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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग मदान्ध रावण को मन्दोदरी की सीख / मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंगमदान्ध रावण को मन्दोदरी की सीखमानसश्रीडॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता ''मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति''मन्दोदरी राक्षसराज मय की पुत्री थी। उसकी माता का नाम हेमा था। हेमा अप्सरा थी। अप्सरा हेमा के लिये दानवपुरी मे जीवनभर रहना सम्भव नहीं था। अतः वह मन्दोदरी को बाल्यावस्था में छोड़कर देवलोक चली गई। मय ने अपनी पुत्री का नाम मन्दोदरी रख दिया। मन्दोदरी अत्यन्त ही सुन्दरी, सुशीला, सरल तथा गुणवती थी । मय दानवराज की ममता-स्नेह का केन्द्र मंदोदरी थी । वे मंदोदरी को सदैव अपनी आँखों के सामने रखते थे । [ads-post] धीरे-धीरे मन्दोदरी ने यौवन में प्रवेश किया।एक दिन दानवराज अपनी प्यारी पुत्री के साथ गहन वन में भ्रमण करने निकले उसी समय उनकी भेंट लंकापति रावण से हो गई। रावण उस समय अविवाहित था। रावण की दृष्टि मन्दोदरी पर पड़ी तथा वह उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गया। उसने दानवराज मय को अपने पितामह ब्रह्मा तथा उच्चवंश का होने का बताकर मन्दोदरी से विवाह करने की इच्छा प्रगट की। दानवराज ने भी रावण की इच्छानुसार मन्दोदरी के साथ विवाह कर दिया। श्रीरामचरितमानस में भी मन्द…

मजदूरीनामा / के. ई. सैम

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1 मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस दुनिया भर में मजदूरों के नाम पर मनाया जाता है. इस दिन को उन मजदूरों की याद में श्रद्धांजलि स्वरूप मनाया जाता है जिनकी लाशें पूंजीपतियों एवं सामंतवादी विचारधारा के लोगों के द्वारा सिर्फ इसलिए बिछा दी गईं थीं कि उन्होंने अपनी मेहनत के एवज में अपनी जायज मांगों को पूरा करने की मांग करने की हिमाकत दिखाया था. साधारणतः दिवसों को किसी ख़ुशी अथवा गम के रूप में मनाया जाता है, मगर मजदूर दिवस गम के साथ-साथ एक ऐसे दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो हर साल दुनिया के मजदूरों के दिल और दिमाग को एक ऐसा एहसास दिलाता है कि तुम दबे रहो, कुचले रहो. तुम्हें अपनी उचित मांगों को मांगने का भी अधिकार नहीं है. तुम अपने खून-पसीनों को बहाते रहो. अमीरों की गुलामी करते रहो. पसीना बहाकर. पानी छानकर लाकर बलवानों का पैर धोते रहो. तुम्हें दबे रहना है, तुम्हें कुचले रहना है. तुम्हें अपना मुंह खोलने का अधिकार नहीं है. तुम सामंतों की केवल सेवा करते रहो. उन्हें खुश करते रहो, जिसके बदले में तुम्हारे सामने रोटी डाल दी जायेगी. तुम्हें जरा भी विरोध नहीं करना है. तुम सिर्फ सेवा करने के लिए ही बने ह…

कहानी : वह हँसने वाली लड़की ........! अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’

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‘ वह मुझे वाराणसी रेलवे  स्टेशन पर मिली थी। खुली किताब के फड़फड़ाते पन्ने -सी। पढ़ रहा था मैं एक -एक हर्फ़। जिसे मैं शब्दों और वाक्यों की बंदिशों में गुनगुना रहा था, वह एक रहस्य कथा – थी  .....।उसे फैजाबाद अपनी बुआ के यहाँ जाना था और मुझे नवाबगंज।मेरे बगल बैठी वह बड़े चिरपरिचित अंदाज में एक - एक कर कितनी बातें पूछे जा रही थी और मैं उसी लय में गुम  सब बताता जा रहा था। था ही क्या छुपाने को ...? मेरा संकोची स्वभाव खुद के दायरे कैसे तोड़ रहा था ,यह सोचकर  मुझे हँसी  भी आ रह थी । “ आप हँसते हुए बुरे नहीं लगते , फिर इतना कम क्यों हँसते हैं ?” “ मुझे दूसरों को हँसते हुए देखना ज्यादा अच्छा लगता है..... मेरा ऐसा उत्तर  सुनकर वो  जोर से हँसी ,बोली – “ अरे वाह ! कुछ ज्यादा ही नहीं हो गया  ?” “ कहाँ से हो ? बनारस के तो नहीं हो,  इतना तो पक्का है !” [ads-post] सच कहूं !, जवाब देने का मन तो नहीं था, पर फिर भी मेरे प्रति उसकी जिज्ञासा अच्छी लग रही थी। जिन्दगी में पहली बार कोई अनजान लड़की इतने अपनापे भरे सवाल कर रही थी कि जवाब  मेरे चिंतन से बगैर इज़ाज़त लिए उछल-उछल कर बाहर आ रहे थे। हाँ ! , बात -बात में उ…

कांग्रेसियों ने ही किया ‘तिलक’ का विरोध / रमेशराज

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------------------------------------------------------------------- बंगाल के कांग्रेस नेता विपिनचन्द्र पाल, पंजाब के स्वतंत्रता संग्राम के नायक लाला लाजपतराय और महाराष्ट्र में जन्मे राष्ट्रीय नेता बाल गंगाधार ‘तिलक’ कांग्रेस के नरमपंथी बुद्धिजीवी लेखकों, समाजसेवियों, विचारकों और मानवतावादियों से अलग किन्तु एक स्पष्ट राय यह रखते थे कि ‘‘भारत में ब्रिटिश शासन निरंकुश हो गया है। वह जनता की भावनाओं की थोड़ी-सी भी चिन्ता नहीं करता।’’ ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से विख्यात यह टीम अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँची कि अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ों को भारत से उखाड़ने के लिए आवश्यक है कि राष्ट्रीय शिक्षा, राष्ट्रभाषा हिन्दी पर जोर देकर पूरे राष्ट्र को एक राष्ट्रीय भावना के सूत्र से बांधा जाये। विदेशी विशेषकर इंग्लैंड में बनी वस्तुओं का पूरी तरह वहिष्कार किया जाये। पूरे भारतवर्ष में शराब के प्रचलन पर चोट की जाये ताकि अंग्रेजों की अर्थव्यवस्था जर्जर हो जाये। भारत में अर्धशासन, कथित सुशासन के बजाय ‘स्वराज्य’ की माँग को बुलंद किया जाये। [ads-post] कलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान तिलक ने अपने ओजस्वी…

हिटलर ने भी माना सुभाष को महान / रमेशराज

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------------------------------------------------------------------- अपने समय के सर्वोच्च क्रान्तिकारी सुभाषचन्द्र बोस ने फ्रांसीसी विद्वान रोम्यारोलां से सन् 1935 में कहा था - ‘‘भारत में एक ऐसा राजनीतिक दल होना चाहिए जो किसानों और मजदूरों के हित को अपना हित समझे। मैं कहना चाहूँगा कि गॉंधी जी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर कोई निश्चित मत नहीं रखते। उनकी प्रकृति समझौतावादी है। ’’ फरवरी 1938 में जब सुभाष हरिपुर अधिवेशन में कांग्रेस के अघ्यक्ष बने तो उन्होंने इस अवसर पर स्पष्ट कहा- ‘‘जिसे तुम अहिंसा कह रहे हो, वह पहले दर्जे की कायरता है। एक उजला बन्दर घुड़काता है तो तुम कांपने लगते हो । क्या इसी तरीके से भारत आजाद होगा? इसके लिए शौर्य चाहिए, वीरता चाहिए और चाहिए खून। तुम अगर मुझे ये दे सकते हो तो मैं आजादी का वादा कर सकता हूँ । ’’ [ads-post] जब हिजली और चटगॉंव में नौकरशाही का नंगा नाच सर्वत्र दिखाई दे रहा था तब हिजली-कांड के विरोध में कलकत्ता में आयोजित एक विराट सभा के विराट जनसमूह के बीच सुभाष ने गर्जना की-‘‘जो साम्राज्य एक दिन में बना है, वह एक रात में नष्ट भी होगा।’’ सुभाष की इ…

स्वामी श्रद्धानंद का हत्यारा, गांधीजी को प्यारा / रमेशराज

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(बलिदान दिवस 23 दिसम्बर ) ------------------------------------------------------------------ इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता कि सबसे अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आर्य समाज के राष्ट्रवादी चिन्तन की तप्त विचारधारा से तपकर सोने की भाँति चमके। रानी लक्ष्मीबाई, तिलक, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, अजित सिंह, भगवती चरण वोरा , सुखदेव, राजगुरु, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक आत्म बलिदानियों के साथ-साथ स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के वहिष्कार, स्त्री शिक्षा, दलितोद्धार और गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के प्रबल समर्थक तथा अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले स्वामी श्रद्धानंद का स्वतन्त्रता संग्राम का जज्बा भी उस आत्म बलिदान की गाथा है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। [ads-post] लेकिन इतिहासकार डॉ. मंगाराम की पुस्तक ‘क्या गांधी महात्मा थे?’ के तथ्यों के प्रकाश में देखें तो गांधीजी को आर्य समाजियों से बेहद चिढ़ थी। डाक्टर साहब के अनुसार -‘‘गांधीजी ने आर्य समाज, सत्यार्थ प्रकाश, महर्षि दयानंद और स्वामी श्रद्धानंद की विभिन्न प्रकार से आलोचना की। गांधीजी ने कहा-‘‘स्वामी श्र…

अमर क्रन्तिकारी भगत सिंह / रमेशराज

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----------------------------------------------------------------- युग-युग से पंजाब वीरता, पौरुष और शौर्य का प्रतीक रहा है। सिखों के समस्त दस गुरु अपनी आन पर मर मिटने, पराधीनता न स्वीकार करने और अत्याचारी मुगलों से टक्कर लेने के कारण आज भी जन-जन के बीच श्रद्धेय हैं। लाला हरदयाल की प्रेरणा से ‘गदर पार्टी’ का निर्माण कर अंग्रेजी साम्राज्य चूलें हिला देने वाले सोहन सिंह भकना, करतार सिंह, बलवन्त सिंह, बाबा केसर सिंह, बाबा सोहन सिंह, बाबा बसाखा सिंह, भाई संतोख सिंह, दिलीप सिंह, मेवा सिंह जैसे अनेक रणबाँकुरे सिखों की जाँबाजी की शौर्य-गाथाएँ पंजाब के ही हिस्से में आती हैं। [ads-post] ‘जलियाँवाला बाग’ में सैकड़ों सिखों की शहादत, लाला लाजपतराय का ‘साइमन-कमीशन-विरोध’ इतिहास के पन्नों में यदि दर्ज है तो दूसरी ओर स्वतन्त्रता की नई भोर लाने के लिए पंजाब के लायलपुर के एक गाँव बंगा के एक सिख खानदान का योगदान अविस्मरणीय है। इसी खानदान के वीर अर्जुन सिंह ने अंग्रेजी शासन की बेडि़याँ तोड़ने और पराधीन भारतमाता को आजाद कराने के लिए म्यान से बाहर तलवारें खींच लीं। सरदार अर्जुन सिंह के तीन बेटे किशन सिंह, अ…

‘1857 के विद्रोह’ की नायिका रानी लक्ष्मीबाई / रमेशराज

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---------------------------------------------------------------------------- दूसरों की जूठन खाने वाले कौआ, गिद्ध या श्वान सौ नहीं पांच सौं वर्ष जीवित रहें लेकिन वह शौर्य, प्रशंसा और श्रेष्ठ वस्तुओं के अधिकारी नहीं हो सकते और न इनका इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जा सकता है। किन्तु सिंह की तरह केवल दो चार वर्ष ही जीवित रहने वाले व्यक्ति की शौर्य-गाथाएं युग-युग तक यशोगान के रूप में जीवित रहती हैं। इतिहास में वही आत्म बलिदानी दर्ज हो पाते हैं, जिनमें आत्म-बल, अपार धैर्य शक्ति और स्वयं को आहूत कर देने का अदम्य साहस होता है। ‘1857 के विद्रोह’ की नायिका रानी लक्ष्मीबाई यद्यपि 24 वर्ष ही जीवित रहीं और उन्होंने केवल 9 माह की झांसी पर शासन किया। किन्तु रानी के शासन के ये 9 माह इस बात के गवाह हैं कि साम्प्रदायिक सदभाव, प्रजा सेवा, कुशल रणनीति, अपूर्व साहस की एक ऐसी मिसाल थीं जो इतिहास में दुर्लभ है। [ads-post] अंग्रेजों से विद्रोह करने वाले अनेक राजघरानों के राजा महाराजा, नवाब और जमींदार 1857 की क्रान्ति में वह स्थान न पा सके जिस स्थान पर आज इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई खड़ी हैं। वे इसलिए सबसे …

सत्तावन की क्रांति का ‘ एक और मंगल पांडेय ’ / रमेशराज

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--------------------------------------------------------------------------- 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ सैन्य विद्रोह करने वालों में मंगल पांडेय का नाम ही अब तक सुर्खियों में आता रहा है, जबकि मंगल पांडे के अलावा भी ऐसे कई क्रांतिवीर पैदा हुए, जिनके नेतृत्व में एक नहीं अनेक स्थानों पर सामूहिक सैन्य विद्रोह हुआ। 1857 के विद्रोह के इतिहास पर यदि हम गौर करें तो पता चलता है कि बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में एक तरफ अवध, रुहेलखण्ड, नीमच, पंजाब सहित अन्य प्रांतों में भी अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत का झण्डा बुलंद किया था। लखनऊ रेजीडेंसी पर 87 दिन तक अग्रेजों के खिलाफ जो सैन्य विद्रोह हुआ उसमें लगभग सात सौ विद्रोही मारे गये थे। [ads-post] विद्रोह की यह आग कथित तौर पर भले ही गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों के कारण भड़की हो, लेकिन यह विद्रोह सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ था। योजनाबद्ध तरीके अंग्रेजों के खिलाफ उनकी सेना को भड़काने का कार्य अलीगढ़ के एक सैनिक पंडित भीष्म नारायण ने भी किया। पंडित भीष्म नारायन जो भीके नारायन के नाम से भी मशहूर थे, का जन्म मथुरा जनपद के…

सच्चे देशभक्त ‘ लाला लाजपत राय ’ / रमेशराज

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---------------------------------------------------------------------- देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने वाले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनेक वीरों में से लाला लाजपतराय का नाम भी स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उच्चकोटि के शिक्षित और अपने ओजस्वी भाषणों से भारतीय जनता को मंत्रमुग्ध कर आन्दोलन के लिए प्रेरित करने वाले इस महान नेता के विचार बेहद गर्म थे। इसी कारण इन्हें ‘शेर-ए-पंजाब’ और ‘पंजाब केसरी’ जैसी उपाधियां से विभूषित किया गया। महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक, बंगाल के विपिनचन्द्र पाल और पंजाब के लाला लाजपत राय कांग्रेस में रहकर भी कांग्रेस के अंग्रेजों के प्रति नरम रवैये से सहमत नहीं थे, अतः ‘लाल-पाल-बाल’ नाम से विख्यात इस तिकड़ी को अंग्रेजों के कोप का शिकार होना ही पड़ा, साथ ही इन्होंने कांगेसियों के विरोध को भी झेला। [ads-post] लाल लातपत राय के बारे में इतना तो सभी जानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने भारत में कथित सुधार हेतु साइमन कमीशन के नाम से जो जाँच कमीशन भेजा था, वह 30 अक्टूबर 1928 को जब लाहौर पहुँचा तो इसका विरोध करने के लिए लालाजी भारी जनता के साथ ‘साइमन गो बैक’ के नारे लग…

चर्बी लगे कारतूसों के कारण नहीं हुई 1857 की क्रान्ति / रमेशराज

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[ क्रान्ति दिवस ] ----------------------------------------------------------------------------- कई इतिहास लेखकों ने 1857 की क्रान्ति को जिस तरह तोड़-मरोड़कर और भ्रामक तरीके से लिखा है, उससे अब पर्दा उठने लगा है। ऐसे इतिहासकारों की पुस्तकों में विवरण है कि चर्बी लगे करतूस लेने के विरोध में विद्रोही स्वभाव अख्तियार करते हुए मंगल पांडेय नामक एक भारतीय सैनिक ने 29 मार्च सन् 1857 को मेजर सार्जेण्ट, लैफ्रटीनेण्ट बॉग तथा जनरल हियरिंग पर गोलियां चलायीं। मंगल पांडेय के तीनों वार खाली गये। उत्तेजना और भावातिरेकता की अवस्था में प्रहार करने के कारण गोलियां सही निशानों पर न लग सकीं। किन्तु जिन लोगों में पूर्व से ही क्रान्ति की भावना थी, वे साहस से भर उठे और पूरे भारतवर्ष में क्रान्ति की लहर फैल गयी। इस क्रान्ति में सबसे बढ़-चढ़ कर सामंतों और उनकी फौज ने लिया। [ads-post] 29 मार्च सन् 1857 की घटना के उपरांत यह भी इतिहासकारों ने लिखा है कि 24 अप्रैल 1857 की मेरठ में तीसरे नम्बर के रिसाले के 90 सवारों में से 85 सवारों ने चर्बी लगे कारतूस लेने से इन्कार कर दिया। इनमें 36 हिंदू और 49 मुसलिम सैनिक थे। इन…

‘ चन्द्रशेखर आज़ाद ‘ अन्त तक आज़ाद रहे +रमेशराज

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[शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद स्मृति दिवस 27 फरवरी ] ------------------------------------------------------------------ आगरा का एक मकान जिसमें चन्द्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा, विजय सिन्हा, जयदेव कपूर, डॉ. गया प्रसाद, वैशम्पायन, सदाशिव, भगवान दास माहौर आदि दल के सक्रिय सदस्य आपस में विनोद करते हुए मजाकिया विचार-विमर्श कर रहे थे कि कौन किसतरह पकड़ा जायेगा और पकड़े जाने पर क्या करेगा? भगत सिंह पर फब्ती कसते हुए राजगुरु ने कहा- बच्चू [ विजय कुमार सिन्हा ] और रणजीत दोनों ही जब सिनेमा हॉल में पिक्चर देख रहे होंगे तो गोरी फौज आयेगी और इन्हें यकायक गिरफ्तार कर लेगी। जब ये पकड़े जायेंगे तो पुलिस से कहेंगे- ‘‘अरे हमें पकड़ लिया, चलो ठीक है। मगर पिक्चर तो पूरी देख लेने दो।’’ भगत सिंह भी भला इस बात पर चुप कैसे बैठते। उन्होंने राजगुरु पर व्यंग्य किया-‘‘ ये हजरत तो जब सो रहे होंगे तभी पुलिस इन्हें पकड़ लेगी। ये तब भी नींद में ही होंगे और रास्ते में हथकडि़यों के साथ चलते-चलते जब पुलिस लॉकअप में जागेंगे तो कहेंगे-‘‘ क्या मैं सचमुच पकड़ा गया हूँ या कोई सपना देख रहा हूँ।’…

सावरकर ने अंडमान जेल में भी करायी क्रान्ति / रमेशराज

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[ स्मृति दिवस 26 फरवरी पर ] ---------------------------------------------------------------------- वीर विनायक सावरकर के मन में बचपन से ही क्रान्ति की हिलौरें उठने लगी थीं। वे अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फैंकने के लिये सशस्त्र क्रान्ति के ऐसे पुरोधा बने, जिन्होंने भारत ही नहीं, विदेश में रहकर भी क्रूर अंग्रेज शासकों को सबक सिखाने के लिये उनकी हत्या कराने और उन्हें आतंकित करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी। वीर सावरकर अहिंसा, सत्याग्रह जैसे उपायों के द्वारा अंग्रेजों को भारत से भगाने के घोर विरोधी थे। उन्होंने बड़े ही गुप्त तरीके से ब्रिटेन में रहकर भारतीय क्रान्तिकारियों को भारत में पिस्तौले उपलब्ध करवायीं। इन पिस्तौलों से भारत में तैनात क्रूर अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतारा गया। यहीं नहीं ब्रिटेन में उनके शिष्य मदनलाल धींगरा ने एक अंग्रेज अफसर की हत्या की। उन्होंने 1857 के क्रान्तिकारियों पर एक ऐसी पुस्तक लिखी जिसे पढ़कर भारत ही नही, अनेक स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ वीरों के मन में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी। [ads-post] वीर सावरकर के क्रान्तिकारी मिशन का जब भेद खुला तो अंग्रेजों ने उन्हे…

गांधीजी की हर नीति के विरोधी थे ‘ सुभाष ’ / रमेश राज

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[ सुभाष जयंती 23 जनवरी ] ----------------------------------------------------------------------- नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे चमकते सितारे थे, जिसमें सच्ची देशभक्ति का ओज था। इस सितारे की आभा के सम्मुख न नेहरू टिक पाते थे और न अंहिसा के मंत्रों का जाप करने वाले महात्मा गांधी। अपने समय के सर्वोच्च क्रान्तिकारी सुभाष आई.सी.एस. उत्तीर्ण ऐसे विचारवान, विद्वान और महान नेता थे, जो अंग्रेजों के सम्मुख भारतीय स्वतंत्रता की भीख मांगने वाले कांग्रेसी नेताओं के समान याचक की भूमिका में कभी नहीं रहे। वे 26 वर्ष की युवा अवस्था में अपनी प्रतिभा के कारण कलकत्ता के मेयर बने। मेयर पद पर रहकर भी उन्होंने अंग्रेजों की शोषणवादी अनीतियों का जमकर विरोध किया। उनका विरोध इतना आक्रामक होता था कि अंग्रेजों के सम्मुख वे हर बार एक नया खतरा बनकर उपस्थित होते थे। अंग्रेजों के प्रति आक्रामक रवैये के कारण ही उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। [ads-post] नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जब कांग्रेस के कार्यकर्ता बने तो अपनी कुशल रणनीति और अदभुत् कार्यशैली के कारण ख्याति के उच्च शिखर पर पहुंच गये। उनकी…

अमर शहीद स्वामी श्रद्धानंद / रमेशराज

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-------------------------------------------------------------------- क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि एक व्यक्ति जो रईसों के बिगडै़ल बेटे की तरह अहंकारी, उन्मादी, भोगविलास की समस्त रंगीनियों का आनंद लेने वाला रहा हो, उसके सम्पर्क में एक महर्षि आये और उसके चरित्र, व्यवहार और दैनिक क्रियाकलाप में आमूल परिवर्तन आ जाये। वह असुर के विपरीत सुर अर्थात् देवरूप व्यवहार करने लगे, है न ताज्जुब की बात! लेकिन इसमें ताज्जुब कैसा? बाल्मीकि का जीवन-चरित्र भी तो इसी प्रकार का रहा था। स्वामी श्रद्धानंद भी एक ऐसे ही देशभक्त और तेजस्वी सन्यासी थे जिनका प्रारंभिक जीवन भोगविलास के प्रसाधनों के बीच बीता। स्वामी श्रद्धानंद बनने से पूर्व इनका नाम मुंशीराम थ। पिता पुलिस विभाग में ऊंचे ओहदे पर थे, सो उनके पुत्र मुंशीराम को पैसे की कोई कमी न थी। परिणाम यह हुआ कि वे अपने पिता के ऐसे बिगडै़ल पुत्र बन गये जो दिन-रात मांस-मदिरा का सेवन करता। सुन्दरता का भ्रम पैदा करने वाली भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने इतना घेर लिया कि सिवाय रंगीनियों के आनंद के उन्हें कुछ न सूझता। [ads-post] वैभवता से परिपूर्ण जीवन के इसी मोड़ पर जब …

सावरकर ने लिखा 1857 की क्रान्ति का इतिहास / रमेशराज

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[वीर सावरकर स्मृति दिवस 26 फरवरी पर ] ----------------------------------------------------------------- भारत माता के वीर समूतों ने अंग्रेजों की दासता की बेडि़याँ काटने के लिए हिन्दुस्तान से बाहर रहकर भी गोरी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति का शंखदान किया। गदर पार्टी के क्रान्तिकारी और एक सशक्त सैन्य संगठन ‘आजाद हिन्द फौज’ को लेकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने एक तरफ अंग्रेजों को कुचलने के लिए विदेश की युद्ध-भूमि को चुना तो दूसरी ओर विनायक दामोदर सावरकर के गुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन स्थित ‘भारतीय भवन’ से अंग्रेजों की अनीतियों, अत्याचार और शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द की। लंदन का ‘भारतीय भवन’ उन दिनों कैसी क्रान्तिकारी गतिविधिायों का केन्द्र था, इसका पता उसमें बैठकर ‘बम बनाने के तरीकों’ पर दिये जाने वाले भाषणों से आसानी के साथ लगाया जा सकता है। भारतीय भवन से ही सावरकर ने पंजाब के सपूत मदनलाल धींगरा की उनके हाथ में छुरी गाड़कर कठिन परीक्षा लेने के बाद धींगरा से सर कर्जन वाइली की हत्या करायी। कर्जन सावरकर की आँखों में इसलिये खटक रहा था, क्योंकि वह भारतीय भ…

रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग / रमेशराज

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------------------------------------------------------------ कुछ कांग्रेस के पिट्टू इतिहासकार आज भी जोर-शोर से यह प्रचार करते हैं कि बिना खड्ग और बिना तलवार के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले कथित अहिंसा के पुजारियों के ‘आत्मसंयम, आत्मबल और स्वपीड़ा’ से भयभीत होकर आताताई और बर्बर अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हुए। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असली तस्वीर नहीं है। अगर आजादी सावरमती के संत के ‘ब्रहमचर्य के प्रयोगों’ के बूते आयी तो कांग्रेस उस काल के 1942 के जन आंदोलन को भारतीय जनमानस के सम्मुख क्यों नहीं लाती, जिसमें भले ही गांधी जी ने अहिंसात्मक आंदोलन किये जाने पर जोर दिया था, किंतु सरकारी दमन से विक्षिप्त और क्रुद्ध होकर कथित अहिंसा को नकारते हुए जनता ने अंग्रेजों के सरकारी 250 रेलवे स्टेशनों को नष्ट कर दिया। 600 डाकघरों को आग के हवाले किया। 3500 टेलीफोन और टेलीग्राम के तारों को काट दिया। 70 थानों को जलाकर राख किया। 85 सकारी भवनों को धूल-धूसरित कर डाला। 9 अगस्त 1942 से लेकर 31 दिसम्बर 1942 तक बौखलायी सरकार ने 940 स्वतंत्रता सेनानियों को गोलियों से भूनकर सदा के लिये संसार से…

आज़ादी की जंग में यूं कूदा पंजाब / रमेशराज

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--------------------------------------------------------------- गुलामी की जंजीरों में जकड़े हिन्दुस्तान को आजाद कराने में अपने प्राणों को संकट में डालकर लड़ने वाले रणबांकुरों में एक तरफ जहां पं. चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, गणेश शंकर विद्यार्थी, गेंदालाल दीक्षित, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, सूर्यसेन, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, विपिन चन्द्र पाल, खुदीराम बोस, रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डेय, बेगम हसरत महल आदि का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, वही पंजाब की माटी ने भी ऐसे एक नहीं अनेक सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने अंग्रेजों के साम्राज्य को ढाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। देखा जाय तो अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाने वालों में सिखों का नाम ही सबसे पहले आता है। भले ही सिखों के आंदोलन धार्मिक रंग लिये होते थे, किन्तु इन्हीं आयोजनों से अंग्रेजों की नींद हराम होती थी। 13 अप्रैल 1919 बैसाखी के दिन गुरू गोविंद सिंह के अमृतपान की स्मृति से जुड़ा पवित्र दिन आजादी के इतिहास में ऐसा ही धार्मिक उत्सव था। उस दिन जलियांवाला बाग में मनाये गये उत्सव के समय अंग्रेजों की गोलियों से 309 …

अदालत में मदनलाल धींगरा की सिंह-गर्जना / रमेशराज

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[17 अगस्त ] --------------------------------------------------------------------------- अमृतसर जिले के खत्री कुल में धनी परिवार में जन्म लेने वाले क्रान्तिकारी मदनलाल धींगरा पंजाब विश्वविद्यालय से बी.ए. पास कर आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए जब इंग्लैंड पहुँच गये तो विलायत का भोग-विलासी वातावरण उन्हें बेहद भा गया। वे छात्रों के साथ पढ़ायी कम, मौज-मटरगश्ती अधिक किया करते। वे बगीचों में बैठकर या तो पुष्पों को निहारते रहते या उनका समय मादक संगीत में अपनी टोली के साथ नृत्य करते हुए बीतता। उन्हीं दिनों उन्होंने अखबारों में समाचार पढे़ कि बंगाल में अपने वतन की आज़ादी के लिये खुदीराम बोस, प्रफुल्ल कुमार चाकी, कन्हाई लाल जैसे अनेक क्रान्तिवीरों की टोली अंग्रेजों के खून से होली खेल रही है। इन समाचारों को पढ़कर उनका मन भी जोश से भर उठा। वे भी अपने वतन हिन्दुस्तान के लिये कुछ कर गुजरने के लिये व्याकुल हो उठे। इसी व्याकुलता ने उन्हें क्रान्ति के अग्रदूत सावरकर से मिलने को प्रेरित किया। वे इंग्लैंड से ही क्रान्ति की आग को प्रज्वलित करने वाले क्रान्ति के मसीहा सावरकर से ‘भारतीय भवन’ जाकर मिले और पर…

हुईं देश पर सैकड़ों वैश्या भी कुर्बान / रमेशराज

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[ शहीद दिवस 30 जनवरी पर विशेष ] ----------------------------------------------------------------- अंग्रेजी शासन से मुक्त होने के लिए, दासता की बेडि़यों को तोड़ने में केवल राष्ट्रभक्त क्रान्तिवीरों ने ही अपने प्राणों की आहुति नहीं दी, बल्कि गुलाम भारत में ऐसी अनेक वीरांगनाएं भी जन्मीं, जिनके मन को क्रान्ति की ज्वाला ने तप्त किया। जरूरत पड़ने पर सौन्दर्य की देवी नारियों ने भी रणचण्डी का रूप धारण किया। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने, उन्हें लोहे के चने चबवाने में विशेषकर दो वीरांगनाओं रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल के नाम से तो सब परिचित हैं | लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि अंग्रेज अफसरों के यहां काम करने वाली लाजो के द्वारा ही मंगल पांडे तक चर्बी के कारतूसों की जानकारी पहुंची थी। मुगल सम्राट बहादुर शाह की बेगम जीनतमहल ने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ने के लिये अनेक योद्धाओं को संगठित किया था। चिनहट की लड़ाई में शहीद हुए पति का प्रतिशोध लेने वाली वीरांगना ऊदा देवी ने पीपल के पेड़ की घनी शाखों में छुपकर अपने तीरों से 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया और बाद म…

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