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प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / लौकी का तेल / राजेन्द्र राव

कहानी

लौकी का तेल

राजेन्द्र राव

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परिचय

राजेंद्र राव शिक्षा और पेशे से भले ही इंजीनियर रहे हों, मगर उनका मन सदैव साहित्य और पत्रकारिता में ही रमा रहा. तकनीकी और प्रबंधन के क्षेत्र में काफी समय बिताने के बाद अवसर मिलते ही साहित्यिक पत्रकारिता में आ गए. कृतियों में एक उपन्यास, सात कथा संकलन और कथेतर गद्य के बहुचर्चित संकलन ‘उस रहगुजर की तलाश है’. संप्रति दैनिक जागरण में साहित्य संपादक.

सम्पर्कः 374 ए-2, तिवारीपुर, जाजमऊ,

जे के रेयन गेट के सामने, कानपुर-208010

 

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रदार रतन सिंह ने, जिन्होंने यह मकान दिलाया था, मानो हौसला अफजाई करते हुए कहा, ‘ओजी बंसल साहब, आपकी तो मौज हो जानी है. यहां तो बड़े पकौड़े बनते हैं, गरमा गरम, हर वक्त कढ़ाई चढ़ी रहती है. और क्या वैरायटी होती है पकौड़ों की! पालक के, प्याज के, आलू के, बैंगन के।एकदम करारे! इस घर के ठीक पीछे है रामऔतार हलवाई की दूकान. जब मन चाहे पकौड़े मंगा लो. एक क्या दस मेहमान आ जाएं घर में कुछ बनाने की जरूरत ही नहीं.’ असल में पीछे सड़क के पार काटन मिल का मेन गेट था जहां हर समय लोगों की आवाजाही बनी रहती थी. एक शिफ्ट छूटती तो दूसरी के वर्कर अंदर जाते. यही हाल भोजन अवकाश के समय होता. इस वजह से हलवाई की दूकान में पकौड़े या समोसे बनते ही रहते थे. मकान शिफ्ट करके यहां आए तो सामान उतरवाने-रखवाने वाले मजदूरों और सहायता के लिए आए मित्रों के लिए चाय-पकौड़े पीछे से मंगाए गए. रतन सिंह ने गलत नहीं कहा था, पकौड़े सचमुच करारे और मजेदार थे.

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कहां शांत साफ-सुथरी सरकारी बस्ती का बंगला और कहां काटन मिल गेट की गहमा गहमी से आक्रांत यह किराए का मकान. इस माहौल का अभ्यस्त होने में हमें काफी समय लगा, मगर मिल के गेट पर अक्सर बनी रहने वाली रौनक का हमने खूब लुत्फ उठाया. पकौड़े और समोसे तो नियमित रूप से नाश्ते में शामिल हो गए थे, सब्जी-भाजी और फलों का भी आराम था. मिल के गेट पर हर शिफ्ट छूटने के समय अच्छा-खासा बाजार सज जाता था. चूंकि वहां क्रेता मजदूर होते थे इसलिए सस्ती दर पर चीजें बिकतीं और हाथों हाथ बिक जाती थीं. सब्जी-फल ही नहीं वहां दाल, चावल, मसाले, सस्ते रेडीमेड कपड़े, अंगोछे-मच्छरदानियां और जाने क्या क्या बिकने को आता था. शुरू में तो कुछ संकोच हुआ, फिर हम भी इस बाजार के ग्राहक बन कर सर्वहारा वर्ग के निकट आने की एक स्वचालित प्रक्रिया में शामिल हो गए. होना ही था. पिताजी के रिटायर होने बाद पहले सरकारी बंगला गया, फिर एक एक करके सुविधाएं. अब वेतन की जगह पेंशन थी जिसमें अपनी बुर्जुआ पहचान बनाए रखना मुश्किल हो रहा था. मैं खुद एक साधारण नौकरी पर था और दो छोटे भाई पढ़ रहे थे।धीरे धीरे वह मिल हमारे लिए खुलती गई. इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब हमें रामऔतार के हर समय बनते रहने वाले पकौड़े भा गए थे. फिर सस्ती सब्जियां, किफायती अंडरवियर और अंगोछे हमारी क्रयसूची में शामिल हुए. मामला बढ़ता गया. हम लोग सोचने लगे कि कम से कम घर का एक लड़का तो मिल में नौकरी पा जाए. इस दिशा में कार्य भी हो रहा था. मैंने पड़ोस में रहने वाले मिल के वैलफेयर आफीसर गर्ग साहब से जान पहचान बढ़ा ली और वे घर आने-जाने लगे. परिवारों में भी मेल जोल बढ़ा. बाद में एक दिन मां ने बताया कि गर्ग साहब और उनकी पत्नी को अपनी कन्या के लिए मैं पसंद हूं और मेरे छोटे भाई को बी एस सी पास करते ही वे मिल में कैमिस्ट की नौकरी दिलवा ही देंगे. अब जरा सोचिए यह सब उस मकान में आने के छै महीने के भीतर हो गया. किसी जादू की तरह. सच कहता हूं गर्ग साहब की कन्या मुझे प्रथम दृष्टि में ही पसंद आ गई थी. वह घर से कॉलेज जाने के लिए सिर झुकाए दुपट्टा लहराती निकलती और उसी तरह सिर झुकाए, नजरें जमीन में गड़ाए घर लौटती. मां कहतीं, ‘कितनी सुशील कन्या है मगर शादी तभी करेंगे जब कम से कम एक लड़के को नौकरी पर लगवा देंगे. दान दहेज तो कुछ देंगे नहीं, और दें भी कहां से! इसी नौकरी से तीन तीन बहनों की शादी की है, लड़के को इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती कराया है. खैर हमें दहेज चाहिए भी नहीं, बस एक लड़का मिल में लग जाए, इतना बहुत है. मिल की नौकरी कहने के लिए ही प्राइवेट है,

सुविधाएं सरकारी से कहीं ज्यादा हैं. देखो वर्दी मिलती है, ओवरटाइम मिलता है, बोनस में एक डेढ़ महीने की तनख्वाह हर साल, सस्ते दाम पर एक बोरा गेहूं (मिल के फार्म का), कोपरेटिव से लोन और जाने क्या क्या. ऐसी नौकरी मिलती है कहीं? वह भी घर के ठीक पीछे. यह तो रामजी की कृपा है जो घर दिलाने के बहाने यहां ले आए हैं.’

मैं उन्हें याद दिलाता तो कहतीं, ‘हां हां, भला हो रतन सिंह जी का जो उन्होंने यह घर दिलवाया.’ -इसमें कोई शक नहीं कि शोर शराबे...खास तौर पर यूनियन की अक्सर गेट पर चलने वाली नारेबाजी से होने वाले व्यवधान को छोड़ दिया जाए तो यह घर हर दृष्टि से सुविधाजनक था. यहां से मेरे दफ्तर की दूरी मुश्किल से दो ढाई किलोमीटर थी. भाइयों के कॉलेज भले ही दूर हों मगर टैम्पो की सवारी सुलभ थी. बैंक-पोस्ट ऑफिस मिल के गेट पर ही थे, मजदूरों के चंदे से बना एक मंदिर एकदम बगल में था. छोटा मोटा बाजार तो वहां लगता ही था. हर नई फसल की जिंस, आस पास के गांवों से, वहां साइकिलों पर लद कर बिकने के लिये आती थीं.

पहले कुछ दिन अटपटा सा लगा, फिर मन उस वातावरण में रमने लगा. वहां शाम को जनरल शिफ्ट छूटने पर लगने वाला बाजार और हर हफ्ते दस दिन बाद होने वाली यूनियन की मीटिंगें खासी दिलचस्प होती थीं. ऑफिस से आने के बाद अक्सर मैं पकौड़े लेने के बहाने वहां एक तमाशबीन की तरह पहुंच जाता था. कुछ देर बाजार में भाव ताव करता या ट्रेड यूनियन नेताओं के जोश भरे भाषण सुना करता. मिल में दो दशक पुरानी लाल झंडे वाली जमी जमाई यूनियन थी जिसे उखाड़ने के लिए सत्ताधारी दल की एक नई यूनियन मैदान में उतारी गई थी. उसे कोई गंभीरता से नहीं ले रहा था मगर गरमा गरमी तो थी ही. ऐसी ही एक मीटिंग में लौकी का तेल बेचने वाले कलंदर से मेरी मुलाकात हुई. उसकी साइकिल के हैंडिल पर एक तख्ती लगी थी जिस पर लिखा था- ‘शुद्ध लौकी का तेल, नकली साबित करनेवाले को रु 5000 इनाम.’ पहले पहल देखा तो मैं हैरान रह गया, मुझे मालूम नहीं था कि लौकी का भी तेल होता है. तीव्र उत्कंठा के मारे उसी से पूछ बैठा- ‘क्या लौकी का भी तेल होता है?’ इस बेवकूफी भरे प्रश्न से वह आहत हुआ होगा, नाराज भी, बोला- ‘तो हम क्या चूतिया हैं जो यहां बेचने के लिए खड़े हैं!’ उसको घेरे खड़े मजदूरों में से एक ने मुझ पर तरस खाकर कहा- ‘बाबू आप शहरी आदमी नहीं जानते कि लौकी का तेल कितना जो है फायदेमंद होता है. अरे गांव देहात में कौनो डाक्टर बैठा है जो अधकपारी और तमाम खोपड़ी के मर्ज का इलाज जो है सो करेगा! तब लौकी का तेल ही ना जो है सो काम आता है. इधर जितना भी मजदूर भाई छुट्टी में गांव जाता है, बोतल दो बोतल तेल लेकर जाता है.’ तेलवाला भी थोड़ा पसीजा- ‘बाबू ऐसा वैसा मत समझिए, मैं तेल सिर्फ एडवांस बुकिंग पर सप्लाई करता हूं. अभी आप मांग लो तो नहीं दे पाऊंगा. लौकी का तेल निकलता ही कितना है! हां नकली चाहे जितना ले लो. सीसामऊ में जौन मिलता है, आप बाबू लोग ही लेते हो, क्या वह असली है?’ कई लोगों ने इस बात की ताकीद की- ‘हां हां, तेल तो इनका असली है, पैसा भले ही ज्यादा जो है सो ऐंठते हों.’ तब तक उसके एडवांस बुकिंग वाले ग्राहक आ गए और एक गंदे थैले से चीकट बोतलें बाहर आने लगीं. एक आदमी ने इशारे से मुझे पास बुला कर कान में कहा- ‘बाबू! कभी कभी जो है सो मर्द और औरत की गर्मी नीचे खलास होने के बजाए ऊपर चढ़ जाती है, दिमाग में, तो आदमी जो है सो एकदम पगला जाता है. लोग समझते हैं कि ये जो है सो ऊपर की हवा है मगर वो नीचे की हवा होती है, समझे ना तब लौकी का तेल काम आता है. थप्पी भर लगाया नहीं खोपड़ी पर कि मामला ठंडा, दिमाग से लेकर नीचे तक सबकुछ रैट. चैन मिलता है खूब नींद आती है मरीज को. कुछ लोग होते हैं जिन की देर तक जो है शादी नहीं होती तो कभी कभी सरशाम हो जाता है तो उनके लिए लौकी का तेल रामबाण है ऐसा समझिए.’ इस मूर्खतापूर्ण चर्चा में मैं कुछ और उलझता कि टैम्पो स्टैंड से सिर झुकाए हुए आती अपनी भावी वाग्दत्ता दिखाई दी और मन कहां से कहां पहुंच गया.

मिल पर धीरे धीरे श्रमिक अशांति के बादल मंड़राने लगे. नई यूनियन की मीटिंगों में भले ही मुट्ठीभर लोग जमा होते हों मगर उसके तेवर तीखे होते जा रहे थे. बोनस दशहरे से पहले बंटता था. पुरानी यूनियन डेढ़ महीने के वेतन पर राजी थी लेकिन नई यूनियन ने इसे नकार दिया और दो महीने के बराबर बोनस की मांग को लेकर जोरदार मुहिम छेड़ दी. असल में सत्ताधारी पार्टी का एक तेज तर्रार युवा नेता इस काम के लिए मैदान में उतारा गया था. न तो वह मिल में काम करता था न ही ट्रेड यूनियन पृष्ठभूमि थी. हां आत्मविश्वास गजब का था. उसने हड़ताल का नोटिस दिया तो यह भेद खुला कि नई यूनियन को गुपचुप मान्यता मिल चुकी थी. पुरानी यूनियन ने इस मान्यता को चुनौती देते हुए याचिका दायर कर दी और श्रमायुक्त कार्यालय के सामने प्रदर्शन करने दल बल सहित गये तो मैदान खाली पाकर वह युवा नेता मिल गेट के सामने तंबू-कनात लगा कर भूख हड़ताल पर बैठ गया. मिल प्रबंधन ने भी कोई आपत्ति नहीं की. अब पुरानी यूनियन के सामने यह धर्मसंकट पैदा हुआ कि ज्यादा बोनस की मांग का विरोध कैसे करे? फिर भी सैद्धांतिक आधार पर इस मांग का विरोध किया गया और ताबड़तोड़ कई मीटिंगें कर के मजदूरों को इसका औचित्य समझाने की कोशिश की गई...उधर भूख हड़ताल पर बैठे नेता के समर्थन में सुबह शाम विधायक-सांसद और जाने माने राजनीति के खिलाड़ी आने- भाषण देने लगे. इस अनशन स्थल पर जो भीड़ रहती थी उसमें बहुत तरह के लोग होते थे लेकिन मिल मजदूर दूर से ही तमाशा देखते थे. बस इसी आश्वस्ति के कारण पुरानी यूनियन मात खा गई क्योंकि भूख हड़ताल के पांचवें दिन मिल प्रबंधन ने दो महीने के वेतन के बराबर बोनस की मांग मान ली. पुराने नेताओं का बरसों के संघर्ष से लगा तंबू इस आंधी में ऐसा उखड़ा कि फिर वापिस नहीं लग पाया. मिल मजदूरों ने नये और युवा नेता को कंधे पर उठा लिया. मिल गेट से ऐतिहासिक विजय जुलूस निकला जिसमें सत्ताधारी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रथारूढ़ हुए.

उसके बाद मिल जैसे दो टुकड़ों में बंट गई. रामऔतार की दूकान पर हंसी खुशी चाय पीते, पकौड़े खाते लोग अब वाक युद्ध में रत रहने लगे. नई यूनियन के समर्थक कुछ ज्यादा ही जोश में रहते थे, जल्दी ही जुबानी जंग मारपीट में बदल गई. पहले गेट के बाहर हुई फिर मिल के अंदर पहुंच गई. बोनस से जेब जितनी गर्म हुई उससे ज्यादा मिल मजदूरों का दिमाग गर्म रहने लगा. जिस दिन बोनस बंटा मिल के गेट पर बाजार क्या अच्छा खासा मेला लग गया. पहली बार किस्तों पर टी वी, फ्रिज और मोटरसाइकिल बेचने वाले स्टाल लगे. जींस, टी शर्ट और मैक्सी विक्रेताओं ने पारंपरिक कच्छे-बनियान-अंगोछे के दुकानदारों को दुबकने के लिए मजबूर कर दिया. मेरे छोटे भाइयों ने अपनी पसंद की जींस और टी शटर्ें खरीदीं. हलवाई की दुकान में तो सुबह से ही जलेबियां छन रहीं थीं. मैं भाइयों को कपड़े और जलेबियां दिला कर मां को मनाने में जुटा. बाइक लेने की तमन्ना जाने कब से सीने में दफन थी लेकिन हालात ऐसे नहीं थे कि एकमुश्त इतनी रकम जुटा पाते. किस्तों पर लेने का यह सुनहरी मौका था लेकिन मां ने दूरदर्शिता का नमूना पेश कर दिया- ‘अरे जहां इतने दिन काटे हैं वहां थोड़े दिन और सबर कर ले. ठीक है दहेज में रुपिया पैसा नहीं दे पाएंगे मगर ऐसे गए गुजरे भी नहीं कि मोटरसाइकिल न दें. हां तुम पहले ही खरीद कर बैठ जाओ तो बात और है. फिर उन्हें नहीं देने का बहाना मिल जाएगा. आजकल तो छोटा से छोटा आदमी भी लड़की की शादी में फ्रिज-टी वी-मोटरसाइकिल सब देता है. जाओ वहां लौकी के तेलवाला खड़ा हो तो सौ ग्राम ले आओ. राम जाने खुश्की है या कोई बलाय है कि सिर दर्द के मारे फटा जाता है.’ मेरी समझ में नहीं आया कि मां की इस होशियारी पर खुश होऊं या नाखुश पर मेरा जी कुछ हल्का हो गया था. मैं लौकी के तेल की तलाश में बाहर आया तो देखा मेरी वुड बी अपने छोटे भाई के साथ दरवाजे पर सिर झुकाए खड़ी है. अब मैं तो एकदम हक्क बक्क, शैतान का नाम लो कि शैतान हाजिर. उसके भाई ने कहा, ‘मम्मी ने कहा है कि मदन भैय्या के साथ जाकर जींस और टाप खरीद लो, जैसी सोनू भैय्या और मोनू भैय्या ने ली है. दीदी को भी लेनी है.’

मां के कान दरवाजे पर ही लगे थे, ‘हां हां, मदन बेटा ये देख लेना कि राजू का कद अभी बढ़त पर है सो इंच दो इंच बड़ी ही दिलाना. हां श्वेता के लिए कोई ऐसी देखना जो चार छै महीने पहन ले तो पैसे वसूल हो जाएं. बाद में कहां पहन पाएगी. और मेरे लिए तेल जरूर लेते आना.’ श्वेता की मम्मी ने ही बताया है कि बहुत आराम मिलता है इसे लगाने से...मैं इस अप्रत्याशित परंतु सुखद दायित्वबोध से मन ही मन पुलकित होते हुए भी ऊपर से परम गंभीरता का चोला ओढ़ कर मिल गेट की ओर आगे आगे चला. मेरे पीछे श्वेता, उसके पीछे राजू. बिल्कुल राम-सीता वन गमन का दृ्श्य।जींस बेचने के लिए कंपनी की मोबाइल वैन आई थी. वहां पहुंचते ही दीदी ने अपना सदैव झुका रहनेवाला दर्शनीय सिर जो उठाया तो फिर फाइनल खरीद तक उठाए ही रखा. इस पूरे प्रकरण में उसने मेरी या राजू की पसंद या सलाह पर रत्ती भर भी

ध्यान नहीं दिया. यहां तक की रंग के मामले में राजू ने अपनी चलाने की कोशिश की तो इतनी जोर से डांटा कि हम दोनों सहम गए. आगे कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई- लौकी के तेल वाले की भी खिंचाई करते हुए उसने कु्छ इस अदा से सौ ग्राम तेल खरीदवाया जैसे वह नकली तेल लेकर उस पर अहसान किया जा रहा हो. वह बेचारा दीदी दीदी करता रहा. हां लौटते समय उसने फिर से सीधी गऊ की तरह अपना सिर झुका लिया. अब बताइये इस अदाकारी पर कौन फिदा नहीं होगा...मजेदार बात यह रही कि पहले मेरी मां ने खरीदे गए कपड़ों का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया और बढ़िया चयन की प्रशंसा की जिसको सुन कर जनकदुलारी मंद मंद मुस्काईं और चोर दृष्टि से, विजयी भाव से मेरी ओर देखा. बाद में सुना कि उसकी मम्मी को भी कपड़े बहुत पसंद आए और वे इस खरीदी में मेरे मार्गदर्शन की मुक्तकंठ सराहना करने मेरे घर आईं. मजेदार बात यह थी कि कपड़े न तो मुझे पसंद थे न राजू को. उससे क्या होता है! मुझे लगा कि मेरा और श्वेता का यह गुप्त रूप से कांपेटिबिलिटी टेस्ट था जिसमें हम दोनों खांटी मध्यवर्गीय मानकों पर खरे पाए गए.

दीवाली तक मिल मजदूर त्यौहारी धुन में मगन रहे. बोनस मानों खुशियां ही खुशियां लेकर आया था. किस्तों पर कई फ्रिज और टी वी खरीदे गए. इस मिल के लिए यह एक नया अध्याय था. एक नई शुरुआत. किस्तों में बेहतर जीवन!

जब नई आर्थिक नीति के अंतर्गत उदारतापूर्वक, देश भर में, उधार पर सभी तरह के ह्वाइट गुड्स धड़ाधड़ बेचे जा रहे थे तो यह मिल कब तक बची रहती. बहरहाल संपन्नता के इस स्वादिष्ट फल को चखने के बाद वर्कर्स में एक नई चेतना जागृत हुई, जिसका सहारा लेकर नई यूनियन ने दीवाली के बाद तनख्वाहें बढ़ाने के लिए प्रबंधन को नोटिस दे दिया. वास्तविकता यह थी कि पिछले दस वर्ष से मिल में वेज रिवीजन नहीं हुआ था. नई यूनियन ने मुम्बई और अहमदाबाद की कपड़ा मिलों के समकक्ष वेतनमान की मांग की थी. पुरानी यूनियन इसका विरोध कैसे करती, मन मसोस कर रह गई. प्रबंधन ने दोनों यूनियनों को वार्ता के लिए बुलाया तो मजदूरों की बांछें खिल गईं. बैठक के पहले गेट पर हुई जनरल बाड़ी मीटिंग में युवा नेता ने छाती ठोक कर कहा कि वह इस मिल में मुम्बई-अहमदाबाद के बराबर वेतनमान बढ़वा कर ही दम लेगा. गेट पर पीपल के पेड़ के नीचे एक नोटिस बोर्ड लगाया गया जिस पर नई यूनियन द्वारा प्रस्तावित वेतनमान प्रदर्शित थे.

मिल मालिकों ने फौरी तौर पर 10 प्रतिशत वेतनवृद्धि की पेशकश की, वह भी इस शर्त पर कि कर्मचारी उत्पादन में भी 10 प्रतिशत वृद्धि करने का लिखित संकल्प दें. पुरानी यूनियन इस पर लगभग सहमत थी लेकिन नई यूनियन ने 25 प्रतिशत से कम पर विचार करने से ही इंकार कर दिया. वह भी उत्पादन बढ़ाने की शर्त के बगैर. बातचीत टूट गई. अगले दिन जब पुराने नेता मीटिंग करके मजदूरों को 10 प्रतिशत वेतन वृद्धि को स्वीकार करने के लिए समझा रहे थे तो उनकी जम कर हूटिंग की गई. जल्दी ही वहां हाथापाई और मारपीट शुरू हो गई. बड़ी मुश्किल से कुछ सदाशयी लोगों ने गर्मागर्मी को शांत किया. अगले ही दिन नई यूनियन ने आमसभा बुलाई जिसे संबोधित करने प्रदेश सरकार के श्रम राज्य मंत्री आये और उन्होंने इस न्यायोचित संघर्ष में श्रमिकों के साथ कंधा से कंधा मिला कर संघर्ष करने का उद्घोष किया तो किसी को रत्ती भर भी संदेह नहीं रहा कि इस लड़ाई में विजय किसकी होने वाली है...और नई यूनियन के नये युवा नेता ने हड़ताल के नोटिस का ऐलान कर दिया।किस्सा कोताह यह कि दीवाली के बाद जब देव नींद से उठे और मांगलिक कार्यक्रमों का सामाजिक सिलसिला आरंभ हुआ तो कुछ दिन बाद शुभ मुहूर्त में काटन मिल में हड़ताल हो गई- इस मिल में लोग बताते हैं कि पहले भी कई बार हड़ताल हुई थी मगर उसको लेकर न तो इतने स्वप्न थे न ही अपेक्षाएं. हालत यह थी कि रोजाना सारे दिन चलने वाली गेट मीटिंग में सुबह से शाम तक मिल वर्कर बैठे रहते थे और सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से चाय नाश्ते का भंड़ारा चलता रहता था. राम औतार हलवाई की कढ़ाई दिन भर चढ़ी ही रहती थी और पकौड़े निकलते रहते थे.- सच तो यह है कि हमारे घर में यह एक स्थाई नाश्ता हो गया था. मां कहती, ‘जब इतनी अच्छी सुविधा मौजूद है तो मैं क्यों चूल्हे पर चढ़ी रहूं. अब तो नई बहू आएगी तो वही बनाएगी कुछ नया, तब तक पकौड़ों से ही काम चलाओ.’

पुरानी यूनियन ने हड़ताल का समर्थन नहीं किया और वर्कर्स से काम पर आने का आह्वान किया. लेकिन बढ़े हुए बोनस और वेतन में 10 प्रतिशत वृद्धि की पेशकश ने कर्मचारियों को ही नहीं अफसरों को भी डांवाडोल कर दिया था. मुश्किल से 50-60 लोग जनरल शिफ्ट में हाजिरी लगवाने जाते थे. बाकी शिफ्टों में काम बंद था. उधर गेट मीटिंगों में दिनों दिन रौनक बढ़ती जा रही थी. रोजाना कोई न कोई वी आई पी अपने लाव लश्कर के साथ वहां हड़तालियों को समर्थन देने पहुंच रहा था. मिल मजदूरों को ही नहीं हम जैसे आस पास रहने वालों को भी उम्मीद हो गई थी कि जल्दी ही वेतन वृद्धि पर समझौता हो जाएगा. इन्हीं दिनों मौका देख कर गर्ग साहब ने एम एस सी फाइनल में बैठने जा रहे मेरे छोटे भाई की एप्लीकेशन मिल में लगवा दी थी. उन्हें इस संबंध में चीफ कैमिस्ट से पक्का आश्वासन मिल चुका था. मां ने भी चुपचाप अपने विश्वसनीय दुलारे ज्वैलर्स के यहां आना जाना शुरू कर दिया. अभी इस संभावना पर नीतिगत दृष्टि से गोपनीयता का आवरण पड़ा था इसलिए आस पड़ोस में किसी को कानों कान खबर नहीं लगी थी. हां गर्ग कन्या कुछ ज्यादा ही सिर झुका कर चलने लगी थी. गर्ग परिवार के बारे में तो यह सुना जाता था कि उन्होंने शादी की पूरी तैय्यारी पहले से ही कर रखी है. -बस मिल में हालात सामान्य होने की प्रतीक्षा थी. वेतन वृद्धि हमेशा किसी पिछली तिथि से लागू होती है और अच्छा खासा एरियर मिला करता है. गर्ग साहब इन्हीं घटनाओं पर निगाह लगाए हुए होंगे.

प्रदेश के श्रमायुक्त ने (संभवतः सरकार के निर्देश पर) मिल प्रबंधन और यूनियनों की त्रिपक्षीय बैठक बुलाई और समझौते के लिए जोर डाला. मिल मालिकों ने हाथ खड़े कर दिए. उनकी बैलेंस शीट के हिसाब से मिल घाटे में चल रही थी और 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि भी तभी संभव थी जबकि उत्पादन बढाया जाए और सरकारी विभागों से कपड़े की आपूर्ति के आर्डर मिलें. वे एडहाक के रूप में भुगतान के लिए तैयार थे अगर उत्पादन बढ़ाने का करार हो जाए. नई यूनियन ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह नकार दिया और 25 प्रतिशत वृद्धि की मांग पर अड़े रहे. वार्ता विफल हो गई तो पुरानी यूनियन ने काम पर आने और 10 प्रतिशत एडहाक वृद्धि को स्वीकार करने की घोषणा कर दी मगर मिल प्रबंधन नई यूनियन के बगैर किसी किस्म के समझौते के लिए तैयार नहीं था. -इस द्वंद्वात्मक स्थिति ने अगले रोज मिल के गेट पर हुए खून खराबे की भूमिका बना दी.

दूसरे दिन सुबह शिफ्ट शुरू होने के समय, पुरानी यूनियन के करीब सौ सवा सौ वर्कर और अधिकारी अंदर जाने के लिए गेट पर पहुंचे तो उन्हें बलपूर्वक रोका गया. कुछ देर तक गर्मा गर्मी, गाली गलौज होती रही जो अंततोगत्वा मारपीट में बदल गई. देखते ही देखते लाठी डंडे और पत्थर चलने लगे. सुनियोजित ढंग से कुछ नेताओं और अफसरों को बुरी तरह पीटा गया. पुलिस के आने तक कई लोग घायल हो चुके थे, कुछ तो वहीं धराशायी हो गए. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिले के बड़े अधिकारी फौज फाटे के साथ वहां पहुंचे. दोनों यूनियनों और आफीसर एसोसिएशन की तरफ से एक दूसरे के खिलाफ रिपोटर्ें दर्ज कराई गईं. मिल के चीफ सीक्योरिटी आफीसर ने भी लिखित में रिपोर्ट दी और मिल की सुरक्षा की मांग की. घायलों को एम्बुलेंस से जिला अस्पताल भेजा गया और मिल के गेट पर पी ए सी की दो बटालियनें लगा दी गईं. दोपहर होते होते मैदान साफ हो गया. इस पूरी महाभारत के दौरान नई यूनियन का नया और युवा नेता किसी को भी नजर नहीं आया. रात को पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह फरार हो चुका था. बाद में पता चला कि उसने पहले ही अदालत से एंटीसिपेटरी बेल (पेशगी जमानत) ले रखी थी. खैर नई-पुरानी यूनियनों के दो दर्जन से अधिक नेता रात में धर लिए गए. कई दिन बाद जब वे लौट कर आए तो खेल खतम हो चुका था. मिल मालिकों ने हिंसा, खून खराबे और लगातार बढ़ते घाटे को आधार बना कर तालाबंदी घोषित कर दी थी जिसके विरोध में यूनियन की आड़ में प्रदेश में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल ने संगठन स्तर पर मोर्चा संभाल लिया. मिल गेट के सामने सड़क पार मैदान में जबर्दस्त आंदोलन कई महीने चला जिसमें श्रमिकों को ढाढ़स बंधाने स्वयं मुख्य मंत्री तक आए मगर मिल मालिकों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. उन्हें राजधानी बुला कर हड़काया गया तो वे सिर्फ एक रुपये में सरकार को मिल बेचने के लिए तैयार हो गये. लेकिन कोई सरकार इस आफत को मोल लेने के लिए तैयार नहीं हुई. न केंद्र में न प्रदेश में. दोनों इसके पहले ही घाटे में चल रही मिलों का अधिग्रहण करके अपनी उंगलियां जला चुकी थीं और बैठे ठाले कर्मचारियों को रुला रुला कर, किसी तरह वेतन दे रही थीं. कुछ को बैंकों से ऋण दिलवा कर उत्पादन शुरू करवाया लेकिन कुशल प्रबंधन और नई तकनीक के अभाव में घाटा तथा बैंक का ब्याज निरंतर बढ़ते गए गए. ऐसी कई मिलों की कुर्की की नौबत आ चुकी है. -चूंकि तालाबंदी पुख्ता कानूनी आधार पर की गई थी इसलिए पुरानी यूनियन इसे अवैध करार दिये जाने का मुकदमा हार गई. मिल के नोटिस बोर्ड पर कर्मचारियों के बकाया भुगतान की सूचना चस्पा हो गई तो वे आसमान से गिरे. पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि वे ठगे गए हैं. पहली बार युवा नेता की जम कर हूटिंग हुई. उसने भी अपना ब्रम्हास्त्र निकाल लिया. वह अपनी पहुंच के एक प्रभावशाली केंद्रीय मंत्री को हाथ पैर जोड़ कर गेट मीटिंग में ले आया. इस मीटिंग का इतना प्रचार किया गया कि मिल मजदूर ही नहीं, मीडिया और पार्टी संगठन के लोगों का भारी जमावड़ा हुआ. मंत्री महोदय तालाबंदी से बेरोजगार हो गए हजारों मजदूरों को मरणांतक स्थिति से बाहर निकालने का कारगर फार्मूला ले कर आये थे. उन्होंने मजदूरों का आह्वान किया कि सरकार के भरोसे रहने के बजाए वे प्रारंभिक पूंजी स्वयं जुटाएं. उनका भविष्य निधि और ग्रेच्युटी का जितना भी पैसा है उसे शेयर लेने में लगाएं और स्वयं मालिक बन कर चलाएं. प्रदेश और केन्द्र की सरकारें इसमें हर तरह से मदद करेंगी. मंत्री जी के इस अनोखे प्रस्ताव पर तालियां तो बजीं मगर पुरानी यूनियन को मजदूरों के बीच अपना खोया हुआ आधार वापिस पा लेने का स्वर्णिम अवसर आखिर मिल ही गया.

पुरानी यूनियन ने मिल वर्करों के पी एफ और ग्रेच्युटी पर ‘डाका’ डालने की इस तथाकथित साजिश को ले कर हंगामा मचाया कि नई यूनियन को जवाब देना मुश्किल हो गया. धीरे धीरे बहुत से मजदूर अपने गांव चले गए. यहां रहने का मतलब था बची खुची रकम से भी हाथ धोना. मिल खुलने की आशा क्षीण होती जा रही थी. सीक्योरिटी और कुछ जरूरी सेवाओं को छोड़ कर बाकी सबकी छुट्टी हो गई थी. मुश्किल उन मजदूरों की थी जिनके पास वापिस जाने के लिए कोई गांव नहीं था. उन्हें तो यहीं जीना मरना था. जिनके ऊपर मिल की नौकरी का मुलम्मा ज्यादा नहीं चढ़ा था उनमें से कुछ फुटपाथ या ठेले पर दुकान करने लगे तो कुछ किराए पर रिक्शा चलाने लगे. अब मिल खुले या बंद रहे इनकी बला से. जो लोग यह नहीं कर सकते थे वह रात दिन चिंता में डूबे हुए मिल से मिले आखिरी भुगतान की रकम को धीरे धीरे कुछ इस तरह से खा रहे थे जैसे कोई गुनाह किए जा रहे हों. अफसरों ने भी

इधर उधर नौकरी ढूंढ़ना शुरू कर दिया था. उनमें जो टैक्निकल हैंड थे उन्हें तो मुश्किल नहीं थी मगर गर्ग साहब जैसे कहां जाते? पूरे देश में एक एक करके मिलें बंद होती जा रही थीं तो श्रम कल्याण अधिकारियों का कल्याण होना टेढ़ी खीर थी. अब कुछ न कुछ तो करना था, वह पुराने एल एल बी थे, कुछ दिन वकालत भी की थी सो घर बैठने के बजाए एक परिचित वकील के बस्ते पर जाकर बैठने लगे. ठाली से बेगार भली! हमारे घर में अब यह एक अप्रिय प्रसंग हो गया था. अव्वल तो कोई यह राग छेड़ता ही नहीं था लेकिन अगर गलती से छेड़ ही दे तो मां का मूड एकदम खराब हो जाता. उनका सिर दर्द से फटने लगता. दर्द से कराहते हुए वे कहतीं, ‘अरे वह लौकी के तेल वाला कहीं दिखाई दे तो जरूर ले लेना. उससे बड़ा आराम मिलता है.’

कुछ महीने मीटिंगें, भाषणबाजी और हवाई आश्वासनों के सहारे मिल के गेट पर तथाकथित संघर्ष चलता रहा फिर जैसे सब टांय टांय फिस्स हो गया. नई यूनियन के उदीयमान युवा नेता यकायक विलुप्त हो गए. उन्हें कोई खोजना भी नहीं चाहता था. एक अपुष्ट अफवाह यह थी कि मिल बंद कराने के लिए लाला ने उन्हें लाखों रुपये दिए हैं. अचानक बोनस की मांग को लेकर यह युवा नेता आसमान से नहीं टपके थे, बाकायदा योजनाबद्ध ढंग से भेजे गए थे. आगामी चुनाव के लिए पार्टी को पैसा चाहिये था और मिल मालिकों को मिल की जमीन जिसकी कीमत आसमान छू चुकी थी. दशकों पहले कौड़ियों के भाव ली गई जमीन अब सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बन चुकी थी...देखिये अफवाहें भी निराधार नहीं होतीं. जब मिल को चलवाने की खींचतान ठंडी पड़ गई तो एक दिन ट्रक भर कर कारीगर मिल में आए और मशीनें खोलने-उखाड़ने लगे. यह खबर फैली तो कुछ नेता और मिल वर्कर गेट पर पहुंच कर हो हल्ला करने लगे. सीक्योरिटी ने उन्हे अंदर नहीं घुसने दिया. गार्ड्स से

धक्का मुक्की हुई तो आनन फानन में ट्रक भर कर पी ए सी आ गई. कुछ लोग धरना देकर बैठ गए लेकिन अंदर काम चलता रहा. नेताओं ने प्रतिज्ञा की कि मशीनें गेट से बाहर नहीं जाने देंगे. दो तीन दिन बाद मशीनें खोल कर वह टीम चली गई तो दीवारें गिरा कर मलबा बनाने वाले मजदूर आ गए. अंदर तोड़ फोड़ होती रही और बाहर धरना. नतीजा यह कि गेट से बाहर कुछ भी नहीं जा सका. मिल मालिकों को भी ऐसी जल्दी नहीं थी. उनका मकसद पूरा हो गया था. मिल का पूरी तरह संहार हो चुका था. मलबा तो कभी न कभी निकल ही जाएगा.

सच पूछा जाए तो कहना होगा कि इतनी बड़ी और चलती हुई अच्छी खासी मिल के बंद होने को किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया जब तक बेआसरा हो गए बेचेहरा मजदूरों में से एक ने, कर्ज में डूब कर, आत्महत्या न कर ली. उसकी मृत देह को नेता लोग मिल गेट के सामने रख कर धरने पर बैठ गए. एक बार फिर से वातावरण में उत्तेजना व्याप्त हो गई. जिला प्रशासन सक्रिय हुआ और एक त्रिपक्षीय वार्ता की भूमिका बनी.

जिलाधिकारी ने अहैतुक कोष से पीड़ित परिवार को अनुग्रह राशि प्रदान किए जाने की घोषणा करके बलि का बकरा बने कामगार की अंत्येष्टि करवाई. -त्रिपक्षीय वार्ता की खबर पाकर बहुत से लोग अपने घर-गांव से लौट आए. वार्ता में मिल मालिकों ने मिल को फिर से एक रुपये में (समस्त देनदारियों के साथ) हस्तांतरित करने का प्रस्ताव रखा, चाहे सरकार ले ले या मजदूर यूनियन. सरकार की ओर से पुनः सुझाव दिया गया कि सभी कर्मचारी और अधिकारी अपना अपना अंशदान देकर मिल को सहकारिता के अधार पर चलाएं. प्रशासन की ओर से सभी प्रकार की संभव सहायता दी जाएगी. यहां तक कि संचालन के प्रारंभिक वषरें में बिक्री कर आदि में छूट भी दिलवाई जा सकती है. मगर उस वार्ता में शामिल तीनों पक्ष जानते थे कि चील के घोंसले में मांस नहीं बचा है. ज्यादातर मजदूर ही नहीं अफसर भी पी एफ और ग्रेच्युटी की राशि का बड़ा हिस्सा जिंदगी की निरंतर जलती भट्टी में झोंक चुके हैं. उसके बाद रह रह कर तीन या चार आत्महत्याएं और हुईं मगर अखबारी बयानबाजी में घड़ियाली आंसू बहाने के अलावा और कुछ नहीं हुआ. सही बात तो यह है कि कुछ हो भी नहीं सकता था. कुशल शिकारियों के एक मिले जुले दल ने पेशेवर हांकने वालों को लगा कर, आराम से ऊंची मचान पर सुरक्षित बैठ कर अपनी विश्वसनीय बंदूकों से अचूक निशाना साधा था. इनके काटे का कोई उपाय नहीं था. शिकार ढेर हुआ पड़ा था, बस उसे बांस पर लटका कर ले जाना और खाल उतार कर उसमें भूसा भरवाना ही बाकी था. -हमेशा गुलजार रहने वाले मिल गेट के सामने अब इक्के दुक्के बैठकबाज ही रामऔतार की दूकान पर चाय के बहाने, लगभग मातमी माहौल में, कभी लाला को, कभी नेताओं को तो कभी भाग्य को कोसते नजर आते थे. वह बड़ी कढ़ाई जिसमें हर समय पकौड़े बनते रहते थे दुकान के सामने मंजी धुली पड़ी रहती थी. रामऔतार का

धंधा ही नहीं दिल भी बैठ गया था, जाने कितने लोग उधार खाकर भाग गये थे. जो नहीं भागे उनसे वसूली की कोई उम्मीद नहीं थी. एक दिन दुकान पर बैठे बैठे ही रामऔतार को दिल का दौरा पड़ा और वह हताशा की भयावह यंत्रणा से हमेशा के लिए छुटकारा पा गया. उसकी औरत के दारुण चीत्कार उजड़े हुए दयार में देर तक गूंजता रहा. फिर कुछ दयानतदार लोग उसके अंतिम संस्कार के लिए चंदा जुटाने में लगे.

मां भले ही ऊपर से बेरुखी का आवरण ओढ़े रही हों लेकिन अंदर से उनका दिल बहुत नर्म था. जब गर्ग परिवार एकदम निरुचेष्ट होकर बैठ गया तो उन्हें अखरने लगा. मिल बंद होने के बाद उन लोगों की तरफ से बराबर संकेत आते रहे थे कि इस आपदा से मांगलिक अनुष्ठान पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, यथाशक्ति डीसेंट मैरिज करेंगे, हां अगर मिल चल जाती तो निश्चित रूप से सोने पर सुहागा होता. छोटे भाई की नौकरी के लिए गर्ग साहब ने पूरा जोर लगा दिया था, हो भी जाती सभाव और परोक्ष रूप से की गई टिप्पणियों के माध्यम से यह जता दिया कि हम लोग तो दोनों तरह से नुकसान में रहे. बगैर दान-दहेज के संबंध इस लिए मंजूर किया था कि चलो एक लड़का ठौर-ठिकाने से लग जाएगा, अब उससे भी गए. अब तो समझो जो करना है सैंत-मैंत में करना है. आगे की भी कोई आस उमीद नहीं दिखाई देती...धीरे धीरे मामला ठंडा पड़ता गया और असंवाद की स्थिति पैदा हो गई. मुझे और पिताजी को यह न्यायोचित नहीं लगा लेकिन यह पूरी तरह मां के अधिकारक्षेत्र का विषय था. -मिल मजदूरों के साथ हो रही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से मां विचलित होती गईं. अगर कोई मिल कर्मचारी ठेला लेकर कुछ बेचने आता तो उससे बगैर भाव ताव किए सौदा खरीद लेतीं. गर्ग परिवार की लंबी चुप्पी से वे मन ही मन बैचेन थीं मगर मौन साधे रहीं. अपने दिल के बात दिल में ही रखे रहीं. हम लोगों को जरा भी अहसास नहीं हुआ कि वे व्यथित हैं और चाहती हैं कि उस ओर से बात चलाई जाए.

एक दिन अचानक उनके सब्र का बांध टूट गया. जिस दिन मिल से मलबा लद कर बाहर जा रहा था उन्होंने महरी के बहाने पूरे घर को सुना कर कहा, ‘किसी के दिए-लिए से किसी का घर भरता है क्या? जिसके पूत कमाऊ हों उसे किसी से कुछ मांगने-तूंगने की भला क्या जरूरत है?’ हम लोग सुन कर पहले तो हैरान हुए फिर मन में खुशी की लहर दौड़ गई. दोनों घरों में वही महरी बर्तन मांजती थी. वह काम करके जाने लगी तो मां ने उसे कुछ खाने का सामान देते हुए कहा, ‘अरी गर्ग मेम साब को कहना कि श्वेता को भेजें एक दिन. महीनों हो गए लड़की का मुंह देखे. कोई कुछ समझता हो तो समझे, मैं तो उसे अपनी बेटी की तरह मानती हूं.’ महरी पल्लू कमर में खोंस कर मुस्कुराती हुई चली गई. तभी किसी ने बाहर ‘ताजा मुलायम लौकी ले लो’ की आवाज लगाई. मां ने मुझे बाहर जाकर उसे रोकने को कहा. शायद लौकी की जरूरत थी.

बाहर निकल कर मैंने साइकिल के कैरियर पर टोकरा लादे लौकी वाले को आवाज दे कर बुलाया. उसका चेहरा देख कर मैं हैरान रह गया. वह वही व्यक्ति था जो गेट पर लौकी का तेल बेचने आता था. मैंने पूछा तो हंस कर बोला, ‘मिल क्या बंद हुई मेरा तो धंधा ही ठप्प हो गया. गांव-देहात के मजदूर तेल खरीदते थे अब उन्हें ही खाने के लाले पड़ गए हैं. शहरी लोग लौकी-कद्दू के तेल की तासीर नहीं जानते. अब कटरी से सुबह सुबह ताजा लौकी लेकर आता हूं आप लोगों की सेवा के लिए. पेट भरने के लिए कुछ तो करना है कि नहीं!’ तब तक मां आ गईं. उन्हें बताया कि यही है लौकी के तेल वाला तो उन्होंने उससे एक बोतल तेल लाकर देने के लिए कहा. उसने खुश होते हुए कहा, ‘मांजी आज तो लौकी की सेवा ले लीजिए किसी दिन आपको शुद्ध तेल लाकर भी दूंगा. उधर गर्ग मेमसाहब ने भी आर्डर दिया है. वो भी आपकी तरह सिरदर्द से परेशान हैं.’

उपसंहार...उसी दिन शाम को श्वेता हमारे घर आई और बहुत देर तक मां से बातें करती रही. बाद में मां ने ज्यादा तो नहीं लेकिन इतना बताया कि गर्ग साहब की नौकरी चेन्नई की एक कपड़ा मिल में लग गई है और जल्दी ही वहां जाने वाले हैं. वहां मिल में भर्ती करने का काम भी इन्हीं के पास होगा. उस रात चेन्नई की दूरी की बात सोच सोच कर मां के सिर में भयंकर दर्द हुआ लेकिन अब लौकी का तेल कहां था. भगवान जाने वह तेल लेकर कब आएगा?

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