बुधवार, 5 अप्रैल 2017

प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / उनका मन / देवेन्द्र कुमार मिश्रा

कहानी

उनका मन

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

सा पहली बार नहीं हुआ. पहले भी हो चुका है. हां, लोग इसे अच्छी नजरों से नहीं देखते. समाज इस तरह के रिश्तों को बेमेल, अनैतिक कहता है. बहुत हद तक इस सम्बंध, जिसे आप प्यार कहते हैं, शादी कहते हैं, इनकी उम्र कितनी होती है. महज आकर्षण है, वासना है या कुछ और...

क्या पूर्व समय में 50 का दूल्हा और 20 या 25 की दुल्हन का विवाह नहीं हुआ है. वजह धर्म रहा हो या धन या अभी ऐसा हो नहीं रहा है. क्या शिष्या गुरू में विवाह नहीं हुए हैं? फिर ये वे गुरुवर्य तो नहीं हैं. ये तो आम आदमी हैं, त्रस्त और परेशान, पीड़ित. इन्हें गुरु की बजाय शासकीय कर्मचारी शिक्षक, प्रोफेसर कहें तो ज्यादा अच्छा है. फिर कई लोगों पर बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम वाली बात भी सिद्ध होती है. कई बुजुर्गवार हैं जिनके दिल अभी भी जवान हैं. हां हमारे शासकीय प्राध्यापक चतुरसेन की दिलेरी है ये तो कि प्यार भी किया और खुलेआम स्वीकार भी. प्यार की जगह लफड़ा भी कह सकते हैं. अब इस तरह के सम्बंधों को यदि मीडिया दिखाये तो फिर वो घटनायें हो जाती हैं. फिर ऐसी चटपटीदार घटना का जनता जनार्दन में चर्चा का विषय होना स्वाभाविक ही है. विरोध किये बगैर नहीं जी सकते.

58 वर्ष के चतुरसेनजी जो कि रिटायर होने की दहलीज पर हैं...साधारण सी शक्ल सूरत वाले. 58 की उम्र में जो एक व्यक्ति के लक्षण होने चाहिए, पूरे के पूरे हैं. मसलन बचे-खुचे सफेद बाल. मुंह में दांतों का अकाल. पिलपिली सी चमड़ी. नजर का चश्मा. चार जवान बच्चे. एक बीबी, पूर्ण गृहस्थन, ठीक-ठाक. चतुरसेन जी के बच्चों की उम्र की मौली चतुरसेनजी की शिष्या. नई उम्र, खूबसूरती. फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली. क्या उम्र होगी 20 या 22 वर्ष, पर कानूनी दृष्टि से बालिग. कॉलेज में एम.ए. कर रही है. मतलब उच्चशिक्षित. पर कहते हैं कि समझ अनुभव से आती है और अनुभव उम्र से. शिक्षा भर से आती तो क्या मौली ऐसी हरकत करती? अब क्या करें? दिल है कि मानता नहीं. फिर एक कहावत है. मेढकी से दिल लगा तो परी क्या चीज है? इसे थोड़ा उलट लीजिए मौली के हिसाब से. मेंढक पर दिल आया तो चतुरसेन क्या चीज है?

मौली कहती है कि वह बालिग है. पढ़ी-लिखी है. समझदार है. वह अपने निर्णय खुद ले सकती है. वह जो कर रही है. उसकी अपनी इच्छा है. किसी प्रकार का कोई दवाब नहीं. वह अपना भला-बुरा समझ सकती है. स्त्री शिक्षा, स्त्री शक्ति, स्त्री स्वतंत्रता वाली सभी बातें. समाज का क्या है? करते रहो- हाय-हाय. जलाते रहो पुतला.

इधर चतुरसेन की धर्मनिष्ठ पत्नी रूपा का कहना है कि उनका आदमी तो सज्जन है. इस कमीनी मौली ने अपने रूप, जवानी के जलवे से सीधे-सीधे उनके पति को फांस लिया है. इसी वजह से धर्मनिष्ठ पत्नी रूपा ने अपने पति को कुछ कहने की बजाय एक बार कॉलेज में, एक बार अपने घर में मौली की धुनाई की. औरत जात जो ठहरी, औरत को ही कोसेगी. कुतिया, कमीनी, चरित्रहीन, वेश्या न जाने क्या-क्या कहा? मीडिया वालों ने तो बाकायदा मौली की धुनाई होते हुए चित्र भी प्रसारित किये और बच्चे बेचारे शर्म से इधर-उधर मुंह छिपाये घूमते रहे. कहीं कोई मीडिया वाले उनसे उनके पिता की करतूत पर प्रश्नोत्तर न करें. जैसे लड़का कितना भी खराब हो, मां हमेशा अपनी बहू को ही कोसेगी. लड़के को नहीं. ऐसे ही चतुरसेन को छोड़ रूपा ने मौली की ही करतूत बताई. अब ऐसी पतिभक्त पत्नियां हो तो आदमी को काहे की टेंशन, चिंता.

मौली ने एम.ए. फाइनल हिंदी साहित्य में दाखिला लिया तो उसके प्रोफेसर थे चतुरसेन. चतुरसेन को धीरे-धीरे आभास हुआ कि इस उम्र में कोई उनकी तरफ ध्यान दे रही है. तब से वे थोड़ा सज संवरकर आने लगे. इससे पहले, इस आभास के पहले, वे ठीक उसी ढंग से रहते थे जैसे 58 वर्ष का पुरुष रहता है. करते भी क्या बेचारे? उनकी पत्नी रूपा जब देखो उनसे झगड़ती रहती. रूपा का ध्यान बच्चों पर ही रहता. चतुरसेन को तो घर में सुबह अपने साथ-साथ पत्नी-बच्चों के और घर-गृहस्थी के काम भी करने होते. सुबह पानी भरना. गैस की टंकी लाना, फोन का बिल, बिजली का बिल, अनाज, राशन का सामान लाने से लेकर सुबह का दूध लाने तक. कई बार तो पत्नी को, बच्चों को चाय बनाकर भी देना पड़ता. बच्चों को केवल रुपयों से मतलब रहता. कॉलेज की फीस हो या जेब खर्च. बस तभी पिता याद आते. पत्नी थी कि जमाने भर का गुस्सा पति पर उतारती. जमाने भर की शिकायतें भी. पड़ोसी के घर में ये है. हमारे घर में नहीं है वगैरा-वगैरा. शिकायत ये भी रहती कि बाकी के प्रोफेसर ट्यूशन, कोंचिंग, पेपर सुधारने के नाम पर कितना पैसा बना रहे हैं और चतुरसेनजी निरा मूर्ख. ईमानदारी के पुजारी. चार बच्चों का परिवार. कल बच्चों की शादी करना. पड़ोसियों की रईसी के हिसाब से खुद को मेंटेन करना है. ऐसे में क्या इज्जत रह जायेगी उनकी? पर चतुसेनजी है कि कुछ समझते ही नहीं, मूर्ख कहीं के.

सो चतुरसेनजी को अक्सर जली-काटी सुननी पड़ती. जीवन जैसे बेरंग हो चला. अस्वाद भोजन और रंगहीन जीवन एक सा. मौली हिंदी के प्रोफेसर चतुरसेन की सादगी से प्रभावित थी. उनकी वाकपटुता से भी. उनकी बुद्धिमानी से भी. चतुरसेन जी कॉलेज में कोई प्रश्न पूछते तो मौली सबसे पहले जवाब देती सम्मान सहित. बहुत से छात्र तो गंवार किस्म के थे. जो न तो चतुरसेन की इज्जत करते, न सम्मान. बल्कि मजाक उड़ाते रहते. चतुरसेन मजाक से तिलमिलाते नहीं थे. कई छात्रों का तो कहना ही ये था कि हिंदी कोई पढ़ने, सर छपाने का विषय है. ये तो टाईमपास है. केवल डिग्री लेने के लिए उन्होंने हिंदी साहित्य लिया.

चतुरसेन से छात्रों को इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि उन्हें उत्तीर्ण करवाएं अच्छे नंबरों से. सो वे तो उन प्रोफेसरों को पैसा और मान देते जो उनके रिजल्ट सुधारे. चतुरसेन तो गोबर गणेश ठहरे. ये किस काम के और काम के नहीं तो इज्जत भी नहीं. बहुत से छात्र तो उनका पीरियड गोलकर सिनेमा चले जाते. क्लास रूम में मौली ही उनकी तरफ एकटक देखती सुनती-पढ़ती. अन्य छात्र-छात्रायें या तो धीरे-धीरे आपस में बतियाते. आपस में मजाक करते, चिढ़ाते एक-दूसरे को. कुछ कॉपियों में उल्टे-सीधे चित्र बनाते और कुछ प्रेम-पत्र लिखते.

ऐसे में किसी एक खूबसूरत जवान पढ़ी-लिखी लड़की का चतुरसेन को सम्मान देना उन्हें सुनना काफी था, चतुरसेन का ध्यान खींचने के लिए. रही बात मौली की. तहसील स्तर पर बी.ए. किया. आगे पढ़ने की इच्छा थी. घर का माहौल भी उसे कुछ रास नहीं आया. पिता से 15 साल छोटी मां. पिता 50 के मां 35 की. पिता अपनी उम्र के हिसाब से सज्जन, शांत, धीर, गंभीर. सादा जीवन उच्च विचार वाले और मां अपनी उम्र के हिसाब से चंचल, चपल, हंसी मजाक करने वाली. सजने संवरने में मस्त.

मां और उसके पिता की कम ही बनती थी. मां कभी पड़ोसन के जवान होते लड़कों के साथ सिनेमा, बाजार जाने में भी संकोच नहीं करती. जिस रुचि और निगाह के साथ पति को देखना चाहिए, वैसी रुचि और निगाह उसकी मां की लड़कों में होती. शायद उसे अपने 50 वर्षीय पति से वो सब कुछ न मिल पा रहा हो जो वो चाहती थी. पिता को इस बारे में उसने कभी मां को टोकते हुए भी नहीं देखा. पता नहीं शायद इसी कारण मां उसे कुछ अच्छी नहीं लगती.

एक-दो बार उसने मां को समझाया तो मां ने मौली को ये कहते हुए डांटा-फटकारा- ‘‘तुम बेटी होकर मां को नसीहत देती हो. मेरा हंसना, बोलना, घूमना अच्छा नहीं लगता. एक तो ऐसा पति मिला, फिर ऐसी लड़की.’’ कई दिनों तक घर का माहौल बोझिल रहता. मौली फिर मां से कुछ नहीं कहती.

अपने पिता के शांत, गंभीर, सादा जीवन से वह बहुत प्रभावित थी. उसने 15 वर्ष की उम्र में जाना बुजुर्ग व्यक्ति धोखा नहीं दे सकता. उनमें चंचलता नहीं होती. उनमें होती है गंभीरता, ईमानदारी, सहन करने की क्षमता. जवान व्यक्ति का कोई भरोसा नहीं. जवान उसकी मां की तरह होते हैं. उसके हमउम्र कॉलेज में साथ पढ़ने वाले लड़के कभी इस लड़की के साथ कभी उस लड़की के साथ. बेईमान कहीं के.

अपने पिता की छवि उसने प्रोफेसर चतुरसेन में दिखाई दी. इकलौती लड़की होने के बाद भी मौली की इच्छा पर पिता ने उसे एम.ए. के लिए जिले के कॉलेज में दाखिल करवा दिया और छात्रावास में रहने खाने का इंतजाम भी. हर महीने रुपये पैसे भी भेजते.

प्रोफेसर चतुरसेन और मौली. कभी पढ़ाई के नाम पर. कभी ट्यूशन, कभी कॉलेज की पिकनिक के नाम पर एक-दूसरे से मिलते रहे. बातचीत होती रही और कब एक-दूसरे के इतने करीब आ गये कि दोनों को पता भी न चला. समाज, घर-परिवार दुनियादारी का उन्हें ध्यान ही नहीं आया. दोनों एक साथ घूमते-फिरते. बगीचे में बैठकर घंटों बातें करते. सिनेमा देखते. कभी चतुरसेन मौली की गोद में सिर रखकर दुनिया भूल जाते. कभी मौली चतुरसेन के सीने से लगकर अपने को शांत, हल्का महसूस करती.

मगर समाज की दो नहीं, दो हजार आंखें होती हैं और मुंह तो पूछो मत...लाखों-करोड़ों. खुसर-पुसर होने लगी. वे चलते तो लोग हंसते. वे मिलते तो समाज के ठेकेदार सिर फोड़ने को तैयार. किसी ने चतुरसेन की स्त्री रूपा के कान भर दिये. रूपा ने भरे बाजार में अपने चारों लड़कों को सामने खड़ा कर मौली की पिटाई कर दी. लड़के पिता को डांटते घसीटते घर ले आये. मौली रोते-रोते छात्रावास पहुंची.

दूसरे दिन अखबार वालों ने खूब मजे ले लेकर इस खबर को छापा. लोगों ने मजे लेकर पढ़ा. चूंकि चतुरसेन को कॉलेज पढ़ाने तो जाना ही पढ़ता, वहीं मौली से मुलाकात भी हो जाती. मौली भी कोई डरपोक लड़की नहीं थी. उसने स्वयं को गलत माना ही नहीं. सो उनका मिलना जारी रहा. अखबार छापते रहे. लोग हंसते रहे. उनके पुतले जलते रहे. इलैक्ट्रॉनिक मीडिया भनक लगते ही पहुंच गई. प्रोफेसर चतुरसेन और मौली से सीधी बात की. चतुरसेन की स्त्री से बात की. आस-पड़ोस से बातें की. कुल मिलाकर चतुरसेन का अपनी छात्रा से प्रेम स्वीकार करना और मौली का अपने प्रोफेसर से प्रेम का इकरार करना, दोनों का इसे गलत न मानना. मौली का अपनी उम्र, प्रोफेसर की उम्र का अंतर को महत्व न देना. दोनों का खुश रहना एक-दूसरे के साथ और इसका टी.वी. चैनलों पर सीधा प्रसारण. यह प्रेम-प्रसंग एक घटना बन गई.

नैतिकता की दुहाई देने वाले धार्मिक, सामाजिक संगठनों की बैठकें हुईं. निन्दा हुई. अखबार में बड़े-बड़े कॉलम छपने लगे. चौराहों पर बहसें होने लगीं. मीडिया वालों ने अपने कार्यक्रमों- सीधी बात, परिचर्चा में इस विषय को रखा. जमकर आलोचना हुई. इसे अनैतिक, अवैध संबंधों का नाम दिया गया.

मौली के पिता तक बात पहुंची. मां चीखी चिल्लाई, पिता खामोश रहे. हजारों विरोध, बंदिशों के बाद भी वे मिलते रहे. उन्हें नहीं लगा कि वे कुछ गलत कर रहे हैं. हालांकि चतुरसेन ने उम्र के इस अंतर को समझा. वे ये भी जान गये थे कि इस तरह मौली के जीवन से खिलवाड़ होगा. अब बस...मौली भी समझती थी उम्र के अंतर को. उसने अपने जीवन के विषय में भी सोचा. वो ये भी जानती थी कि प्रोफेसर का परिवार है. वो समझती थी. लेकिन मौली को प्रोफेसर में एक ईमानदार व्यक्तित्व दिखता था. उनके साथ वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करती थी और प्रोफेसर भी मौली के साथ स्वयं को हल्का महसूस करते थे. प्रोफेसर को लगा कि उनकी उम्र जवान लड़की के साथ घूमने की नहीं है. भजन-पूजन भगवान में रमने और मरने की उम्र है. लेकिन पूरी जिंदगी तो जिम्मेदारियों के नाम पर कुर्बान कर दी थी. बेरंग से बदतर होती जिंदगी में मौली के साथ यही उन्होंने महसूस किया कि उनके जीवन के रंगहीन फूल रंग-बिरंगे होने लगे हैं.

मौली भी समझती थी कि प्रोफेसर से उन्हें न तो शारीरिक सुख मिल सकता है न ये साथ बहुत लंबा हो सकता है, लेकिन क्या करें वो, यदि उसका मन प्रोफेसर के साथ रहने में शांत होता है. दिल की अपनी मजबूरियां होती हैं. समाज किसी को माफ नहीं करता. समाज की परवाह करता कौन है? भौतिकवादी इसे अनैतिक कहते हैं. मनोचिकित्सक इसे बीमारी का नाम देते हैं. समाज के ठेकेदार इसे हवस, बुढ़ापे की आखिरी गर्मी कहते हैं. कुछ का कहना है कि बुढ़ऊ घाघ है. वासना प्रेमी है.

महिला संगठन कभी कभी तो मौली को समझाती-बुझाती हैं. कभी विरोध करती हैं. फिर पक्ष में बोलती हैं. धार्मिक संस्थायें इसे पाप, अनाचार कहती हैं, भारतीय संस्कृति के खिलाफ कहती हैं. कुछ दिन सभी कहते रहे. समझाते रहे. फिर शांत हो गये.

मीडिया वालों ने कुछ दिन खूब चटखारे लगाकर इस बेमेल प्रेम प्रसंग को खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया. चैनलों की खूब टी.आर.पी. बढ़ी. इसके बाद वे भी एक गड्ढे में गिरे बच्चे की जीवन-मौत की कहानी दिखाने लगे. कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्हें दुनिया जहान से कोई विशेष लगाव नहीं था. उनका एक ही कहना रहता है. जो हो रहा है अच्छा हो रहा है...वे जाने उनका काम जाने. अपने को क्या लेना-देना? भारत क्रिकेट मैच जीते या हारे. कोई भी सरकार आये. कहीं कुछ भी हो जाये, इनके ठेंगें से. ऐसे लोग बड़े संत स्वभाव के होते हैं. लेकिन प्रेम, मोहब्बत, आशिकी पर ऐसे ही थोड़ी सदियों से कहानियां लिखी जाती रही हैं. फिल्में बनती रही हैं. आखिर कोई तो बात होगी.

तभी तो प्रोफेसर चतुरसेन और उनकी छात्रा मौली, एक बुढ़ऊ और एक जवान तमाम विरोधों को ठेंगा दिखाते हुए आज भी घूम रहे हैं. अभी-अभी निःशब्द फिल्म देखकर आये हैं. फिल्म देखते समय एक किशोर उम्र के लड़के की आवाज उनके कानों में पड़ी. ‘‘हमारी क्लास में भी एक टीचर है सेक्सी....मैं भी लाइन मारना शुरू करता हूं.’’ दोनों में विचार विमर्श चल रहा है और द्वन्द्व भी. क्या ये बेशर्मी नहीं? माना कि आपको प्रेम है एक-दूसरे से. पर क्या समाज के प्रति आपका कोई कर्त्तव्य नहीं? आने वाली पीढ़ी को आप क्या संदेश देकर जायेंगे और क्या सीखेंगे लोग इस घटना से. क्या त्याग, बलिदान से प्रेम की चमक और नहीं बढ़ेगी. ऐसा नहीं होना था. चलो ऐसा हो गया, तो क्या वे इतने स्वार्थी हो गये हैं. अपने प्रेम में इतने अंधे हो गये कि सिर्फ एक-दूसरे के अलावा उन्हें कुछ नहीं दिखाई दे रहा. क्या उनकी उच्च शिक्षा पूर्णतः संस्कार हीन है? क्या शिक्षा केवल उदरपोषण, जीविकोपार्जन का माध्यम भर है. क्या आने वाले शिक्षक, बच्चे आगे आने वाली पीढ़ी उनका उदाहरण दे-देकर इस तरह...नहीं...नहीं... हमने कोई पाप नहीं किया. हमने तो प्रेम किया है. सिर्फ प्रेम...

राम सीता से बड़ा तो नहीं हैं उनका प्रेम. राम ने सीता का परित्याग किया...मर्यादा के कारण...राज्य...समाज के कारण...ऐसी आदर्श जोड़ी फिर भी त्याग और हम शिक्षक एक आदरणीय पद, एक आदर्श और आदर्श ही अगर अमर्यादित हो जायें...क्या करें...क्या न करें...क्या भाग जाये कहीं? क्यों भागेंगे? क्या कोई अपराध किया है? पलायनवादिता कायरों, चोरों का काम है. क्या वे कायर हैं, चोर हैं?

लेकिन उनका मन...कैसे जियेंगे वे एक-दूसरे के बिना..? दिल से ऊपर दिमाग होता है. सोचो समझो फिर निर्णय लो. क्या परिणिति होगी उनके प्रेम की...लेकिन उनका मन...कितने दिन चलेगा उनका ये प्रेम...कल उनका उदाहरण देकर अन्य विवाहित पुरुष बहकेंगे. स्त्रियां, बच्चे उनको गालियां देंगे. घर बर्बाद होंगे. माता-पिता अपनी जवान बच्चियों को पढ़ने नहीं भेजेंगे. भेजेंगे भी तो शिक्षकों को शक, संदेह की दृष्टि से देखेंगे. शिक्षा बदनाम, शिक्षक बदनाम. शिक्षा के केन्द्र को व्यभिचार के दायरे में लिया जायेगा.

फिर विवाह के समय अग्नि के समक्ष लिये सात फेरे, सात वचन भंग के आरोपी नहीं हैं वे. नहीं...नहीं ये सब बकवास है...क्या दिया उन्हें समाज ने...समझा हमेशा...जली-कटी सुनाती रही...छोड़कर भागी तो नहीं किसी के साथ...निभा तो रही है...क्या उसके साथ विश्वासघात नहीं...यदि वो भी ऐसा करती तो...क्या इज्जत रह जाती उनकी समाज में, जाति में...खानदान में...आज यही सब मैं कर रहा हूं तो बेचारी रूपा, बच्चों पर क्या...गुजर रही होगी.

तो क्या मौली की मासूमियत...नादानी...का फायदा उठा रहा हूं मैं. मौली, अभी उसकी उम्र ही क्या है? वो नासमझ है मैं तो नहीं. नहीं, मैं नहीं जी सकता उसके बगैर. भाड़ में जायें सब. दो घड़ी का सुकून भी लोगों से बर्दाश्त नहीं होता. जलते हैं सब मुझसे. मौली, क्या किसी पूर्व अनुभव से बनी धारणा तो नहीं है उसकी. मां ने जो किया...वो क्या कर रही है. किसी का घर तोड़ रही है. क्या मान-मर्यादा केवल शिक्षक का कार्य है? शिष्य का कोई दायित्व नहीं.

एकलव्य जैसे शिष्य भी तो हुए हैं. गुरू के कहने पर जिसने अपना अंगूठा दे दिया. और वो तो अपने गुरू का नाम, काम, परिवार सब बर्बाद कर रही है. क्या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं. पिताजी क्या सोच रहे होंगे. जैसी मां वैसी बेटी...कितने विश्वास से उन्होंने पढ़ने भेजा था. कैसे फिर कोई पिता अपनी पुत्री पर विश्वास करके उसे पढ़ने भेजेगा?

क्या समूची नारी जाति की शत्रु नहीं है वो? क्या धर्म, संस्कार, विवाह के कोई माने नहीं. बुद्धि की लगाम से कस तो रहे हैं. दोनों मन को...पर मन बड़ा मायावी है. बहुत कसने की जरूरत पड़ेगी मन को. सोच तो यही रहे हैं दोनों. मौली पढ़ाई छोड़कर घर जाने की. कभी कुछ-कभी कुछ. फिर भागना नहीं है, सामना करना है. विद्यार्थी जीवन सन्यास की भांति है. तपस्वी के तप की तरह ही मन पर बुद्धि की लगाम कसनी होगी.

बुजुर्गों का जीवन आदर्श है. अनुभव की खान है. लोग जाने-अनजाने उनसे प्रेरणा लेते हैं, सीखते हैं. स्थान नहीं बदलना है. मन बदलना है. सोच बदलना है. ये कहां की समझदारी है कि एक व्यक्ति के लिए सारे रिश्ते तोड़ दिये जायें. घर-परिवार समाज धर्म, जाति, भाषा संस्कार...हृदय में कहां समझ होती है? हृदय तो होता है मूर्ख...उनका मन...भटकता मन...छांव की तलाश में धूप से चोटिल होता उनका मन...

सम्पर्कः भरत नगर, चंदन गांव, छिन्दवाड़ा-480001 (म.प्र.)

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