीं हूं (पाखी); एक्वेरियम (कथाक्रम); जाननिसारी (परिकथा,जनवरी-मार्च 2017)।

संप्रति : संयुक्त-निदेशक, राज्य सभा सचिवालय ।

संपर्क : फ्लैट नं: सी-39, राज्य सभा आवास, आई.एन.ए. कालोनी, नई दिल्ली-110023

मोबाइल : 09968300239

ई-मेल : 226amahenku1969@gmail.com

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ब्रजमोहन आर्य की कलाकृति

उसने गर्भ में पल रहे बच्चे से उसके दुनियाँ में आने से पहले ही कई सारे वादे किए। जिनको पूरा करने के लिए न जाने कितने दर्द, कितनी तकलीफें सही। अपने जीवन साथी के विरोध का सामना किया जब पता चला कि गर्भ में पल रहे जिस बच्चे को वह जीवन देना चाहती है वही उसके अपने जीवन के लिए खतरा बन सकता है। बच्चे के जन्म लेने के बाद अपने परिवार के लोगों का धोखा जो उसे तलाक के रूप में मिला उस दर्द को भी अपने बच्चे की हँसी-किलकारी के साथ भुला दिया। बच्चे की परवरिश, शिक्षा आदि के लिए पारिवारिक, सामाजिक प्रताड़नाओं का दर्द भी वह हँसते-हँसते सहती रही। आखिर वह एक माँ थी।

माँ के कर्तव्यों से वह अनजान नहीं थी क्योंकि दुनिया में उसकी भी अपनी एक माँ थी जो अपने अन्तिम समय में अपनी बेटी के नाम अपना घर कर गई थी जिसके कारण अपने भाई-भाभी की नफरत का कारण भी वह बनी। साथ ही माँ को वचन भी दिया कि उस आशीर्वाद रूपी कोठी को वह कभी नहीं बिकने देगी। उसी कोठी में अपने बच्चे की खुशियाँ व आवश्यकताओं को पूरा करते- करते उसने बेटे को बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया, इंजीनियर बनाया। अपने बेटे को इस मुकाम तक पहुँचाते- पहुँचाते खुद उसकी आंखों की रौशनी धुंधली पड़ गई। फिर भी उसका संघर्ष व दर्द से नाता खत्म नहीं हुआ। बेटे को नौकरी दिलवाने के लिए ली जाने वाली राशि की व्यवस्था उसे अपनी एक किडनी बेचकर करनी पड़ी। बेटे को नौकरी मिली व विदेश जाने का सुनहरा मौका। उसने कभी सोचा भी न था कि उसे अपने बेटे से दूर होना पड़ेगा।

अब बारी थी बेटे से दूर होने के बाद मिलने वे दर्द की............. जिसे न तो वह अपने चेहरे पर न अपनी जुवां पर आने दे सकती थी, क्योंकि कहीं न कहीं बेटे की खुशी उस दर्द पर भारी थी। समय अपनी गति से आगे बढ़ने लगा। बेटे ने अपने विवाह की सूचना माँ को तार द्वारा दी। जहाँ हर माँ अपने बच्चों की शादी के सपने व अरमान अपने दिल में संजोती है वहीं इस माँ का वो अधिकार भी छिन गया। यादों के सहारे समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था ............. एक दिन अचानक माँ के कानों में बेटे की आवाज़ आई... क्षण भर की खुशी ने बरसों के साथी दुख को पीछे कर अपनी पैठ जमाई।

बेटे ने माँ को परदेस साथ चलने के लिए आखिरकार मना ही लिया साथ ही उसने वह कोठी बेचने के लिए भी माँ को राजी कर लिया, जिसे ना बेचने का वह अपनी माँ को वचन दे चुकी थी। कोठी बेच माँ-बेटे परदेस जाने के लिए निकल पड़े, जाते – जाते माँ के दिल में टीस उठ रही थी अपनी माँ को दिए वचन के टूटने की। पर वो विवश थी। स्टेशन पर पहुँच बेटे ने माँ को एक छड़ी थमाई क्योंकि वह भांप चुका था कि आँखों के साथ- साथ माँ का शरीर भी कमजोर हो चुका था। अपनी माँ को एक बैंच पर बिठाकर बेटे ने माँ से कहा मैं तुम्हारी टिकिट और साथ चलने की व्यवस्था करके आता हूँ। माँ ने कहा जा बेटा मैं यहीं तेरा इंतजार करती हूँ।

कई रातें, कई दिन बीत गए। माँ की आस व आँखें पथरा गईं बेटे का इंतजार करते -करते। माँ उठी उसी छड़ी के सहारे जो उसके लाडले बेटे ने उसे दी थी। किसी तरह उसी छड़ी को सहारा बना कर माँ अपनी बेची हुई कोठी पर पहुँची इस आस में कि कभी बेटा अपने घर की याद कर लौटेगा तो कोई तो होना चाहिये उसका ध्यान रखने के लिए। अब तो सर से छत भी छिन चुकी थी, शरीर भी लाचार हो गया था पर माँ का दिल यह सोचकर परेशान हो उठा कि अगर कभी मेरा बेटा अपने घर वापस आएगा, उसे मेरी जरूरत होगी तो वह कहाँ जाएगा। यही सोच जिन लोगों को कोठी बेची थी उन्हीं के घर चौका-बर्तन करने लगी।

दो वक्त की रोटी के साथ जो तनखा उसे मिलती थी उसे बेटे के नाम संजोने लगी।............

क्या करती वो माँ थी.... माँ तो ऐसी ही होती है।......

 

जबलपुर

अचानक
------
हो गया जब
सामना
खोए हुए ख्वाबों से
लिपट कर मुझ से
यूं चीख कर रो पड़े
अपनी गुमशुदगी
पर हैरान से थे
कितनी शिद्दत से
संवारा था जिन्हें
उन्हें यूँ बिखेर दिए
तोड़ तोड़ कर
अपने सिरहाने
रोज जख्म खाने को
टूटे हुए ख्वाबों के टुकड़े
रोज चुभते है मुझे
मेरे सिरहाने वो बिखर कर
हर रोज जो सो जाते हैं


सांसें
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रखती है
जब से उम्र की
दहलीज पर
कदम
जिस्म की
हरकतों पर
पाबंदी सी
लग गई है
अनगिनत
ख्वाहिशें
वक़्त की
कोख मैं ही
दम तोड़ देती है
उस
भ्रूण की तरह
जो दुनिया
में आने से पहले ही
समाज
के खोखले
रिवाजों की
वेदी पर कुरबान
हो जाते हैं
उसने लड़कपन में कई जख्म खाए होंगे
इतनी संजीदगी क्यों कर उसके चेहरे पर


गुण
------
तुम क्यों हथेली
मिलाने की बात
करते हो
जब तक विचारों का
मेल नहीं होता
अग्नि के चारों
तरफ चक्कर
लगवा लो या
छत्तीस गुण
मिलवा लो
बन्धन मजबूत
नहीं बन्धेगा ।
वो अब नहीं कहेगी
प्याज के आंसू हैं
अपने दर्द को लबों से
बयां कर सकती है
अब उसे जुबां
मिल गई है ।
वो अकेले लड़ सकती है
हजारों से
पर अब भरे बाजार में
अपने कपड़े
नहीं उतारने देगी किसी को।
उसका सम्मान करना
ही पड़ेगा अब
क्योंकि वो
सिलेट पर शब्द
मात्र नहीं लिखती हैं
वो अब इतिहास
लिखने लगी है ।
तुम गिराते रहोगे
तुम्हारे कदमों में
पड़ी रहे वो
नहीं अब ये सोच
बदलने की जरूरत है
तुम्हें
वरना तुम उसका
सामीप्य नहीं
पा सकोगे अब
नारी है तो क्या हुआ
अबला बेचारी नहीं
शक्ति की परिभाषा
बन कर , ब्रह्मांड में
छा गई है वो


चाय
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जब कभी
माँ थोड़ी सी
भी चाय
मेरे प्याले मैं
काम डाल देती थी
मैं बहुत नाराज
होकर वो
चाय का प्याला
यूँ ही छोड़ कर
गुस्से से
नहीं पीती थी
जब तक
माँ ज्यादा
दूसरी चाय
नहीं बनाकर दे देती
आज जब
मैं ससुराल में हूँ
तो सभी का
प्याला भरते भरते
बेटी के हिस्से में
आधा कप देती हूँ
तब समझी
ससुराल में
सब का मन
रखने के लिए
अपने मन को
ना जाने
कितनी बार
मारना पड़ता है
ना जाने कितनी
बार अपना सुख भी
परिवार के
बाकी सदस्यों
के हिस्से में
चला जाता है
बेटी को भी
अपनी जैसे अपना
हिस्सा बांटना
सिखाने
त्याग करने
को स्त्री
धर्म समझते हैं
बस बेटियाँ ही
समझदार बने
उन से यही
उम्मीद रखते हैं
हम


अधूरी
-------
आज ही मिली वो
जो खो चुकी थी ।
एक किताब के कोने में
रंगीन पोटली में
मुझे से मिलने की
ख्वाहिश लिए ,
अपनी पूरी ताकत के साथ
कलम को दबाए
हालांकि चुभ रही थी
उनके दामन में
कुछ अनकही....
जो बहुत अरसे से
चुपचाप बैठी अपने
पूरे होने के इंतजार में
मेरी अधूरी कविता
वो
----
पिघल गयी
कतरा कतरा ,
अपनी मुहब्बत को
जमाने में ।


बाती
------
दिये के खातिर
राख हुई
जाती है बाती ।
दिये को फिर भी
भ्रम है
मुझ से ही
पहचान जाती
बाती


आंसू
-------
तुम क्यों बेवजह
आंखों से गिरते हो
तुम्हें मालूम है ना
जो निगाहों से गिर जाते हैं
वो कभी उठते नहीं
चेहरा आईना है
उम्र के हर पड़ाव का


ये
---
दर्द भी
कितना
नासमझ है
सोचता है
ये
दिल के बहुत
करीब है


मैं
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मैं तो गीली
मिट्टी हूँ
जितने की
लालसा नहीं है
पर मैं
हारूंगी नहीं कभी
मैं तो गीली
मिट्टी सी हूँ
आकार कोई भी
दे देना
मैं तो उसमें ढल
जाऊँगी
मेरी
सीमा निर्धारित मत करो
मुझे भी बहने दो
झरनों सी निश्चल
मैं तो नदी हूँ
सागर में आ मिलूंगी
मुझे
काबीलियत
से
मत आंको
मैं तो पानी हूँ
जिस
रंग में रंगोगे
में
उस रंग में रंग जाऊंगी
मुझे
यूं एक जगह पर
रोके
मत रखो
बहने दो
गंगा जल सी
पापों को नष्ट
करने को
अपने प्रेम की
धारा बताऊंगी


कुछ
---
इस तरह
कशमकश में
जी रही थी
तेरी ना होते
हुए भी तेरा
होने की
चाहत लिए
तेरे दीदार की तलब है हर घड़ी हर वक्त मुझे
कितने अरसे से तू ख्यालों में आया ही नहीं ।


मेरे
----
सिरहाने पर
कुछ टूटे ख्वाब
कुछ बिखरे सपने
रखे हैं
वो रहने दो
मेरी तिजोरी
यादों से
भरी है
वो भी रहने दो
ऐ चुराने वाले
तुम्हें
यहां बस
इन्तजार ही
मिलेगा चुराने हो
जो बरसों से मेरी
आंखों में भरा


शायद
------
हर बार
कुछ फन्दे
छुट जाते है
हकीकत के ।
सपनों को
बुनते बुनते ।
इसलिए हर
बार शुरू से
बुनने पड़ते है मुझे
सपनों के धागे


उम्र
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उम्र भर का तजुर्बा
बांटते रहे
मुझ से उम्र भर
वो लोग

सार्थक देवांगन

भूल की सजा

एक बार की बात है । एक गांव में एक बहुत भुलक्कड़ आदमी रहता था । उसका नाम अइयर था । वह मूलतः चेन्नई का रहने वाला था । वह गांव के डाकघर में पोस्टमास्टर का काम करता था । उसके परिवार वाले चेन्नई में रहते थे । उसका जन्म भी चेन्नई में हुआ था । एक बार की बात है , एक दिन डाकघर में उसने डाकिया को बहुत डांट दिया । डाकिया ने उसे जवाब देते हुए कहा कि – आप एक दिन मेरी जगह काम करके देखिए तब आपको पता चलेगा कि डाकिया का काम कितना मुश्किल है । इतनी धूप में घर घर जाना पड़ता है , और वैसे भी आप भुलक्कड़ आदमी हो , हर चीज भूल जाते हो । अइयर किसी की चुनौती को अनदेखा नहीं करता था । वह आसानी से तैयार हो गया । दूसरे दिन उसने डाकिया की छुट्टी कर दी और उसकी जगह पत्र बांटने निकल पड़ा । गरमी के दिन थे । धूप बड़ी तेज थी । सूरज आग उगल रहा था । थोड़ी दूर चलने पर वह थक सा गया । पेड़ की घनी छाया देखकर थोड़ा आराम करने की सोचने लगा । एक पेड़ के नीचे सो गया । वह भूल गया कि किस काम के लिए निकला है । जब दोपहर ढली तब , रटपटा कर उठा और घर चले गया । शाम को डाकिये के घर के नजदीक गुजरने पर उसे याद आया कि , उसे तो डाक बांटना था । दौड़ते दौड़ते बगीचे में गया और जहां वह सोया था उसके अगल बगल टटोलने लगा । डाक वाली बैग गायब थी । इधर उधर खूब तलाश की , परंतु कोई फायदा नहीं । मुंह लटकाकर वापस हो गया । रात भर इस चिंता में नहीं सोया कि अगले दिन वह डाकिये को क्या मुंह दिखाएगा , फिर क्या पता किस आदमी के लिए क्या जरूरी खबर उस डाक बैग में आयी रही होगी जो उसकी लापरवाही और भूल जाने की बीमारी की वजह से नहीं वितरित हो सकी ।

अगले दिन डाकिये से वह सामना नहीं कर पा रहा था । परंतु जब डाकिये ने बताया कि कल की पूरी चिट्ठियां वितरित हो चुकी है , उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । अपनी गलती के लिये उसने डाकिये से माफी मांगी और चुनौती पूरा नहीं कर पाने की लज्जा में वह छुट्टी लेकर चेन्नई चला गया । अपने परिवार से , बहुत दिनों के बाद मिला था । उसने अपने परिवार के कुछ लोगों को नहीं पहचाना । तभी उसे सभी लोगों ने कहा कि अभी भी बहुत भुलक्कड़ है आप । वापस जाने के दिन करीब आने लगे , तभी उसकी अम्मा ने उसकी शादी के लिए कुछ मेहमान आने की जानकारी दी । उनके चाय काफी के इंतजाम के लिए , अम्मा ने उसे दूध लाने के लिये भेजा । अइयर अपने पुराने स्कूटर से निकल गया । रास्ते में उसके कुछ दोस्त मिल गये । वहीं रूककर चाय पीने लग गया । और उसी चक्कर में वह भूल गया कि किस काम से निकला है ।

शाम को वह घर पहुंचा तब पता चला कि मेहमान आकर निकल गये । लड़के को नहीं देख पाने की वजह से रिश्ता नहीं हो पाया । उसकी अम्मा ने गुस्से में पूछा कि तुम दूध ले आये ? उसने कहा – नहीं । अम्मा मैं तो दूध नहीं लाया । मैं भूल गया । मेरे दोस्त मिल गये थे इसलिए .............। अम्मा ने उसकी लापरवाही के लिए खूब डांटा । पापा ने अम्मा को समझाया कि लड़का कल जाने वाला है इस तरह मत फटकारो । पापा ने बड़े प्यार से समझाया । सुबह वापस जाने के लिए अइयर तैयार हो गया । स्टेशन तक छोड़ने के लिए स्कूटर निकालने के लिए स्कूटर को तलाशने लगे । स्कूटर गायब थी । पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर था पर कुछ कह नहीं सके । स्कूटर को , अइयर पता नहीं , कहां भूल आया था । उसकी ट्रेन छूट गयी । बाद में स्कूटर तो उसके एक दोस्त के घर से मिल गया । परंतु वह अपनी ड्यूटी में दो दिन देर से पहुंचा । अपने सीनियर पोस्ट मास्टर से अपनी भूल और लापरवाही की वजह से खूब डांट पड़ी ।

भूल और लापरवाही ने अइयर को ऐसी सजा दी कि उसकी शादी इस साल भी नहीं हो सकी , और तो और विभाग में होने वाले प्रमोशन की सूची से भी उसका नाम कट गया ।

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सार्थक देवांगन

छठवीं , केंद्रीय विद्यालय रायपुर

अल्लाह ( अलइलअह ), यदि हम इसका विश्लेषण करें तो पाएगें कि अ- आब यानी पानी, ल- लब यानी भूमि, इ- इला यानी दिव्य पदार्थ अर्थात् वायु, अ- आसमान यानी गगन, ह- हरक यानी अग्नि. ठीक इसी तरह भगवान भी पंचमहाभूतों का समुच्चय है, भ- भूमि यानी पृथ्वी, ग- गगन यानी आकाश, व- वायु यानी हवा, अ- अग्नि यानी आग और न- नीर यानी जल. यह बिल्कुल सच है कि अल्लाह या भगवान ही इन पंचमहाभूतों का महान कारक है, जिससे समूचा ब्रह्माण्ड़ गतिमान है. हम सब एक दूसरे के पूरक घटक बनकर आपस में जुड़े हैं. यदि इन पंचमहाभूतों का संतुलन बिगड़ जाता है तो हमारे अन्दर भिन्न- भिन्न प्रकार का विकार उत्पन्न होने लग जाते हैं.

बड़े आश्चर्य की बात है कि आज का आधुनिक समाज, जिससे वह बना है उसी को नहीं जानता है. शायद मेरी इस बात पर आपको यकीन नहीं हो रहा होगा. इस बात की आप स्वयं ख़बर ले सकते हैं. बड़े बड़े स्कूलों और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ रहे नवयुगलों से जरा पूछिए, आपको अपने आप ख़बर हो जाएगी. भारतीयता से दूर हटने का नतीज़ा यही हो रहा है कि हम अपने मूल को ही भूलते चले जा रहें हैं. वह भारतीय संस्कृति ही थी, जो हमें आत्मकेन्द्रियता नहीं, वरन समग्रता का पथिक बनाती थी. परन्तु अन्धी भौतिकता की क्षणिक लोलुपता में हमने अपने आदर्श को ही ठुकरा दिया. आप स्वयं जवाब दीजिए, गर हम अपने मूल को ही नहीं जानते तो स्वयं को कितना जानते होंगे .....?

भारतीय दर्शन, सांख्य दर्शन एवं योगशास्त्र के मुताबिक पंचमहाभूतों को सभी पदार्थों का मूल माना गया है. पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु इन पंचतत्व से ही सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ बना है. आमतौर पर हम लोग इसे क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा कहते हैं. इतना ही नहीं, हिन्दू विचारधारा के समान ही यूनानी, जापानी और बौद्ध मतों ने भी पंचतत्व को महत्वपूर्ण माना है. समूचा ज्योतिष शास्त्र भी इसी पर टिका है, गर इन पंचतत्वों में एक का भी संतुलन बिगड़ जाता है तो हमारा दैनिक जीवन भी प्रभावित नज़र आता है. परन्तु आजकल हम लोग रोग के जड़ को खत्म करने के बजाय रोग को खत्म करना चाहते हैं. यही वजह है कि आजकल अधिकतर व्यक्ति एक बीमारी से निजात पाते ही दूसरी बीमारी से ग्रसित हो जाता है.

पृथ्वी मेरी माता, आकाश मेरा पिता, वायु मेरा भाई, अग्नि मेरी बहन, जल निकट सम्बंधी है. परन्तु आज आलम यह है कि हम इन पंच परिवार को अपना मानकर संरक्षण नहीं कर रहें हैं, नतीज़न ये पाँचों दिन-ब-दिन हमसे रूठते नज़र आ रहे हैं. ये पाँचों स्वयं बीमार भी हैं और तन्हा होकर अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहें हैं. हमने अपने निजी स्वार्थ के लिए बिना विचार किए अपने मन मुताबिक बिल्डिंग बनाए, कारखाने लगाए, रोड़ पसारे , नदियों का पानी रोके, वृक्ष काटे और स्वयं को ही सर्वेसर्वा मानकर इनका हर सम्भव तरीके से दोहन किए. कभी ये तो सोचा ही नहीं कि अब तक हमने इन पंचमहाभूतों को क्या दिया, जो इनसे मैं लेने जा रहा हूँ. खैर कुछ लोगों की बात भी बिल्कुल जायज़ है कि इनको समझने के लिए कोई कोर्स तो होता नहीं है तो फिर हम इनको समझें ही कैसे ? जी हाँ, यकीनन आपको लगता होगा कि आपकी बात बिल्कुल ठीक है परन्तु जब समझने का मौका मिला था तो वह आप ही तो थे, जो हमारी अतुलनीय पावन भारतीय संस्कृति का मज़ाक उड़ाकर पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने में तनिक भी देर नहीं लगाए थे, आपने अपने नव निहालों को भारतीय परम्परा वाले विद्यालय में  शिक्षा हेतु न भेजकर शहर के बड़े कान्वेंट और अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजा था, जो सरेआम हमारे भारतीय संस्कार और संस्कृति की धज्जियाँ उड़ानें हैं. फिर आज आप क्यूँ कहते हो कि क्या ज़माना आ गया है कि विद्यालयों में आधुनिक शिक्षा के साथ साथ नैतिक शिक्षा नहीं दी जा रही है ?

एक बात बिल्कुल साफ है कि समूची सृष्टि के जड़- चेतन इन्हीं पंचमहाभूतों से बनते हैं और अन्ततः इन्हीं में समाहित भी हो जाते हैं. गर हम अपने वैदिक या स्वर्ण भारत की बात करें तो हमें जन्म से ही इन पंचमहाभूतों के साथ सम्बंध स्थापित करना बताया जाता था. पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, वायु इन सबको हम अपना मानकर इन पूजन, वंदन और संरक्षण करते थे. इतना ही नहीं, समाज का लगभग प्रत्येक व्यक्ति पंचतत्व के लिए अपना हर सम्भव योगदान देता ही था. क्योंकि आज की तरह वह आधुनिक उपकरणों पर आश्रित न होकर पंचमहाभूतों पर ही पूर्णरूपेण आश्रित था.

पंचमहाभूत को वैदिक परिभाषा में वाक् कहते हैं. क्योंकि इनमें सूक्ष्मतम भूत 'आकाश' है, उसका गुण शब्द या वाक् है. यह सूक्ष्म भूत 'आकाश' ही सब अन्य भूतों में अनुस्यूत होता है. इसलिए वाक् को ही पंचमहाभूत कहा जाता है. आपने सुना ही होगा कि नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा नदी को देश की पहली जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी और गंगा और यमुना को जीवित मनुष्य के समान अधिकार देने का फैसला किया. भारत ही नहीं, अपितु न्यूजीलैंड ने भी अपनी वागानुई नदी को एक जीवित संस्था के रूप में मान्यता दी थी. खैर यह कोई नई बात नहीं है, हमारा वेद सदियों पहले से ही पंचमहाभूत को जीवंत मानता आया है. इसके हजारों प्रमाण आपको मिलेंगे. ऋग्वेद का एक श्लोक - ' इमं मे गंगे यमुने सरस्वती....' हे गंगा, यमुना, सरस्वती मेरी प्रार्थना सुनो. यानी नदियों को जीवित मानकर हमारे वेदों में प्रार्थना की गई है. यह बिल्कुल सच है कि सनातन धर्मियों ने प्रकृति और मनुष्य के बीच कभी भेदभाव नहीं माना, क्योंकि दोनों सजीव हैं.

दौर इस कदर बदला कि हम अधिकतर नवयुवक अपने वैदिक, पौराणिक वैज्ञानिक तथ्यों को स्वीकार करने में तौहीनी महसूस करने लगे. इतना ही नहीं, प्रत्येक विषय पर अपने व्यक्तिगत मत को थोपने और आधुनिक फूहड़पन को अपनाने में फख्र महसूस करने लगे. मुझे इससे कोई गुरेज नहीं है कि आप आधुनिकता को न स्वीकारें या फिर अपने व्यक्तिगत मत न व्यक्त करें. बशर्ते आपको यह ज्ञात होना चाहिए कि अध्यात्म एक सुपर विज्ञान है और यह भी शोध और सिद्धान्तों पर टिका है, हाँ यह बात जरूर है कि यह आम लोगों की समझ से थोड़ा परे है. अध्यात्म विज्ञान यानी वेद ही आधुनिक विज्ञान का जन्मदाता है. जिन विषयों पर आज शोध किया जा रहा है, अध्यात्म विज्ञान सदियों पहले उन पर शोध करके प्रयोग भी कर चुका है. इसके एक दो नहीं असंख्य प्रमाण एवं दर्शन हैं. अध्यात्म विज्ञान ने भी पंचमहाभूत को ही जड़-चेतन का मूल माना है.

यकीनन हम यह कह सकते हैं कि यह आधुनिक विज्ञान का ही ख़ामियाजा है कि हम जिससे बनें हैं, आज उसी से दूर होते जा रहें हैं. परिणाम भी सामने है, बाढ़, सूखा, प्रदूषण एवं कई अन्य प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से आए दिन हम सब प्रभावित हो रहें हैं. क्योंकि पंचमहाभूतों को संजोये भारतीय अध्यात्म विज्ञान को हमने सिरे से नकार दिया. अब आए दिन इन्हीं पंचमहाभूतों के प्रबन्धन, संरक्षण के लिए सरकार तरह तरह की नीतियाँ एवं जागरूकता अभियान चला रही है. आज हम सबके दिमाग में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि हम समझते हैं कि विज्ञान प्रत्येक विषय का हल ढूंढ़ सकता है. बात कुछ हद तक जायज है , लेकिन यह तभी सम्भव है, जब हम सबके बीच पंचमहाभूतों की समुचित उपस्थिति रहेगी.

आप इस बात को अच्छी तरह से गठिया लीजिए,  पंचमहाभूत विज्ञान नहीं, वरन संस्कार का विषय हैं. हमारे संस्कार ही इनको संरक्षित एवं संचित कर सकते हैं. बशर्ते जरूरत यह है कि हमारे नवनिहालों को प्रारम्भिक स्तर से ही वास्तविकता को मद्देनजर रखकर शिक्षित किया जाए और आधुनिकता के साथ साथ एक नैतिकता का भी पाठ पढ़ाया जाए. ताकि वो समग्रता की सोच से एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण कर सकें.

डॉ. मधु त्रिवेदी

बाल परित्यक्ता
❤❤❤❤❤❤

         जुम्मे - जुम्मे उसने बारह बसंत ही देखे थे कि पति ने परस्त्री के प्रेम - जाल में फँस कर उसे त्याग दिया । उसका नाम उमा था अब उसके पास दो साल की बच्ची थी जिसके लालन -पालन का बोझ उसी पर ही था साथ ही सुनने को समाज के ताने भी थे । मर्द को भगवान ने बनाया भी कुछ ऐसा है जो अपने पर काबू नहीं कर पाता और फँस जाता है पर स्त्री मरीचिका में । बंधन का कोई महत्त्व नहीं । प्रेम भी अंधा होता है लेकिन इतना भी नहीं कि अग्नि को साक्षी मान कर जिस स्त्री के साथ सात फेरे लिए है उस बंधन को भी तोड़ डाले।
           धीरे - धीरे बच्ची बड़ी होती गयी । बच्ची का नाम उज्जवला था साफ वर्ण होने के कारण माँ ने उसको उज्जवला नाम दिया था ' जवानी की दहलीज पर पैर रखते ही वह और भी सुंदर लगने लगी । लेकिन अपनी इस सुन्दरता की ओर उसका बिलकुल ध्यान न था । यह सुन्दरता उसके लिए अभिशाप बनती जा रही थी । चलते फिरते युवकों की नजरें उस पर आकर सिमट जाती थी ।
            सामान्य लड़कियों से भिन्न उसे गुड्डे गुड़ियों के खेल कदापि नहीं भाते थे । प्रकृति के रमणीय वातावरण में जब उसकी हम उम्र लड़कियाँ लंगड़ी टॉग कूद रही होती थी गुटके खेल रही होती थी वह किसी कोने में बैठी अपनी माँ के अतीत को सोच रही होती  थी कि कहीं ऐसी पुनरावृत्ति उसके साथ न हो और  भय से काँप उठती थी ।

       मलिन बस्ती में टूटा - फूटा उसका घर था लोगों के घर -घर जाकर चौका बर्दाश्त करना उनकी आय का स्रोत था माँ बच्ची को पुकारते  हाथ बंटाने के लिए कहा करती थी , बेटी कहा करती थी माँ 'मुझे होमवर्क' करना है । माँ की स्वीकरोक्ति के बाद बेटी उज्जवला पढ़ने बैठ जाती ।  बच्ची पास के निशुल्क सरकारी विद्यालय में पढ़ने जाया करती थी किताब कापी का खर्च स्कालरशिप से निकल जाता था ।  
          धीरे - धीरे माँ की आराम तंगी को समझ बेटी ने ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू कर दिया । मेट्रिक की परीक्षा पास करते ही माँ उमा को ब्याह की चिंता सताने लगी । परित्यक्ता होने के कारण बेटी के साथ बाप का नाम दूर चला गया था लोग गलत निगाह से देखते थे ।  इसलिए जब माँ घर से दूर होती तो उज्जवला को अपने साथ ले जाती ।
         उमा को भय था कि उसकी बेटी उज्जवला भी अपनी माँ की तरह घर , परिवार एवं समाज से परित्यक्त न हो ।इसलिए हर पल उज्जवला का ध्यान रखती थी क्योंकि पति के छोड़ने के बाद जितना तन्हा और और अकेला महसूस करती थी उसकी कल्पना मात्र से काँप उठती थी । पति के छोड़ने के बाद सास ससुर ने भी घर से निकाल दिया था , अतः दुनिया में कोई दूसरा सहारा न था । माँ बाप तो दूध के दाँत टूटने से पहले ही राम प्यारे हो गये थे ।
उसे खुद अपना सहारा बनने के साथ बेटी का सहारा भी बनना था ।
            उज्जवला की सुन्दरता भी किसी अलसाए चाँद से कम न थी पर इस सुन्दरता का पान करने वाले मौका परस्ती भी कम न थे । इसलिये माँ उमा डरती थी कि उसकी बेटी कहीं जमाने की राह में न भटक जाए ।

               अपनी यौवनोचित चंचलता को संभालते हुए उसने आत्मनिर्भर बनने की कोशिश की अतः उसने पास के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने का निर्णय लिया । अब माँ -बेटी के जीवन में नया मोड़ आ गया था अब उसकी माँ को लोग "मैडम जी की माँ के नाम से पुकारते थे । इस तरह समाज में उसका नया नामकरण हो चुका था । अब उसके रिश्ते भी नये आने लगे थे , लेकिन माँ से जुदा होने के अहसास के साथ उज्जवला को कोई रिश्ता कबूल नहीं था ।

               लेकिन माँ उमा का शरीर जर्जर हो चुका था इसलिए उसकी इच्छा थी कि उसकी बेटी शीघ्र ही परिणय सूत्र में बँध जाये लेकिन बेटी जब विवाह की बात चलती तभी "रहने माँ , तुम भी "कहकर इधर -उधर हो जाती " थी । इसलिए माँ ने एक सुयोग्य वर देखकर उज्जवला का विवाह कर दिया ।बेटी के जाते ही माँ फिर से नितांत अकेली हो गयी थी ।

डॉ मधु त्रिवेदी

        

   अड्डा शब्द कहते ही हमारे मन में सबसे पहले हवाई-अड्डे की तस्वीर उभरती है | हवाई-अड्डे हवाई जहाज़ों के ठहरने के वे स्थान हैं जहां कई जहाज़ इकट्ठे खड़े हो सकते हैं | कुछ हवाई-अड्डे राष्ट्रीय हैं तो कुछ अंतर्राष्ट्रीय भी होते हैं | अंतर्राष्ट्रीय हवाई-अड्डों पर अनेक देशों के जहाज़ों के ठहराने की सुविधा होती है | हवाई-अड्डे तो बेशक होते हैं पर अड्डे ‘हवाई’ नहीं होते | लेकिन मुझे ‘हवाई-अड्डा’ शब्द बड़ा मजेदार लगता है | ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह ज़मीन पर स्थित कोई केंद्र न होकर हवा में तैर रहा कोई स्थान हो | वैसे हम भारतवासी हवाई-किले बनाने के बड़े शौकीन हैं और ज़ाहिर है ये हवाई-किले ज़मीनी हकीकत नहीं होते | ये हमारे मन में बसते हैं और इन्हें हम स्वतन्त्र विचरण के लिए हवा में छोड़ देते हैं | एक व्यक्ति के मन में हवाई किला बनाते बनाते यह विचार आया कि क्यों न अपने शहर को स्मार्ट बनाने के लिए किसी पुराने हवाई जहाज़ को लुधियाना लाकर उसमें एक रेस्टोरेंट खोल दिया जाए जिसमें बैठ कर लोग खाना खाएं तो उन्हें ऐसा लगे की वे किसी हवाई जहाज़ में बैठ कर खाना खा रहे हैं | बड़ी बात यह थी, कि उसने अपने इस हवाई-किले को ज़मीन पर उतार दिया | यह हवाई किला ‘हवाई-अड्डा रेस्टोरेंट’ के नाम से आज कायम है |

    हवाई-अड्डे हैं, तो इक्के और तांगों के अड्डे भी क्यों न हों ? असल में पहले इक्के और तांगों के ही अड्डे होते थे | टैक्सी और हवाई जहाज़ों के अड्डे तो बहुत बाद में आए | छोटे कस्बों में आपको कोई सवारी लेने के लिए इक्के/तांगों के अड्डे पर ही जाना पड़ता है | वृहद् हिन्दी कोष में अड्डे का अर्थ “मिलने या इकट्ठा होने की जगह” बताया गया है | अड्डे के लिए जगह और जमघट –ये दो चीजें ज़रूरी हैं | अड्डे के अनेक उदाहरण दिए गए हैं | लेकिन अड्डे की बदकिस्मती देखिए कि यह अधिकतर बदनाम लोगों के जमघट का ही केंद्र माना गया है | चोरों, डकैतों, जुआरियों, आदि, के मिलने की जगह, रंडियों और कुटनियों के डेरे, इत्यादि | आधुनिक समाज में ऐयाशियों के भी अड्डे बन गए हैं | आतंकवादियों के अड्डे हैं; और तो और, पुलिस चौकी को भी आम जनता अड्डा ही कहती है | कोई शरीफ आदमी वहां नहीं जाना चाहता |

    लेकिन जनाब, शरीफों के भी अड्डे होते हैं | उनकी पहचान आप अड्डों की तरह न करें, यह बात दूसरी है | पहले ये केंद्र कहलाते थे | बुद्धि-जीवियों के केंद्र, विचारकों के केंद्र, साहित्यकारों के केंद्र, इत्यादि | अब ये अधिकतर अड्डे हो गए हैं | कभी काफी-हाउज़ साहित्यकारों का मिलन केंद्र हुआ करता था | पर अब ऐसे मिलन केंद्र तो लगभग समाप्त होते जा रहे हैं, इनकी जगह अड्डे बन गए हैं जहां साहित्यकार अपने गुट और गिरोह की बात ज्यादह और साहित्य-चर्चा न के बराबर करते हैं | कई शहरों में ‘इंडियन काफी हाउस’ साहित्यकारों और लेखकों का आज भी अड्डा बना हुआ है, और उसे ‘केंद्र’ न कहकर, ‘अड्डा’ कहने में ही गर्व महसूस किया जा रहा है | यहाँ लेखक आदि यारबाशी के लिए जमा होते हैं, मौज-मस्ती के लिए बातचीत करते हैं | गंभीर विषयों पर चर्चा के लिए भी कोई प्रतिबन्ध नहीं होता | बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों, और पत्रकारों के ऐसे अड्डे आपको हर कस्बे, हर शहर, और गाँवों तक में मिल जावेंगे और ज़रूरी नहीं कि उनकी बैठकें किसी संभ्रांत काफी हाउज़ में ही हों; वे किसी भी बाग़-बागीचे, चाय की गुमटी, खान-पान की छोटी दूकान आदि में भी संपन्न हो सकती हैं | बस अड्डेबाजी के लिए नियमित रूप से, जैसे हर रविवार को, सदस्यों में से कुछ का वहां पहुँच जाना ज़रूरी होता है | अगर आप इतिहास देखें तो वैचारिक अड्डेबाजी का सबसे बढ़िया और ज्वलंत उदाहरण आप यूनानी दार्शनिक सुकरात की बैठकों में देख सकते हैं | सुकरात अपनी बैठक किसी भी कोने में जमा लेते थे और लोगों से संवाद शुरू कर देते थे | देखते देखते इस अड्डेबाज़ी से सुकरात का पूरा एक दर्शन तैयार हो गया जिसका एक प्रमाणित दस्तावेज़ हमें प्लेटो के “डायलोग्ज़” में मिलता है |       

    अड्डे बनाने के लिए जैसे ठोस धरती ही काफी नहीं थी कि अड्डों की वेब-साइट्स भी खुल गईं हैं, जहां अड्डेबाजी की वर्चुअल-दुनिया फल-फूल रही है | मौसम की जानकारी के लिए, मौसम-अड्डा; लोगों को अपनी बात रखने के लिए, लोक-अड्डा; चर्चित खबरों के लिए, रिपोर्ट अड्डा; जवानों के लिए, यूथ-अड्डा; स्त्री-विमर्श के लिए वीमन-लिबरेशन अड्डा_ _ कोई भी, किसी भी मुद्दे को लेकर अपना अड्डा इस आभासी-दुनिया में बना डालता है | ई-अड्डों की तो भरमार होती जा रही है |  अड्डा तेरे रूप अनेक |

                                                                                                              -डॉ. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

रोहित वर्मा की कलाकृति

*नितिन ने कल ही तो प्रोजेक्ट जमा किया था वह आत्महत्या कैसे कर सकता है।*नितिन का दोस्त मुकुल सुबक उठा पुलिस के सामने।

नितिन आई आई टी के अंतिम वर्ष का छात्र था।एक सामान्य घर का मेधावी छात्र।

आज अपने होस्टल के कमरे में पंखे से लटका मिला।

पुलिस पूछ ताछ कर रही थी।

*कुछ दिनों से मानसिक प्रेसर में था नितिन*उसके दोस्त मुकुल ने पुलिस को बताया *वोकह रहा था मैं जो करना चाहता हूं वो कर नही पा रहा हूँ।अच्छे मार्क्स आ नही रहे हैं।नौकरी का कोई भरोसा नही है।माँ बाबूजी कब तक पैसे देंगे।*

वो बहुत भावुक लड़का था वो प्रकृति से बहुत प्यार करता था।वो चित्रकार था ।बहुत सुंदर चित्रकारी करता था।लेकिन बहुत मायूस और टूटा हुआ था।

कल प्रोजेक्ट जमा करते हुए मुझ से कह रहा था।यार बहुत थक गया हूँ।

मेरी नींद लग जाये तो मुझे जगाना नहीं।

पुलिस को उसके कमरे से एक सुसाइड नोट मिला था जिसमें लिखा था।

*मुझे सोने दो*

माधुरी जैन की कलाकृति

शक्लो- सूरत से समीर कोई खास नहीं था परंतु लगातार क्लास में फर्स्ट आने और मानिटर बनने से इमेज तो अच्छी बन ही गई थी उसकी खासकर लड़कियों में।"पढ़ाकू मंडली" में भी लड़कियों के अफेयर के किस्से कानाफूसियों में और टिफिन या छुट्टी के समय तो होता ही रहता था।लेकिन " लफारी टोली" और बंक मारकर भागने वालो के बीच तो हमेशा यही टापिक ही होता था।पढ़ाकू होने के कारण लड़कियाँ उससे बातें करना चाहती थी ।इसी में एक लड़की थी निशा जिसे लफारी टोली"स्टील बाडी" के नाम से कोडिंग कर बुलाया करते थे। थी तो वह झक्क सफेद और  सुंदर !पर उतनी ही लड़कों के सर्कल में बदनाम भी थी।गासिप का केंद्र बिंदु वह हुआ करती थी।

" अमुक के साथ वो फिल्में देखने जाती है तो परसों अपने शो रुम के मैनेजर के साथ शो रुम के गैराज में पकड़ी गई। " महेश उवाच!

  नीरज चटखारे लेकर उसमें जोड़ता" अरे!उसके मैनेजर को उसके भाइयों ने काफी मारा पीटा है और नौकरी से निकाल दिया है।"

सिंटू तो दो कदम आगे बढ़ जाता" अरे! जानकी हास्पीटल का कंपांऊडर बता रहा था कि पिछले सप्ताह भर्ती भी हुई थी। आगे नहीं बताऊंगा क्या हुआ?

सिंटू हमेशा उसके चक्कर में रहता था लेकिन शायद अंगूर खट्टे थे इसलिए भड़ास निकालता रहता था। उसके पापा स्वयं इस स्कूल में मास्टर थे पर सिंटू का मन कभी भी पढ़ाई में नहीं लगा।वह इस लफारी टोली का लीडर था।

तो निशा सेक्शन बी में थी और समीर सेक्शन ए में। आठवें क्लास से दोनों को कभी साथ बैठने का मौका नहीं मिला था क्योंकि सेक्शन ए के साथ डी बैठता था और सेक्शन बी के साथ सी,पर निशा उन दिनों भी  बिना बात के भी कभी कापी किताब मांगने या कभी कुछ पूछने उसके पास चली आती।

समीर बड़ा इमेज कांशस था, वह उसको आते देखकर ही घबरा जाता और उससे कन्नी काटने की कोशिश करता। जल्द से जल्द उसका काम कर छुटकारा पाता था।सेक्शन ए की लड़कियां मोस्टली शरीफ और पढ़ाकू थी और वो समीर के चाल चरित्र को जान भी गये थे कि इस बंदे का तो इस फील्ड में कुछ होने से रहा। ये सिर्फ किताबी कीड़ा बनकर रह जाएगा। पर ऐसा नहीं था कि समीर का दिल नहीं धड़कता, उसको सरसराहट महसूस नहीं होती।उसकी भी ख्वाहिश आम हम उम्र लड़कों के समान थी पर उसने आपने लिए एक इमेज क्रियेट करने के चक्कर में अपने चारों ओर एक वृत (सर्किल) बना लिया था जिसमें वह किसी को नहीं घुसने देना चाहता था ताकि उसकी प्राईवेसी और आत्म संकेंद्रण कोई भंग न कर सके। लेकिन वो वृत की दीवार धीरे धीरे इतनी मजबूत बन गई कि वह स्वयं चाहकर भी उसे तोड़ नहीं पाया।

इसी वृत में फंसे समीर तक " स्टील बाडी" बार बार पहुंचने का असफल प्रयास करती थी और समीर उस घेरे को और मजबूत कर लेता।जैसे अज्ञात भय से कछुआ अपने आपको अपने खोल में समेट लेता है, समीर का भी वही हाल था।

टेंथ में हेडमास्टर हरमन डिसूजा ने अचानक निर्णय लिया कि अब सेक्शन ए और बी साथ एक रुम में बैठेंगे और सी और डी एक साथ।वास्तव हरेक क्लास में चार सेक्शन होता था जिसमें ज्यादातर ब्रिलियेंट बच्चे सेक्शन ए में और सेक्शन बी में होते थे। उन्हें मिक्स कर पढ़ाने का उद्देश्य यह होता था कि अच्छे बच्चों के साथ खराब और कमजोर बच्चे भी पढ़ जायेंगे। लेकिन शायद टेंथ में आकर सेक्शन ए और बी को साथ लाने का उद्देश्य यह रहा होगा कि सभी अच्छे बच्चों को एक साथ अच्छी पढ़ाई करायें, उनपर फोकस करें ताकि स्कूल का बोर्ड में रिजल्ट अच्छा हो और स्कूल का नाम रौशन हो।

हरमन साहब की सोच अच्छी थी पर नियति को कुछ और मंजूर था।अब निशा उसी क्लास रुम में लड़कियों वाली बेंच पर बैठती और समीर लड़कों वाली आगे वाली बेंच पर। वो लड़की न जाने क्या सोचकर हमेशा मुड़ मुड़ कर समीर को देखती रहती। समीर में कौन आकर्षण था न जाने, जबकि वो सांवला सा, दुबला पतला लड़का था और ज्यादा पैसे वाले परिवार से न होने के कारण ज्यादा जिट जाट में भी नहीं रहता था। हालात तो ऐसे थे कि वह हाईस्कूल में भी हाफपैंट पहनकर पहले पहल आया था। वो तो भला हो इंदुशेखर सिंह मास्साब का ,जो बोले" शर्म नहीं आती! ये मोटी मोटी जांघों पर हाफ पैंट पहन कर आते हो। छौड़ी सबको दिखाने आते हो क्या?

वो दिन था जब आखिरी बार उसने हाफपैंट पहना। घर जाकर मां के सामने धरना दे दिया कि फुलपैंट दो तो स्कूल जाऊंगा। नहीं तो नहीं जाऊंगा। अगले दिन से पाजामा और बुशर्ट पहनकर स्कूल जाने लगा।

निशा के क्लास में भी हमेशा समीर को देखते रहने से समीर तो डिस्टर्ब हो ही रहा था, क्लास के लफारी लौंडों के सीने पर भी सांप लोट रहे थे, आरियां चल रही थी। समीर ने अपने खास दोस्तों राजेश ,शशि, और आलोक से अपनी परेशानी बतायी।समीर ने इंदू शेखर मास्साहब से भी यह बात घुमा फिरा कर कहा कि सेक्शन ए और बी के साथ आने से समस्या बढ़ रही है।

एक दिन जब वह स्कूल पहुंचा तो शशि ने कहा " आज तुम आगे के बेंच पर नहीं बैठना।

" क्यों"?

बस कुछ मत पूछो । जो मैं कहता हूं करो। आज बवाल होगा।

शशि उसी गांव का लड़का था शायद उसे कुछ घटना घटने वाली है,इसका अंदाजा था।

उधर जब क्लास की ओर वो जा रहा था तो कुछ लफारी लौंडे पीछे लग गये

" समीर भाई आज आपके साथ बैठूंगा। 

" क्यों?

अरे! वो स्टील बाडी हमेशा आपको देखती रहती है तो इसी बहाने हम पर नजर पड़ जायेगी।

समीर किसी तरह पीछा छुड़ाकर उस दिन शशि के पीछे बैठ गया, शायद पहली बार।ठाकुर जी मास्टर साहब ने अटेंडेंस लिया, जब मैं सबसे पीछे से बोला सारा क्लास चौंक गया था कि आज इसको क्या हो गया?

" समीर आज पीछे क्यों बैठे हो?

" कुछ नहीं मास्साब ,वैसे ही मन किया तो बैठ गया।"

मास्टर साहब पढ़ाना शुरू ही किए थे कि अचानक सभी लड़कियाँ रोते हुए उठ खड़ी हुई।

मास्टर साहब ने पूछा तो बताया" किसी ने हमारे ऊपर लौंग इलायची फेंकी है।

हंगामा होने पर हरमन साहब तीन चार टीचरों के साथ एक मोटी छड़ी लिए क्लास में आ गये।

" बताओ" किसने बदतमीजी और ऐसा करने की हिमाकत की है? मैं उसका खाल उधेड़ दूंगा।"

कोई कुछ नहीं बोला तो पहली बेंच से सटासट मारना शुरू कर दिया।

समीर डर से कंपकंपा रहा था और मन ही मन शशि को धन्यवाद भी दे रहा था क्योंकि सब दिन की भांति वह आगे वाले बेंच पर होता तो मार खा रहा होता। चार पांच लड़कों के मार खा जाने के बाद विष्णु  ने उनको कुछ कहा। 

वो रुक गये। फिर चले गये।

पीछे से चपरासी आया 

" समीर !आपको ठाकुर जी , सिंह साहब और हेडमास्टर साहब बुला रहे हैं।

समीर का तो हलक सूख गया।लगा आज दुनिया पलट जाती,उसे भय से चक्कर आने लगा था पर शशि ने संभाला।

"जो सब हुआ है ,क्लीयर कट बता देना। कुछ नहीं होगा।"

समीर उठा और ऑफिस की ओर धीरे धीरे चला। उस पर जैसे सौ मन पानी पड़ गया हो! गेट पर ही ठाकुर जी और सिद्द्की साहब खड़े थे।

बड़े प्यार से पूछा" क्या निशा के साथ तुम्हारा कोई चक्कर है?

समीर बेतहाशा बोलने लगा" न मास्टर साहब।हम तो कुछ भी नहीं किये हैं। हम तो उसको देखते भी नहीं। वो ही कब से हमारे पीछे पड़ी है। क्लास में जबसे आई है, घूर घूर कर हमको देखती रहती है।हम तो उससे दूर भागते रहते हैं। वो है ही बदनाम लड़की। कुछ लड़के जबर दस्ती उसके साथ मुझे भी बदनाम करना चाहते हैं। "एक ही सांस में वो सबकुछ बोल गया। 

बोले" जाओ"! 

उसके बाद टीचरों की ऑफिस में मंत्रणा प्रारंभ हो गई।समीर अपने गिने चुने दोस्तों के साथ फील्ड में बैठ गया धरने पर। सेक्शन ए और बी को पहले की तरह अलग करो। इसमें सेक्शन डी भी शामिल हो गया क्योंकि तीन साल साथ पढ़ते पढ़ते अपनापन हो गया था।

सेक्शन ए की लड़कियाँ भी चाहती थी कि "बी" साथ न रहे। बी में लड़कियाँ ज्यादा थी जिससे सेक्शन ए वालियों को अपने वजूद पर खतरा महसूस हो रहा था। " स्टील बाडी" ने तो उन्हें हिला ही दिया था और सारे लड़कों का अटेंशन अपनी ओर कर लिया था। दो दिन धरना चला। समीर और साथी सेक्शन ए और डी के बच्चे क्लास में अटेंडेंस बनाकर वापस मैदान में आकर बैठ जाते।

अंत में पढ़ाई और बच्चों के हित में हरमन साहब ने अपना फैसला बदला और सेक्शन बी को अलगकर "सी" के साथ फिर से कर दिया गया।

निशा को उस दिन के बाद समीर ने या किसी ने नहीं देखा। उसे शायद स्कूल से निकाल दिया गया या उसके गार्जियन को बता दिया कि उसके स्कूल आने की जरूरत नहीं है, वह सिर्फ परीक्षा दे।समीर काफी दिनों तक उसके इसतरह बदनाम होकर स्कूल से बाहर हो जाने के लिए खुद को जिम्मेदार ठहरा कर गिल्ट फील करता रहा।

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प्राण प्रतिष्ठा

'मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहुँ सो दशरथ अजिर बिहारी।।'

अखण्ड रामचरित मानस के पाठ का संपुट हाईटेक ध्वनि विस्तारक यंत्रों के माध्यम से पूरे गाँव में धर्म और धार्मिकता को प्रमाणित कर रहा था।

खालिकपुर गाँव के प्रधान रामरतन ने पिता की बरसी पर हनुमान मंदिर का निर्माण करवाया था। पच्चीस साल से गाँव के भाग्य विधाता रहे थे। पिछली बार का चुनाव वे जीते थे परंतु गाँव हार गया था। गांव-जवार में मुखिया दादा की तूती बोलती थी। पाँच-पाँच बेटे जिस टोले से निकलते 'अउरू का हाल हैं....फलनवाँ' कहकर जिसकी खैर-खबर ले लेते वे लोग अपने को खुश नसीब समझते। नई बहुएँ उनकी भौजाइयाँ और बेटियाँ बुआ होती थीं। जिनके प्रति इनके शिष्टाचार का जितना बखान किया जाय कम है।

पिछले कई महीनों से लोचहा गांव के पथर कटवों ने छेनी-हथौड़ी से भगवान महावीर की मूर्ति गढ़ी थी। कुम्हार टोला के मिस्त्री-कारीगरों की जुर्रत कि कहीं और कन्नी-बसुली चला सके हों। जो जिस लायक था मंदिर निर्माण में भागीदार होकर पुन्यार्जन कर रहा था। धरम के इस काम में बेगारी कोई नहीं था क्योंकि सबको इहलोक के बजाय परलोक सुधारने का अवसर जो मिला था। पुन्नि लूटने वालों से इकट्ठा हुए दूध की खीर का इंतजाम प्रसाद रूप में किया गया था। हलवाई न मुखिया जी के यहाँ पहले कभी आया था न आगे ऐसी संभावना थी।

छनई महाराज और भोला का बनाया भोजन सबको स्वादिष्ट कहना पड़ता था। अन्ना आंदोलन रामलीला मैदान में जरूर सफल हुआ था। लेकिन खालिकपुर के नायक का धिरोद्धात्त चरित्र सदाचार की परिभाषाएं रचता था।

अखण्डपाठ के समापनोपरांत अष्टसिद्धिनवनिधि के दाता, केसरी नंदन, अंजना सुत, पवनपुत्र, दुष्टदलन हनुमान जी की मूर्ति में श्वास संचार कराया गया। फूसा-फासी हो रही थी 'ऐरा-गैरा थोड़े ही हैं, पूरे विधि-विधान से करायेंगे, बनारस से आये हैं।'

षोडशोपचार चल रहा था।

स्नानम् समर्पयामि.........

धूपं-दीपं-नैवेद्यं समर्पयामि

सर्वा भावे अक्षतानि समर्पयामि

'......श्री राम दूतंशरणं प्रपद्ये।

'हनूमान जी की जय '

घोषणा की गई कि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा हो गई है। आरती के पश्चात् भक्तजन दर्शनों का पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

गुलमवा पथरकटा मंदिर प्रांगण के बाहर से सबकुछ निहार रहा था। उसे बता दिया गया था कि प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात् उसके स्पर्श से भगवान अछूत .......हो जायेंगे।

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अब तो निपटा दो

धन्नियों से लटके ललउवा के शव से लिपटा उसका बाप रज्जन कभी बेटे की निकली आंखों और लटकी जीभ की ओर देखता तो कभी गांव के खैरख्वाह जबर सिंह और दयाल की ओर। आंखों के आंसू सूख चुके थे। बुढ़ापे का चिराग धोखा दे गया था।

पत्नी के साथ रज्जन बेटे के विवाह की तैयारियां कर रहा था। धन से गरीब मगर दिल से राजा देवी सिंह सरीखा खर्चीला स्वभाव।

विपन्न गला काट-काटकर पैसा नहीं इकठ्ठा करते सो उदारमना होते हैं। गाढ़े-संकरे एक-दूसरे की मदद करना इनका सामान्य स्वभाव। ये दिखावे के लिए दान का ढ़िंढोरा नहीं पीटते। जब किसी ने रज्जन को काम के लिए बुलाया हां के सिवा उलट के जवाब न दिया था।

आज विधाता ने जो विपत्ति डाली उसमें कोई उसका हितू नहीं। समस्याएं, परेशानियां तो बड़ों की हैं। उनके साथ संवेदनाओं, सहानुभूतियों की फेहरिश्त है। गरीब का दुख कहां ? उसका जनम ही दुखों के लिए, तो काहे की हमदर्दी ?

पंच अपना सुविधा शुल्क लिए बिना पंचनामें के लिए तैयार न थे। ललउवा के जेब से तिरासी रुपये निकले जो उसने फांसी लगाने से पहले रिक्शा चलाकर कमाए थे।

रमरतिया के पास तीस बरस पुराना मंगलसूत्र रखा था। जिसको गोद में पाला था उसे गवां देने की पीड़ा वही समझ सकती थी। रज्जन को कोई उपाय नजर न आ रहा था।

'बच्चा तो चले गए, अब किसके लिए मरना-खपना'

बचनी सोनार के हाथ मंगलसूत्र पांच सौ रुपये में बेचकर उसने पंडित काका और ठाकुर दादा को सौ रुपये देकर पंचनामा कराया।

लाश गांव से निकली ही थी कि चौराहे पर घात लगाये पुलिस वाले पीछे लग लिए। चढ़उका चढ़ाकर ट्राली आगे बढ़ी।

हां हूजूरी और सौ रुपये देने पर भी लाश का पोस्टमार्टम रोक दिया गया।

चीर घर में ललउवा की लाश का पांचवा नम्बर था। सूर्य देव भी साथ देने को तैयार न थे। सूर्यास्त के पश्चात लाश को गंगा में प्रवाहित नहीं किया जा सकता था।

चीर घर का कर्मचारी रज्जन के कान में कुछ फुसफुसा गया।

वह सीधे अंदर जाकर डॉक्टर के पैरो में सिर रख तीन सौ तिरासी रुपये देते हुए कहने लगा

'..................साहब अब तो निपटा दो।'

डॉ. श्यामबाबू

मो.-9863531572

 

आत्म परिचय


डॉ. श्यामबाबू
जन्म- 20 जुलाई 1975
एम.फिल, पीएच.डी., अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन :-
रघुवीर सहाय और उनका काव्य 'लोग भूल गए हैं'
भूमण्डलीकरण और समकालीन हिंदी कविता
नई शती और हिंदी कविता
दलित हिंदी कविता का वैचारिक पक्ष
हंस, वर्तमान साहित्य, लहक, निकट, साहित्य सरस्वती, अक्षरपर्व, जनपथ, जनतरंग, लौ सहित तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लघु कथाएं-कहानियां
प्राण प्रतिष्ठा और मुर्दों से डर नहीं लगता कहानियां चर्चित.

रूचि क्षेत्र :-
समसामयिक विषयों पर अध्ययन, विशेषतः भूमण्डलीकरण

प्रसारण :-
दूरदर्शन से साक्षात्कार

संप्रति :-
एकेडमिक काउंसलर, इग्नू, शिलांग
स्वतंत्र लेखन

संपर्क :-
85/1, अंजलि काम्पलेक्स
शिलांग ;मेघालय)
793001
मो.-9863531572
ई-मेल :- lekhakshyam@gmail.com

 

कविता को समर्पित ‘आलोचना’ के सहस्राब्दी अंक 57 को पढ़ते समय मेरा ध्यान बरबस कवयित्री अनामिका की कविता ‘बारामासा’ पर टिक गया, इस ‘बारामासा’ शीर्षक ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी. क्योंकि कहाँ तो नवकवितावादी अपने पूर्व की कविताओं का कलेवर हर स्तर पर बदल डालने का संकल्प लेकर आगे बढ़े थे, और बदले भी, और कहाँ अनामिका ने विषयवस्तु ही पुराना ले लिया.  संवेदना में कितना पुरानापन और नयापन है यह इन कविताओं में डूबने पर ही पता चलेगा. यह परखना रोचक होगा. यह भी देखना रोचक होगा कि नई कविता का जो रूप हमारे सामने है उसमें कविता का जो बहुत कुछ खो गया है, इस बारामासा में उन संवेदना के तंतुओं को घना करने में कवयित्री को कितनी रुचि है और उसे कितना घना पर पाई हैं.

आलोचना का यह सहस्राब्द्र्यांक 57 कुछ विशिष्ट है. इस अंक की प्रस्तुति ‘कविता की उत्तरजीविता’ शीर्षक से सम्पादकीय लिख कर की गई है. सम्पादकीय लिखा है सम्पादक अपूर्वानंद ने. अभी पिछली शताब्दी में कविता का कुछ लोगों ने अंत कर दिया था, तो अपूर्वानंद जी का चिंतित होना स्वाभाविक ही है. वह चिंता से भर गए हैं. इस चिंता में उन्हें जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडार्नो याद आने लगे हैं. अडार्नो ने एक विचार दिया है निगेटिव डायलेटिक्स का- “आश्वित्ज के बाद कविता लिखना बर्बरता है”. आश्वित्ज कंसेन्ट्रेशन कैंप में जर्मनी विरोधियों को नजियों ने बंदी बनाकर और बहुत प्रताड़ना देकर मार डाला. अडार्नो इससे इतने विचलित हो गए कि उनके ह्रदय का करुणा-जल सूख गया. उन्होंने कविजनों को संदेश दे दिया कि ऐसी स्थिति में कविता लिखना बर्बरता होगी. हालाँकि मैंने महसूस किया है कि अत्याचारियों के खिलाफ कविता एक बहुत बड़ा हथियार होती है. हमारे मार्क्सवादी कवि भी पूँजीवादी सोच के विरुद्ध लड़ने के लिए कविता को एक हथियार के रूप में ही इस्तेमाल करने की बात करते हैं. यदि आश्वित्ज के बाद कविता लिखना बर्बरता है तो उसका हथियार के रूप मे प्रयोग करना तो और बर्बरता ढाना ही होगा.

जब अडार्नों ने यह विचार रखा तो पता नहीं उनके ध्यान में महाभारत का युद्ध था या नहीं. पर पत्रिका के सम्पाकीय लिखनेवाले के ध्यान में अवश्य होना चाहिए था. वह तो उनकी नाड़ियों में प्रवाहित है. इस युद्ध में भी बर्बरता बरती गई थी. इसमें मानवी उर्जा का इतना ह्रास हुआ कि उस क्षति से उबरने में भारत को सहस्राब्दियाँ लग गईं. जापान के हिरोशिमा और नागाशाकी पर जो बम गिराए गए वह भी बर्बरता ही थी. उसकी पीड़ा जापान की आज की पीढ़ी तक भुगत रही है. किंतु न तो भारत के न जापान के ही बौद्धिक इतना निराश हो बैठे कि वे ह्रदय के स्फोट को एक बर्बर कार्य मान लिए हों. इन संस्कृतियों के प्राणों में विधेयकता है. महाभारत तो समय में हमसे बहुत दूर है पर जर्मनी के कन्संट्रेशन कैंप में ढाए जा रहे जुल्म के लगभग समांतर ही जापान पर बम गिराए गए थे. इस जापान ने अपने प्राणों की उर्जा का उपयोग कर इस बर्बरता को झेल लिया. पता नहीं अडार्नों के चिंतन में जर्मनी के प्राणों की उर्जा का योग था या नहीं.

खैर, अडार्नों का आयातित चिंतन न तो कविता का अंत कर सका, न उसकी उत्तरजीविता को ही कभी बाधित कर सका और न ही कविता लिखने को कभी बर्बरता में तब्दील कर पाया. कविता लिखी जाती रही और उसे हमेशा हृदय का स्फुरण ही समझा गया. हाँ ऐसा शोर मचाने वालों ने उसमें पोर पोर विचारों को पिरोया जरूर (भावों से दूरी बनाई), पर ये विचार कविता में कितना सौंदर्य भर पाए यह शोध का विषय है. कविता पर तमाम तरह के मुखौटे थोपे गए, कुछ नया लाने के प्रयास में. किंतु सभी प्रयास अल्पजीवी रहे. उसे सीमा में बाँधने की कोशिश की. किंतु हिंदी कविता वादों के घेरे में नहीं आ सकी. कविजनों में अभिव्यक्ति की बेचैनी भरी छटपटाहट थी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. पर उनमें अनुभव और अनुभूति की भरी पूरी समृद्धि भी थी, इसपर विवाद खड़ा हो सकता है.  इनकी प्रामाणिकता की बातें खूब की गईं. पर अब ये कविताएँ कुछ थोड़े से बौद्धिकों तक सिमट कर रह गई हैं. एक समय में सहृदय होते थे जो कविता-पुस्तकों को खोज-खोज कर पढ़ते थे. आज उनका स्थान जन ने ले लिया है और मेरे अनुभव में ये बौद्धिक ही वे जन हैं. इनका आश्रयस्थल जीवन का व्यापक क्षेत्र नहीं वरन् कॉफी-हाउस और पुस्तक विमोचन-मंच हैं. ये अपनी रचनाओं को पढ़े जाने के लिए जन की खोज कर रहे हैं. अभी दैनिक हिंदुस्तान में सुधीश पचौरी का इसपर एक खूबसूरत व्यंग्य आया है.

जो हो, मेरी उत्सुकता इस कवितांक की ‘बारामासा’ कविता में है. यह कवयित्री द्वारा वर्ष के बारह महीनों के नाम से अलग-अलग लिखी गई कविताओं का एक गुच्छ है. कवयित्री ने हर महीने की बदलती ऋतु के अनुसार अपने को उससे जोड़कर जो मन में अनुभूत किया है उसे ही पिरोया है. हिंदी कविता में छायावाद के बाद आज की तिथि तक यह एक अभिनव और साहसिक प्रयोग है. अभिनव इसलिए कि बारहमासा गीतों में जो संवेदनाएँ परंपरा से रूढ़ हो गईं हैं उनका इन कविताओं में दर्शन नहीं होता. ये विशुद्ध बुद्धिवादी कविताएँ हैं. और साहसिक इसलिए कि परंपरागत संवेदनाभूति के स्थान पर इसमें नया चिंतनानुभव और परिप्रेक्ष्य देने की चेष्टा की गई है.

‘बारहमासा’ नाम से एकांत श्रीवास्तव की भी एक कविता देखने को मिली है पर वह बहुत संक्षिप्त है, और चलताऊ है.   

कवयित्री ने अपने कविता-गुच्छ के लिए ‘बारहमासा’ की जगह ‘बारामासा’ शीर्षक चुना है. यह शब्द हिंदी की हरियाणवी बोली का है. इसका अर्थ होता है विरह गान. हिंदी की अन्य बोलियों में भी इस तरह के गीत बहुप्रचलित हैं. वहाँ इन्हें ‘बारहमासा’ कहा जाता हैं. ऐसी कविताओं के लिए ‘बारहमासा’ पद ही अधिक प्रचलित है.

कवयित्री ने अपने गीत-गुच्छ के लिए यद्यपि ‘बारामासा’ शीर्षक चुना है पर इनके गीत विरहानुभूति के गीत नहीं हैं. ये विरह के गान नहीं हैं. वर्ष के हर माह के मौसम-परिवर्तन को वर्ष भर में कवयित्री ने जैसा अनुभूत किया है, उसे इन कविताओं में बुनने का नहीं वरन् चित्रित करने का प्रयास किया है. इसमें प्रकृति उनकी जीवनानुभूतियों के साथ एकरूप नहीं हैं. इस कवितागुच्छ पर कुछ लिखने के पूर्व परंपरागत ‘बारहमासा’ की प्रकृति और स्वरूप को परखना युक्तिसंगत होगा.

‘बारहमासा’ मूल रूप में लोक बोलियों में गाया जानेवाला गीत है. हिंदी की लगभग हर बोली में ‘बारहमासा’ के गीत गाए जाते हैं. गामीण अपनी सीमाओं में जीते हैं. उनके जीने के अपने ढंग होते हैं. जब वे दिन भर के अपने कामों को निपटा कर थके-हारे होते हैं तो शाम को खा-पीकर चौपाल में या अन्यत्र ढोल झाल के साथ इकट्ठे होते हैं और गा-बजाकर अपना मनोरंजन करते हैं--कभी भजन, कभी कबीर का निर्गुन, तो कभी रामचरित मानस के दोहे गाकर. कभी वे निपुण गवैयों को बुलाकर  ‘आल्हा’ और ‘कुँअर विजयमल’ जैसे वीर गीत सुनते हैं तो कभी ‘सोरठी बृजभार’ और ‘विहुला बाला-

लखंदर’ जैसे विरह के गान भी सुनते हैं. इन विरह-गीतों ‘में बारहमासा’ के गीत भी होते हैं.

यह लोक गीत की एक आकर्षक विधा है. इसमें लोक कवि द्वारा किसी विरहिणी स्त्री की पीड़ा गूँथी हुई होती है जो वह अपने प्रियतम के विछुड़ने से भोग रही होती है. विरहिणी हर पल पति की बाट जोहती है. पति अथवा प्रियतम दूर है. महीने पर महीने बीत रहे हैं पर वह नहीं आता. हर महीने प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों के साथ पत्नी अथवा प्रिया की मानसिक दशा में भी परिवर्तन होते हैं. कभी उनका मन आकाश में आषाढ़ के भटकते बादलों में प्रियतम को खोजने के लिए भटक जाता है, तो कभी सावन के झकोरों में झूमते उसके अलक उसके बदन से टकराकर उसे पति-स्पर्श की स्मृति से भर पीड़ा देते हैं. भादो की धारासार बारिश में वह मदन-अंगड़ाइयों से बेहाल हो जाती है. वैसे ही शरद, हेमंत, शीत. बसंत और ग्रीष्म ऋतुओं में पति वियोग से होने वाली मंद-तीव्र पीड़ाओं की अनुभूति उसे सताती हैं. वर्ष भर की ऋतुओं के उतार चढ़ाव के साथ उनकी विरहानुभूति में होने वाले परिवर्तन ही बारहमासा में गुंफित रहते हैं. लोक-कवि अपने बीच विरह में घुलती विरहिणियों की विरहानुभूति को अत्यंत जीवंत रूप से पिरोए रहते हैं और बारहमासा गायक उसमें इतना डूब कर गाते हैं कि सुनने वाले की आँखों में आँसू आए बिना नहीं रहता. लोग उसे रस ले-लेकर सुनते हैं.

बारहमासा कविता वस्तुतः लोक कविता का वह विशिष्ट रूप है जिसमें प्रकृति एवं लोक जीवन की तरलतम अनुभूति का करुणापूर्ण और मोहक दर्शन होता है.

साहित्य मे यह ग्यारहवीं शती से मिलता है. इसका प्राचीनतम साक्ष्य अब्दुल रहमान कृत संदेशरासक का विरह-प्रसंग है (हिंदी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ- पृ 315, योगेंद्र प्रताप सिंहा) अपभ्रंश साहित्य की नेमिनाथ चउपई में भी बारहमासा का प्रसंग है. रासो काव्यों में, बीसलदेव रासो और ढोला मारूरा दूहा में भी बारहमासा का उपयोग हुआ है. ‘बीसलदेव’ में रानी राजमति पति बीसलदेव को एक ब्राह्मण द्वारा संदेश भेजती है जिसमें उनसे एक वर्ष के विछुड़न के, प्रत्येक माह में झेले गए, कष्टों का वर्णन है. दूसरे में मारवणी, प्रियतम ढोला को एक ढाढ़ी द्वारा संदेश भेजती है जिसमें वर्ष भर में भोगे गए उसके कष्टों का वर्णन है. विद्यापति ने भी बारहमासा पर हाथ आजमाया है. किंतु यह विधा साहित्य में गति न पा सकी. बारहमासा विधा को गति मिली अवधी भाषा के प्रेमाख्यानक काव्यों में भक्तिकाल में. पद्मावत के ‘नागमति वियोग’ वर्णन में मलिक मुहम्मद जायसी ने बारहमासा विधा का बड़ा ही सटीक और साहित्यिक प्रयोग किया है. रीतिकाल में बारहमासा कविता ने कवि-शिक्षा का रूप ले लिया. इसके पश्चात उन्नीसवीं सदी के अंत तक बारहमासा के गीत लोक काव्यों में ही मिलते हैं.

‘विरह-गीतों के लिए बारहमासा’ एक रूढ़ हो गई विधा है. ‘बीसलदेव रासो’ में यह गीत सावन माह से शुरू होकर आषाढ़ माह तक और ‘ढोला मारूरा दूहा’ में कार्तिक माह से शुरू होकर आश्विन माह तक जाता है. लेकिन पद्मावत में यह आषाढ़ से शुरू होकर जेठ माह तक जाता है.

अधुनातन हिंदी काव्य में कवयित्री ने ‘बारहमासा’ को एक नए रूप में प्रस्तुत किया है. उन्होंने इस शीर्षक से अपने कविता-गुच्छ के लिए आधुनिक मनस्थिति और तदनुरूप आधुनिक शब्दावली का चयन किया है. ऋतुओं को आधुनिक छवि देने की कोशिश की है. किंतु यह आधुनिकता उनके द्वारा निर्मित कतिपय बिम्बों और मुक्त छंद के पंक्ति-विन्यासों में ही अधिक देखने को मिलती है. हाँ भावभूमि में उन्होंने अनुभूति के स्थान पर अनुभव को प्रतिष्ठित किया है. पहली कविता की कुछ पंक्तियाँ बारामासा की भूमिका-सी लगती हैं. किंतु इसे लिखते समय बारहमासे की परंपरागत पीठिका की स्मृति उनमें बनी हुई-सी लगती है. बारामासा चुँकि विरह गान के रूप में प्रचलित है, कदाचित ईसीलिए उन्होंने अपनी कविता का आरंभ दुख से किया है, ऋतु भी आषाढ़ की चुनी है.

                मेरा दुख

                जल्दी में

                ढीली बाँधी गई गठरी का दुख है. 

                                          (आषाढ़ में धरती-1)

‘पद्मावत’ के ‘नागमति वियोग-वर्णन’ में नागमति की बारहमासी अनुभूति उसके वियोग से प्रारंभ होती है जो उसे हीरामन तोते के बहकावे में आकर पति रतन सिंह के सिंहल चले जाने से होता है. वह दुखी हो जाती है. उसके दुख का पारावार नहीं है. पर वह करे क्या. प्रतीक्षा ही कर सकती है. वह प्रतीक्षारत हो जाती है. इतने में आषाढ़ का महीना आ जाता है. आकाश में घुमड़ते विकीर्ण मेघ उसकी नाड़ियों में जाने कैसी वेदना भर देते हैं. वह दुखानुभूति से भर ताती है. यह दुख विरह का है, और जीवंत है. ‘बारामासा’ की कवयित्री किसी के वियोग में नहीं हैं. उन्हें किसी के वियोग का दुख नहीं है.  वह किसी दुखानुभूति में नहीं हैं. लगता है जब वह कविता लिखने बैठीं तो उन्होंने दुख का आह्वान कर लिया. वह दुख ढीली बाँधी गई गठरी का ही दुख सही (गठरी तो उन्होंने ही बाँधी होगी). यह गठरी उन्हें दुख दे रही है, संभवतः अपने बेडौलपन के कारण. अब इसमें जीवंतता कहाँ से होगी. इसे दुख नहीं कष्ट कहना चाहिए. इसमें मानवीय संवेदना (गहराई में अनुभूत हुई जो अनुभूति बन गई हो) का कहीं अता पता नहीं है. क्योंकि यदि गठरी कसकर बाँधी गई होती तो? संभव है तब कष्ट कम होता या होता ही नहीं (गठरी बाँधने का कौशल कष्ट कम कर देता है). इस गठरी में है भी क्या, उनके द्वारा बटोरी गई कुछ निधियाँ- भाषाओं की लुप्तप्राय ध्वनियाँ, बारह ऋतुओं का विलास (हमें तो छै ही ऋतुओं का पता है, पश्चिम में चार ही होती हैं), अंतःसत्वा चुप्पियाँ (मानों युप्पियाँ कहीं मँडरा रहीं थीं), बाली से छूट गिरे अन्नकणों की खुशबुएँ और आषाढ़ माह की पहली बूँदों का आस्वाद. कवयित्री ने गठरी में बाँधी गई निधियों को कुछ शब्द सोंदर्य से मढ़ कर पेश किया है-जैसे,

                आस्वाद

                मिट्टी की टटा रही जिह्वा पर

                आषाढ़ की पहली

                सिहरती हुई बूँद का.

किंतु ये निधियाँ उनकी अनुभूति में स्फुरित निधियाँ नहीं हैं, सामान्य अनुभव की चीजें हैं. व्याकरण में अनुभव और अनुभूति में अंतर किया गया है. अनुभव का अर्थ है बाहर का अनुभव अर्थात बुद्धि का

अनुभव और अनुभूति का अर्थ है भीतर का अनुभव अर्थात हृदय द्वारा अनुभूत. किसी की पीठ पर लद कर अनुभव ही लिया जा सकता है जैसे वायुयान पर सवार होकर मंत्री लोग लेते हैं.

अनुभव में भी कुछ गहराई होती है. अनुभव की सीमा लाँघ लेने पर ही अनुभूति में प्रवेश मिलता है. कवयित्री महसूस करती हैं कि वह काल की पीठ पर लदी हैं. याने वह समय से बाहर हैं. पर हमारा अनुभव है कि हम समय में हैं. समय के बाहर होने पर तो हम आईंस्टीन की सापेक्षता के शिकार हो जाएँगे, पीठ पर लदने का सवाल ही कहाँ रहेगा. समय तो हमारे जीवन का एक आयाम है. जीवन आयाम में बहता है, उसकी पीठ पर लद कर नहीं चलता. “समय की पीठ पर’’ वाक्यांश में काव्य की ध्वनि–सी निकलती प्रतीत होती तो है पर इसमें काव्य है नहीं. इसे पढ़कर हमारे हृदय की कोई पंखुड़ी नहीं खुलती. इस मायने में संस्कृत भाषा के कवियों के अनुभव और अनुभूतियाँ ध्यान देने योग्य हैं.

कवयित्री के बारामासे में विरहानुभूति न होकर ऋतुओं का विलास है. उनकी बड़े जतन से सँजोई गई गठरी की निधियाँ एक-एक कर गिरती जा रही हैं, उन्हीं में ऋतुओं का विलास भी गिरता है और वह उनके समूचे मानस-क्षेत्र पर छा जाता है. उनके बारामासा में ऋतुओं का यह विलास ही चित्रित है. इस तरह बारहमासा का परंपरागत कथ्य उनके बारामासे में ऋतु विलास से स्थानापन्न हो गया है. मेरी दृष्टि से इस कविता-गुच्छ का समेकित शीर्षक ऋतु विलास होना चाहिए, बारामासा नहीं.  

                                                     ( अधूरा )

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