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प्राची - फरवीर 2017 / साक्षात्कार / राकेश भ्रमर से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत

साक्षात्कार

‘‘कहानी मानव जीवन, उसके समाज और उनकी समस्याओं की कहानी है’’

(वरिष्ठ गजलकार, कवि, गीतकार, कथाकार और उपन्यासकार राकेश भ्रमर से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत)

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संवेदनशील गजलकार, कहानीकार, उपन्यासकार, यथार्थ व्यंग्यकार, कवि, गीतकार के रूप में ख्याति अर्जित करने के साथ-साथ राकेश भ्रमर की छवि एक सफल संपादक के रूप में उभर कर आई है. अब तक चार गजल संग्रह, पांच उपन्यास, आठ कहानी संग्रह, एक निबंध संग्रह, एक व्यंग्य संग्रह, एक कविता संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और एक सम्पादित गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. अनेक सम्मानों से सम्मानित भ्रमर जी को लघुकथा में भी महारथ हासिल है. इन्हें वर्ष 2015 में जबलपुर में लघुकथाकार सम्मान से अलंकृत किया गया. इनकी कहानियों में जीवन्तता के दर्शन होते हैं. इनके लेखन की भाषा सरल और सहज है. केंद्र सरकार की सेवा के साथ ही साथ ये लेखन कार्य करते रहे. केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद से सेवानिवृत हो कर पूर्ण रूप से साहित्य को अपना जीवन समर्पित कर दिया. भ्रमरजी केवल संपादक ही नहीं, मूल रूप से लेखक हैं. साहित्यकार की दृष्टि से प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल ने की उनसे बातचीत के अंश...

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डॉ. भावना शुक्ल : प्रेमचंद युग से कहानी किस मायने में आगे बढ़ी है?

राकेश भ्रमर : प्रेमचंद युग के बाद की कहानी के बारे में कुछ कहने से पहले प्रेमचंद की कहानियों के बारे में जान लेना आवश्यक है. उनकी कहानियां समाज की समस्याओं के साथ-साथ उसके सच्चे स्वरूप को प्रस्तुत करती हैं. अपनी कहानियों के माध्यम से प्रेमचंद ने जहां समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अव्यावहारिक परम्पराओं और अंधविश्वासों पर प्रहार किया, वहीं मानवीय संवेदनाओं को भी यथोचित स्थान दिया. उनकी अधिकांश कहानियां और उपन्यास यथार्थवादी होते हुए भी आदर्शवादी थे. परन्तु जीवन के अवसान में आदर्शवाद से उनका विश्वास उठ गया था. यह उनके अन्तिम उपन्यास ‘गोदान’ से स्पष्ट हो जाता है, जिसका अंत बहुत ही दुःखद है.

प्रेमचंद के पश्चात हिन्दी कहानी में बहुत-से परिवर्तन आए. कहानी कई वादों के दौर से गुजरी. वह कहानी से नई कहानी हो गयी. नई कहानी के विषय थे- मध्यवर्ग के परिवारों का विघटन, मूल्यों का ह्रास, असुरक्षा की भावना, व्यक्तिगत कुंठा, एकाकीपन और चिन्ता. इसी दौर में हिन्दी साहित्य के मठाधीशों ने कहानी को कई वादों और गुटों में बांटकर रख दिया. हिन्दी कहानी को ऐसे-ऐसे नाम दिये गये कि उन नामों के बीच में कहानी कहीं गुम-सी गयी. अचेतन कहानी, सचेतन कहानी, समानान्तर कहानी, प्रगतिशील कहानी, जनवादी कहानी आदि-आदि नाम सामने आए. मेरा मानना है, कहानी केवल मानव जीवन, उसके समाज और उनकी समस्याओं की कहानी होती है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य कहानी नहीं होती है. प्रेमचंद के बाद की कहानियों में लेखकों ने प्रयोग कर-करके उसकी आत्मा को निचोड़ा ही नहीं, मिटा दिया. कहानी समाज, परिवार और राष्ट्र से दूर होकर व्यक्तिवादी हो गयी. साठ-सत्तर के दशक में जो कहानियां लिखी जा रही थीं, वह परिवार, समाज और राष्ट्र की कहानियां होते हुए भी उससे बहुत दूर थीं. इन कहानियों के पात्र ऐसे व्यक्ति होते थे, जो सदा कुंठाग्रस्त रहते थे और अवसादों से घिरे हुए थे. आलोचकों ने ऐसी कहानियों को उच्चकोटि की कहानियां सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, परन्तु सत्य यही है कि अमूर्त कहानियां लिखने वाले लेखक बाद में स्वयं कुंठा और हताशा के शिकार होने लगे. वे फिर से परिवार, समाज और उसमें व्याप्त विसंगतियों और विषमताओं की कहानियां लिखने लगे.

आज कहानियां लिखी जा रही हैं, परन्तु उनमें वह बात नहीं है, जो प्रेमचंद और उनकी पीढ़ी के बाद के लेखकों की कहानियों में थी. संभवतः इसीलिए आज की कहानियां उतनी लोकप्रिय नहीं हो रही हैं. जबकि आज सबसे ज्यादा पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित हो रही हैं, परन्तु उनमें कहानियों की संख्या बहुत कम होती है, और कविताओं की संख्या बहुत ज्यादा होती है. इसके अतिरिक्त कहानियों की जगह अब लोग लघुकथाओं को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं. फिर भी मेरा मानना है कि कहानी कभी समाप्त नहीं होगी. जब तक मानव समाज है, कहानी जीवित रहेगी.

डॉ. भावना शुक्ल : ‘नई कहानी’ के तीन ध्वज वाहक कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव माने जाते हैं? इनके बारे में कुछ कहना चाहेंगे?

राकेश भ्रमर : नई कहानी के संबंध में ऊपर कह चुका हूं. इसके प्रवर्तक कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव को अवश्य माना जाता है, परन्तु नई कहानी के अन्य पर्वतक भी थे. ये हैं भीष्म साहनी, अमरकांत, शेखर जोशी और शैलेश मटियानी. जहां तक कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव त्रयी की बात है, इन्होंने नई कहानी के माध्यम से युगान्तरकारी परिवर्तनों, समाज में आनेवाले बदलाव और उसमें व्याप्त नई चेतना की कहानियां लिखीं. इनकी कहानियों के पात्र शिक्षित और बुद्धिजीवी थे. स्त्रियां पारिवारिक बेड़ियों को तोड़कर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर समाज की मुख्य धारा में सम्मिलित होने के लिए अग्रसर हो रही थीं. तीनों कहानीकारों ने बहुत अच्छी सामाजिक और पारिवारिक कहानियां लिखीं. कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ सुप्रसिद्ध कहानी है, जिसमें एक नपुंसक व्यक्ति की व्यथा को बहुत ही मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है. उसकी पत्नी पर पुरुष से संबंध बनाकर गर्भवती हो जाती है. मोहन राकेश की ‘मलबे का मालिक’ देश के बंटवारे को आधार बनाकर लिखी गयी बहुत सुन्दर कहानी है, वहीं राजेन्द्र यादव की ‘जहां लक्ष्मी कैद है’ एक अविवाहित स्त्री की पीड़ा की कहानी है. कहने का तात्पर्य यही है कि तीनों कहानीकारों ने कहानी को ‘नई कहानी’ नाम भले ही दिया हो, परन्तु व्यक्ति, परिवार और समाज से दूर रहकर वह भी कुछ नहीं लिख सके, क्योंकि कहानी का उद्गम स्थल ही मानव-जीवन और उसका समाज है. हां, नई कहानी में नई चेतना और नए युग का प्रभाव अवश्य था. कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव का हिन्दी कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में अमूल्य योगदान है और इसे भुलाया नहीं जा सकता.

डॉ. भावना शुक्ल : अमरकांत, शेखर जोशी, शिवानी, शैलेश मटियानी और निर्मल वर्मा की कहानियों के बारे में आपका क्या मत है?

राकेश भ्रमर : यह सारे लेखक नई कहानी के प्रवर्तक थे और सक्रियता के साथ इस आंदोलन से जुड़े रहे. अमरकांत की कहानियों में आम आदमी का चित्रण बहुत सुन्दर और प्रभावी ढंग से किया गया है. उनकी रचनाओं की तुलना प्रेमचंद की कहानियों से की जाती रही है. इस प्रकार अमरकांत को प्रेमचंद की परम्परा का लेखक मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए. आलोचकों की राय इससे भिन्न हो सकती है. यह भी सच है कि एक लेखक और कवि के बारे में भिन्न-भिन्न आलोचक भिन्न-भिन्न प्रकार से सोचते और मत व्यक्त करते हैं. शेखर जोशी ने अपनी कहानियों के माध्यम से उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन का जीवंतता के साथ चित्रण किया है. यहां की संस्कृति, परम्परा और जीवन स्तर (रहन-सहन) की उन्हें गहरी परख है. उनकी कहानियां यथार्थवाद की गठी हुई कहानियां हैं. ‘दाज्यू’ और ‘कोसी का घटवार’ उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से हैं. उन्होंने आधुनिक औद्योगिकता और श्रम जीवन की कहानियां भी लिखी हैं. शिवानी (गौरा पंत शिवानी) का संबंध साहित्यकारों के परिवार से रहा है. उनकी कहानियों के पात्र अधिकांशतः कुमायूं क्षेत्र के लोग हैं. शिवानी ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में स्त्री पात्रों को महत्त्व दिया है. उनके स्त्री पात्र सुन्दर व्यक्तित्व वाली होते हुए भी दुर्भाग्यशाली जीवन व्यतीत करती हैं. शिवानी चूंकि स्वयं उच्च वर्ग से संबंध रखती थीं, इसलिए उन्होंने केवल उच्चवर्ग की कहानियां लिखी हैं, लेकिन उनके स्त्री पात्र आम जीवन के निचले तबके की स्त्रियों की विडम्बनाओं और दुःखों से भी सरोकार रखती हैं. इनकी कहानियों में बंगला का खासा प्रभाव है और वह मानती थीं कि उन पर बंकिम चंद चटर्जी का बहुत प्रभाव था.

रमेश सिंह ‘मटियानी’ उर्फ शैलेश मटियानी को उत्तराखंड का प्रेमचंद कहा जाता है. शेखर जोशी के साथ इन्होंने कुमायूं के जन-जीवन का चित्रण करके राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया है. इनकी कहानियों में निम्न और निम्न मध्यवर्ग के संघर्षशील जीवन और उनके यथार्थवादी जीवन का चित्रण बहुत सुन्दर ढंग से हुआ है. उनकी कहानियों के मुख्य पात्र मुख्यतया भिखारी, चोर-उचक्के, जेबकतरे, बूढ़े और लूले-लंगड़े और समाज से तिरस्कृत लोग होते थे. संभवतः इसीलिए उन्हें ‘जनकथाकार’ माना जाता है. उनके खाते में विभिन्न पुस्तकों के साथ 30 उपन्यास और 17 कहानी संग्रह हैं. हिन्दी कहानी में आधुनिकता में बोध करानेवालों में निर्मल वर्मा का नाम अग्रणी है. वह नई कहानी आंदोलन के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर माने जाते हैं. इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक रोमांटिसिज्म बहुत प्रखर होकर उभरा है. एक मायने में इनकी कहानियों में भारतीयता और विदेशीपन का अद्भुत संगम है. ‘नई कहानी’ के प्रणेता होने के बावजूद इनकी कहानियां इनके समकालीन लेखकों से अलग हैं. इन्होंने अपनी कहानियों में नई चेतना के स्त्री-पुरुषों के दरकते और टूटते संबंधों को मुख्य रूप से चित्रित किया है. इनके स्त्री पात्र स्वतंत्र रूप से जीवन जीने के पक्षधर हैं. इस कारण मानवीय संबंधों में क्रांतिकारी और युगान्तरकारी परिवर्तन आता है.

डॉ. भावना शुक्ल : आपके हिसाब से कहानी में कथ्य या शिल्प की कितनी प्रधानता होनी चाहिए?

राकेश भ्रमर : कहानी में कथ्य और शिल्प दोनों ही प्रधान होते हैं. कथानक अच्छा है, परन्तु उसे सुन्दर ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जाय, तो कहानी बेजान हो जाती है. कहानी में प्रस्तुतिकरण ही पाठक को उसकी तरफ खींचती है और पढ़ने के लिए बाध्य करती है. लेकिन अगर कथानक नहीं है, केवल प्रस्तुतिकरण अच्छा है, तो भी कहानी में जान नहीं आएगी. मेरा मत है कि कहानी में कथ्य और शिल्प दोनों की ही प्रधानता होनी चाहिए. कथानक अच्छा हो, प्रस्तुतिकरण प्रभावी हो और कहानी की भाषा शुद्ध, गठी हुई और उसकी शैली में प्रवाह हो तो ही कहानी पढ़ने का मजा आता है. वह लम्बे समय तक पाठक हो याद रहती है.

डॉ. भावना शुक्ल : आपका उपन्यास ‘ओस में भीगी लड़की’ कैसा उपन्यास है. उसका आधार क्या है? इससे आज की युवा पीढ़ी को कोई सन्देश मिल सकता है क्या?

राकेश भ्रमर : ‘ओस में भीगी लड़की’ उपन्यास सरकारी कार्यस्थलों पर स्त्री-पुरुष के बीच बननेवाले प्रेम और शारीरिक संबंधों पर आधारित है. उपन्यास की नायिका युवती है और अपने प्रौढ़ बॉस के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उसके ऊपर आसक्त हो जाती है. यह अस्वाभाविक भी नहीं हैं. स्त्री-पुरुष जब लगातार एक साथ रहते हैं, तो उनके बीच एक अपरिहार्य आकर्षण उत्पन्न हो जाता है. नायिका चूंकि अविवाहित है और बॉस शादीशुदा है, उसके बच्चे हैं तो दोनों का प्यार कुछ समय बाद स्वमेव समाप्त हो जाता है. इस उपन्यास में मैंने कोई संदेश देने का प्रयास नहीं किया है, परन्तु आधुनिक युवा पीढ़ी इससे यही सीख ले सकती है कि अविवाहित युवती और विवाहित पुरुष के बीच बननेवाले संबंधों का कोई भविष्य नहीं होता है. इस प्यार में केवल शारीरिक संबंध पनप सकते हैं. आत्मिक जुड़ाव असंभव है. अंततः ऐसे प्रेम संबंधों की परिणति अच्छी नहीं होती. हालांकि उपन्यास में नायक-नायिका आपसी सहमति से एक दूसरे से जुदा हो जाते हैं और उनके जीवन में कोई बिखराव नहीं आता, न कटुता उत्पन्न होती है.

डॉ. भावना शुक्ल : आपकी कहानियों और उपन्यास में जीवन्तता के दर्शन होते हैं?

राकेश भ्रमर : इसमें कोई संदेह नहीं है कि कहानी मानव जीवन की कहानी होती है. हम उसमें कितनी जीवंतता डाल पाते हैं, यह लेखक के कौशल और लेखन के ऊपर निर्भर करता है. मैंने अपनी कहानियों में ग्रामीण और शहरी परिवेश को बराबर का स्थान दिया है. लगभग 25 प्रतिशत कहानियां प्रेम कहानियां हैं. मैंने भरपूर प्रयास किया है कि उनमें जीवंतता हो, परन्तु यह पाठक और आलोचक ही बता सकते हैं कि मेरी कहानियों और उपन्यासों में कितनी जीवंतता है. एक लेखक स्वयं अपनी कहानियों का मूल्यांकन नहीं कर सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने दही को खट्टा नहीं कहता और पुत्र को तो नालायक समझ ही नहीं सकता.

डॉ. भावना शुक्ल : कहते हैं भोगा हुआ यथार्थ ही कहानी को जन्म देता है. क्या आपका कोई उपन्यास या कहानी इस धरातल पर है?

राकेश भ्रमर : पूर्व में मैंने अपनी किसी पुस्तक की भूमिका में कहा है कि लेखन तीन प्रकार का होता है. एक- स्वयं का भोगा हुआ यथार्थ, दूसरों का भोगा हुआ यथार्थ अर्थात लेखक का सुना हुआ यथार्थ और तीसरा काल्पनिक लेखन. मेरा मत है कि पहले और दूसरे प्रकार का लेखन ही यथार्थवादी और सत्य लेखन होता है. हां, यथार्थवादी लेखन में भी कल्पना के रंग होते हैं, जो कहानी और उपन्यास को रोचक और मनोरंजक बनाते हैं. मेरी अधिकांश कहानियां कल्पना के रंगों के साथ-साथ सच्ची और वास्तविक घटनाओं पर लिखी गयी हैं. उपन्यासों में भी पचास प्रतिशत से अधिक सच्चा यथार्थ है. लेकिन उतनी ही कल्पना भी है. परन्तु कल्पना के रंग भी वास्तविक जीवन से जुड़े होते हैं. मेरा पहला प्रकाशित उपन्यास ‘उस गली में’ लगभग 75 प्रतिशत वास्तविक जीवन पर आधारित है. ग्रामीण जीवन पर आधारित मेरी कहानियों में अधिकांश पात्र मेरे गांव के हैं. इस प्रकार आप कह सकती हैं कि मेरी अधिकांश कहानियों और उपन्यासों का आधार भोगा हुआ यथार्थ है.

8. डॉ. भावना शुक्ल : आपकी दृष्टि में व्यंग्य क्या है? आपने व्यंग्य कब से और क्यों लिखा?

राकेश भ्रमर : मानव जीवन की रूढ़ियों, अंधविश्वासों, विरूपताओं, विसंगतियों, असंगितियों और मनुष्य द्वारा किये गए अनर्गल कार्यों को मजाहिया तरीके से तंज कसते हुए प्रस्तुत करना ही व्यंग्य कहलाता है. इसे भी आप एक व्यंग्य कह सकती हैं कि गीत, उपन्यास और कहानी से लेखन आरंभ करने वाले लेखक की किसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में प्रकाशित होनेवाली पहलह रचना एक व्यंग्य रचना थी. हुआ यूं कि 1974 में जब मैं इंटर का विद्यार्थी था, मेरे एक अध्यापक मित्र ने आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के लिए मुझे दी थीं. उन पुस्तिकाओं में विद्यार्थियों के जवाब देखकर मुझे आश्चर्य भी हुआ और हंसी भी आई. उन्हीं उत्तरों को आधार बनाकर बाद में मैंने एक लघु व्यंग्य रचना लिखी थी, जो 1976 में दिल्ली प्रेस की पत्रिका ‘मुक्ता’ में छपी थी. इसके बाद मैंने एकाध और व्यंग्य रचना की थी तथा कुछ व्यंग्य क्षणिकाएं लिखीं. फिर उसमें विराम आ गया. 1980 में मेरी पोस्टिंग शिलांग में हुई. वहां मुझे कलकत्ता से प्रकाशित होनेवाला अखबार ‘सन्मार्ग’ पढ़ने को मिला. इसमें ‘चकल्लस’ नाम से एक कॉलम आता था, जिसमें व्यंग्य कविताएं/क्षणिकाएं/कुंण्डलियां आदि छपती थीं. 1983 में मैंने उसमें व्यंग्य कविताएं और कुण्डलियां भेजनी शुरू कीं, जो लगातार छपने लगीं. इससे मुझे प्रोत्साहन मिला. लेकिन तब मेरा व्यंग्य लेखन केवल पद्य तक ही सीमित रहा. गद्य में व्यंग्य लेखन मैंने 2009 में आरंभ किया. इसका एक कारण था. 2008 में जब मैंने ‘प्राची’ पत्रिका का संपादन संभाला, तो मैं गंभीर प्रकृति के आध्यात्मिक और समाज को संदेश/उपदेश देने वाले संपादकीय लिखता था. बाद में मैंने महसूस किया, अगर सामाजिक समस्याओं को व्यंग्य का पुट देकर प्रस्तुत किया जाय, तो वह मारक तरीके से पाठक के दिलों में उतर सकता है. 2009 में मैंने यह प्रयोग किया और मैंने व्यंग्यात्मक संपादकीय लिखने आरंभ किये. पाठकों को ही नहीं, लेखकों को यह स्वरूप बहुत पसंद आया और इस प्रकार मेरे गद्य व्यंग्य लेखन की शुरुआत हुई. अब मैं व्यंग्य की पद्य रचनाएं नहीं लिख रहा हूं.

डॉ. भावना शुक्ल : आपकी गजलें और गीत लगता है, आपके हृदय के बहुत करीब हैं. हमारे पाठकों को गीत या गजल के माध्यम से कोई सन्देश दीजिये, जिससे उन्हें कोई प्रेरणा मिल सके?

राकेश भ्रमर : काव्य हृदय से उपजने वाली अभिव्यक्ति होती है. जब तक इसमें आपका हृदय नहीं रमता, तब तक आप कविता नहीं लिख सकते. मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने अपने गीत और गजलें हृदय की गहराई में डूबकर लिखी हैं. मेरी एक गजल इस प्रकार है-

‘‘दिल कोई पत्थर नहीं है.

ये नजर खंजर नहीं है.

खुशनुमा तेरी गली में,

कोई भी मंजर नहीं है.

क्या पढ़ें उनके खतों में,

कोई भी अक्षर नहीं है.

हर तरफ केवल मकां हैं,

कोई इनमें घर नहीं है.

छांव में हम बैठ जाते,

कोई ऐसा दर नहीं है.

दीप ऐसे मत बुझाओ,

चांद का ये घर नहीं है.’’

 

संदेश के तौर पर मैं अपनी एक गजल यहां प्रस्तुत कर रहा हूं-

हाथ पकड़कर साथ ले चलो, तुम रहबर बन जाओगे.

छांव किसी के सर पर कर दो, तुम तरुवर वन जाओगे..

जिधर रोशनी के कतरे हों, उधर घरों के मुंह कर दो,

आंगन में जब धूप खिलेगी, तुम दिनकर बन जाओगे..

लहराते हों पेड़ जहां पर, सरिताओं का गुंजन हो,

बादल वहीं बसेरा लेंगे, तुम गिरिवर बन जाओगे..

इच्छाओं का मरण नहीं है, लिप्साओं का अन्त नहीं,

प्रेमसिक्त दो बोलों से ही, तुम सुखकर बन जाओगे..

हाथ मिलाते हो तुम सबसे, कभी गले भी तो मिल लो,

धड़कन जब महसूस करोगे, तुम सहचर बन जाओगे..

नींद तुम्हारे सपनों की है, अब जल्दी क्या टूटेगी,

झूठे सपने मत बेचो, तुम सौदाग़र बन जाओगे.

--

सम्पर्कः जेड-21 हरि सिंह पार्क,

मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व )

नई दिल्ली 110056

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