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April 2017
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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग

मदान्ध रावण को मन्दोदरी की सीख

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मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

''मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति''

मन्दोदरी राक्षसराज मय की पुत्री थी। उसकी माता का नाम हेमा था। हेमा अप्सरा थी। अप्सरा हेमा के लिये दानवपुरी मे जीवनभर रहना सम्भव नहीं था। अतः वह मन्दोदरी को बाल्यावस्था में छोड़कर देवलोक चली गई। मय ने अपनी पुत्री का नाम मन्दोदरी रख दिया। मन्दोदरी अत्यन्त ही सुन्दरी, सुशीला, सरल तथा गुणवती थी । मय दानवराज की ममता-स्नेह का केन्द्र मंदोदरी थी । वे मंदोदरी को सदैव अपनी आँखों के सामने रखते थे ।

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धीरे-धीरे मन्दोदरी ने यौवन में प्रवेश किया।एक दिन दानवराज अपनी प्यारी पुत्री के साथ गहन वन में भ्रमण करने निकले उसी समय उनकी भेंट लंकापति रावण से हो गई। रावण उस समय अविवाहित था। रावण की दृष्टि मन्दोदरी पर पड़ी तथा वह उसके सौन्दर्य पर मोहित हो गया। उसने दानवराज मय को अपने पितामह ब्रह्मा तथा उच्चवंश का होने का बताकर मन्दोदरी से विवाह करने की इच्छा प्रगट की। दानवराज ने भी रावण की इच्छानुसार मन्दोदरी के साथ विवाह कर दिया। श्रीरामचरितमानस में भी मन्दोदरी के संबंध में कहा गया है -

तिन्हि देई बर ब्रह्म सिधाए । हरषित ते अपने गृह आए।।

मय तनुजा मंदोदरी नामा। परम सुन्दरी नारि ललामा।।

सोई मयँ दीन्ही रावनहि आनी । होइहि जातुधानपति जानी।।

हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई ।।

गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी । विधि निर्मित दुर्गम अति भारी ।।

सोई मय दानवँ बहुरि सँवारा । कनक रचित मनिभवन अपारा ।।

भोगावति जसि अहिकुल बासा अमरावति जसि सक्रनिवासा।।

तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका । जग विख्यात नाम तेहि लंका ।।

दोहा - खाई सिंधु गंभीर अति चरिहूँ दिसि फिरि आव ।।

कनक कोट मनि खचित दृढ़ वरनि न जाइ बनाव ।।

श्रीरामचरितमानस-177 : 1 से 4

ब्रह्माजी तीनों भाई रावण , कुम्भकरण और विभीषण को वर देकर चले गये तथा तीनों भाई प्रसन्नता पूर्वक अपने घर लौट आये। मय दानव मन्दोदरी नाम की कन्या अत्यन्त ही सुन्दरी और स्त्रियों में शिरोमणि थी। मय ने उसे लाकर रावण को दिया। उसने यह जान लिया कि रावण राक्षसों का राजा होगा । अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ फिर उसके बाद उसने अपने दोनों भाईयों का विवाह कर दिया । समुद्र के मध्य में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा के द्वारा निर्मित एक विशाल किला था । मय दानव एक निपुण कारीगर था उसने अत्यन्त ही परिश्रम से मणियों से जड़े हुए स्वर्ण के अनेक महल भी निर्मित कर दिये । नागकुल में रहने की नगरी जो कि पाताल में है उसे भोगावतीपुरी कहते है ,तथा इन्द्र के रहने की स्वर्गलोक की नगरी को अमरावती कहते है उससे भी अधिक सुन्दर और बाँका दुर्ग वाली पुरी का नाम लंका पुरी के नाम से विख्यात हुआ । उसने कुबेर से पुष्पक भी छीन लिया था । रावण को अपनी धन सम्पदा ,पुत्रों बल और राक्षसों के कारण अत्यधिक घमण्डी हो गया था ।

रावण ने देव , गंधर्व और नागों की अनेक कन्याओं से विवाह किया था किन्तु उसका सर्वाधिक प्रेम मंदोदरी पर ही था । मंदोदरी भी रावण को ह्नदय से चाहती थी और उसे हमेशा सत्यपथ पर चलने के लिये यथा समय निवेदन करती थी । इसका प्रभाव रावण पर यह पड़ा कि वह मंदोदरी की बात को ध्यान से सुनता था । मंदोदरी एक पतिव्रता नारी थी । उसे ज्ञात हो गया था कि भगवान् विष्णु ने संसार के कल्याण हेतु अयोध्या में श्रीराम के रूप में जन्म ले लिया है और पिता की आज्ञा से वन में गमन करते करते राक्षसों से रहित पृथ्वी को करने वाले है ।

लंका को हनुमानजी भस्म करके गये तब से राक्षस भयभीत रहने लगे। वे अपने -अपने घरों में बैठकर विचार विमर्श करने लगे कि अब राक्षस कुल की रक्षा कैसे की जाय। जिसके दूत का वर्णन नहीं किया जा सकता है यदि उसके स्वामी लंका में आवेगें तो क्या होगा ? अर्थात लंका के राक्षसों की दयनीय दशा हो जावेगी। इस बात की मन्दोदरी की दूतियों ने उन्हें बतायी । तब मन्दोदरी ने इस प्रकार रावण से कहा -

रहसि जोरि कर पति पग लागी । बोली बचन नीति रस पागी ।

कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू ।।

श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्डः 35-3

मन्दोदरी विवेकशील महारानी थी उसे पूर्वाभास हो गया था कि श्रीराम से बैर करना ठीक नहीं है । अतः एकान्त में रावण के हाथ जोडकर चरणों में सिर रखकर अत्यन्त ही नीति रस से भरी हुई वाणी से बोली - हे प्रियतम! श्रीहरि से विरोध छोड़ दीजिये । मेरे कहने को अत्यन्त ही हितकर समझकर ह्नदय में धारण कीजिये अर्थात मेरी बात मान लीजिये । आप अपने मंत्री को बुलाकर उसके साथ सीताजी को श्रीराम के पास भेज दीजिये क्योंकि -

तव कुल कमल बिपिन दुःखदायी । सीता सीत निसा सम आई ।।

सनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें । हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ।।

श्रीरामचरितसुन्दरकाण्ड 35-5

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सीता अपने कुलरूपी कमलों के वन को दुःख देने वाली ठंड (जाड़े) की रात्रि के समान आयी है । हे नाथ ! सीता को दिये अर्थात लौटाये बिना शम्भु (शंकरजी) , ब्रह्माजी भी आपका भला नहीं कर सकते। इसी तरह आपकी कोई भी देवता रक्षा नहीं कर सकता है । श्रीराम के बाण सर्पों के समूह हैं जो राक्षस रूपी मेढ़कों को निगल जावेगें तात्पर्य यह है कि राक्षसों का वंश ही नष्ट हो जावेगा । रावण मंदोदरी की सीख को स्त्री के डरपोक स्वभाव की संज्ञा देकर सभा से चला गया तब मन्दोदरी ने कहा -

मन्दोदरी ह्नदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।

श्रीरामचरितमानस सुन्दरकाण्ड : 36-3

मन्दोदरी ह्नदय में चिन्ता करने लगी कि पति पर विधाता प्रतिकूल हो गये हैं । इसके पश्चात् दूसरी बार जब मन्दोदरी ने सुना कि प्रभु (श्रीराम) आये हैं और खेल-खेल ही में उन्होंने समुद्र को बाँध लिया अर्थात सेतुबन्ध बना लिया है तब वह रावण का हाथ पकडकर उसे अपने महल में लाकर अत्यन्त ही मधुर वाणी से कहा -

चरन नाई सिरू अंचल रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकण्ड - 5-4

मन्दोदरी ने रावण के चरणों में ऑचल पसारा और कहा हे प्राणप्रिय । कृपया क्रोध छोड़ मेरा वचन सुनिये । हे नाथ ! बैर उसी से करना चाहिये जिससे बुद्धि और बल से जीत हो सकती हो । आप में और श्रीराम में वैसा ही अंतर है जैसे कि जुगनू और सूर्य में अंतर है । मन्दोदरी रावण को श्रीराम के बारे में कहती है - जिन्होंने अत्यन्त बलवान मधु और केटभ राक्षसों को मारा है और शक्तिशाली वीर दितिपुत्रों हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का नाश किया जिन्होंने दैत्यराज बालि को बाधा और सहस्त्रबाहु को मारा वे ही पृथ्वी का भार हरने के लिये अवतार लेकर आये है । इन सब का उदाहरण देकर मन्दोदरी रावण को यह समझाना चाहती थी कि क्या तुम इन सबसे अधिक शक्तिशाली हो ? अर्थात इनके सामने तुम कुछ भी नहीं हो । अंत में मन्दोदरी रावण से कहती है -

दोहा- रामहि सौंपि जानकी नाई कमलपद माथ ।

सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड-दोहा 6

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हे नाथ (रावण) श्रीरामचन्द्रजी के चरण कमलों में माथा टेककर(नवाकर) उनको श्रीजानकीजी सौंपकर अपने पुत्र (मेघनाथ) को राज्य देकर स्वयं वन में जाकर और श्रीरघुनाथजी का भजन करें । हे नाथ संत ऐसी नीति कहते है कि राजा चौथपन में वन में चला जाय ।

अंत में नेत्रों में जल भरकर रावण के चरण पकड़कर काँपते शरीर से कहा हे नाथ ! श्री रधुनाथजी को भजो जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय। इतने पर भी रावण न माना ।

श्रीराम द्वारा लंका में अंगद के द्वारा रावण को समझाने हेतु भेजकर कहा कि अंगद शत्रु (रावण) से वही बात करना जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो ।अंगद एवं रावण संवाद हुआ अंगद ने रावण की सभा में जाने के पूर्व एक पुत्र को मार डाला तथा अंगद के चरण को हटाना तो दूर हिला भी नहीं सका तब वह सन्ध्या के समय महल में उदास होकर गया तब मन्दोदरी ने रावण को समझाया और कहा -

चौपाई - कंत समुझि मन तजहु कुमतिही । सोह न समर तुम्हहिरघुपतिही।।

रामानुज लधु रेख खचाई । साउनहिं नाधेउ असि मनुसाई ।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड -35 (ख)-1

हे कंत (स्वामी) मन में समझकर कुबुद्धि त्याग दो । आप श्रीरधुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता । उनके छोटे भाई (लक्ष्मण) ने जरा सी रेखा खींच दी थी उसे भी आप का लाँघ नहीं सके ऐसा तो आपका पुरूषत्व है । इस तरह मन्दोदरी ने अंत में श्रीराम से युद्ध न करने की फटकार लगा दी। रावण पर इन सब बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा ।

रावण ने विभीषण का अपमान किया किन्तु मन्दोदरी का अपमान कहीं नहीं किया क्योंकि मन्दोदरी की बात विवेकपूर्ण , नीतिसंगत हमेशा ही रही । अनेक बार रावण को मन्दोदरी ने समझाया पर रावण को अपने धन-बल का अहंकार था अतः वह मन्दोदरी की बात को समझ नहीं सका । तब मंदोदरी ने यहाँ तक रावण को कहा -

तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू । मुधा मान ममता मद बहहू ।।

अहह कंत कृत राम बिरोधा । काल बिबस मन उपज न बोधा।।

काल दंड गहि काहु न मारा । हरई धर्म बल बुद्धि बिचारा ।।

निकट काल जेहि आवत सोईं । तेहि भ्रम होई तुम्हारिहि नाई ।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड 36-3-4

हे स्वामी ! उन्हें (श्रीरामको) आप बार-बार मनुष्य कहते हैं आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझा ढो रहे हो । हाँ प्रियतम ! आपने श्रीराम का विरोध कर लिया और काल (मृत्यु) के विशेष वश होने से आपके मन में अब भी ज्ञान अंकुरित क्यों नहीं हो रहा है ।

काल दण्ड (लाठी) लेकर किसी को नहीं मारता है। वह घर्म, बल,बुद्धि और विचार को हर लेता है। हे स्वामी! जिसका काल (मृत्यु का समय) निकट आ जाता है उसे आपके समान ही भ्रम हो जाता है ।

दोहा - दुई सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु ।

कृपासिन्धु रधूनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु ।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड 37

हे स्वामी आपके दो पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए और नगरी (लंका) भस्म हो गई जो हुआ सो हुआ हे प्रियतम! अब भी इस भूल की पूर्ति (समाप्ति)कर दीजिये । श्रीरामजी से बैर त्याग दीजिये । हे नाथ ! कृपा के समूद्र श्रीरधूनाथजी को भजकर निर्मल यश लीजिये ।

अंत में रावण श्रीराम के द्वारा मारा गया उसको उसके दुष्कर्म का फल प्राप्त हुआ । मन्दोदरी इस दुःखद धटना के समय रावण के समीप जाकर विलाप करने लगी। उस समय भी उसको श्रीराम पर पूर्ण विश्वास था कि दयामय श्रीराम उसके पति को दुर्लभ धाम भेजकर उसका हित ही करेंगे।

दोहा - अहह नाथ रधुनाथ सम कृपासिंन्धु नहिं आन ।

जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान् ।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड 104

अहह! नाथ ! श्रीरधुनाथजी के समान कृपा का समुद्र दूसरा कोई नहीं है जिन भगवान् ने तुमको (रावण को) वह गति जो जोगी समाज को दुर्लभ है ।

मन्दोदरी भले ही राक्षसजाति की थी किन्तु एक आदर्श -विवेकशील, न्यायप्रिय, राजा की रानी के साथ ही साथ पतिव्रता भी थी । रावण की गति मति तथा शक्ति का धमण्ड अंत तक काल के वश होने के कारण सुधार नहीं सकी इस । धटना से प्रमाणित होता है कि -

सो न टरई जो रचई बिधाता

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मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

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मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति'' Sr.MIG-103,व्यासनगर, ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड- 456010 Ph.:0734-2510708,Mob:9424560115

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मजदूर दिवस

1 मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस दुनिया भर में मजदूरों के नाम पर मनाया जाता है. इस दिन को उन मजदूरों की याद में श्रद्धांजलि स्वरूप मनाया जाता है जिनकी लाशें पूंजीपतियों एवं सामंतवादी विचारधारा के लोगों के द्वारा सिर्फ इसलिए बिछा दी गईं थीं कि उन्होंने अपनी मेहनत के एवज में अपनी जायज मांगों को पूरा करने की मांग करने की हिमाकत दिखाया था. साधारणतः दिवसों को किसी ख़ुशी अथवा गम के रूप में मनाया जाता है, मगर मजदूर दिवस गम के साथ-साथ एक ऐसे दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो हर साल दुनिया के मजदूरों के दिल और दिमाग को एक ऐसा एहसास दिलाता है कि तुम दबे रहो, कुचले रहो. तुम्हें अपनी उचित मांगों को मांगने का भी अधिकार नहीं है.

तुम अपने खून-पसीनों को बहाते रहो. अमीरों की गुलामी करते रहो. पसीना बहाकर. पानी छानकर लाकर बलवानों का पैर धोते रहो. तुम्हें दबे रहना है, तुम्हें कुचले रहना है. तुम्हें अपना मुंह खोलने का अधिकार नहीं है. तुम सामंतों की केवल सेवा करते रहो. उन्हें खुश करते रहो, जिसके बदले में तुम्हारे सामने रोटी डाल दी जायेगी. तुम्हें जरा भी विरोध नहीं करना है. तुम सिर्फ सेवा करने के लिए ही बने हो. क्योंकि तुम तो ( इन सामंतवादियों की दृष्टि में ) मनुष्य नहीं हो? तुम तो केवल हाड़-मांस के एक टुकड़े हो. तुम इन अमीरों, बाहुबलियों की बराबरी क्यों और कैसे कर सकते हो! तुम तो कमजोर हो. और भला कमजोरों को खुश रहने का अधिकार है? क्या गरीबों को अपनी चाहतों को पूरा करने का अधिकार है? क्या मजदूरों को सामर्थवानों की बराबरी करने का अधिकार है? नहीं न! तुम स्वयं को मनुष्य समझने की भूल क्यों करते हो? तुम अपनी औकात! में रहो. वरना तुम जरा सा भी हिले, तुमने जरा भी अमीरों की बराबरी करने की कोशिश की, तुमने जरा भी अपने अरमानों को पूरा करने का ख्वाब देखा, तो तुम्हें गोलियों से भून दिया जायेगा.

एक मई हर वर्ष दुनिया के मजदूरों, गरीबों को याद दिलाता है कि तुम कितने उपेक्षित हो. तुम्हारा एक अलग घटिया? समाज है. तुम्हें सहानुभूति की, तुम्हें सहायता की, तुम्हें प्यार की, तुम्हें प्रशंसा की, तुम्हें ईनाम की, तुम्हें श्रेय की उम्मीद ही नहीं रखनी चाहिए. तुम्हें अपने अरमानों का गला घोंट देना है. तुम्हें अपनी इच्छाओं को मार देना है. यह दिवस याद दिलाता है कि मजदूर हमेशा मजदूर ही रहेगा. तभी तो आज भी मजदूरों की जिंदगी में कोई बुनियादी फर्क नहीं हुआ है. थोड़े से पैसे उन्हें अधिक अवश्य मिल जाते हैं, पर वर्तमान समय में रूपये के अवमूल्यन के हिसाब से वही कमाई है, जो पहले थी. वरना आज मजदूर भी महलों में रहते. कारों में घूमते. उनके बच्चे भी आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर अमीरों की बराबरी कर सकते. परन्तु एक सोची समझी साजिश के तहत बराबरी और समानता के ढोंगी समाज के द्वारा उन्हें उतना ही दिया जाता है कि जिससे वे किसी तरह अपने पेट को रूखे सूखे अनाजों से भर लें. और आदिकाल से एक सोची समझी साजिश के तहत उन्हें सुविधाओं से वंचित करके रखा गया है. क्योंकि यदि मजदूर, गरीब रहेंगे तभी अमीरों की अमीरी भी बनी रहेगी. गरीब हैं तभी अमीर भी हैं.

अमीर अपनी अमीरी को कायम रखने के लिए गरीब की गरीबी का मोहताज है. वरना यदि गरीब सुविधायुक्त हो जाएँगे तो वो सुखी संपन्न हो जाएँगे. और जब वे सुखी संपन्न हो जाएँगे, सक्षम हो जाएँगे, तो वे गरीब, मजदूर, कहाँ रहेंगे. और अगर गरीब, मजदूर नहीं रहेंगे, तो फिर अमीर कैसे अमीर रहेंगे. फिर उनकी सूखी फुटानियों को कौन बर्दाश्त करेगा. फिर उनकी सेवा में कौन लगा रहेगा? किसे फिर वे अपनी अमीरी, शान व शौकत धन दौलत को दिखायेंगे. फिर उनसे कौन डरेगा? फिर वे किसे झुकायेंगे? किस पर रौब गाठेंगे? इसीलिए मई दिवस एक सांकेतिक दिवस है. वास्तव में वर्ष का हरेक दिन मई दिवस है. हर दिन हजारों गरीब, मजदूर सुविधा के अभाव में, धन-दौलत के अभाव में मर रहे हैं. वस्तुतः अमीरों के हाथों अप्रत्यक्ष रूप से मारे जा रहे हैं. हाँ यह अलग बात है कि मई दिवस की तरह गोलियों की आवाजें नहीं आती हैं.

उनकी मौतों की ख़बरें नहीं आती हैं. वे कहीं किसी अँधेरे कोने में सिसक-सिसक कर मर रहे हैं. न जाने कब "अँधेरे कोने" से उनकी मौतों की आवाजें आम लोगों के, सामर्थ्यवानों के कानों से गुजरकर उनकी अंतरात्मा को झिंझोड़ेगी. न जाने कब उनकी जिन्दगी अँधेरे कोने से निकल कर उजाले में चमकेगी. पता नहीं! दुनिया के हर कोने में मजदूरों की दशा दयनीय है. उनके कल्याण हेतु सामंतवादियों, धनवानों के द्वारा बस थोड़ी सी सहायता कर खानापूर्ति कर दी जाती है. और उसमें भी सहानुभूति, अपनत्व, प्रेम की अपेक्षा एहसान का भाव अधिक होता है. मजदूर ही लूटे जाते हैं, सताये जाते हैं, मारे जाते हैं. धनवानों के द्वारा उन्हीं का अधिकार छीना जाता है. और उलटे उन्हीं पर एहसान भी थोपा जाता है. इतने वर्षों के बाद भी मजदूरों की स्थिति यथावत है. साल का हरेक दिवस मई दिवस बन कर रह गया है. इसलिए अब मई दिवस की सार्थकता ख़त्म हो गई है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि " अजब करते हो तुम यारों, ये क्या बात करते हो, हमें ही लूटते हो और हमें खैरात करते हो".

के. ई. सैम स्वतंत्र पत्रकार

‘ वह मुझे वाराणसी रेलवे  स्टेशन पर मिली थी। खुली किताब के फड़फड़ाते पन्ने -सी। पढ़ रहा था मैं एक -एक हर्फ़। जिसे मैं शब्दों और वाक्यों की बंदिशों में गुनगुना रहा था, वह एक रहस्य कथा – थी  .....।उसे फैजाबाद अपनी बुआ के यहाँ जाना था और मुझे नवाबगंज।मेरे बगल बैठी वह बड़े चिरपरिचित अंदाज में एक - एक कर कितनी बातें पूछे जा रही थी और मैं उसी लय में गुम  सब बताता जा रहा था। था ही क्या छुपाने को ...? मेरा संकोची स्वभाव खुद के दायरे कैसे तोड़ रहा था ,यह सोचकर  मुझे हँसी  भी आ रह थी ।

“ आप हँसते हुए बुरे नहीं लगते , फिर इतना कम क्यों हँसते हैं ?” “ मुझे दूसरों को हँसते हुए देखना ज्यादा अच्छा लगता है..... मेरा ऐसा उत्तर  सुनकर वो  जोर से हँसी ,बोली – “ अरे वाह ! कुछ ज्यादा ही नहीं हो गया  ?”

“ कहाँ से हो ? बनारस के तो नहीं हो,  इतना तो पक्का है !”

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सच कहूं !, जवाब देने का मन तो नहीं था, पर फिर भी मेरे प्रति उसकी जिज्ञासा अच्छी लग रही थी। जिन्दगी में पहली बार कोई अनजान लड़की इतने अपनापे भरे सवाल कर रही थी कि जवाब  मेरे चिंतन से बगैर इज़ाज़त लिए उछल-उछल कर बाहर आ रहे थे। हाँ ! , बात -बात में उसने ये जरूर बताया था कि  वह एनएसडी के लिए फॉर्म भरना चाहती थी ,एक्ट्रेस बनना चाहती  थी । ‘’परिवार तो बहुत  रूढ़िवादी है ,फिर भी मैं थोड़ी अलग हूँ।’’ उसने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझसे कहा , “ यहीं करौंदी  के पास  रहती हूँ।कभी आइयेगा घर ! ” न्योता दे  डाला था।मेरी सहजता ने मुस्कुराकर स्वीकृति भी दे दी थी। “अच्छा लगा ,आप जैसी आज़ाद ख़याल लड़कियों को देखकर ,मैं खुश हो जाता हूँ।” “ क्यों आपको कैसे लगा कि मैं आज़ाद ख्याल की हूँ ?फिर हँसते हुए बोली ... अरे ! वो तो बस  ..ऐसा बोलकर सहज  महसूस  करती हूँ, बस इसीलिए बोल दिया। मैंने कहा -आपकी हँसी और लड़कियों से बिलकुल अलग है ! झट से बोल पड़ी – पता नहीं ,पर इतना ज़रूर है कि  जब भी मेरा मन उदास होता है ,तो  जोर –जोर से हँसने को जी करता है, तब  मैं  हँस लेती हूँ ,ठहाके लगाकर। बस.... उदासी की धुंध छूमंतर . वैसे भी ख़ुशी ,शांति ये सब तो मानव मन की मूल प्रवृत्ति है ,एक अपना मन ही तो है, जिसे हम अपने अनुसार चला सकते हैं।”

“लेकिन हर कोई कहाँ चला पाता है मन को  अपने अनुसार ....?” मैं बुदबुदाया।

घर में जब इस तरह खुलकर हँसती होंगी तो सच में,  सारा विषाद , सारी थकान दूर भाग जाती होगी पूरे परिवार की ,कितना गुलज़ार होता होगा आपका घर आपकी इस जीवंत हँसी से ?” मेरे प्रश्न को सुनकर बोल पड़ी – “ हाँ !घर पर भी चाहे बाद में कितनी भी डांट  पड़े , पर अपनी आत्मा को कष्ट नहीं पहुँचाती  ,पाप लगता है ना ?” मैंने प्रश्न किया - पाप और पुण्य ,यक़ीन करती हैं ?अच्छा आपकी नज़र में पाप और पुण्य है क्या ?” कहने लगी –“ सम्पूर्ण प्रकृति को जो सुकून दे पुण्य।और हाँ सबसे बड़ा पाप है आत्महिंसा।” मैं झट से मुस्कुराते हुए बोल पड़ा –“ दार्शनिक हैं आप तो !”

उसने शरमा कर पर पूरे आत्मविश्वास के साथ  मेरी तरफ़ नज़रें उठाकर बोलती गयी  –“ व्यक्ति ताकतवर हो जाये तो परहिंसक हो जाता है और कमजोर हो तो आत्महिंसक और मैं जीवन में कभी कमजोर नहीं पड़ना चाहती।बार –बार जन्म लेकर मानव जीवन जीना चाहती हूँ।इस प्रकृति- सा मजबूत जन्म।क्योंकि कमजोर होना ,आत्महिंसक होना पाप है।और मुझे कभी  मोक्ष नहीं चाहिए।जीवन संघर्ष की द्यूतक्रीड़ा - सा आनंद और कहाँ  ? ” खूब जोर की हँसी......ठहाकेदार।....कितना खुलकर हँसती हैं आप ....अच्छा लगता है।पूरे  इलाके में गूँजती होगी आपकी हँसी ? मैं ही हँसती हूँ पूरे गाँव में ऐसी हँसी।बाकी  सभी लड़कियां ,औरतें डरती हैं, मेरी तरह हँसने में।” “ऐसा  क्यों ?” आश्चर्य मिश्रित जिज्ञासा से मैंने उससे पूछा।

“जानना है क्यों ?”अपने रेशमी बालों पर हाथ फेरते हुए उसने कहा।

इतनी  अद्भुत बात  सुनने के लिए मैंने उत्सुकता में सिर हिलाया।

उसने बोलना शुरू किया – “ मेरे गाँव की एक बुआ जी थीं ,बड़ी भली थीं ,पर इतना हँसती थीं कि पूरा गाँव उन्हें हँसने वाली डायन बुलाता था , उनके हँसने की शुरुआत भी आरोह –अवरोह के साथ होती ,पहले मुस्कुरातीं ,फिर बच्चों जैसा खिलखिलातीं ,फिर मर्दों -सी धमाकेदार हँसी ,बिलकुल मेरे जैसी।लोग कहते जिस घर जाएगी पति चार दिन में निकाल बाहर  करेगा।सुरसा की तरह मुँह फाड़कर हँसती है  , ये लच्छन लड़कियों के लिए शोभा नहीं देते,  बिलकुल आवारा हँसी ,ना जाने कितने नामों ने नवाज़ी गयी उनकी हँसी।और जानते हो ! शादी के बाद एक दिन बुआ की  ससुराल में मनिहार चूड़ी पहनाने आया ,चूड़ी पहनते हुए मनिहार की किसी बात पर जोर-जोर से हँस रही थी , न जाने किस बात पर... वैसे भी  उनकी  ससुराल में हँसने जैसी स्थिति पैदा करने सरीखा , कुछ  भी तो नहीं था ।हँसी का भरा कलश अवसर पाकर  छलक पड़ा , फिर क्या - सास ने ना आव देखा ना ताव ,बेटे को पुकारते हुए बोलीं- “ निकाल इस हँसोड़ की जुबान ,परेतिन- सा  हँसती रहती है। जान –अनजान , आस -पड़ोस सांझ- सबेरे मुँह बिचकाता है। ना  जाने कहाँ से उठा लाये बेशरम बहुरिया ? माँ-बाप ने हँसने का भी तरीका ना सिखाया लड़की को , भक्क –भक्क कर हँसती है।बुआ बाँह भर –भर चूड़ियाँ खनकाती उठी ही थी कि, तभी एक तेज धक्का उनकी पीठ पर  पड़ा .....बेटे ने जैसे मातृऋण उतार दिया।बुआ के मुँह से पाँच  दांत बाहर निकल पड़े ......हँसी का सोता तो भीतर था , वह कैसे सूखता , वह तो आत्मा का गान था।हँसना तो प्रकृति से एकाकार होना था।बाकी उमर बुआ ने उन्हीं टूटे दांतों को श्रद्धांजलि देने में बिताया ।हंसी खूब हंसी। पहले जहाँ दांत  दिखते थे ,वहाँ अब कभी-कभी सौन्दर्य लोभ से आँचल का कोना मुँह पर होता था।वैसे पूरी उमर जीकर शरीर नहीं त्यागा ,असमय चली गयीं वो .......कितने अधूरे ख्व़ाब लिए .....। पीछे पाँच बेटियाँ ,पाँच दांतों की निशानी। बेटा जनने की आस लिए काया कंकाल में तब्दील हो गयी ....या पति ने ही मुक्ति दे दी ...जितने मुँह, उतनी बातें।सच किसे पता ....? बेटियाँ भी विरासत में माँ की हँसी पा गयी थीं। ”

फिर...? मेरे अशांत मन ने शांतिपूर्वक पूछा ।

“ फिर क्या, तबसे जब भी गाँव में कोई लड़की तारा बुआ- सा हँसती , तो लोग यही ताने देते ,कि  कोई सिरफिरा मरद मिल गया तो, भरी जवानी में मुँह पोपला कर देगा।”

जोरदार हँसी ...झरनों की तरह ,वेग से उतरती हँसी ,ना जाने किस रेगिस्तानी शून्य  में समा जाती।झुंडों में सिमटी हँसी बिखर कर लुप्त हो जाती ...फिर सन्नाटा ........आगत  भय का इतना भयानक बखान ,वो भी हँसी की पतंगे उड़ाकर।

“ जानते हो ! ये सब मैंने तुम्हें क्यों बताया ...क्योंकि जब भी मेरे भीतर कोई दुःख होता है , मैं बाँट देती हूँ, किसी से भी कह देती हूँ, मुझे आत्मा में यकीन है , सभी आत्माएं हैं, कभी -कभी जब कोई नहीं सुनने को तैयार नहीं होता तो अपने कुत्ते, गैया,पेड़ ,नदी और तालाब से भी बातें कर लेती हूँ।ये  बेजुबान सही ,पर उनकी आत्मा तक तो मेरी आवाज पहुँच ही जाती है ना ! और तो  और कभी – कभी खुद से भी बतिया लेती हूँ ......तुम करते हो ऐसा ?” मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया – “ करूँगा ” , अब कोशिश करूँगा “....उसने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा – “ और हाँ ! ये पशु ,पक्षी, पेड़ -पौधे तुम्हारे मन की किसी से कहेंगे भी नहीं ..इन्सानों -से नहीं होते ये ! कुछ पल रुककर, गहरी साँसें लेते हुए बोल पड़ी, काश ! इंसानों के भी जुबान न होती ..कितना अच्छा होता ! तारा बुआ के दांत ना टूटते। मैं भी क्या पागलों - सा सोचती हूँ ! बोर हो रहे होंगे ना आप भी ?” मैंने कहा –“नहीं तो ! मैं तो सोचना शुरू करना चाहता हूँ।’’

फिर चेहरे के भाव को संयत करते हुए कहने लगी –“तुम मिले तो मन ने कहा- कह डालो ...कह दिया ......। दो पल में सदियों का दर्द तो नहीं कहा जायेगा ना !” एक जोरदार हँसी ....वह अच्छी लग रही थी।

                   फैज़ाबाद आ गया था।हम स्टेशन से बाहर आ चुके थे। रिक्शा लेकर वो जाने लगी तो बोली - लीजिये ! मेरा पता है इसमें।और फिर चली गयी।जाते हुए उसको आवाज़ दी मैंने ..वह मुड़ी ,मैं जोर से चिल्लाया ....मेराSSमेंSSरा  नाम मानव भार्गव है ...तुम्हाराSSS…। उसके हाथ आश्वस्त भाव से हवा में  हिल रहे थे। मुझे लगा शायद सुन लिया होगा उसने  ...।

             उससे  मिलने के बाद दो वर्ष और जुड़ गए थे मेरी जिन्दगी में। नौकरी मिल गयी थी और  प्रशिक्षण भी पूरा कर लिया  था। आज बनारस छूट रहा था। इतने दिन बनारस  में बिताने के बाद उसकी यादें ,मन को भारी  कर रही थीं। रद्दी इकट्ठी की , पेपर वाले को बुलाया। वो तराजू -बाँट लेकर बैठ गया। मैं हँसा और उसका मुँह लड्डू से मीठा कराते हुए बोला। “नहीं भैया ! आज तोलकर नहीं, ऐसे ही ले जाओ।” उसने प्रसन्न मुद्रा में हाथ जोड़े और रद्दी को भरने लगा ,तभी एक कागज का टुकड़ा गिरा ,समय की ठहरी यादें ....वो हँसने वाली लड़की का पता था।मैंने देखा ,मेरा उदास मन हँसने की वजह पा गया।

मैंने सोचा, मिलने चलता हूँ आज ,पर क्या वो दो  वर्षों बाद पहचान पायेगी ? इतना संक्षिप्त - सा परिचय था उस दिन,पता नहीं मेरा नाम भी सुन पायी थी  कि  नहीं ?उसका नाम भी तो नहीं पूछ  सका था उस दिन ...अरे हाँ ! वो हँसने वाली डायन बुआ वाली बात याद दिला दूँगा। पर ना जाने कितनों को बता चुकी हो अपनी बात? छोड़ो भी , जाने दो ...पता नहीं कैसी लड़की हो या फिर अब तक शादी हो गयी हो ....पर, एक बात तो पक्की है , कुछ बन जरूर गयी होगी। गजब का आत्मविश्वास और साहस था।जीने का एक अपना ढंग।बहुत कम लड़कियाँ जी पाती हैं ऐसा , कपास – जैसा।यहीं बनारस  का पता था – करौंदी ,बी.एच.यू. के पास।सोचा, दोबारा ना जाने कब आऊँगा।मिल लेता हूँ एक बार , शायद अभी यहीं हो ? वो बिलकुल मेरे वैचारिक  खाके में समाने  वाली लड़की थी।उसकी निश्छल हँसी ...सोचते -सोचते मैं उस पते के सामने था।मैंने उस जर्जर होते मकान की कुण्डी खटकाई ऐसा लगा , कुण्डी निकलकर हाथ में आ जाएगी । ईंटों से झाँकते मोरंग , बेबस धूलों ने, बेतरतीब उगी जिद्दी घासों ने ,यहाँ –वहाँ  लटके जालों ने मुझे आगाह किया हो जैसे।तभी एक जर्जर काया  ने दरवाज़ा खोला। अनुभवी रंग लिए बाल , विजन सरीखी आँखें ,पपड़ाये  होंठ और एक प्रश्नवाचक दृष्टि।

मैंने उसके मुखाभाव को मूक प्रश्न मान, उत्तर दिया – “ मैं मानव भार्गव ....वो खूब हँसनेवाली लड़की यहीं रहती है ? मुझे भी अपने प्रश्न पर लज्जा ,संकोच और हँसी मिश्रित भाव आ रहे थे।कहीं ये मुझे पागल ना समझ ले।मैं उन शून्य में खोयी आँखों से, किसी उत्तर की उम्मीद ना पाकर लौटने लगा।  मैं मुड़ा ही था कि एक भर्रायी आवाज़ ने मेरे क़दमों को रोक दिया। “ हाँ ....हाँ ! यहीं रहती है ..आइये !” उसने मुझे बैठाया पानी को ग्लास में उड़ेलते हुए उसने  दीवार पर लगी तस्वीर की तरफ इशारा करके पूछा ! इसी  लड़की की खोज में आये हैं ना आप ?मेरे हाथ से पानी का गिलास छूट गया। मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गयी। बिलकुल वही चेहरा आँखों के सामने घूम गया , कानों में वही हँसी पिघलने लगी। तभी उसकी भर्रायी आवाज़ ने मुझे झकझोर दिया - “ करीब पंद्रह साल हुए वो हँसने वाली लड़की को गए।” मैं  लगभग उसे डाँटते हुए बोल पड़ा - “ पर ये  तो मुझे दो साल पहले मिली थी ! मैं मिला था ,उससे ट्रेन में, यकीं नहीं होता मुझे ,आप मज़ाक तो नहीं कर रहे ...” “ ऐसा भी हो सकता है ?” मैंने खुद से प्रश्न किया।उसकी बातें सुनकर मुझे पसीना आ गया  ,मेरे पैर काँप रहे थे।

        तभी उसने बात आगे बढ़ाई  .... “ पत्नी थी वो मेरी। कब मिली थी आपको ?” मेरी  आँखों को , इस रूह सिहरा  देने वाले सच पर यकीं करना नामुमकिन था।फिर भी मैं सुनना चाहता था।

वह  मेरे जिज्ञासु, अशांत बालमन सरीखे प्रश्नों को पहचान, उत्तर देने के लिए ,अपनी पथरायी स्मृतियों घिसने लगा  - “ वो आज भी आती है। तारा , नाम था उसका” ....।

ओह्ह्ह....... ! मैं सिहर  उठा।मैंने  अपने हाथों को आपस में भींच, दोनों अंगूठों को दाँतों  तले दबा लिया। “ तो वो तारा बुआ थीं ....।खुद की कहानी दोहरा रही थीं ....।” बस इतना आत्मप्रलाप।

   “ हाँ ! पाँच बेटियाँSSS थीं ना उनके ?” मैंने उत्सुकतावश और सच को पैना करने के लिए पूछा।

“ हाँ ..पाँच बेटियाँ थीं ....पाँचवीं बेटी यहीं है, मेरे साथ ”  एक बुत सरीखी काया की तरफ इशारा किया उसने , गहरी साँस ली , बोला – “ इसने  माँ की कहानी सुन , हँसना छोड़ ही दिया था। बाकी चार खूब हँसती थी। इसके  भीतर एक अनागत भय था। लगता था ,यूँ जोर - जोर हँसेगी  ,तितलियों - सा उड़ेगी  , झरनों -सा बहेगी ,सपने सजायेगी,  तो कहीं ऐसा ना हो कि इसके माँ  जैसी इसकी  भी जिन्दगी हो जाये। पर नहीं, इसका  सोचना गलत था।लोगों को हँसना अच्छा लगता है ....ज़िन्दा लोग तो हँसते हुए ही अच्छे लगते हैं ! इसने  एक सहमे भविष्य की आशा में वर्तमान को नहीं जिया।इसका कोई छोर भी है, नहीं पता ....” थोड़ा रुककर ...... “ पर इसकी माँ  आज भी आती हैं इससे मिलने, मुझसे नहीं मिलती ,नाराज़ है अभी तक, मैंने कोई भी वचन नहीं निभाया ना,सब कुछ त्याग मेरे पास आई थी ,कहाँ  समझ सका एक नारी मन को, मेरे भीतर का दंभी, अज्ञानीपुरुष। हम एक दूसरे के पूरक बन सकते थे ,पर नहीं ! मेरे भीतर उपजे पुरुष अहं ने आत्मा की आवाज़ को अनसुना कर दिया था। मैंने प्रकृति की सहजता को उसकी कमजोरी ,उसकी विवशता माना। स्वप्नपंख ही काट दिए मैंने उसके ,यथार्थता पर पिघले मोम उड़ेल दिए , ओह्ह्ह .....भयानक भूल थी मेरी ,अक्षम्य अपराध है मेरा ... अक्षम्य अपराध ....” यह कहते हुए उसकी आँखों से रक्तवर्णी अश्रु प्रवाहित हो रहे थे।वह बोलता जा रहा था , “ जानता हूँ मैं ,तारा चाहती  है - एक बार अपनी बेटी को अपने जैसा हँसता हुआ देख ले  , उसे आत्मिक शान्ति  प्राप्त हो जाएगी ।और मैं तारा की इस पीड़ा को परिशान्त करने में लगा हूँ ,क्योंकि मेरे लिए अब प्रायश्चित का एक यही जरिया है। रोज तरह –तरह से इसकी खिलखिलाहट लौटाने का भागीरथ प्रयत्न करता रहता हूँ। ताकि इसके भीतर जमी हँसी की हिमानियां पिघल कर,  कल –कल करती हुई , जीवन-सरिता  से मिल सकें।

तारा  हर लड़कियों की रूह में है, जो हँसना जानती हैं। पर तारा का लक्ष्य  ...कोख़ में असुरक्षित होती हुई ,आग में जलती हुई ,सड़कों पर गिद्ध भरी नज़रों से निहारी जाती हुई ,बेंची और खरीदी जातीं ,मर्दित की जाती हुई आस्थाओं ,पवित्रताओं का आत्मबल बनना चाहती है। इसीलिए मुक्त नहीं होना चाहती, इस नश्वर जगत से। ना जाने पीड़ा की कितनी कहानियों में वो चीखतीं हैं ,चिल्लाती हैं ......जीने के अंदाज़ बताती है, वह हर हारे मन की आवाज़ बनना चाहती है। ....जानते हो ! तारा उस दिन बहुत खुश दिखती हैं ,जब कोई बेटी जन्म लेती है ,जब कोई बेटी अपने तरह उकेरी गयी जिन्दगी जीती दिखाई देती है ,आसमान को छूती है , अपने सपने सच करती है और खुल कर हँसती है। खुलकर हँसने को वो आत्मा का संगीत ,एक अनहद नाद ....चिर शांति का महाद्वीप मानती है।”

“ ये क्या हैं ?मैंने तस्वीर के पास रखे लाल कपड़े बंधे लोटे की तरफ इशारा किया ...वह बिना एक पल रुके कातर स्वर में बोल पड़ा -अस्थियाँ हैं तारा की ....ले जाओगे आप ? गंगा में प्रवाहित कर देना ,मुक्त हो जायेगी तारा .........बेटियों पर अत्याचार नहीं देखा जाता उससे ना ..........नहीं तो ना जाने कब तक आती रहेगी बार –बार, इस पीड़ायुक्त पथ पर पावों में छाले उगाने  , सदियों –सदियों सहती रहेगी परपीड़ा ....नहीं ....नहीं मुक्त कर दीजिये उसे आप। मैंने जो  परहिंसा की है, उसी का प्रायश्चित कर रहा हूँ ,पापहस्त हूँ मैं,कोई नहीं आता यहाँ अब ! शायद तुम्हारे हाथों ये पुण्य कार्य लिखा था, तभी उसने तुम्हें यहाँ भेजा है !”  यह कहते हुए उसने अस्थिकलश मेरी ओर बढ़ाया , मैंने भारी  मन से , हलके अस्थिकलश को कांपते हाथों  उठाया। तारा बुआ के पति का पश्चाताप कितना सार्थक था ? सोचता हुआ मेरा उद्दिग्न मन दहाड़े मार - मार कर रोना चाहता था।

और अब मेरे भीतर एक अंतर्द्वंद था। तारा बुआ की मुक्ति ज़रूरी है या उनका रहना। तारा की भटकती आत्मा तो  बेटियों , औरतों , अजन्मी - जन्मी काया की शक्ति है ,संबल है। उसकी आत्मा को मुक्त करना , प्रकृति को पीड़ा देना , हतोत्साहित करना और अनाथ कर देने जैसा नहीं होगा ? और फिर तारा ने कहा भी तो था, उसे मोक्ष नहीं चाहिए ! प्रश्नों के अनंत ज्वालामुखी मेरे अन्तर्मन में फूट रहे थे।  

आज मैं फूट- फूट कर रोना चाहता था। मैं प्रार्थना   रहा था कि तारा बुआ के पति का परहिंसक रूप किसी भी पुरुषमन को अपना ठौर ना बना पाये। 

        मैं अपरचित समय से, परिचय की माँग  कर रहा था, चारों ओर पसरे प्रश्नों के कंकाल  , मुझे हँसने वाली डायन बुआ के पाँच टूटे हुए दांत सरीखे  भयावह लग रहे  थे।

तारा समय के बंधन से मुक्त  हो चुकी थी .... मृत्यु तो  मात्र उस शरीर का अंत है जो प्रकृति के पञ्च तत्वों से निर्मित होता है । भगवान श्री कृष्ण ने कहा है -  “ आत्मा अमर है , उसका अंत नहीं होता, वह तो मात्र शरीर रूपी वसन परिवर्तित करती है।  कटना, जलना, गलना व सूखना सभी  प्रकृति से बने शरीर या दूसरी वस्तुओं में ही संभव होता है, आत्मा में नहीं।”

तारा की मृत्यु पर शोक करके मैं उसकी पवित्र आत्मा को कष्ट नहीं देना चाहता था।

            लेकिन ना  जाने क्यों मेरा  दृढ़  विश्वास  है कि वो हँसने वाली लड़की फिर मिलेगी मुझे ! और हाँ ! हर मनद्वार पर आज भी खड़ी है वो, मूकव्यथाओं का प्रचंड अंतर्नाद, और आत्मबल बनकर ! खटखटाती है, हर आत्मा की कुण्डियां  सुन सको तो खोल  देना द्वार , कर लेना  आत्मसात, उस हँसने वाली लड़की की पीड़ा ,जब  रोप लोगे मन की जमीनों पर उसका आना ,उसकी खिलखिलाहट ,उसकी पहचान ,उसकी उड़ान ,उसके स्वप्न ,उसकी साँझ, उसका विहान।

क्योंकि आत्मा तो अजर, अमर है, बिलकुल उस हँसने वाली लड़की की, अन्तरिक्ष सरीखी हँसी जैसा !

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अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर ’

जन्म :    1  मार्च

ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर - प्रदेश

दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बिनी,वागर्थ ,बया ,इरावती प्रतिलिपि डॉट कॉम , सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि में  रचनाएँ प्रकाशित

2001  में  बालकन जी बारी संस्था  द्वारा राष्ट्रीय  युवा कवि पुरस्कार

2003   में बालकन जी बारी संस्था   द्वारा बाल -प्रतिभा सम्मान  

आकाशवाणी इलाहाबाद  से कविता , कहानी  प्रसारित

‘ परिनिर्णय ’  कविता शलभ संस्था इलाहाबाद  द्वारा चयनित

मोबाइल न. 8826957462     mail-  singh.amarpal101@gmail.com

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बंगाल के कांग्रेस नेता विपिनचन्द्र पाल, पंजाब के स्वतंत्रता संग्राम के नायक लाला लाजपतराय और महाराष्ट्र में जन्मे राष्ट्रीय नेता बाल गंगाधार ‘तिलक’ कांग्रेस के नरमपंथी बुद्धिजीवी लेखकों, समाजसेवियों, विचारकों और मानवतावादियों से अलग किन्तु एक स्पष्ट राय यह रखते थे कि ‘‘भारत में ब्रिटिश शासन निरंकुश हो गया है। वह जनता की भावनाओं की थोड़ी-सी भी चिन्ता नहीं करता।’’

‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से विख्यात यह टीम अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँची कि अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ों को भारत से उखाड़ने के लिए आवश्यक है कि राष्ट्रीय शिक्षा, राष्ट्रभाषा हिन्दी पर जोर देकर पूरे राष्ट्र को एक राष्ट्रीय भावना के सूत्र से बांधा जाये। विदेशी विशेषकर इंग्लैंड में बनी वस्तुओं का पूरी तरह वहिष्कार किया जाये। पूरे भारतवर्ष में शराब के प्रचलन पर चोट की जाये ताकि अंग्रेजों की अर्थव्यवस्था जर्जर हो जाये। भारत में अर्धशासन, कथित सुशासन के बजाय ‘स्वराज्य’ की माँग को बुलंद किया जाये।

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कलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान तिलक ने अपने ओजस्वी भाषण के माध्यम से कहा - ‘‘न हमारे पास शस्त्र हैं और न उनकी कोई आवश्यकता है किन्तु विदेशी वस्तुओं के वहिष्कार के रूप में हमारे पास ऐसा राजनीतिक हथियार है जो अंग्रेजों की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने में अचूक साबित होगा। मुट्ठीभर गोरे लोगों का निरंकुश शासन हम भारतीयों की कमजोर संकल्प शक्ति के बूते ही चल रहा है। यदि हम सब एकजुट होकर निसस्वार्थ भाव से अंग्रेजों की उस हर वस्तु का वहिष्कार करने पर जुट जायें, जो किसी न किसी प्रकार की गुलामी का प्रतीक है तो यह कोई असंभव कार्य नहीं कि अंग्रेज भारत न छोडें।’’

तिलक ने आगे कहा - ‘‘माना हममें सशस्त्र विद्रोह की शक्ति नहीं है लेकिन क्या हममें आत्मनिषेध और आत्म संयम का बल भी नहीं है जिसके द्वारा अंग्रेजों की हम पर शासन करने इच्छाशक्ति को नष्ट न किया जा सके? यदि हम अंग्रेजों को शासन चलाने में कोई सहायता नहीं देंगे तो उल्टे अंग्रेज हमसे भयभीत होंगे। राजस्व वसूली और शांति बनाये रखने में परोक्ष-अपरोक्ष दिया गया हमारा सहयोग ही तो पराधीनता के असल रोग को बढ़ावा देता है। भारत से बाहर होने वाले युद्धों में हम जन-धन से अंग्रेजों को सहायता आखिरकार क्यों करते हैं? हमें न्यायालयों के काम में अंग्रेजों की मदद करना बंद कर देना चाहिए। हमें अपने विवाद सुलझाने के लिए अपने न्यायालय विकसित करने होंगे। अब समय आ गया है कि हम सरकार को टैक्स भी न दें। अंग्रेजों का हर प्रकार से बहिष्कार ही हमारा राजनीतिक हथियार है। क्या आप लोग इन सब बातों के लिये तैयार हैं। यदि हाँ तो आप कल ही स्वतंत्र हो जाऐंगे।’’

बाल गंगाधार राव तिलक के स्वराज के इस सिंह-घोष ने एक तरफ जहाँ हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में नव उत्साह का संचार किया, वहीं अंग्रेजी हुकूमत के प्रति नरम रवैया अख्तियार करने वाले उन नेताओं को तिलक का यह भाषण नश्तर की तरह चुभ गया, जिनकी राजनीति राष्ट्रभक्ति के मिथ्याभिमान के बूते चलती थी, जो विचारक, चिन्तक, लेखक, समाजसुधारक की भूमिका में तो बने रहना चाहते थे, किन्तु अंग्रेजों की कृपा पर आश्रित रहकर। तन और मन से अंग्रेज बनकर अंग्रेजी हुकूमत का छद्म विरोध करने वाले ऐसे ही कथित देशभक्तों ने जल भुनकर लाला लाजपत राय द्वारा बुलाये जाने वाले कांग्रेस के अगले अधिवेशन के प्रस्ताव को तो ठुकराया ही, साथ ही लाल-पाल-बाल को अलग-थलग करने के लिये पूरी योजना के साथ लाहौर के स्थान पर नागपुर में कांग्रेस का अगला अधिवेशन करने पर मुहर लगा दी।

देश को स्वाधीनता का पाठ पढ़ाने वाले नरमपंथी नायक यहीं नहीं चुप बैठे। इन्होंने सूरत में अचानक मुम्बई प्रांतीय सम्मेलन का आयोजन कर तिलक के ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ और ‘बहिष्कार’ के प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इतना ही नहीं इलाहाबाद के प्रादेशिक सम्मेलन में बाल-लाल-पाल के कार्यकर्ताओं को भाग लेने से रोक दिया। और 1906 में कलकत्ता में आयोजित अधिवेशन में इन्ही छद्म राष्ट्रचिन्तकों ने स्पष्ट कर दिया कि तिलक व उनके साथियों के लिए कांग्रेस में अब कोई जगह नहीं है।

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अपने समय के सर्वोच्च क्रान्तिकारी सुभाषचन्द्र बोस ने फ्रांसीसी विद्वान रोम्यारोलां से सन् 1935 में कहा था - ‘‘भारत में एक ऐसा राजनीतिक दल होना चाहिए जो किसानों और मजदूरों के हित को अपना हित समझे। मैं कहना चाहूँगा कि गॉंधी जी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर कोई निश्चित मत नहीं रखते। उनकी प्रकृति समझौतावादी है। ’’

फरवरी 1938 में जब सुभाष हरिपुर अधिवेशन में कांग्रेस के अघ्यक्ष बने तो उन्होंने इस अवसर पर स्पष्ट कहा- ‘‘जिसे तुम अहिंसा कह रहे हो, वह पहले दर्जे की कायरता है। एक उजला बन्दर घुड़काता है तो तुम कांपने लगते हो । क्या इसी तरीके से भारत आजाद होगा? इसके लिए शौर्य चाहिए, वीरता चाहिए और चाहिए खून। तुम अगर मुझे ये दे सकते हो तो मैं आजादी का वादा कर सकता हूँ । ’’

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जब हिजली और चटगॉंव में नौकरशाही का नंगा नाच सर्वत्र दिखाई दे रहा था तब हिजली-कांड के विरोध में कलकत्ता में आयोजित एक विराट सभा के विराट जनसमूह के बीच सुभाष ने गर्जना की-‘‘जो साम्राज्य एक दिन में बना है, वह एक रात में नष्ट भी होगा।’’

सुभाष की इसी प्रकार की एक नहीं अनेक सभाओं में हुयी सिंह-गर्जनाओं का परिणाम यह हुआ कि वे युवाओं के मस्तिष्क पर गर्म खून की तरह छा गये। गॉंधी जी की नीतियों का शीतल स्पर्श अब उनसे कोसों दूर था। इसी युवा वर्ग ने मार्च 1939 में कंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में सुभाष को अघ्यक्ष पद के लिए खड़ा कर दिया। इस अधिवेशन में गाँधी जी द्वारा खड़ा किया गया प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैया लगभग दो हजार वोटों से पराजित हो गया। इस पराजय को गाँधी जी ने अपनी पराजय मानकर सुभाष के अघ्यक्ष बनने का विरोध ही नहीं किया बल्कि उन्हें हटाने के लिए कार्यसमिति के अपने बारह शिष्यों के माध्यम से त्यागपत्र देने को कहा । त्यागपत्र देने वालों में पण्डित जवाहर लाल नेहरू भी थे। दरअसल गाँधी जी चाहते थे कि सुभाष उनकी कठपुतली बनकर कार्य करें। सुभाष को यह स्थिति गवारा न थी। अतः उन्होंने अघ्यक्ष पद से इस्तीपफा देते हुये गाँधी जी पर यह टिप्पणी की-‘‘जो व्यक्ति अभी तक ‘मैं’ से नहीं उभर सका, वह भारत माता की क्या सेवा कर पायेगा।’’

सुभाष किसी के आगे नतमस्तक होने के बजाय गर्व से जीवन जीने की विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले व्यक्तियों में से एक थे, अतः त्यागपत्र के बाद उनके मन में बार-बार यही सवाल कौंधता कि ‘उल्टी सोच और व्यक्तिगत प्रतिशोध में उलझे नेताओं के हाथों में यदि स्वराज्य प्राप्ति के बाद सत्ता आयी तो इस देश का क्या होगा ?’

ऐसे ही ज्वलंत सवालों को लेकर जब वे 22 जून 1940 को स्वातंत्रवीर सावरकर से मिले तो उन्होंने सुभाष को सलाह दी-‘‘कलकत्ता में अंग्रेजों की मूर्तियों को सार्वजनिक स्थानों से हटाने के लिये आंदोलन करने से कुछ नहीं होगा। अंग्रेज इस समय भयानक युद्ध में फॅंसे हुये हैं, छोटे-मोटे आंदोलन कर जेल में सड़ने से तो अच्छा है कि आप रासबिहारी बोस की तरह भारत से दूर जाकर कोई ऐसा ही सैन्य संगठन खड़ा कर अंग्रेजों को टक्कर दें।’’

सुभाष के मन में सावरकर की योजना घर कर गयी और वे 16 जनवरी 1941 की रात्रि 8 बजे पुलिस को चकमा देकर पठान के भेष में अपने मकान से भागने में सफल हो गये।

बर्लिन पहुँचकर जब सुभाष दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह और अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन हिटलर से मिले तो उसने बड़े ही जोशभरे अंदाज में हाथ मिलाया। कुछ देर के वार्तालाप के उपरांत दोनों ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ब्रिटिश सरकार धोखेबाजी और विश्वासघात की नीतियों को नहीं छोड़ेगी। इसलिये आवश्यक है कि अंग्रेजों पर भारत की बाहरी सीमा से हमले किये जायें। भारत जब आजाद हो जाये तो उसकी आजादी बरकार रखी जायेगी।’’

योजनानुसार जर्मनी के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ देने वाले भारतीय सैनिकों को युद्ध बंद करने के संदेशपत्र गिराये गये। सुभाष के संदेशपत्रों का प्रभाव यह हुआ कि 45 हजार भारतीय सैनिकों ने कर्नल हसन के नेतृत्व में आत्मसमर्पण कर दिया जिन्हें लेकर सुभाष ने ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना की । इस अवसर पर हिटलर ने आजाद हिंद फैाज की सलामी ली और अपने गद्गद कंठ से संबोधित करते हुये कहा-‘‘महान भारतवासी सैनिको! आप धन्य हैं और आपके नेताजी बधाई के पात्र हैं। आपके नेताजी का दर्जा मुझसे कहीं अधिक ऊॅंचा है। मैं केवल आठ करोड़ जर्मनों का लीडर हूँ , जबकि सुभाषजी 40 करोड़ भारतीयों के नेता हैं। नेताजी हर कोण से मुझसे बड़े राष्ट्रनायक हैं। मैं और मेरे जर्मन सैनिक उन्हें प्रणाम करते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि नेताजी के नेतृत्व में भारत एक दिन अवश्य स्वतंत्र होगा |’’

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(बलिदान दिवस 23 दिसम्बर )

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इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता कि सबसे अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आर्य समाज के राष्ट्रवादी चिन्तन की तप्त विचारधारा से तपकर सोने की भाँति चमके। रानी लक्ष्मीबाई, तिलक, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, अजित सिंह, भगवती चरण वोरा , सुखदेव, राजगुरु, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक आत्म बलिदानियों के साथ-साथ स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के वहिष्कार, स्त्री शिक्षा, दलितोद्धार और गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के प्रबल समर्थक तथा अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले स्वामी श्रद्धानंद का स्वतन्त्रता संग्राम का जज्बा भी उस आत्म बलिदान की गाथा है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

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लेकिन इतिहासकार डॉ. मंगाराम की पुस्तक ‘क्या गांधी महात्मा थे?’ के तथ्यों के प्रकाश में देखें तो गांधीजी को आर्य समाजियों से बेहद चिढ़ थी। डाक्टर साहब के अनुसार -‘‘गांधीजी ने आर्य समाज, सत्यार्थ प्रकाश, महर्षि दयानंद और स्वामी श्रद्धानंद की विभिन्न प्रकार से आलोचना की। गांधीजी ने कहा-‘‘स्वामी श्रद्धानंद पर भी लोग विश्वास नहीं करते हैं। मैं जानता हूँ कि उनकी तकरीरें ऐसी होती हैं जिनसे कई बार बहुतों को गुस्सा आता है। दयानंद सरस्वती को मैं बड़े आदर की दृष्टि से देखता हूँ, पर उन्होंने अपने हिन्दू-धर्म को संकुचित और तंग बना दिया है। आर्य समाज की बाइबिल ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को मैंने दो बार पढ़ा है। यह निराशा और मायूसी प्रदान करने वाली किताब है।’’

डॉ. मंगा राम ने पुस्तक में आगे लिखा है-‘‘स्वामी श्रद्धानंद को 23 दिसम्बर 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक युवक ने उस समय गोली से मार दिया, जब वे रुग्ण शैया पर पड़े हुए थे। गांधीजी ने स्वामीजी के हत्यारे को ‘प्यारे भाई रशीद’ कहकर सम्बोधित किया। उसके द्वारा की गयी जघन्य हत्या की निन्दा करने के स्थान पर उस हत्यारे के प्रति बरती गयी उदारता क्या गांधी जी की नैतिकता गिरावट को प्रकट नहीं करती? भले ही ब्रिटिश सरकार ने अब्दुल रशीद को फाँसी पर लटका दिया किन्तु उसको बचाने का प्रत्यत्न करने वाले वकील आसफअली गांधीजी के भक्त और कांग्रेस के नेता थे।

स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के समय गांधीजी कांग्रेस के 1926 के गोहाटी अधिवेशन में भाग ले रहे थे। जब उन्हें स्वामीजी की हत्या का समाचार मिला तो गांधीजी ने कहा-‘‘ऐसा तो होना ही था। अब आप शायद समझ गये होंगे कि किस कारण मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा है और मैं पुनः उसे भाई कहता हूँ। मैं तो उसे स्वामीजी का हत्या का दोषी नहीं मानता। वास्तव में दोषी तो वे हैं जिन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध घृणा फैलायी।’’

स्वामी श्रद्धानंद के अतिरिक्त प्रख्यात आर्य उपदेशक पं. लेखराम, दिल्ली के प्रसिद्ध आर्य समाजी नेता लाल नानक चंद, महाशय राजपाल, सिन्ध के आर्य नेता नाथूरमल शर्मा आदि भी कट्टरपंथियों द्वारा मारे गये किन्तु गांधीजी ने इन आर्य विद्वानों और नेताओं की हत्या की निंदा में कभी भी कोई शब्द व्यक्त नहीं किया। जिस प्रकार स्वामी श्रद्धानंद जैसे मूर्धन्य नेता की हत्या किये जाने पर गांधीजी ने उनके हत्यारे अब्दुल रशीद की आलोचना नहीं की, उसी प्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या किये जाने पर भी उन्होंने हत्यारों की निंदा नहीं की।

कुल मिलाकर डॉ. मंगा राम अपनी पुस्तक ‘क्या गांधी महात्मा थे?’ के माध्यम से अंहिसा के पुजारी महात्मा गांधी की हिंसा को बल प्रदान करने वाली इस सोच के पीछे यह तर्क देते हैं कि-‘‘गांधीजी समझते थे कि मुस्लिम हत्यारों की निंदा करने पर उनकी वांछित हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्भव नहीं हो पायेगी तथा उन्हें साम्प्रदायिक कहकर बदनाम किया जायेगा।

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युग-युग से पंजाब वीरता, पौरुष और शौर्य का प्रतीक रहा है। सिखों के समस्त दस गुरु अपनी आन पर मर मिटने, पराधीनता न स्वीकार करने और अत्याचारी मुगलों से टक्कर लेने के कारण आज भी जन-जन के बीच श्रद्धेय हैं। लाला हरदयाल की प्रेरणा से ‘गदर पार्टी’ का निर्माण कर अंग्रेजी साम्राज्य चूलें हिला देने वाले सोहन सिंह भकना, करतार सिंह, बलवन्त सिंह, बाबा केसर सिंह, बाबा सोहन सिंह, बाबा बसाखा सिंह, भाई संतोख सिंह, दिलीप सिंह, मेवा सिंह जैसे अनेक रणबाँकुरे सिखों की जाँबाजी की शौर्य-गाथाएँ पंजाब के ही हिस्से में आती हैं।

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‘जलियाँवाला बाग’ में सैकड़ों सिखों की शहादत, लाला लाजपतराय का ‘साइमन-कमीशन-विरोध’ इतिहास के पन्नों में यदि दर्ज है तो दूसरी ओर स्वतन्त्रता की नई भोर लाने के लिए पंजाब के लायलपुर के एक गाँव बंगा के एक सिख खानदान का योगदान अविस्मरणीय है। इसी खानदान के वीर अर्जुन सिंह ने अंग्रेजी शासन की बेडि़याँ तोड़ने और पराधीन भारतमाता को आजाद कराने के लिए म्यान से बाहर तलवारें खींच लीं। सरदार अर्जुन सिंह के तीन बेटे किशन सिंह, अजीत सिंह, स्वर्ण सिंह भी देशप्रेम के दीवाने होकर अंग्रेजी हुकूमत को टक्कर देते रहे।

इसी बहादुर परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया। बच्चे की माँ चूकि पूजा-पाठ करने वाली ‘भगतिन’ थी, अतः बालक का नाम रखा गया- सरदार भगत सिंह।

भगत सिंह के पिता एक दिन खेत में गेंहूँ बो रहे थे। उस समय बच्चे भगत ने खेत में कारतूस बोकर यह सिद्ध कर दिया कि वह भी बाबा और पिता के आदर्शों पर चलकर अंग्रेजों की गुलामी की बेडि़यों से भारत को आजाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगाएगा।

उच्च शिक्षा ग्रहण करते समय भगत सिंह क्रान्तिकारी गतिविधियों में संलग्न ही नहीं रहे बल्कि देश-भर के क्रान्तिकारियों को संगठित कर एक दल ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना’ का गठन भी किया।

जब ‘साइमन कमीशन’ का विरोध कर रहे लाला लाजपतराय पर साण्डर्स ने बेरहमी के साथ लाठीचार्ज किया तो लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए साण्डर्स का वध कर भगत सिंह ने यह दिखला दिया कि अभी भारत-भूमि वीरों से खाली नहीं हुई है।

भगत सिंह सच्चे अर्थों में मजदूरों, गरीबों, किसानों, बुनकरों आदि के हितैषी थे। वे एक ऐसे भारत के निर्माण का सपना देखते थे जिसमें न किसी प्रकार का शोषण हो और न कोई आर्थिक असमानता। तिलक, सुभाष, लाला लाजपत राय की तरह ही वे गाँधीजी को वास्तविक आजादी का छद्म योद्धा मानते थे और उनकी अहिंसा को कोरा पाखण्ड बतलाते थे।

अपनी क्रान्तिकारी विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने और बहरी अंग्रेज हुकूमत के कान खोलने के लिए 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त्त और सुखदेव के साथ एसेम्बली में बम से धमाका कर साइमन साहब, वायसराय, सर जार्ज शुस्टर को ही नहीं इंग्लेंड को भी हिलाकर रख दिया। बिना कोई नुकसान किये किसी साम्राज्य को कैसे हिलाया जा सकता, यह नजारा हॉल में बैठे क्रांग्रेस के दिग्गज नेता पण्डित मोतीलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और पण्डित मदन मोहन मालवीय ने भी देखा।

बम से धमाका करने, ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के नारे लगाने और बहरी सरकार के खिलाफ पर्चे फेंकने के बाद भगत सिंह चाहते तो वहाँ से आसानी से बच निकल सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा न कर, गिरफ्तार होना ही उचित समझा।

23 मार्च, 1931 का वह सबसे दुर्र्भाग्यपूर्ण दिन। जेल की कोठरी में एडवोकेट प्राणनाथ मेहता से प्राप्त ‘लेनिन का जीवन-चरित्र’ नामक पुस्तक को भगत सिंह पूरी तन्मयता से पढ़ रहे थे, जबकि उन्हें अच्छी तरह ज्ञात था कि आज का दिन उनके जीवन का अन्तिम दिन है। मृत्यु के भय से परे भगत सिंह ने कुछ ही समय पूर्व अपने प्रिय रसगुल्ले मँगाकर उनका स्वाद चखा। ऐसा लग रहा था जैसे वे मौत के आतंक से इतनी दूर हों, जितना पृत्वी से आकाश। उस वक्त यदि कोई उनके पास था तो वह था महान क्रन्तिकारी लेनिन का व्यक्तित्व।

भगत सिंह पुस्तक के कुछ ही पन्ने पढ़ पाये थे कि उनकी कालकोठरी में चमचमाती यूनीफार्म पहने जेलर दाखिल हुआ। उसने कहा-‘‘अब आपको फाँसी पर चढ़ाने का हुकुम है, आप तैयार हो जाएं।’’

भगत सिंह के दाहिने हाथ में पुस्तक थी, उन्होंने पुस्तक से अपनी आँखें न उठाते हुए अपने दूसरे हाथ से जेलर की ओर इशारा करते हुए कहा-‘‘ठहरो, एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल रहा है, क्या आप लोग इतना भी समय नहीं देंगे कि हम भारतीय विदेशों में बह रही क्रान्ति की हवा में भी साँस न ले सकें।’’

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दूसरों की जूठन खाने वाले कौआ, गिद्ध या श्वान सौ नहीं पांच सौं वर्ष जीवित रहें लेकिन वह शौर्य, प्रशंसा और श्रेष्ठ वस्तुओं के अधिकारी नहीं हो सकते और न इनका इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जा सकता है। किन्तु सिंह की तरह केवल दो चार वर्ष ही जीवित रहने वाले व्यक्ति की शौर्य-गाथाएं युग-युग तक यशोगान के रूप में जीवित रहती हैं। इतिहास में वही आत्म बलिदानी दर्ज हो पाते हैं, जिनमें आत्म-बल, अपार धैर्य शक्ति और स्वयं को आहूत कर देने का अदम्य साहस होता है।

‘1857 के विद्रोह’ की नायिका रानी लक्ष्मीबाई यद्यपि 24 वर्ष ही जीवित रहीं और उन्होंने केवल 9 माह की झांसी पर शासन किया। किन्तु रानी के शासन के ये 9 माह इस बात के गवाह हैं कि साम्प्रदायिक सदभाव, प्रजा सेवा, कुशल रणनीति, अपूर्व साहस की एक ऐसी मिसाल थीं जो इतिहास में दुर्लभ है।

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अंग्रेजों से विद्रोह करने वाले अनेक राजघरानों के राजा महाराजा, नवाब और जमींदार 1857 की क्रान्ति में वह स्थान न पा सके जिस स्थान पर आज इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई खड़ी हैं। वे इसलिए सबसे महान और बड़ी हें क्योंकि अपने अद्भुत रणकौशल के बल पर उन्होंने हर पराजय के समय भी अंग्रेजों और उनकी सेना को गाजर-मूली की तरह काटते हुए, एक नहीं अनेक अवसरों पर विजय में तब्दील कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और उनके अदम्य साहस की उनके घोर दुश्मन और उनके खिलाफ युद्ध लड़ने वाले अंग्रेजी सेना के अफसर हयूरोज भी कह उठते हैं-‘‘शत्रु-दल में अगर कोई सच्चा मर्द था तो वह झांसी की रानी ही थी।’’

अपने शत्रु से भी अपनी तारीफ करा लेने वाली रानी लक्ष्मीबाई शुरू में भले ही अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति कोमल भावना रखती हों लेकिन जब उनकी अंग्रेजों से ठन गयी तो उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य को पूरे भारतवर्ष से जड़ से उखाड़ फैंकने का जो संकल्प लिया उससे वे कभी पीछे नहीं हटीं।

रानी लक्ष्मीबाई बाल्यावस्था से ही अपार पराक्रमी, तेजस्वी, और अपनी बात पर अडिग रहने वाली स्त्री थी। उनका बाल्यकाल का नाम मनुबाई था। मनुबाई को बचपन से ही घुड़सवारी और विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने का शौक था। लगभग 8 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह झांसी के महाराज गंगाधर राव से हो गया। विवाह के 8 वर्ष बाद सन् 1851 में उसने एक पुत्र को जन्म दिया किन्तु राजा और रानी का दुर्भाग्य कि वह भी चल बसा। पुत्र वियोग के कारण महाराज गंगाधर को संताप और शोक ने घेर लिया। उनकी तबियत निरंतर बिगड़ती गयी और वे एक दत्तक पुत्र को गोद लेने की घोषणा के कुछ दिनों बाद ही 21 नवम्बर 1853 को परलोक सिधार गये |

गंगाधर राव के मरते ही अंग्रेज मेजर एलिस ने झांसी के खजाने पर ताला लगा दिया और 27 फरवरी 1854 को झांसी के राज्य को ब्रिटिश शासन में मिला देने की घोषणा कर दी गयी और दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी के उत्तराधिकारी के रूप में अमान्य घोषित कर दिया गया। यहीं नहीं कानपुर और झांसी में 4 जून को जो सैन्य विद्रोह हुआ, जिसमें विद्रोहियों के नेता काले खां और तहसीलदार अहमद हुसैन ने अपने प्रधान अफसर कप्तान डनलप और टेलर के साथ-साथ 74 अंग्रेज पुरुष, 16 स्त्रियों और 23 बच्चों को झांसी में मौत के घाट उतार दिया और झांसी के किले पर कब्जा कर लिया और बाद में ‘‘खल्क खुदा, मुल्क बादशाह का, अमल महारानी लक्ष्मीबाई का’’ नारा लगाते हुए दिल्ली की ओर कूच कर गये तो इस अंग्रेजी की सेना के सैन्य विद्रोह और अंग्रेजों के कत्लेआम के लिये अंग्रेजों ने हर प्रकार के दोष लक्ष्मी बाई के सर मढ़ दिये। इससे पूर्व भले ही रानी को मजबूरी में ही सही पर इन्ही किले में निवासी अंग्रेजों की हर सम्भव सहायता करती थी यहां तक कि तीन-तीन मन आटे की रोटियां पकवाकर उन्हें भिजवाती थी | किन्तु इन अंग्रेजों का कत्लेआम होने के बाद जब वहां कोई अंग्रेज न रहा तो रानी ने सम्पूर्ण झांसी का प्रबन्धन अपने हाथ में ले लिया।

रानी लक्ष्मीबाई को जून 1857 से मार्च 1858 तक नौ महीने ही शासन करने का अवसर मिला लेकिन इस दौरान शासक के रूप में उसने अपने घर के शत्रुओं जैसे सदाशिव राव नाम व्यक्ति जो अपने को गंगाधर राव का निकट सम्बन्धी बतला झांसी की गद्दी हड़पना चाहता था, युद्ध में परास्त कर गिरफ्तार किया। ओरछा के दीवान नत्थे खाँ ने अंग्रेजों के इशारे पर जब झांसी पर चढ़ाई की तो उसे भी पराजित कर ओरछा जाने को विवश कर दिया।

रानी के इस पराक्रम को देख उस घर के या अन्य-राज्यों के राजाओं की रानी से टक्कर लेने की तो फिर हिम्मत नहीं हुई किन्तु 19 मार्च 1858 को झांसी के नजदीक चंयनपुर नामक स्थान पर पड़ाव डालने के उपरांत 20 मार्च की सुबह जब सर ह्यरोज अपनी सेना को लेकर झांसी पहुंचा और जिस समय रानी से उसका युद्ध हुआ तो रानी ने अपने गुरु तात्याटोपे, सेनापति रघुनाथ हरी नेवालकर, गोशखान, अपने भाई कर्मा आदि के साथ 13 दिन तक युद्ध लड़ा | उस युद्ध का वर्णन एक अग्रेज अफसर डॉ. लो ने इस प्रकार किया है-

‘‘शत्रु की अत्यधिक अग्निवर्षा, बन्दूकों और तोपों की गड़गड़ाहट, अग्निवणों की सरसराहट, बड़े-बड़े पत्थरों को लुड़काने से होती भयावह धमाके और भारी-भारी पेड़ों के नीचे लुढ़कने की ध्वनि से जो प्रलय उत्पन्न हुई उससे अंग्रेजी सैनिकों के पांव उखड़ने लगे।’’

अग्रेजों के साथ 13 दिन निरंतर हुए युद्ध में आखिर अंगे्रज जब किले पर कब्जा करने में कामयाब हो गये तो रानी मर्दानी पोशाक पहनकर और अपने दत्तक पुत्रा दामोदर को पीठ पर पटके से बांधकर अपने दो सौ सिपाहियों के साथ कालपी चल दी। झांसी से 21 मील दूर भांडेर के पास उसने अपना पीछा करने वाले अंग्रेज अफसर कप्तान वाॅकर को घोड़ा दौड़कर धराशायी कर दिया और वे 24 घंटे में 102 मील का रास्ता पार कर कालपी पहुंच गयीं।

अंग्रेज अफसर ह्यूरोज ने 15 मई को कालपी में फिर रानी को घेर लिया। वहां अपने सैनिकों और विद्रोहियों को लेकर गुलौली के पास रानी का अंग्रेजों से फिर भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में रानी के साथ लड़ रहे विद्रोही सैनिकों के टूटते मनोबल को देखते हुए जब रानी ने कालपी के किले को सुरक्षित नहीं समझा तो उसने ग्वालियर की ओर प्रस्थान कर दिया और ग्वालियर जाकर अंग्रेजभक्त शासक जीजाजी राव और दिनकर राव को किले से बाहर खदेड़कर ग्वालियर का किला अपने कब्जे में ले लिया।

16 जून को ह्यूरोज अपनी सेना लेकर ग्वालियर के निकट मोरार में आकर फिर रानी को घेरने लगा। रानी ने विद्रोही सैन्यदल को उसका मुकाबला करने भेजा | किन्तु यह सेना केवल दो घंटे में ही पराजित हो गयी। यही नहीं कुछ ग्वालियर के विद्रोही सैनिक फिर अंग्रेजों से जा मिले। यह अप्रत्याशित और अत्यंत विपरीत दशा देखकर रानी 17 जून को ग्वालियर के निकट ‘कोटा की सराय’ नामक स्थान पर स्वयं रणक्षेत्र में कूद पड़ी। इस भीषण संग्राम में जहां रानी ने अनेक अंग्रेज अफसरों और सैनिकों को चारे की तरह काटा, वहीं अंग्रेजों की भीषण गोली-वर्षा के बीच उसके घोड़े को कई गोलियां लगीं। नाले को फांदने की कोशिश में वह पैर फिसल जाने के कारण गिर पड़ा। इसी बीच एक अंग्रेज सवार ने उसके नजदीक जाकर तलवार से रानी के चेहरे का आधा भाग काट डाला। घायल रानी ने पलटकर उस सवार पर ऐसा वार किया कि वह वहीं ढेर हो गया।’

घावों से अत्यधिक खून बहने के कारण रानी को उनका सरदार एक झोंपड़ी में ले गया। वहां उसने गंगाजल पिया और भारतमाता की जय बोलते हुए अपने प्राण त्याग दिये। कौन नहीं करेगा ऐसी वीरांगना पर गर्व | कौन नहीं बोलेगा- रानी लक्ष्मीबाई की जय?

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1857 में अंग्रेजों के खिलाफ सैन्य विद्रोह करने वालों में मंगल पांडेय का नाम ही अब तक सुर्खियों में आता रहा है, जबकि मंगल पांडे के अलावा भी ऐसे कई क्रांतिवीर पैदा हुए, जिनके नेतृत्व में एक नहीं अनेक स्थानों पर सामूहिक सैन्य विद्रोह हुआ।

1857 के विद्रोह के इतिहास पर यदि हम गौर करें तो पता चलता है कि बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में एक तरफ अवध, रुहेलखण्ड, नीमच, पंजाब सहित अन्य प्रांतों में भी अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत का झण्डा बुलंद किया था। लखनऊ रेजीडेंसी पर 87 दिन तक अग्रेजों के खिलाफ जो सैन्य विद्रोह हुआ उसमें लगभग सात सौ विद्रोही मारे गये थे।

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विद्रोह की यह आग कथित तौर पर भले ही गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों के कारण भड़की हो, लेकिन यह विद्रोह सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ था। योजनाबद्ध तरीके अंग्रेजों के खिलाफ उनकी सेना को भड़काने का कार्य अलीगढ़ के एक सैनिक पंडित भीष्म नारायण ने भी किया।

पंडित भीष्म नारायन जो भीके नारायन के नाम से भी मशहूर थे, का जन्म मथुरा जनपद के सादाबाद-सहपऊ मार्ग के मध्य स्थित गांव खोड़ा मढ़ाका के विख्यात लाठा-पचौरी परिवार में हुआ था। यह परिवार उस काल में बहादुरी और योग्यता के लिये दूर-दूर तक विख्यात था। 1857 से पूर्व यह परिवार क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन चुका था। इसी परिवार की सक्रियता के चलते स्वतंत्रता संग्राम के बीजों का अंकुरण 1856 में मथुरा के घने जंगलों में किया गया। यहां भादों माह में देश के अनेक क्रान्तिकारी एकत्रित हुए। इस बैठक में तात्याटोपे, अजीमुल्लाह, रंगोबाबू बादशाह, बहादुर शाह जफर के शहजादे मीर इलाही आदि ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की रणनीति बनायी। इस बैठक का आयोजन हिन्दू संत खुशाली राम कजरौटी वाले ने किया। इतिहास लेखक पं. सच्चिदानंद उपाध्याय ने लिखा है कि खुशाली राम ने 1857 की क्रान्ति से बहुत पहले उ.प्र. के अतिरिक्त बंगाल और बिहार का दौरा करते हुए जब सन् 1856 में अलीगढ़ तथा बुलंदशहर की अंग्रेजी फौज में देशभक्ति का जज़्बा भर कर अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से खदेड़ने की बात कर रहे थे, तभी बुलंदशहर में एक अंग्रेज फौजी अफसर ने उनकी हत्या कर दी।

पंडि़त भीष्म नारायन उर्फ भीके पंडि़त इसी देश भक्त संत खुशाली राम के रिश्तेदार थे और इसी संत के कहने पर अंग्रेजों की सेना में ‘आजादी के विशेष उद्देश्य की पूर्ति’ हेतु भर्ती हुए थे। चूकि भीके नारायन का भी उद्देश्य अंग्रेजी सेना में सेवारत हिन्दुस्तानी सिपाहियों में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की भावना का संचार करना था, अतः उन्होंने इस क्रांतिकारी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए अपना कार्य क्षेत्र बुलंदशहर चुना और वहां महीनों तक अपनी गुप्त गतिविधियां जारी रखीं। जब वे बुलंदशहर में अंग्रेजों की फौज की यूनिट में देशभक्ति की भावना भर रहे थे, उसी समय उनके किसी देशद्रोही अंग्रेजभक्त साथी ने अंग्रेज अफसरों से शिकायत कर गिरफ्तार करा दिया गया। उन्हें अलीगढ़ लाया गया और उन पर कोर्ट मार्शल किया गया। बीस मई 1857 को फांसी पर चढ़ाने का फरमान जारी किया गया।

फांसी के समय और उसके बाद फैली बगावत का वर्णन करते हुए प्रख्यात क्रान्तिकारी सावरकर लिखते हैं कि ‘‘20 मई की संध्या को जब भीके नारायण को वधमंच पर लाया गया तब इस ब्राह्मण ने अग्निमय भाषण दिया और हंसते-हंसते मृत्यु को अपने गले लगा लिया। फांसी के पूर्व शब्द-रक्त की जो अविरल धारा इस ब्राह्मण के मुख से अग्नि का रूप धारण कर प्रकट हुई वह आसपास खड़े अग्रेज सत्ता के भारतीय सैनिकों में बिजली की तरह कौंध गयी। चारों ओर खड़े सैनिक क्रोध से पागल होकर घनगर्जन करने लगे, ‘फिरंगी राज्य की अर्थी निकालो, फिरंगी राज्य मुर्दाबाद।’ सैनिकों में बढ़ती हुई इस विद्रोह की भावना को भांपकर सारे अंग्रेज अधिकारी अपने बीबी-बच्चों को लेकर रात में ही अलीगढ़ सैन्य छावनी से फरार हो गये।

उक्त घटना के उपरांत देशभक्त जेल प्रहरियों ने जेल का फाटक खोलकर बन्दियों को जेल से मुक्त करा दिया। विद्रोही सैनिकों, जिनमें डाक बंगला के खासनामा रसूल खां और कोचवान मीर खां आदि ने विदेशी शासकों के निवास स्थान पर भारी लूट की। भले ही उस समय अलीगढ़ में मेजर एल्ड की 9 वीं रेजीमेंट के तीन सौ सैनिक मौजूद थे किन्तु, ये सब चुपचाप खड़े इस लूट का तमाशा देखते रहे।

पंडित भीके नारायन की फांसी के उपरान्त कई दिन तक अलीगढ़ निवासियों ने अंग्रेजों दासता से मुक्त होकर चैन की सांस ली। आजादी की इस लड़ाई में पंडित भीके नारायन की शहादत को मंगल पांडेय की शहादत से कम करके नहीं आंका जा सकता है।

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देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने वाले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनेक वीरों में से लाला लाजपतराय का नाम भी स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उच्चकोटि के शिक्षित और अपने ओजस्वी भाषणों से भारतीय जनता को मंत्रमुग्ध कर आन्दोलन के लिए प्रेरित करने वाले इस महान नेता के विचार बेहद गर्म थे। इसी कारण इन्हें ‘शेर-ए-पंजाब’ और ‘पंजाब केसरी’ जैसी उपाधियां से विभूषित किया गया।

महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक, बंगाल के विपिनचन्द्र पाल और पंजाब के लाला लाजपत राय कांग्रेस में रहकर भी कांग्रेस के अंग्रेजों के प्रति नरम रवैये से सहमत नहीं थे, अतः ‘लाल-पाल-बाल’ नाम से विख्यात इस तिकड़ी को अंग्रेजों के कोप का शिकार होना ही पड़ा, साथ ही इन्होंने कांगेसियों के विरोध को भी झेला।

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लाल लातपत राय के बारे में इतना तो सभी जानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने भारत में कथित सुधार हेतु साइमन कमीशन के नाम से जो जाँच कमीशन भेजा था, वह 30 अक्टूबर 1928 को जब लाहौर पहुँचा तो इसका विरोध करने के लिए लालाजी भारी जनता के साथ ‘साइमन गो बैक’ के नारे लगाते हुए रेलवे स्टेशन पर पहुँचे गये। साइमन कमीशन के अध्यक्ष सर जाॅन साइमन इस दृश्य को देख अत्यधिक विचलित हो उठे। लालाजी के नेतृत्व में जनता के गगनभेदी नारों को सुन पुलिस अफसर सांडर्स क्रोध से पागल हो उठा और उसने शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे जुलूस पर लाठीचार्ज करा दिया। जनता लाठियों के प्रहारों से घायल हो रही थी, पर पीछे नहीं हट रही थी। तभी एक नहीं अनेक प्रहार लालाजी के ऊपर भी हुए। लहू से उनका शरीर तर-ब-तर हो गया।

लालाजी पर लाठियों के प्रहार इतने तीव्र थे कि 17 नवम्बर 1928 की सुबह 7 बजे यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अद्वितीय योद्धा हमेशा के लिए भारतवासियों से बिछुड़ गया।

लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि जब अछूत समस्या के निवारण के नाम पर मौलाना मौहम्मद अली और आगा खाँ हिन्दुओं में फूट डालकर मुसलमान बनाने को उकसा रहे थे, इस भयानक चाल का जवाब लाला लाजपतराय ने अछूतों की एक कमेटी बनाकर अखिल भारतीय स्तर पर दिया।

तंगी के कारण जब उनके आन्दोलन की गति धीमी पड़ने लगी तो आर्थिक संकट के समाधान के लिए उन्होंने ‘लक्ष्मी बीमा कम्पनी’ की स्थापना की। लालाजी इस बीमा कम्पनी के अध्यक्ष थे। जब बैकों का राष्ट्रीयकरण हुआ उससे पूर्व यह कम्पनी सफलता के शिखर पर थी।

लाला लाजपत राय ने 1923 में माँ गुलाब देवी की स्मृति में एक क्षय रोगी अस्पताल की भी नींव रखी जो जालंधर में है। यह अस्पताल आज भी परोपकार का प्रतीक बन जनसेवा कर रहा है।

लाला जी ने 1911 में पंजाब में शिक्षा संघ की स्थापना की। शिक्षा संघ के बाद कई प्राथमिक विद्यालय भी खोले। सन् 1920 में ‘तिलक राजनीति विद्यालय’ की स्थापना की, जिसमें वह स्वयं भी एक व्याख्याता थे।

लाला लाजपत राय एक कुशल नेता, सच्चे राष्ट्रभक्त और उच्च शिक्षक के साथ-साथ एक उच्च कोटि के पत्रकार भी थे। आपने 1900 के आसपास ‘पंजाबी’ नाम से एक पत्र निकाला। सन् 1920 में उर्दू दैनिक ‘वंदे मातरम’ का प्रकाशन किया। यह पत्र अंग्रेजों की अनीतियों को उजागर करने के कारण अच्छा-खासा लोकप्रिय रहा। लाला जी ने 1925 में संस्था ‘लोक सेवक मंडल’ के अधीन ‘पीपुल’ नाम से एक अंग्रेजी पत्र का प्रकाशन भी किया।

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[ क्रान्ति दिवस ]

 

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कई इतिहास लेखकों ने 1857 की क्रान्ति को जिस तरह तोड़-मरोड़कर और भ्रामक तरीके से लिखा है, उससे अब पर्दा उठने लगा है। ऐसे इतिहासकारों की पुस्तकों में विवरण है कि चर्बी लगे करतूस लेने के विरोध में विद्रोही स्वभाव अख्तियार करते हुए मंगल पांडेय नामक एक भारतीय सैनिक ने 29 मार्च सन् 1857 को मेजर सार्जेण्ट, लैफ्रटीनेण्ट बॉग तथा जनरल हियरिंग पर गोलियां चलायीं। मंगल पांडेय के तीनों वार खाली गये। उत्तेजना और भावातिरेकता की अवस्था में प्रहार करने के कारण गोलियां सही निशानों पर न लग सकीं। किन्तु जिन लोगों में पूर्व से ही क्रान्ति की भावना थी, वे साहस से भर उठे और पूरे भारतवर्ष में क्रान्ति की लहर फैल गयी। इस क्रान्ति में सबसे बढ़-चढ़ कर सामंतों और उनकी फौज ने लिया।

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29 मार्च सन् 1857 की घटना के उपरांत यह भी इतिहासकारों ने लिखा है कि 24 अप्रैल 1857 की मेरठ में तीसरे नम्बर के रिसाले के 90 सवारों में से 85 सवारों ने चर्बी लगे कारतूस लेने से इन्कार कर दिया। इनमें 36 हिंदू और 49 मुसलिम सैनिक थे। इन सभी को सैनिक अदालत ने 10 वर्ष की कैद की सजा दी। जिस समय इनको, इनकी बैरकों से ले जाया जा रहा था, उसी समय इन विद्रोहियों ने अपने साथियों को ललकारा तो वे भी जोश में आकर अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन करने के लिए तैयार हो गये।

रविवार के दिन गिरजाघर में जब अंग्रेज एकत्रित हो रहे थे तो उन्हें देखकर आन्दोलनकारी सैनिकों को लगा कि उनको गिरफ्तार करने की योजना बनायी जा रही है अतः उन्होंने बगावत शुरू करते हुए हथियार और चर्बी लगे कारतूस लूटे और जेल में बन्द अपने साथियों को छुड़ाने के उपरांत दिल्ली को मुक्त कराने के लिये कूच कर गये। इसके उपरांत मेरठ में भी यकायक विद्रोह की ज्वाला फूट पड़ी।

इतिहासकारों के 1857 की क्रान्ति के बारे में दिये गये इन तथ्यों में एक नहीं अनेक तथ्य इसलिये वास्तविकता से परे महसूस होते हैं क्योंकि यदि यह मान भी लिया जाये कि 1857 का विद्रोह चर्बी लगे कारतूसों के कारण हुआ तो सवाल यह उठता है कि मेरठ के 49 मुसलमान सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का झंडा क्यों बुलंद किया। चर्बी से चिढ़ या घृणा हिन्दू को हो सकती है, मुसलमानों को नहीं। यदि इस बात को सही नहीं मानें, तब भी सोचने का विषय यह है कि यदि चर्बी लगे कारतूसों के प्रति सैनिकों में आक्रोश व्याप्त था तो उन्होंने शस्त्रागार से चर्बी लगे कारतूसों को लूटकर उनका प्रयोग सहज मन से अंग्रेजों के खिलाफ क्यों किया?

दरअसल चर्बी लगे कारतूस के प्रयोग के कारण विद्रोह का प्रचार अंग्रेजों की सोची-समझी एक चाल थी। जिसे उन्होंने इसलिए प्रचारित कराया ताकि आमजन क्रान्ति के उस यथार्थ से वाकिफ न हो सके जो अंग्रेजों की कुनीतियों और अत्याचार के कारण जन-जन में इन घटनाओं से बहुत पूर्व ही घृणा के रूप में घनीभूत हो चुका था, जिसका प्रमाण झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, तात्याटोपे, बिठूर के राजा, दतिया के महाराज, अजीमुल्ला, भीके नारायण, बहादुरशाह जफर के शाहजादे मीर इलाही, खुशहालीराम, स्वामी विरजानंद, महर्षि दयानंद, कुंअर सिंह आदि के रूप में मिल जाता है। यही नहीं मंगलपांडेय के संबध एक नहीं अनेक क्रांतिकारियों से 1857 से पूर्व से ही बन चुके थे।

देखा जाये तो स्वतंत्राता संग्राम अथवा क्रान्ति के बीजों का अंकुरण 1856 में ही मथुरा के जंगलों में हो चुका था। यहां भादों माह में देश के अनेक क्रानितकारियों ने गुप्त बैठक की। इस बैठक में अजीमुल्ला खां, रंगोबाबू बादशाह, बहादुर शाह जफर का शाहजादा मीर इलाही और एक हिन्दू संत खुशहालीराम कजरौटी वाले आदि ने अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से भगाने के लिये सामूहिक संकल्प लिया। इस घटना का आंखों देखा हाल मीर इलाही के अभिलेख में है, जो 12 अक्टूबर 1969 को जालंधर के ‘उर्दूमिलाप’ और दिल्ली के ‘आर्य मर्यादा’ में प्रकाशित हुआ है।

दोनों समाचार पत्रों में प्रकाशित विवरण की सत्यता की पुष्टि ग्राम सोरम जिला मुजफ्रफर नगर के चौधरी कबूल सिंह के पास सर्वखाप पंचायत के अभिलेखों से की जा सकती है। इन अभिलेखों से यह भी सूचना मिलती है कि हिंदू संत खुशहाली राम, क्रान्तिकारी पंडित भीके नारायण के निकट सम्बन्धी थे जो संत खुशहाली राम से प्रेरणा लेकर अंग्रेज फौज में भर्ती हो गये और अंग्रेजों के खिलाफ सैनिकों को एकजुट करने लगे। अंग्रेजों को जब इस अभियान का पता लगा तो पं. भीके नारायन को 20 मई 1857 को फांसी पर चढ़ा दिया। ठीक इसी तरह अजीमुल्ला को भी अंग्रेजी सरकार का बागी मानकर फांसी दे दी गयी।

खाप पंचायत के अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि इसी माह के कुम्भ मेले के दौरान हरिद्वार में अनेक क्रान्तिकारी इकट्ठे हुए। वहां चण्डी मंदिर में स्वामी विरजानंद के शिष्य महर्षि दयानंद पुलिस की निगाहों से बचने के लिए रह रहे थे। विरजानंद ने महर्षि दयानंद को देश में क्रान्ति की भावना जागृत करने का कार्य सौंप रखा था। क्रान्ति के उद्देश्य की पूर्ति के लिये महर्षि कानपुर, बिठूर, इलाहाबाद आदि की यात्रा कर वहां के क्रांतिकारियों से मिल चुके थे। कुम्भ के मेले के दौरान महर्षि दयानंद से मिलने वाजीराव पेशवा के दत्तक पुत्र धुन्धपन्त [ नाना साहब ], अजीमुल्ला खां, तात्या टोपे, कुंअर सिंह, उत्तरी बंगाल के जमींदार गोबिन्दनाथ राय तथा रानी लक्ष्मी बाई पधारीं। इन सबने क्रान्ति के प्रयोजनार्थ स्वामीजी को एक हजार एक सौ रुपये भेंट किये थे तथा आमजन से प्राप्त 635 रुपयों से कुल धनराशि 2835 को स्वामी विरजानंद ने विद्रोह के संचालन हेतु नाना साहब को दे दी।

इस प्रकार देखें तो 1857 की क्रान्ति में मंगल पांडेय और उसके साथियों का अंग्रेजों के प्रति विद्रोह करना चर्बी लगे कारतूस के कारण नहीं बल्कि यह क्रान्ति सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसकी पुख्ता नींव 1856 में मथुरा के जंगलों में डाली गयी थी।

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[शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद स्मृति दिवस 27 फरवरी ]

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आगरा का एक मकान जिसमें चन्द्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा, विजय सिन्हा, जयदेव कपूर, डॉ. गया प्रसाद, वैशम्पायन, सदाशिव, भगवान दास माहौर आदि दल के सक्रिय सदस्य आपस में विनोद करते हुए मजाकिया विचार-विमर्श कर रहे थे कि कौन किसतरह पकड़ा जायेगा और पकड़े जाने पर क्या करेगा?

भगत सिंह पर फब्ती कसते हुए राजगुरु ने कहा- बच्चू [ विजय कुमार सिन्हा ] और रणजीत दोनों ही जब सिनेमा हॉल में पिक्चर देख रहे होंगे तो गोरी फौज आयेगी और इन्हें यकायक गिरफ्तार कर लेगी। जब ये पकड़े जायेंगे तो पुलिस से कहेंगे- ‘‘अरे हमें पकड़ लिया, चलो ठीक है। मगर पिक्चर तो पूरी देख लेने दो।’’

भगत सिंह भी भला इस बात पर चुप कैसे बैठते। उन्होंने राजगुरु पर व्यंग्य किया-‘‘ ये हजरत तो जब सो रहे होंगे तभी पुलिस इन्हें पकड़ लेगी। ये तब भी नींद में ही होंगे और रास्ते में हथकडि़यों के साथ चलते-चलते जब पुलिस लॉकअप में जागेंगे तो कहेंगे-‘‘ क्या मैं सचमुच पकड़ा गया हूँ या कोई सपना देख रहा हूँ।’’

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दल के मुखिया चन्द्रशेखर आज़ाद ने इस बार भगवान दास माहौर पर निशाना साधा-‘‘तू भी तो बहुत सोता है। देखना एक दिन तू भी कहीं सो रहा होगा और पुलिस तुझे गिरफ्तार कर लेगी। पर ध्यान रखना तू भले ही पकड़ा जाये, पर मेरी पिस्तौल पुलिस के हाथ नहीं लगनी चाहिए। जाने कैसे-कैसे मैं पिस्तोलों का इन्तजाम करता हूँ।’’

पंडित चन्द्रशेखर आज़ाद की इस बात को सुनने के बाद सभी क्रान्तिकारी साथी उनकी ओर मुखातिब हो गये। भगत सिंह ने हँसी के लहजे में कहा-‘‘पंडित जी जब आपको कोई मुखबिर पकड़वा देगा तो फाँसी पर चढ़ाने के लिए जल्लादों को दो रस्सियों की जरूरत पड़ेगी। एक आपके गले और एक आपकी मोटी तोंद पर बाँधनी पड़ेगी।’’

भगत सिंह की इस बात को सुनकर पंडित चन्द्रशेखर आजाद थोड़ा तैश में आकर बोले-‘‘अरे मूर्खो में तुम्हारी तरह गिरफ्तार होकर हथकडि़यों के साथ चलते हुए सड़क पर अपना बन्दरिया नाच नहीं करवाऊंगा। रस्से-बस्से तो तुम्हारे ही गले में पड़ेंगे। जब तक मेरे पास यह ‘बम तुल बुखारा’ पिस्तौल है, कोई माई का लाल अंग्रेज मुझे जीवित गिरफ्तार नहीं कर सकता। आज़ाद तो अब भी आज़ाद है और आज़ाद ही रहकर मरेगा।’’

आखिर वह समय ही आया जब आज़ाद की ‘बमतुल बुखारा’ ने आज़ाद के आज़ाद ही रहने के संकल्प को पूरा कर दिखाया।

इलाहाबाद का एलबर्ट पार्क। 27 फरवरी का दिन। पार्क में अपने एक साथी के साथ चन्द्रशेखर आज़ाद बातें करने में तल्लीन। तभी आज़ाद की निगाह पार्क के बाहर सड़क पर पड़ती है। वीरभद्र तिवारी मुखबिर को देखकर वे चौंक उठते हैं। आज़ाद चारों ओर निगाह दौड़ाते हैं। देखते हैं कि पार्क को पुलिस ने घेर लिया है। अचानक एक सनसनाती हुई गोली आती है और आज़ाद की जाँघ में सूराख बना देती है। प्रत्युत्तर में घायल आज़ाद गोली दागते हैं और पुलिस अफसर की कार के टायर को पंचर कर देते हैं। दूसरी गोली फिर सनसनाती हुई आती है और आज़ाद के फेंफड़े में धँस जाती है। अजेय पौरुष खून से नहा उठता है। अपने साथी को सतर्क करते हुए आज़ाद इमली के पेड़ की ओर में हो जाते हैं। सामने उन्हें पिस्टल थामे अंग्रेजी हुकूमत का पिट्ठू नॉट बाबर दिखायी देता है। आज़ाद निशाना साधते हैं। एक ही गोली का करिश्मा, नोट बाबर की पिस्टल वाली कलाई टूटकर शरीर से अलग हो जाती है।

चारों ओर से हो रही गोलियों की बौछार के बीच आज़ाद चीखते है-‘‘ अरे हिन्दुस्तानी सिपाहियो! मैं तो तुम्हारे लिये ही आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा हूँ और मूर्खो तुम मुझी पर गोलियाँ चलाये जा रहे हो। चलाओ, चाहे जितनी गोलियाँ चलाओ, लेकिन मैं तुम्हें अपना भाई होने के नाते नहीं मारूँगा।’’

तभी उन्हें दाहिनी ओर से गोली चलाता विश्वेश्वर सिंह दिखाई देता है। ‘अच्छा तू भी ले’ कहकर आज़ाद निशाना साधते हैं। विश्वेश्वर सिंह का आज़ाद को लगातार गाली बक रहा जबड़ा और टोप गिल्ली की तरह उड़ जाते हैं। इस हैरत में डालने वाले कारनामे को देखकर सी. आई. डी. का आई. जी. इसे ‘वन्डरफुल शॉट’ कह उठता है।

पिस्तौल में अब एक ही गोली शेष है। भंयकर रूप से घायल आज़ाद को भी इस बात का एहसास है। वे ‘बमतुल बुखारा’ को अपनी कनपटी पर रखते हैं और बमतुल बुखारा की अन्तिम गोली आज़ाद को इस दुनिया से हमेशा के लिये आज़ाद कर देती है।

क्रान्ति के अमर सिपाही ने अपना वचन निभाया। अंग्रेज उसे जि़न्दा रहते हुए न पकड़ सके। ब्रिटिश सरकार के गीदड़ और चमचे अब कर ही क्या सकते थे। वे आज़ाद के शव को ट्रक में लाद कर अपने आका अंग्रेज अफसरों की ओर चल दिये। आज़ाद अन्त तक आज़ाद रहे।

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[ स्मृति दिवस 26 फरवरी पर ]

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वीर विनायक सावरकर के मन में बचपन से ही क्रान्ति की हिलौरें उठने लगी थीं। वे अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फैंकने के लिये सशस्त्र क्रान्ति के ऐसे पुरोधा बने, जिन्होंने भारत ही नहीं, विदेश में रहकर भी क्रूर अंग्रेज शासकों को सबक सिखाने के लिये उनकी हत्या कराने और उन्हें आतंकित करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी।

वीर सावरकर अहिंसा, सत्याग्रह जैसे उपायों के द्वारा अंग्रेजों को भारत से भगाने के घोर विरोधी थे। उन्होंने बड़े ही गुप्त तरीके से ब्रिटेन में रहकर भारतीय क्रान्तिकारियों को भारत में पिस्तौले उपलब्ध करवायीं। इन पिस्तौलों से भारत में तैनात क्रूर अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतारा गया। यहीं नहीं ब्रिटेन में उनके शिष्य मदनलाल धींगरा ने एक अंग्रेज अफसर की हत्या की। उन्होंने 1857 के क्रान्तिकारियों पर एक ऐसी पुस्तक लिखी जिसे पढ़कर भारत ही नही, अनेक स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ वीरों के मन में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी।

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वीर सावरकर के क्रान्तिकारी मिशन का जब भेद खुला तो अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें अंडमान जेल पानी के जहाज से लाया जा रहा था तो वे जहाज से समुद्र में कूद पड़े। कई दिन समुद्र में तैरते हुए वे फ्रांस की सीमा में पहुँच गये। फ़्रांस की कमजोर सरकार ने उन्हें अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया।

वीर सावरकर अण्डमान जेल में भयावह यातनाओं के शिकार हुए। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे वहाँ भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों में जीजान से जुटे रहे। उन्होंने जेल की दीवारों पर पत्थरों से क्रान्तिकारी कविताएँ लिखीं। अपने अनेक साथियों को जेल के अत्याचारी अफसरों-कर्मचारियों के विरूद्ध लामबन्द किया।

अण्डमान जेल में जब जेल की यातनाओं से तंग आकर उनके साथी आशुतोष लाहिड़ी, भाई परमानंद आदि आमरण अनशन कर प्राण त्यागने पर आमादा थे, तो वीर सावरकर ने उन्हें समझाया, कि ‘इस उपाय से अच्छा है कि ऐसा कोई कार्य करो जिससे अंग्रेज अफसरों को सबक मिले।

अण्डमान जेल में अंग्रेज हिन्दू-मुसलमानों में भेद डालने के लिये ऐसे मुस्लिम वार्डरों की नियुक्ति करते थे जो हिन्दू कैदियों पर तरह-तरह के अमानवीय अतयाचार तो करते ही थे, साथ ही उन्हें हिंन्दू-जाति के प्रति अपशब्द बोलकर मानसिक आघात भी देते थे।

वीर सावरकर ने इस घिनौने कृत्य का जवाब देने के लिये हिन्दू कैदियों को संगठित किया और उनमें हिन्दू जाति और भारतीय गौरव और स्वाभिमान का बीज अंकुरित कर दिया। यह करने के बाद के बाद उन्होंने एक दिन जेलर बारी को चेतावनी दी-‘‘हम वतन पर-मिटने वालों पर चाहे जितने अत्याचार कर लो किन्तु धर्म की आड़ में हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने की चालें बंद कर दो।’’

वीर सावरकर की इस चेतावनी से कैदी क्रान्तिकारियों में अद्भुत साहस का संचार हआ। जेलर बारी की दहाड़ पर थर-थर काँपने वाले कैदियों में से एक कैदी परमानंद ने गाली बक रहे जेलर के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया। इसके बाद अनेक कैदी जेलर के आतंक के खिलाफ अनशन पर बैठ गये। इस घटना पर ‘स्वराज’ के सम्पादक होतीलाल और ‘अभिनव भारत’ संस्था ने अंग्रेजों की क्रूरता भरी चालों और अत्याचारों का काला चिट्ठा छापकर भारत ही नहीं फ्रांस-अमरीका आदि देशों में वितरित करवाया। अंग्रेजी हुकूमत की हर ओर भर्त्सना हुई और कैदियों पर होने वाले अत्याचारों को बन्द कराने का दवाब बढ़ने लगा। परिणाम यह हुआ कि जन विरोध के सम्मुख ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा। जेल पर्यवेक्षकों को नये नियम बनाने पड़े। कठोर परिश्रम जैसे कैदी को कोल्हू में बैल की तरह जोत कर तेल निकलवाना और कैदियों को गालियाँ बकना आदि पर आखिरकार प्रतिबन्ध लग गया।

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[ सुभाष जयंती 23 जनवरी ]

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नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे चमकते सितारे थे, जिसमें सच्ची देशभक्ति का ओज था। इस सितारे की आभा के सम्मुख न नेहरू टिक पाते थे और न अंहिसा के मंत्रों का जाप करने वाले महात्मा गांधी। अपने समय के सर्वोच्च क्रान्तिकारी सुभाष आई.सी.एस. उत्तीर्ण ऐसे विचारवान, विद्वान और महान नेता थे, जो अंग्रेजों के सम्मुख भारतीय स्वतंत्रता की भीख मांगने वाले कांग्रेसी नेताओं के समान याचक की भूमिका में कभी नहीं रहे। वे 26 वर्ष की युवा अवस्था में अपनी प्रतिभा के कारण कलकत्ता के मेयर बने। मेयर पद पर रहकर भी उन्होंने अंग्रेजों की शोषणवादी अनीतियों का जमकर विरोध किया। उनका विरोध इतना आक्रामक होता था कि अंग्रेजों के सम्मुख वे हर बार एक नया खतरा बनकर उपस्थित होते थे। अंग्रेजों के प्रति आक्रामक रवैये के कारण ही उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा।

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नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जब कांग्रेस के कार्यकर्ता बने तो अपनी कुशल रणनीति और अदभुत् कार्यशैली के कारण ख्याति के उच्च शिखर पर पहुंच गये। उनकी विचारधारा और ख्याति से प्रभावित होकर सन् 1938 में जब उन्हें कांग्रेस के हरिपुर अधिवेश का अध्यक्ष बनाया गया तो उन्होंने गांधी जी की अंहिसावादी विचारधारा की खिल्ली उड़ाते हुए कहा-‘गांधी जी का राजनीतिक ही नहीं सामाजिक दर्शन भी खोखला है। गांधी जी जिसे अंहिसा कहते हैं, उसका दूसरा नाम कायरता है। एक गोरा बंदर हमें घुड़काता है और हम थर-थर कांपना शुरू कर देते हैं। भाइयो, आप ही सोचो, क्या इस तरीके से भारत को आजाद करा लोगे? अगर भारत को आजाद कराना है तो वीर बनो। माता की आजादी के लिये अपनी कुर्बानी देने को तैयार रहो ।’

गांधी जी के ब्रह्रमचर्य प्रयोंगों, प्रेम की आचार संहिता और अंग्रेजों की हर बात पर नतमस्तक हो उठने की नीति के सुभाष कितने विरोधी थे, यह 28 अक्टूबर 1940 को प्रेसीडेंसी जेल से अपने भाई शरदचन्द्र बोस को लिखे पत्र से उजागर हो जाता है। नेताजी पत्र में लिखते हैं-‘जो आदर्शवाद व्यावहारिक स्तर पर केवल शून्य को प्रकट करता हो, ऐसे आदर्शवाद के बूते गांधी जी स्वतंत्र भारत का दम्भ भरते हैं। यह व्यावहारिकता नहीं, केवल विद्रूपता है। इसका पतिणाम सुखद नहीं निकल सकता है। यह धोखाधड़ी का एक ऐसा खेल है जिससे ब्रिटिश सरकार का तो भला हो सकता है, किन्तु भारतीय जनता का नहीं। मैं गांधी जी की राजनीति के बारे में जब भी सोचता हूं तो लगता है कि उल्टी सोच वाले लोगों के हाथों में यदि स्वराज आ गया तो देश दुर्गति के दलदल में फंस जायेगा।’

नेताजी सुभाष के इन क्रान्तिकारी विचारों का प्रभाव उस समय कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में इतना पड़ा कि सन् 1939 में आयोजित त्रिपुरा अधिवेशन में अध्यक्ष पद के चुनाव के समय सुभाष के सम्मुख गांधी जी के उतारे गये प्रत्याशी सीता रमैया को करारी हार का सामना करना पड़ा। सुभाष की यह जीत उनकी क्रान्तिकारी विचारधारा की जीत थी, दूसरी ओर गांधी जी के अंहिसावादी दर्शन की अभूतपूर्व पराजय।

इस पराजय का बदला गांधीजी और उनके समर्थकों ने सुभाष को अध्यक्ष पद से हटाकर लिया। सुभाष शांत नहीं बैठे। उनका कांग्रेस से मोह भंग हो गया। वे 20 जून 1943 को टोकियो पहुंचे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वृद्ध योद्धा रास बिहारी बोस से ‘आजाद हिंद फौज’ की बागडोर अपने हाथो में ले ली। उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ के बलवूते लड़ते हुए अंडमान-निकोवार द्वीप समूह पर अपना भारतीय झण्डा लहराया। वहां अपनी एक बैंक स्थापित की और एक रेडियो स्टेशन बनाया। वहीं से उन्होंने भारतीयों को संदेश दिया-‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’

इसके बाद ‘आजाद हिंद फौज’ ने कोहिमा जीता, इंफाल को भी जीतने का प्रयास किया। सुभाष की सेना के भारत में प्रवेश करने पर कांग्रेस के नेताओं की प्रतिक्रिया थी-‘‘सुभाष भारत की ओर आगे बढ़ा तो नंगी तलवारों से उसका और उसकी फौज का सामना किया जायेगा।’’

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क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि एक व्यक्ति जो रईसों के बिगडै़ल बेटे की तरह अहंकारी, उन्मादी, भोगविलास की समस्त रंगीनियों का आनंद लेने वाला रहा हो, उसके सम्पर्क में एक महर्षि आये और उसके चरित्र, व्यवहार और दैनिक क्रियाकलाप में आमूल परिवर्तन आ जाये। वह असुर के विपरीत सुर अर्थात् देवरूप व्यवहार करने लगे, है न ताज्जुब की बात! लेकिन इसमें ताज्जुब कैसा? बाल्मीकि का जीवन-चरित्र भी तो इसी प्रकार का रहा था।

स्वामी श्रद्धानंद भी एक ऐसे ही देशभक्त और तेजस्वी सन्यासी थे जिनका प्रारंभिक जीवन भोगविलास के प्रसाधनों के बीच बीता। स्वामी श्रद्धानंद बनने से पूर्व इनका नाम मुंशीराम थ। पिता पुलिस विभाग में ऊंचे ओहदे पर थे, सो उनके पुत्र मुंशीराम को पैसे की कोई कमी न थी। परिणाम यह हुआ कि वे अपने पिता के ऐसे बिगडै़ल पुत्र बन गये जो दिन-रात मांस-मदिरा का सेवन करता। सुन्दरता का भ्रम पैदा करने वाली भौतिक पदार्थों की चकाचौंध ने इतना घेर लिया कि सिवाय रंगीनियों के आनंद के उन्हें कुछ न सूझता।

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वैभवता से परिपूर्ण जीवन के इसी मोड़ पर जब उनकी भेंट आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद से हुई तो उन्होंने लम्बे समय तक स्वामीजी से वाद-विवाद किया। दयानंदजी के अकाट्य तर्कों के सम्मुख वे अन्ततः नतमस्तक हो गये। नास्तिकता की जगह आस्तिकता ने ले ली। अवगुणों के स्थान पर सद्गुण आलोकित हो उठे। इस प्रकार बिगड़ैल मुंशीराम अपना पूर्व नाम त्यागकर स्वामी श्रद्धानंद के वेश में ही नहीं आये, उन्होंने आर्य समाज को इतना पुष्पित-पल्लवित किया कि स्वामी दयानंद के बाद उनका नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।

‘गुरुकुल शिक्षा पद्यति’ का जो सपना स्वामी दयानंद संजोये थे, उसे साकार करने के लिए स्वामी श्रद्धानंद ने प्रतिज्ञा ली कि ‘जब तक गुरुकुल की स्थापनार्थ तीस हजार रुपये की व्यवस्था नहीं कर लूंगा, तब तक घर में पैर नहीं रखूंगा |’

स्वामी श्रद्धानंद का यह संकल्प कोई असाधारण कार्य नहीं था। इसके लिए उन्होंने घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया। अन्ततः कांगड़ी के जंगलों में नये तीर्थ ‘गुरुकुल’ की स्थापना हुई।

स्वामीजी 18 वर्ष गुरुकुल के आचार्य पद पर रहे। उन्होंने मातृभाषा हिन्दी को शिक्षा का माध्यम बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दी में भी विज्ञान की उच्च तकनीकी शिक्षा दी जा सकती है। आचार्य पद पर कार्य करते हुए उन्होंने अनेक स्नातकों को विज्ञान, दर्शन, इतिहास के विषय में मौलिक ग्रन्थों का सृजन कराया। नयी पारिभाषिक शब्दावली तैयार की।

अपने लोकमंगलकारी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने ‘श्रद्धा’, ‘विजय’ और ‘दैनिक अर्जुन’ नामक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया, जिनमें राष्ट्रीयता की भावना और चरित्र-निर्माण पर विशेष बल दिया जाता। साथ ही जात-पांत के बन्धन तोड़ने के लिए एक विशेष वैचारिक मुहिम चलायी। दलितोद्धार और छूआछूत निवारण हेतु भी ये समाचार पत्र वैचारिक हथियार बने।

गांधी ने जब असहयोग आन्दोलन चलाया तो स्वामीजी ने उस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। जब उन्हें अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन का स्वागताध्यक्ष बनाया गया तो उन्होंने इस मंच से हिन्दी में बोलते हुए अछूतोद्धार पर विशेष बल दिया।

अंग्रेजों का शासन स्वामीजी की आंखों में कांटे की तरह खटकता था। वे अंग्रेजी भाषा और गोरों की सत्ता को भारत में किसी भी प्रकार नहीं देखना चाहते थे। परतंत्र भारत-माता को देखकर उनका मन गहरे दुःख और विद्रोह की भावना से भरा हुआ था, अतः जब अमृतसर में अंग्रेजी हुकूमत ने विद्रोह को कुचलने के लिये लाठियां चलवायीं, गोलियां बरसायीं तो इतनी बड़ी घटना पर स्वामीजी भला चुप कैसे रहते। वे हजारों विप्लवियों को लेकर लाल किले के सामने प्रदर्शन की तैयारी करने लगे।

सैकड़ों घुड़सवारों के साथ जब कमिश्नर ने भीड़ को तितर-बितर करने का आदेश दिया तो स्वामीजी ने बिना कोई खौफ खाये जुलूस को आगे बढ़ते रहने का आदेश दिया। गोरखा सैनिकों की संगीनों के साये में जुलूस निरंतर आगे बढ़ता ही रहा। तभी एक गोरे फौजी ने उनके सामने बन्दूक तानकर जुलूस खत्म करने की बात कही। स्वामीजी ने अपनी छाती उस अंग्रेज फौजी के सामने कर दी और कहा-‘‘ भले ही मुझे गोलियों से भून दो लेकिन ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों के खिलाफ यह प्रदर्शन रुकेगा नहीं।’’

स्वामीजी की इस सिंह गर्जना के समक्ष संगीनों के कुन्दे नीचे झुक गये। किन्तु दुर्भाग्य देखिए कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे को लेकर हिन्दुस्तान में उन्माद फैला तो एक मुस्लिम धार्मिक उन्मादी ने इस सिंह को गोली मार दी। भले ही आज स्वामी श्रद्धानंद हमारे बीच न हों किन्तु उनकी ‘गुरुकुल’ की स्थापना, देशभक्ति, हिन्दी-प्रेम, अछूतोद्धार के कार्य, जात-पांत मिटाने के संकल्प हमें नव प्रेरणा देते रहेंगे।

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[वीर सावरकर स्मृति दिवस 26 फरवरी पर ]

 

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भारत माता के वीर समूतों ने अंग्रेजों की दासता की बेडि़याँ काटने के लिए हिन्दुस्तान से बाहर रहकर भी गोरी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति का शंखदान किया। गदर पार्टी के क्रान्तिकारी और एक सशक्त सैन्य संगठन ‘आजाद हिन्द फौज’ को लेकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने एक तरफ अंग्रेजों को कुचलने के लिए विदेश की युद्ध-भूमि को चुना तो दूसरी ओर विनायक दामोदर सावरकर के गुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन स्थित ‘भारतीय भवन’ से अंग्रेजों की अनीतियों, अत्याचार और शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द की। लंदन का ‘भारतीय भवन’ उन दिनों कैसी क्रान्तिकारी गतिविधिायों का केन्द्र था, इसका पता उसमें बैठकर ‘बम बनाने के तरीकों’ पर दिये जाने वाले भाषणों से आसानी के साथ लगाया जा सकता है। भारतीय भवन से ही सावरकर ने पंजाब के सपूत मदनलाल धींगरा की उनके हाथ में छुरी गाड़कर कठिन परीक्षा लेने के बाद धींगरा से सर कर्जन वाइली की हत्या करायी। कर्जन सावरकर की आँखों में इसलिये खटक रहा था, क्योंकि वह भारतीय भवन की गुप्त गतिविधियों की जासूसी करता था।

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सावरकर इस तथ्य को भलीभाँति जानते थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी रखने के लिये बम और पिस्तौलों के साथ-साथ क्रान्तिकारी साहित्य का रचा जाना भी आवश्यक है। साहित्य से ही क्रान्ति की ज्चाला धधकती है। इन्ही सब बातों पर विचार करते हुए उन्होंने ‘1857 के स्वतंत्रता युद्ध का इतिहास’ रचा। तथ्यों के संकलन की दृष्टि से यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण थी, जिसमें 1857 का गदर केवल एक सैनिक गदर मात्र नहीं था बल्कि भारतीय मानस में उफान लेती आजादी की भावना पूरी तरह प्रतिबिम्बित होती थी।

‘1857 के स्वतंत्रता युद्ध का इतिहास’ नामक पुस्तक सावरकर ने 24 साल की उम्र में लन्दन प्रवास के दौरान मराठी में लिखी, जिसके कुछ अध्यायों का अनुवाद करके वे अंग्रजी में ‘फ्री इण्डिया सोसायटी’ के सदस्यों को सुनाते थे। पुस्तक की पांडुलिपि को प्रकाशित कराने हेतु जब गुप्त तरीके से भारत भेजा गया तो भारत के मराठी प्रैस मालिकों ने इसे छापने से इन्कार कर दिया। प्रयास फिर भी जारी रहा। अन्त में ‘अभिनव भारत’ नामक क्रान्तिकारी दल के छापाखाने में यह पुस्तक दे दी गयी। पुस्तक छपने की भनक पुलिस को लग गयी। पुलिस उस छापेखाने की ओर दौड़ पड़ी। अतः पुस्तक को छपने से पूर्व ही वहाँ से उसकी पांण्डुलिपि हटा ली गयी।

पुस्तक की पांण्डलिपि को छापने के लिये पेरिस, जर्मन आदि में भी अथक प्रयास हुए किन्तु छपने से पूर्व ही पुलिस को भनक लग जाती और प्रकाशन कार्य रुक जाता।

अन्त में सफलता हाथ लग ही गयी। हालेंड के एक छापेखाने में पुस्तक छपने लगी। फ्रेंच और ब्रिटिश पुलिस को झांसा देने के लिए क्रान्तिकारियों ने यह अफवाह फैला दी कि पुस्तक फ़्रांस में छप रही है।

जब यह किताब हालैण्ड में छप गयी तो इसकी प्रतियों को गुपचुप तरीके से फ्रांस लाया गया। अभी इस बात पर विचार-विमर्श ही चल रहा था कि इस पुस्तक को भारत और अन्य देशों में कैसे भेजा जाये, उसी समय इसकी जब्ती की घोषणा कई देशों ने कर दी। इस जब्ती की आज्ञा के विरूद्ध सावरकर ने ‘लन्दन टाइम्स’ में आक्रोश व्यक्त किया। अंग्रेजों की पिट्ठू कई सरकारों की ओर से भले ही पुस्तक की जब्ती के आदेश थे लेकिन पुस्तक पर गलत रैपर लगाकर इसे भारत ही नहीं अन्य देशों में भी भेजा गया। जैसा कि सावरकर सोचते थे, पुस्तक ने क्रान्तिकारियों में फिर से एक नयी आग भर दी।

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कुछ कांग्रेस के पिट्टू इतिहासकार आज भी जोर-शोर से यह प्रचार करते हैं कि बिना खड्ग और बिना तलवार के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले कथित अहिंसा के पुजारियों के ‘आत्मसंयम, आत्मबल और स्वपीड़ा’ से भयभीत होकर आताताई और बर्बर अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हुए। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असली तस्वीर नहीं है। अगर आजादी सावरमती के संत के ‘ब्रहमचर्य के प्रयोगों’ के बूते आयी तो कांग्रेस उस काल के 1942 के जन आंदोलन को भारतीय जनमानस के सम्मुख क्यों नहीं लाती, जिसमें भले ही गांधी जी ने अहिंसात्मक आंदोलन किये जाने पर जोर दिया था, किंतु सरकारी दमन से विक्षिप्त और क्रुद्ध होकर कथित अहिंसा को नकारते हुए जनता ने अंग्रेजों के सरकारी 250 रेलवे स्टेशनों को नष्ट कर दिया। 600 डाकघरों को आग के हवाले किया। 3500 टेलीफोन और टेलीग्राम के तारों को काट दिया। 70 थानों को जलाकर राख किया। 85 सकारी भवनों को धूल-धूसरित कर डाला। 9 अगस्त 1942 से लेकर 31 दिसम्बर 1942 तक बौखलायी सरकार ने 940 स्वतंत्रता सेनानियों को गोलियों से भूनकर सदा के लिये संसार से विदा कर दिया। पुलिस और सेना की गोलियों की बौछार के बीच 1630 क्रान्तिवीर घायल हुए। 18000 सेनानियों को रक्षा कानून के अंतर्गत तो 60229 सेनानियों को हिंसा फैलाने और रक्तपात करने के आरोप में सलाखों के पीछे भेजा गया।

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भारत छोड़ो आन्दोलन का यह क्रान्तिकारी स्वरूप गांधी जी की अहिंसा और उनकी ‘स्व पीड़न’ की नीति पर एक तमाचा था। इस तमाचे और अहिंसावादियों के तमाशे के बीच सिर उठाती कटु सच्चाई केवल यही बयान करती है कि भारतवर्ष गांधी जी की अहिंसा से नहीं, क्रान्ति की फैलती ज्वाला के कारण आजाद हुआ। इस तथ्य को ‘चर्चिल’ इग्लैंड की लोकसभा में इस प्रकार रखते हैं-‘‘कांग्रेस ने अब अहिंसा की उस नीति को, जिसे गांधी जी एक सिद्धांत के रूप में अपनाने पर जोर देते आ रहे थे, त्याग दिया है और क्रान्तिकारी आन्दोलन का रास्ता अपना लिया है।’’

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर यदि समग्र दृष्टि से सोचा-विचारा जाये तो यह तथ्य छुपा नहीं रह जाता है कि जो क्रान्ति की ज्वाला 1857 में भड़़की थी, उसे भड़काने में उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का महत्वपूर्ण योगदान है जो 1780 से ही सक्रिय थे। तत्समय एक विदेशी नागरिक ने कलकत्ता से देश का पहला अखबार ‘बंगाल गजट’ और ‘जनरल एडवाइजर’ जिसे ‘हीकीज गजट’ के नाम से भी पुकारा जाता है, में तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हैस्टिंग्ज और कम्पनी के अधिाकरियों की अनीति और मनमानी पर प्रहार किये थे। 1785 में ‘बंगाल जर्नल’, ‘द वर्ल्ड ’, ‘टेली ग्राफ’, ‘कलकत्ता गजट’ नामक समाचार पत्रों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफसरों की घूसखोरी, अन्य काले कारनामों के खिलाफ जमकर लिखा गया। 9 अप्रैल 1807 को आम सभाओं पर प्रतिबंध लगने के बाद क्रान्तिवीरों ने पर्चे छापकर बाँटे और क्रान्ति की आग धधकायी। भारतीय पत्रकारिता के पहले शहीद मौलवी मोहम्मद वकार ने फिरंगियों और उनकी सरकार के खिलाफ जमकर कलम चलायी।

स्वतंत्रता संग्राम के कलम के सिपाहियों में एक तरफ जहाँ लोकमान्य तिलक, विवेकानंद, भगत सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद, बालकृष्ट भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुन्द गुप्त, राजा रामपाल सिंह, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, यशपाल, मन्मथनाथ गुप्त, सावरकर, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे अनेक पुरोधा हैं, वहीं तीर-तलवार लेकर अंग्रेजों का रक्त-सत्कार करने वालों में रानी लक्ष्मीबाई, मदनलाल धींगरा, खुदीराम बोस, तात्या तोपे, मंगल पांडेय, सूर्यसेन, दामोदर चाफेकर, बेगम हजरत महल आदि का नाम जगत विख्यात है। लाला लाजपतराय, विपिनचन्द्र पाल, स्वामी श्रद्धानंद, सुभाषचन्द्र बोस चन्द्रशेखरआजाद , भगत सिंह, सूर्यसेन, अशफाक़उल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल आदि का जनभावनाओं को उभारकर अंगेजों के प्रति जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन करना भी एक ऐसा क्रान्तिकारी हथियार रहा है, जिसके आगे अंगेज थर-थर कांप उठे।

क्रान्ति की भूमिका तैयार करने में कवियों-शायरों ने कविता को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का भी काम किया। स्वतंत्रता संग्राम का पैगाम जन-जन तक पहुँचाने में महीदुद्दीन सलीम, शौक किदवई, फैज, मजाज, कैफी आजमी, साहिर लुधिायानवी, बहादुरशाह जफर, तिलक चंद, गोपीनाथ, झम्मन, आनंद नारायण मुल्ला, जोश मलीहाबादी, सोहनलाल द्विवेदी, राम प्रसाद बिस्मिल, आदि का योगदान भी अविस्मरणीय है।

क्रान्ति की आग को घर-घर तक फैलाने या पहुँचाने के लिये ‘रोटियों’ का प्रयोग भले ही आश्चर्यजनक लगे किन्तु यह भी एक ऐसी सच्चाई है जिसका वर्णन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 1857 में एक तरफ जहाँ क्रान्तिकारियों की तलवारें चमकीं, बन्दूकें और तोपें गरजीं वहीं क्रान्ति की ज्वाला धधकाने के लिये और लोगों को अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित करने के लिए गावं-गांव में ‘चपातियाँ’ भेजी गयीं। चपातियाँ म.प्र. के इन्दौर से निमाड़ में बाँटी गयीं। उत्तर भारत के अनेक जिलों जैसे मथुरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, बुलंदशहर, मेरठ आदि में ये चपातियाँ 1857 के जनवरी-फरवरी माह में बाँटी गयी। रोटियाँ बँटवाने का यह कार्य मद्रास में भी हुआ जिसके फलस्वरूप वैल्लौर में विप्लव हुआ। ये चपातियाँ कौन बनाता है और कहाँ से भेजी जाती हैं, इसका का पता अंगे्रजों के जासूस नहीं लगा पाये। चपातियों के माधयम से क्रान्ति का संदेश भेजने का ब्यौरा अंग्रेज अफसर थार्नाईल की डायरी के पृष्ट 2 व 3 पर दर्ज है।

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गुलामी की जंजीरों में जकड़े हिन्दुस्तान को आजाद कराने में अपने प्राणों को संकट में डालकर लड़ने वाले रणबांकुरों में एक तरफ जहां पं. चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, गणेश शंकर विद्यार्थी, गेंदालाल दीक्षित, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, सूर्यसेन, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, विपिन चन्द्र पाल, खुदीराम बोस, रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डेय, बेगम हसरत महल आदि का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, वही पंजाब की माटी ने भी ऐसे एक नहीं अनेक सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने अंग्रेजों के साम्राज्य को ढाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

देखा जाय तो अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाने वालों में सिखों का नाम ही सबसे पहले आता है। भले ही सिखों के आंदोलन धार्मिक रंग लिये होते थे, किन्तु इन्हीं आयोजनों से अंग्रेजों की नींद हराम होती थी। 13 अप्रैल 1919 बैसाखी के दिन गुरू गोविंद सिंह के अमृतपान की स्मृति से जुड़ा पवित्र दिन आजादी के इतिहास में ऐसा ही धार्मिक उत्सव था। उस दिन जलियांवाला बाग में मनाये गये उत्सव के समय अंग्रेजों की गोलियों से 309 देशभक्तों को सदा-सदा के लिये विदा कर दिया। जलियांवाला कांड के शहीदों में सर्वाधिक सिख ही थे।

उस समय ऐसा कोई राष्ट्रीय आंदोलन नहीं था जिसमें सिखों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा न लिया हो। स्वदेशी, खिलाफत, बंग-भंग, भारत छोडो आंदोलनों के दौरान सिखों ने अपने प्राण संकट में डाले, जेलों में सड़े, तरह-तरह की यातनाएं झेलीं।

आजादी की लडाई में सिखों का योगदान सन् 1863 से शुरू होता है। सिखों ने भाई रामसिंह के नेतृत्व में ‘कूका’ आंदोलन प्रारम्भ किया। ‘कूका’ सम्प्रदाय के लोग स्वदेशी के पक्षधर थे। यह एक अर्धसैनिक संगठन था जिसमें अस्त्र-शस्त्र चलाने की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती थी।

ये लोग खादी पहनते और सादा जीवन व्यतीत करते थे। अंग्रेजी संस्कृति के कट्टरविरोधी इन ‘कूका’ सम्प्रदाय के लोगों ने जब अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया तो इनकी भिडंत गोरों की फौज से हो गयी। अंग्रेजों ने 66 कूकों को लुधियाना और 12 को मालेर कोटला में तोपों से बांधकर उड़ा दिया। इनके नेता रामसिंह को गिरफ्तार कर वर्मा भेज दिया | जहां वे अपनी मातृभूमि के लिए तड़पते हुए 1895 में स्वर्ग सिधार गये।

‘पंजाब कालोनाइजेशन एक्ट- 1907’ के विरुद्ध सिखों ने जिस प्रकार प्रर्दशन किया, वह भी इतिहास में एक मिसाल है। इस आंदोलन के दौरान ही बांकेदयाल नामक क्रांतिकारी ने प्रसिद्ध पंजाबी गीत ‘पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल ओये’ लिखा था। इस गीत को सरदार अजीत सिंह, लाला लाजपतराय, स्वामी श्रद्धानंद और बाद में सरदार भगत सिंह की टोली बड़े जोश भरे अंदाज में गाती थी। पंजाब कालोनाइजेशन एक्ट- 1907 के विरुद्ध आंदोलन छेड़ने वाले शीर्ष नेता थे सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपतराय, जिन्हें सरकार ने गिरफ्रतार कर माडले जेल में लम्बे समय तक रखा।

‘जलियांवाला बाग’ के क्रूर हत्यारों के अफसर और ‘साइमन कमीशन’ का विरोध करते समय लाठीचार्ज का आदेश देकर लाला लाजपतराय की मौत का कारण बने सांडर्स से बदला लेने वाले ऊधम सिंह और भगत सिंह का नाम भी स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

लाला हरदयाल की प्रेरणा से सोहन सिंह भकना ने अंग्रेजों की सत्ता को नेस्तनाबूत करने के लिए ‘गदर पार्टी’ का गठन किया। गदर पार्टी के पंजाबी रणबांकुरे करतार सिंह, बलवंत सिंह, भाई भाग सिंह, भाई वतन सिंह, लाला हरदयाल, बाबा सोहन सिंह, बाबा केसर सिंह, बाबा पृथ्वी सिंह, बाबा करम सिंह, बाबा बसाखा सिंह, भाई संतोख सिंह, दलीप सिंह, मेवा सिंह जैसे अनेक सिख जाबांजों ने अमेरिका में रहते हुये भारत माता को आजाद कराने के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध अलख जगा कर अपनी जान की बाजी लगाई। उन दिनों गदर पार्टी अमेरिका के अलावा शंघाई, हांगकांग, फिलीपींस तक फैली हुयी थी। गदर पार्टी सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखती थी। शुरू में इसका नाम ‘हिन्दी एसोशिएसन’ रखा गया। बाद में यह गदर पार्टी में तब्दील हो गयी। इस पार्टी ने अपने संघ का दफ्तर ‘युगांतर आश्रम’ के नाम से खोलकर ‘गदर’ नामक अखबार निकालने के लिए ‘गदर प्रैस’ की स्थापना की । ‘गदर’ अखबार ने पूरी दुनिया में अत्याचार, शोषण, साम्राज्यवाद के विरुद्ध गदर मचा दिया। इस पार्टी के अधिकांश जांबाज या तो गोलियों से भून दिये गये या फांसी पर लटका दिये गये।

गदर पार्टी से गोरी सरकार को कितना खतरा बन चुका था, इस बारे में तत्कालीन पंजाब के गवर्नर माइकल ओडायर लिखते हैं- ‘‘ हिन्दुस्तान में केवल तेरह हजार गोरी फौज थी जिसकी नुमाइश सारे हिन्दुस्तान में करके सरकार के रौब को कायम करने की चेष्टा की जा रही थी। ये भी बूढ़े थे। यदि ऐसी अवस्था में सैनफ्रैन्सिको से चलने वाले ‘गदर पार्टी के सिपाहियों की आवाज मुल्क तक पहुंच जाती तो निश्चत है कि हिन्दुस्तान अंग्रेजों के हाथ से निकल जाता। ’’

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[17 अगस्त ]

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अमृतसर जिले के खत्री कुल में धनी परिवार में जन्म लेने वाले क्रान्तिकारी मदनलाल धींगरा पंजाब विश्वविद्यालय से बी.ए. पास कर आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए जब इंग्लैंड पहुँच गये तो विलायत का भोग-विलासी वातावरण उन्हें बेहद भा गया। वे छात्रों के साथ पढ़ायी कम, मौज-मटरगश्ती अधिक किया करते। वे बगीचों में बैठकर या तो पुष्पों को निहारते रहते या उनका समय मादक संगीत में अपनी टोली के साथ नृत्य करते हुए बीतता। उन्हीं दिनों उन्होंने अखबारों में समाचार पढे़ कि बंगाल में अपने वतन की आज़ादी के लिये खुदीराम बोस, प्रफुल्ल कुमार चाकी, कन्हाई लाल जैसे अनेक क्रान्तिवीरों की टोली अंग्रेजों के खून से होली खेल रही है। इन समाचारों को पढ़कर उनका मन भी जोश से भर उठा। वे भी अपने वतन हिन्दुस्तान के लिये कुछ कर गुजरने के लिये व्याकुल हो उठे। इसी व्याकुलता ने उन्हें क्रान्ति के अग्रदूत सावरकर से मिलने को प्रेरित किया। वे इंग्लैंड से ही क्रान्ति की आग को प्रज्वलित करने वाले क्रान्ति के मसीहा सावरकर से ‘भारतीय भवन’ जाकर मिले और पराधीन भारत को मुक्त कराने के लिये सावरकर से अपनी बात कही। सावकर ने पहले तो इस नवयुवक की ओर निहारा, फिर दल में शामिल करने से पूर्व परीक्षा लेने की बात कही। मदनलाल तुरंत इसके लिये राजी हो गये। फिर क्या था सावरकर ने उनका हाथ जमीन रखकर एक छुरी उनके हाथ में आर-पार कर दी। मदनलाल इस वार की असह्य पीड़ा के बाबजूद चीखना तो दूर, केवल मुस्कराते रहे। इस प्रकार वे परीक्षा में सफल हो गये तो सावरकर ने उन्हें अपने दल का सदस्य बना लिया।

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इस परीक्षा के कुछ समय बाद सावरकर ने एक अंगे्रज अफसर सर कर्जन वाइली को गोली से उड़ा देने का काम गरा को धींगरा सौंप दिया, जो भारत मंत्री के शरीर-रक्षक के रूप में इंग्लैंड में नियुक्त था तथा जिसने ‘भारतीय-भवन’ के समानान्तर भारतीय विद्यार्थियों की एक सभा खोल रखी थी और इसी की आड़ में वह भारतीयों छात्रों की जासूसी कर अंग्रेज सरकार को उनकी गतिविधिायों का ब्यौरा भेजता था।

एक दिन जब सर कर्जन वाइली किसी अंगे्रज अफसर से गम्भीर वार्ता कर रहे थे तो मौका पाकर मदनलाल ने पिस्तौल निकाल कर लगातार दो गोलियाँ दागकर वही खूनी फाग इंग्लैंड़ में खेला, जैसा खूनी फाग भारत के क्रान्तिकारी अंग्रेजों के विरुद्ध भारत में खेल रहे थे। वाइली को गोली मारने के उपरांत धींगरा ने अपने को सहर्ष और सहज तरीके से अंग्रेज सिपाहियों के सम्मुख गिरफ्तार करा दिया।

चूँकि घटना-स्थल पर ही धींगरा ने एक प्रतिष्ठित अंग्रेज अफसर को गोली मारकर उसकी हत्याकर गिरफ्तारी दी थी, अतः उन्हें अपने मृत्युदण्ड को लेकर किसी भी प्रकार का संशय नहीं था। इसीलिए जब उनके केस की सुनवाई कोर्ट में हुई तो बिना किसी भय और पश्चाताप के वे सिंह की तरह गरजते हुए बोले-‘‘जो सैकड़ों अमानुषिक फाँसियाँ और कालेपानी की सजाएँ हमारे देश में धूर्त्त अंग्रेजों के शासन में देशभक्तों को ही रही हैं, उसका बदला लेना कोई पाप या अपराध नहीं। वाइली को मारने में मैंने अपने विवेक के अतिरिक्त किसी अन्य से सलाह नहीं ली है। पापी हुकूमत के इस नुमाइन्दे का रक्त बहाने पर मुझे कोई पश्चाताप नहीं है। एक जाति जिसे विदेशी संगीनों के साये में पराधीन कर कुछ न बोलने पर पांबदी लगा दी है, उसी जाति के अपमान का बदला लेने के लिए मेरी पिस्तौल ने आग उगली है। यदि हमारी मातृभूमि पर कोई अत्याचार करता है तो अब हिन्दुस्तानी सहन नहीं करेंगे। हम हिंदुस्तान ही नहीं, अत्याचारी अंग्रेज हमें जहाँ-जहाँ मिलेंगे, हम उन्हें मारेंगे। मेरी तरह की एक अभागी भारत माता की सन्तान जो बुद्धि और धन दोनों से ही कमजोर है, उसके सिवा अब और कोई रास्ता बचा ही नहीं है कि वह अपनी माता की यज्ञवेदी पर रक्त अर्पण करने से पूर्व उस साम्राज्य को भी लहूलुहान कर डाले जिसके खूनी पंजों के बीच भारतमाता कराह रही है। मैं जानता हूँ कि न्याय का ढोंग रचने के बाद यह कोर्ट मुझे फाँसी पर ही लटकायेगी। मैं अवश्य ही मरूँगा, अतः मुझे अपनी शहादत पर गर्व है। वंदे मातरम।’’

अपनी शहादत पर गर्व करने वाले क्रान्तिवीर मदनलाल धींगरा के लिये आखिर वह दिन भी आ गया, जब 16 अगस्त 1909 को भारत माता का यह शेर सपूत हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ गया और इंग्लैंड से यह संदेश पराधीन भारत को दे गया कि वतन आजाद हो कर ही रहेगा।

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[ शहीद दिवस 30 जनवरी पर विशेष ]

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अंग्रेजी शासन से मुक्त होने के लिए, दासता की बेडि़यों को तोड़ने में केवल राष्ट्रभक्त क्रान्तिवीरों ने ही अपने प्राणों की आहुति नहीं दी, बल्कि गुलाम भारत में ऐसी अनेक वीरांगनाएं भी जन्मीं, जिनके मन को क्रान्ति की ज्वाला ने तप्त किया। जरूरत पड़ने पर सौन्दर्य की देवी नारियों ने भी रणचण्डी का रूप धारण किया। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने, उन्हें लोहे के चने चबवाने में विशेषकर दो वीरांगनाओं रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल के नाम से तो सब परिचित हैं | लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि अंग्रेज अफसरों के यहां काम करने वाली लाजो के द्वारा ही मंगल पांडे तक चर्बी के कारतूसों की जानकारी पहुंची थी। मुगल सम्राट बहादुर शाह की बेगम जीनतमहल ने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ने के लिये अनेक योद्धाओं को संगठित किया था। चिनहट की लड़ाई में शहीद हुए पति का प्रतिशोध लेने वाली वीरांगना ऊदा देवी ने पीपल के पेड़ की घनी शाखों में छुपकर अपने तीरों से 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया और बाद में वीरगति को प्राप्त हुई।

तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी ने होम ग्राण्ट के सैनिक दस्ते को जमकर टक्कर दी। अवध की बेगम आलिया ने अपनी लड़ाकू महिला फौज के साथ एक नहीं कई बार ब्रिटिश सैनिकों को अवध से बाहर खदेड़ा। ठकुराइन सन्नाथ कोइर और मनियापुर की सोगरा बीबी ने विद्रोही नेता नाजिम और मेंहदी हसन को जांबाज सैनिक, तोपें और धन देकर क्रान्तिकारियों की सहायता और हौसला अफजाई की।

झांसी की रानी के ‘दुर्गा-दल’ की कुशल नेतृत्व देने वाली झलकारी बाई झांसी के किले से अदम्य साहस के साथ लड़ी। मध्य प्रदेश के रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई ने अंग्रेजों से जमकर युद्ध किया और घिरने पर स्वयं को खत्म कर लिया।

मध्य प्रदेश के जैतपुर और तेजपुर की रानियों ने दतिया के क्रान्तिकारियों के साथ अंग्रेजी फौज पर हमला किया।

मुजफ्रफरपुर की महावीरी देवी ने 22 महिलाओं के साथ अंग्रेजों को टक्कर दी। अनूपशहर की चैहान रानी ने घोड़े पर सवार हो, तलवार लेकर अनेक ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतारते हुए यूनियन जैक को उतारकर थाने पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया।

स्वामी श्रद्धानंद की पुत्री वेदकुमारी, आज्ञावती और सत्यवती के स्वाधीनता संघर्ष को भी भुलाया नहीं जा सकता है। कोल आन्दोलन, टाना आन्दोलन में आदिवासी जनजातियों की महिलाओं ने फरसा-बलुआ से अंग्रेजों के सर कलम किये।

चटगांव विद्रोह की क्रान्तिकारी महिला प्रीतिलता वाडेयर ने एक यूरोपीय क्लब पर हमला किया और गिरफ्रतार होने के डर से आत्महत्या कर ली। 1931 में स्कूल की दो छात्रा शांति घोष और सुनीता चौधरी ने जिला कलेक्टर को गोली मार दी। बीना दास ने कलकत्ता विश्व विद्यालय के दीक्षांत समारोह में गवर्नर को गोली मारकर ‘हिन्दुस्तान आजाद होकर रहेगा’, यह संदेश पूरे देश को दिया | बंगाल की ही सुहासिनी अली और रेणुसेन की क्रान्तिकारी गतिविधियों को देखकर अंग्रेज मन ही मन भयभीत हुए।

दुर्गाभाभी के नाम से प्रसिद्ध वीरांगना ने हर प्रकार क्रान्तिकारियों का सहयोग तो किया ही, बम्बई के गवर्नर हेली को मारने के लिये गोली भी चलायी, जिसमें हेली के स्थान पर टेलर नामक एक अंग्रेज अफसर घायल हो गया। क्रान्तिकारी आन्दोलन में सुशीला देवी की भूमिका भी इसलिए अविस्मरणीय है क्योंकि इन्होंने काकोरी कांड के कैद क्रान्तिकारियों के मुकदमे की पैरवी के लिए 10 तोला सोना तो दिया ही, ‘मेवाड़पति’ नामक नाटक खेलकर क्रान्तिकारियों की सहायतार्थ धन इकट्ठा किया। तिलक के गरमदल में शामिल वीरांगना हसरत मोहनी की त्याग गाथा को भी कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होंने आजादी की खातिर जेल में चक्की पीसी।

सुभाष चन्द्रबोस की आजाद हिन्द फौज की रजीमेंट की कमाण्डिग ऑफीसर कैप्टन लक्ष्मी सहगल की आजादी की लड़ाई जितनी गौरवशाली है, भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा को भी कैसे भुलाया जा सकता है जिन्होंने ब्रिटिश शासन को मानवता पर कलंक बताते हुए अन्तर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस कान्फ्रेंस में भारतीय ध्वज फहराया। कलकत्ता विश्व विद्यालय के दीक्षांत समारोह में वायसराय लार्ड कर्जन के अपमानजनक शब्दों का खुले मुखर होकर प्रतिकार करने वाली भगिनी निवेदिता की निर्भीकता भी वन्दनयोग्य है।

इन वीरांगनाओं के अतिरिक्त भी ऐसी अनेक वीरांगनाएं इस माटी ने पैदा की हैं जिनमें अदम्य साहस, अनन्य राष्ट्रप्रेम हिलोरें मारता था। वीरांगनाओं के इस गौरवमय योगदान और बलिदान की गाथा में कई ऐसी वीरांगानाओं का नाम भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है जो पेशे से वैश्याएं अवश्य थीं लेकिन जब देश पर मर-मिटने का समय आया तो वे भी किसी से पीछे नहीं रहीं। लखनऊ की तवायफ हैदरीबाई ऐसी ही एक वीरांगना थी जो रहीमी दल की सैनिक बनकर क्रान्तिकारियों के खिलाफ बनने वाली योजनाओं की जानकारी अंग्रेजों से घुलमिल कर जुटाती और क्रान्तिकारियों तक पहुंचाती थी। इसी पेशे से जुड़ी कानपुर की एक और क्रान्ति-नायिका अजीजनबाई ने तो क्रान्तिकारियों से प्रेरणा पाकर 400 वैश्याओं की एक ऐसी टोली बनायी थी जो मर्दाने वेश में रहती थी और क्रांतिकारियों की मदद करती थी। 125 अंग्रेज महिलाओं और उनके बच्चों की रखवाली का कार्य अजीजनबाई की टोली के ही जिम्मे था। इसी कारण इस टोली को आसानी से अंग्रेजों की योजनाओं की गुप्त सूचनाएं प्राप्त हो जातीं जिन्हें वे क्रांतिकारियों तक पहुंचा देती। बिठूर के संग्राम में पराजित होने के बाद जब नाना साहब और तात्याटोपे पलायन कर गये तो अजीजन बाई को गिरफ्तार कर जब अंग्रेज अफसर हैवलाक के समक्ष प्रस्तुत किया तो उसने मृत्युदंड का आदेश दे दिया | इस प्रकार यह वीरांगना भी वीरगति को प्राप्त हुई। ठीक इसी तरह का कार्य नाना साहब की मुंहबोली बहिन तवायफ मैनावती और मस्तानी बाई करती थीं। इन दोनों को भी षड्यंत्र के आरोप में अंग्रेजों ने आग के हवाले कर दिया।

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