सोमवार, 3 अप्रैल 2017

हास्य-व्यंग्य-संस्मरण : मेरे संपादक! मेरे प्रकाशक!! - यशवंत कोठारी - भाग 1

मेरे संपादक !

मेरे प्रकाशक!!

यशवंत कोठारी

(१)

लेखक के जीवन में प्रकाशक व सम्पादक का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है. एक अच्छा संपादक व एक अच्छा प्रकाशक लेखक को बना या बिगाड़ सकता है. मुझे अच्छे प्रकाशक -संपादक मिले, बुरे भी मिले. किसी ने उठाया किसी ने गिराया, किसी ने धमकाया, किसी ने लटकाया, किसी ने अटकाया किसी ने छापा किसी ने अस्वीकृत किया, किसी ने खेद के साथ अन्यत्र जाने के लिए कहा, किसी किसी ने स्वीकृत रचना वापस कर दी, कुछ ने स्वीकृत पांडुलिपियाँ ही वापस कर दी किसी ने विनम्रता से हाथ जोड़ लिए. किसी ने मुझे  तीसरी श्रेणी का बताया तो किसी ने स्पष्ट कहा हम जीवित लेखकों को नहीं छापते. मगर ये सभी अनुभव बड़े मज़ेदार रहे. समय आ गया है की इस विषय पर भी लिखा जाये, कुछ लोग चाहे तो इस रचना को संस्मरण समझ सकते हैं मेरे नज़र में तो हास्य व्यंग्य ही है, इस लघु भूमिका के बाद मैं कुछ स्पष्ट हो जाता हूँ.

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संपादक के रूप में मेरा पहला साबका एक लघु पत्रिका के स्वनामधन्य संपादक महोदय से पड़ा. ये वो समय था जब फोन की सुविधा ज्यादा नहीं थी रचनाएँ लिफाफों में आती जाती थी वापसी का लिफाफा भेजना पड़ता था, सम्पादकजी ने  लिखा-रचना छाप देंगे ग्राहक बन जाओ, मैंने मना कर दिया, रचना वापस मांग ली वे नाराज हो गए, आज तक रचना वापस नहीं लौटी. वापसी वाला लिफाफा उन्होंने खुद के काम में ले लिया था. इस संकट से घबरा कर मैंने अपनी रचनाओं का मुंह बड़ी पत्रिकाओं की और कर दिया. परिणाम आशाजनक रहा. रचनाएँ पढ़ी गई, छापी गयी, और यह सिलसिला चलता रहा. पिछले दिनों नेट की एक ई-पत्रिका के संपादक को रचना भेजी, तुरंत जवाब आया पत्रिका का खाता नम्बर *** है, राशि डालने पर रचना छाप दूंगा, गूगल ने जो काम सर्व जन हिताय निःशुल्क किया उस से भी हिंदी के संपादकों ने कमाई के रास्ते निकाल लिए. यदि लेखक ही संपादक प्रकाशक हो तो समझ लीजिये की करेला और नीम चढ़ा, उस पर गिलोय की बेल. साहित्य की राजनीति मुख्य धरा की राजनीति से ज्यादा घटिया और बेशरम है.

पत्रिकाओं में छपना मुश्किल, पारिश्रमिक मांगना एक अपराध, तुरंत आपको ब्लैक लिस्टेड कर दिया जायगा, पारिश्रमिक में भेद भाव एक आम प्रक्रिया है, प्रभारी के मकान के पास में मकान होने पर पूरे परिवार की रचनाएँ दुगुने पारिश्रमिक के साथ छाप सकती है.. एक अघोषित आपातकाल सेंसरशिप के लिए लेखक को हमेशा तैयार रहना चाहिए.. अच्छी संरचना मुझे नहीं जमी के वेद वाक्य के साथ वापस आ जाती थी.

एक बड़े पत्र के संपादक से मिलने गया, काफी समय बहार बिठाये रखा, फिर जब मैं वापस आने लगा तो बोले-जयपुर की रजाई, मिश्री मावा, घेवर, फ़िन्नी बड़ी प्रसिद्ध है, भेजना, मगर मैं विशुद्ध बेवकूफ नहीं भेज सका. एक अन्य संपादिका ने मेरे लिखे को नकल सिद्ध करने का प्रयास किया, मैंने सेठजी को शिकायत की  सेठजी ने  उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. एक अन्य संपादक सेठजी के घर पर ही पंडिताई करते थे, उनका सार्वजनिक अभिनन्दन हुआ. लघु पत्रिका में छपना आसान मगर पाठक नहीं, बड़ी पत्रिकाओं में छपना मुश्किल. दिल्ली के एक संपादक ने कहा – आपकी रचना अच्छी है मगर इस विषय पर ऊपर के निर्देशों की पालना में क की रचना छपेगी. ये ऊपर के निर्देश भी बड़ी अजीब चीज है, संपादक ने आगे बताया समाचार छपने से ज्यादा पैसा समाचार रोकने पर मिलता है. पिछले कुछ वर्षों में संपादक नामक संस्था का बड़ा अवमूल्यन हुआ है.

ऐसे ही हालात आकाशवाणी, दूर दर्शन व टीवी चैनलों में है, वहां पर संपादक के अलावा सब संपादक है. कभी संपादक को पता रहता था कौन से पेज पर क्या जा रहा है, अब संपादक भी सुबह पाठकों के साथ ही पढ़ता है कहाँ क्या छपा है, एक ही रचना का एक साथ  2 पेजों पर छप जाना आम बात हो गई. टेक्नोलॉजी के विस्तार के कारण किसी को कुछ पता नहीं कहाँ क्या हो रहा है? आधे से ज्यादा अख़बार इन्टरनेट से ले लिया जाता है. कट पेस्ट का युग चल रहा है.

कुल मिला कर यहीं लगता है की पसंद का संपादक मिलना संभव नहीं है. बड़े अखबारों में संपादक अपनी लेखकीय टीम रखता है, जो वह एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है. लेखक गिरोह में काम करते है. कई बार तो ऐसा होता है की यदि क की रचना इस अंक में जा रहीं है तो ब लेखक अपनी रचना नहीं देता. मेरे पसंदीदा संपादकों में धरम वीर भारती के बाद कन्हैयालाल नंदन थे, मनोहर श्याम जोशी व्यंग्य के मामले में ईश्वर सिंह बैस के भरोसे थे. शरद जोशी ने मुझे कहा था –भारतीजी रचना खुद पढ़ कर फ़ाइनल करते थे. हां उनके कुछ पूर्वाग्रह थे जैसे अज्ञेय और बाद में कमलेश्वर.

एक स्थानीय संपादक की चर्चा करना जरूरी है वे स्वयं में गणेशजी की छटा देते थे, कभी मिलना होता तो कहते –तुम्हारी वो वाली रचना अगले अंक में दे रहा हूँ, मैं विनम्रता पूर्वक बताता की वो वाली रचना मेरी नहीं क लेखक की है तथा आप इसे दो साल पहले छाप चुके हैं तो वे शालीनता से बोलते मैंने आपको क ही समझा था. वैसे एक बड़े नेता ने मुझसे कहा-संपादक रूपी राक्षस को कुछ मत कहो, सेठ रूपी तोते की गर्दन मरोड़ो.

(अगले भाग 2 में जारी...)

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