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प्राची - फरवरी 2017 / श्रद्धांजलि / अनुपम मिश्र सच में अनुपम थे (1947-2016) / प्रभात दुबे

श्रद्धांजलि

अनुपम मिश्र सच में अनुपम थे

(1947-2016)

प्रभात दुबे

तारीखों का क्या है? तारीखें तो आती रहती हैं, जाती रहती हैं लेकिन कुछ तारीखें मन को बेहद दुखी कर जाती हैं. इन तारीखों में प्राप्त होने वाले समाचार हृदय को झंझोरते हुए संताप से भर देते हैं. मन व्यथित हो जाता है. कुछ पलों तक सोचने-समझने की सारी शक्ति क्षीण हो जाती है. सहसा विश्वास करने को मन नहीं करता और अचानक मुंह से निकलता है, ‘अरे! यह क्या हो गया?’ ऐसी ही तारीखों में से एक तारीख है 19 दिसम्बर 2016 जो मुझे और मुझ जैसे अनुपम भाई को पसंद करने वाले अनेकानेक लोगों को दुखी कर गई.

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यही वो तारीख है जिस तारीख को गांधी विचार की प्रमुख पत्रिका ‘गांधी मार्ग’ के संस्थापक, प्रखर संपादक, सुप्रसिद्ध लेखक, छायाकार, गाांधीवादी, पर्यावरणविद् श्री अनुपम मिश्र जी का एक लम्बी बीमारी के बाद दिल्ली में देहांत हुआ. यह समाचार मुझे एन.डी. टी.व्ही. न्यूज चैनल से प्राप्त हुआ. मैं भी उन्हें पसन्द करने वाले अनेक लोगों की तरह ही यह समाचार देख सुनकर व्यथित हो उठा. यह समाचार मेरे लिये अप्रत्याशित था. अनुपम भाई के कारण ही मैं बरसों से गांधी मार्ग पुस्तक से जुड़ा हूं. अनुपम भाई से यदाकदा मेरी दूरभाष के माध्यम से बातें हो जाया करती थी. अनुपम भाई हिंदी के प्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र जी, मन्ना जी के सुपुत्र थे. 22 दिसम्बर 1947 को जन्में, परिवार एवं मित्रों में पमपम भाई के नाम से संबोधित होने वाले, अनुपम भाई केवल नाम के अनुपम नहीं थे. उनका पूरा जीवन अनुपम था. सादगी और उच्च विचारों से भरा हुआ. सादगी और उच्च विचार ही उनकी मजबूती थी, या यूं कह ले कि उनकी यही पूंजी थी. उनका पूरा जीवन स्वच्छ, साफ-सुथरा था. उन्होंने अपने जीवन में भौतिक सुखों को न के बराबर स्थान दिया. ‘जितनी कम आव-कतायें, उतना सुखी जीवन’ के सिध्दांत पर चलने वाले थे अनुपम भाई. मैने स्वयं उनको देखा है कि वे गिलास में उतना ही पानी लेते थे जितना पानी उन्हें पीना होता था. वे पानी की मितव्ययिता के लिये बेहद अनुशासन प्रिय और पर्यावरण के लिये अत्याधिक संवेदनशील थे. खादी उनका प्रिय लिबास था. खादी का कुरता-पायजामा, खादी की ही जॉकिट और पैरों में खादी की सामान्य सी चप्पलें. खादी का यह परिधान उन्हें अपने परिवार से प्राप्त हुआ था क्योंकि उनके पिता हिदी के सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद जी मिश्र, माता सरला जी तो स्वयं सूत कात कर खादी के वस्त्र बना कर उनका उपयोग किया करते थे. पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. उन्होने देश की स्वतंत्रता के लिये जेल यात्रायें भी की थीं.

अनुपम भाई की आवष्यकता से अधिक संग्रहण करने की फितरत तो थी ही नहीं और साथ ही साथ कम साधनों में काम चलाना उनकी सर्वश्रेष्ठ आदतों में शुमार था. वे पर्यावरण के बिगड़ते हालत को लेकर सदैव चितिंत रहे. मै अक्सर उन्हें पढ़ा करता था इसलिये जानता हूं कि उन्होंने जब भी लिखा तो लिखा गांधी, बिनोबा और पर्यावरण पर ही. गांधी मार्ग में प्रकाशित अनेकानेक संपाकीय और लेख इस बात के साक्षी हैं कि उन्होंने गांधी जी को अपने जीवन में और आचरण में पूरी तरह से उतार लिया था. अभी ‘पहल’ के पिछले अंक 104 में भी उनके जीवन पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए अत्यन्त सारगर्भित लेख का प्रकाशन हुआ है. जिसमें उनके जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया गया है.

ऐसे व्यक्ति का 69 वर्ष की उम्र में यूं चले जाना निःसंदेह दुखी करता है क्योंकि इस देष के बिगड़ते पर्यावरण के सुधार करने हेतु सचेतक की भूमिका निभाने वाले इस पर्यावरण चिंतक की इस समाज और देश को अभी बहुत जरूरत थी. उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली में पर्यावरण कक्ष की स्थापना भी की थी. उन्हें प्रकृति से बेहद लगाव था. वे कलम कौशल के धनी तो थे ही इसके साथ ही साथ वे कुशल छायाकार भी थे.

अनुपम भाई को श्रद्धाांजलि अर्पित करते हुए जल संरक्षण के लिये ख्यात पर्यावरणविद श्री राजेन्द्रसिंह कहते है- ‘अनुपम मिश्र, प्रमाणित बातें करते थे, नपे-तुले शब्दों में बोलते थे. कभी किसी से डरते नहीं थे. उन्हें कभी यह भय सताता नहीं था कि इसे सच्ची बात कह दी तो यह मेरा नुकसान कर सकता है. उन्हें सच को तौलिए में लपेट कर मारना नहीं आता था, वे सच्ची बात को सीधा बोलते थे.

अनुपम भाई अन्तिम समय तक गांधी विचार की द्विमासिक प्रमुख हिंदी पत्रिका गांधी मार्ग के संपादक रहे. विश्व में प्रसिद्ध चम्बल के डाकुओं के समर्पण में उनका योगदान उल्लेखनीय है. उन्होंने इस पर एक चर्चित पुस्तक ‘चम्बल की बन्दूकें गांधी के चरणों में’ भी लिखी थी. वर्ष 1980 में ‘देश का पर्यावरण और हमारा पर्यावरण’ नामक दो अद्वितीय पुस्तकों का अनुवाद भी अनुपम भाई ने किया था. अनुपम भाई की वर्ष 1993 में प्रकाशित 120 पृष्ठीय उनकी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में तालाबों के महत्व को रेखांकित करते और तालाबों की दुर्दशा से व्यथित होते हुए उन्होने लिखा भी है- ‘सैकड़ों, हजार तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे. इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की. यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा बनती थी. पिछले दौ सौ बरसों में नए किस्म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गये समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्य ही बना दिया है.’

‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी अत्यन्त प्रसिद्ध पुस्तक के लिये वर्ष 2011 में ‘जमनालाल बजाज पुरुस्कार’ से भी सम्मानित किया गया है. यह पुस्तक 19 भाषाओं में प्रकाशित हुई है और इसे ब्रेल भाशा में भी प्रकाशित किया गया है. इस पुस्तक की दो लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं. भाई अनुपम मिश्र जी को वर्ष 1996 में देश का सर्वोच्च पर्यावरण पुरुस्कार ‘इन्दिरा गॉधी पर्यावरण पुरुस्कार’ से भी सम्मानित किया जा चुका है.

अनुपम भाई की अन्य प्रमुख रचनायें ‘राजस्थान की रजत बूंदे एवं साफ माथे का समाज’ है. सच में, हमने एक सच्चा, गांधीवादी, असाधारण पर्यावरणविद् खो दिया है, जिसकी हमें हर क्षण आवश्यकता महसूस होती रहेगी.

सम्पर्कः 111 पुश्पांजली स्कूल के सामने,

शक्तिनगर, जबलपुर-482001 (म.प्र.)

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