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प्राची - फरवरी 2017 : आपने कहा है

आपने कहा है

महावीरप्रसाद द्विवेदी पर सारगर्भित आलेख

‘प्राची’ का कश्मीर केंद्रित दिसम्बर अंक हाथों में है, किन्तु इसमें कश्मीर के किसी भी विषय पर कोई शोधपरक आलेख का न होना मुझे अखर रहा है. अलबत्ता समस्त आलेख ठीक-ठाक भर लगे. फिर भी इतना अवश्य है कि कश्मीर की सम-सामयिक स्थिति का समुचित वर्णन और वर्तमान हालात के दर्द को समेट पाने में सक्षम हुआ है यह अंक. इंद्रेश जी से बातचीत के आधार पर लिखा गया भावना जी का आलेख मोटे तौर पर कश्मीर के अतीत और वर्तमान को भली प्रकार उजागर करता है. कहानियां लगभग हल्की-फुल्की कही जा सकती हैं. अलबत्ता कुशेश्वर जी की कविताओं में पर्याप्त धार दिखाई पड़ती है, किन्तु वहीं भैया विवेक प्रियदर्शी की कविता विषय का एक अनावश्यक विस्तार प्रतीत होती है. वहीं कुछ रचनाकारों की कविताएं मंच पर जोशपूर्वक कहे जाने लायक हैं किंतु किसी साहित्यिक पत्रिका में उन्हें छपवाने से परहेज ही करना चाहिए.

शिवप्रसाद कमल का ‘उग्र’ के ऊपर जो संस्मरण है, वह बहुत रोमांचक और उग्र जी के जीवन की बेहद क्रूर खबर लेने वाला आलेख है, यह आलेख दरअसल व्यक्ति और उसके रचनाकर्म के बीच एक भयानक अंतर का एक रोजनामचा है.

इस अंक की सबसे बेशकीमती रचना/आलेख भारत यायावर जी का महावीर प्रसाद द्विवेदी जी पर शोधपरक आलेख है, जो न केवल द्विवेदी जी के चरित्र, कर्म और काल का विश्लेषण करता है, बल्कि द्विवेदी जी के आलोचकों की भी खूब खबर लेता है. ऐसा प्रतीत होता है कि रामचन्द्र शुक्ल और अन्य कतिपय आलोचक द्विवेदी जी के प्रति किसी हद तक बेहद पूर्वाग्रह से ग्रसित थे, जिन्होंने द्विवेदी के कायरें का मूल्यांकन बिल्कुल गलत एवं मनमाने तरीके से किया है. द्विवेदी की गुह्य और विद्वत्तापूर्ण दृष्टि ने वेदों से लेकर साहित्य और तमाम साहित्यकारों तक को जिस गहराई से देखा है, वह न केवल बहुत साहस का काम था, कम-से-कम उनके अपने काल के मुताबिक; बल्कि उनकी मीमांषा ने तमाम धर्म ग्रंथों की बाबत हमारी आंखों पर छाए अंधकार पर भी घोर कुठाराघात किया है, और उल्टी-सीधी परम्पराओं तथा रूढ़ियों का स्पष्ट और समुचित विरोध भी किया. यही कारण है कि द्विवेदी जी अपने जाने के बाद और अपने रहते भी एक किवदंती की तरह बन चुके थे, जिसके कारण एक युग का नाम ही दिवेदी युग पड़ा और वे हिन्दी साहित्य के पहले आचार्य कहलाए! द्विवेदी जी का रचनाकर्म अपने समय का एक तटस्थ मूल्यांकन है और इसमें किसी के प्रति भी किसी भी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह या छल-कपट दिखाई नहीं देता, इसीलिए द्विवेदी जी के आलोचकों ने भी द्विवेदी जी के कार्यों का अंततः लोहा माना!

इस महत्वपूर्ण और सारगर्भित आलेख के लिए भारत यायावर जी को अत्यंत साधुवाद. सिर्फ इस एक आलेख के कारण प्राची का यह अंक संजो रखने लायक बन पड़ा है!

राजीव थेपड़ा, रांची (झारखंड)

bhootnath.r@gmail.com

 

यायावर जी की कविताएं ठोस एवं घनीभूत होकर जिंदगी को पकड़ती है

वरिष्ठ कवि भारत यायावर की चुनी कविताओं को ‘‘तुम धरती का नमक हो’’ शीर्षक से युवा कवि गणेश चंद्र राही ने चयनित तथा संपादित किया है. मेरे पास उन्होंने पोस्ट से इसे भेज कर मुझ पर आत्मीयता जतायी है कि इस बहाने मुझे भारत यायावर की चयनित कविताओं को पढ़ने का मौका मिला. इस संग्रह में लंबी तथा लघु कविताएं दोनों संग्रहित हैं. मैंने सिर्फ लघु कविताओं को पढ़ने के लिये चुना. मैं मानता हूं कि लंबी कविताएं अपेक्षाकृत दूर तक चलती हुई इतस्तः मुड़ती हुई लगती हैं, जो जीवन को अवश्य पकड़ती हैं, पर लघु कविताएं जिंदगी के इतने करीब से गुजरती हैं कि उन्हें घनीभूत होने के अलावा फुर्सत नहीं हैं. साथ ही इसमें कल्पना और बिंब भी घनीभूत होकर आते हैं. सीधे-सीधे पाठक के मन को प्रभावित करते हैं. यायावर जी की लघु कविताएं कुछ ऐसी ही हैं, जो जिंदगी को इतने ठोस एवं घनीभूत होकर पकड़ती हैं कि बिखराव की कोई गुंजाइश नहीं बचती है. मैं उन्हें हार्दिक

बधाई देता हूं.

गणेश चंद्र राही का चयन और संपादन सटीक है. यायावर जी पर लिखी उनकी भूमिका उन्हें एक प्रौढ़ रचनाकार एवं आलोचक के रूप में खड़ा करती है. यह गणेश चंद्र राही का किसी कवि पर प्रथम चयन तथा संपादन है. फिर भी संपादन की परिपक्वता इसमें झलकती है. उन्होंने यायावर की जिंदगी और कृति पर अच्छी प्रस्तुति की है. मैं उन्हें भी बधाई देता हूं.

डॉ शोभनाथ यादव, मुंबई

मो. 9969850809

 

ओखली में सर कौन दे

‘प्राची’ का नवम्बर अंक का परिवर्तित रूप अच्छा लगा. वैसे इसका पहलेवाला रूप भी कम ‘अच्छा’ नहीं था. इस अंक के पूर्व जनकवि नागार्जुन पर, फिर आदरेय त्रिलोचनजी पर, विश्वास है आगामी कोई अंक केदारनाथ अग्रवाल पर होगा. इस त्रयी के सबसे कमजोर कवि नागार्जुन हैं, किन्तु एक खास खेमे ने कंधे पर बैठाकर नागार्जुन और उनकी सपाट कविता जो नारेबाजी के अतिरिक्त कुछ नहीं रही है, को अदबी बुलन्दी देने का उपक्रम किया. नागार्जुन की दो चार कविताओं, जो छान्दसिक हैं, को स्तरीय कविता की कोटि में रखा जा सकता है. आदरेय त्रिलोचन जी भाषाविद्, काव्यविद् और व्याकरणविद् थे. उनकी कविता में वाजिब शब्दों की प्रायोगिक जमीन एक अभिनव रसभरता के साथ उजागर हुई है. लोकभाषा के शब्दों को अपनी कविता में उतारकर ‘लोकभाषा’ की गरिमा को त्रिलोचन जी ने उजागर किया है. त्रिलोचन को सुनना साहित्य की अधुनातन जानकारियों से गुजरना था. यह पंक्तिकार व्यक्तिगत तौर पर त्रिलोचन जी के सम्पर्क में रहा है. ‘हिन्दी गजल की सार्थक जमीन क्या है?’ में विचार पाने हेतु त्रिलोचन को पत्र लिखा. ‘गजल’ को केन्द्र में रखकर उन्होंने मुझे एक लम्बा पत्र लिखा, किन्तु ‘हिन्दी गजल’ के सवाल पर लिखा, ‘हिन्दी गजल पर कुछ लिखकर ‘ओखली’ में सर कौन दे? हिन्दी गजल का पहचानी जानेवाली स्थिति तो पहले ही बन चुकी थी, किन्तु त्रिलोचन ने अपना विचार ‘हिन्दी गजल’ पर नहीं दिया.

त्रिलोचन जी ने सॉनेट के अतिरिक्त गजल भी लिखी है, जिनकी आत्मा हिन्दी की है. जहां तक यह पंक्तिकार समझता है, अगर हिन्दी गजल पर त्रिलोचन कुछ कहते-बोलते तो उनके खेमे में उनकी रुस्वाई होती. त्रिलोचन से जो ‘लॉबी’ साहित्य की जुड़ी हुई थी उनमें अधिसंख्य लोग ‘गोलबंद’ शिविरबद्ध लोग थे. सौभाग्यवश आज भी साहित्य में ‘गोलबंदी’ का सिलसिला बरकरार है. अपने शिविर के हिन्दी गजलकारों की कृतियों पर त्रिलोचन लिखते थे, किन्तु उनका लिखना चिमटे से अंगार छूने जैसा था.

इस त्रयी के श्रेष्ठ कवि केदारनाथ अग्रवाल रहे हैं. केदारनाथ अग्रवाल की कविता के बरक्स कवि की हैसियत न ही त्रिलोचन और न ही नागार्जुन कहीं ठहरते हैं. त्रिलोचन, नागार्जुन को तो समीक्षकों ने भी काफी अदबी ऊंचाई अपनी कलम से दी किन्तु केदारनाथ अ्रग्रवाल पर विवशतः कुछ लिखा भी तो ‘कलम का दम’ दमदारी चुरा कर लिखा. त्रिलोचन के अभिन्न अनिल जन विजय और भारत यायावर रहे हैं. त्रिलोचन जी को समग्रता में रेखांकित कर लेना चाहिए था. साहित्यिक समझदारी नयी पीढ़ी और साहित्य की आगत पीढ़ी उनसे काफी कुछ हासिल कर लेती. त्रिलोचन पर भारत यायावर की कविता (अगर कविता है) तो गनीमत है. डॉ. विश्वनाथ तिवारी ‘नयी कविता’ और ‘समकालीन कविता’ के महत्वपूर्ण कवि हैं. ‘समकालीन हिन्दी कविता’ की पहचानी जानेवाली वैचारिक रंगिमा और अग्निमा से परिचित कराया है. एक साधक कवि की आत्मा विश्वनाथ जी में पर्यवसित है.

डॉ. मधुर नज्मी, गोहना मुहम्मदाबाद, मऊ (उ.प्र.)

 

प्राची का सार्थक अंक

‘प्राची’ का जनवरी-17 अंक देखने को मिला. राकेश भ्रमर का संपादकीय ‘नसबंदी बनाम नोटबंदी’ ने देश की ज्वलंत समस्याओं से रूबरू कराया और अपनी चिर-परिचित बेबाक टिप्पणी से मन को झकझोरा एवं सच्चाई से सामने रखा. उन्हें बधाई! इसी अंक में दूधनाथ सिंह का आत्मकथ्य और उनकी कहानियों की समीक्षा करते हुए डॉ. अजीत प्रियदर्शी और महेश दर्पण बहुत-बहुत अच्छे लगे. सबसे अधिक मन को मुग्ध किया प्राची के प्रधान संपादक भारत यायावर, जिन्होंने अपने विद्वतापूर्ण वक्तव्य में सुप्रसिद्ध साहित्यकार राधाकृष्ण पर गहरी और महत्वपूर्ण जानकारी दी. पंकज मित्र द्वारा लिया गया उनका साक्षात्कार, इस अंक की महत्वपूर्ण रचना है. यायावर जी ने

राधाकृष्ण के संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को जिस महत्वपूर्ण तरीके से रेखांकित किया है, वह अप्रतिम एवं अन्यतम है. ‘प्राची’ के दिसम्बर अंक में भी श्री भारत ने महावीरप्रसाद द्विवेदी का जो मूल्यांकन किया था, वह लीक से हटकर था और सर्वोत्तम था. इसी तरह रेवती रमण ने एकांत श्रीवास्तव (संपादक वागर्थ) की कविताओं में जो मारक और मन को छूने वाली जमीनी सचाई है, उसे पूरी क्षमता से पाठकों के समक्ष रखा है. इसी क्रम में अनंत कुमार सिंह की कहानी ‘नया साल मुबारक हो’ आज के समय का दस्तावेज है. लेखक का कथन जैसे चलचित्र की भांति आंखों के सामने चलता रहता है. डॉ. विकास कुमार का व्यंग्य ‘नए वर्ष की शुभकामना’ अच्छा लगा. धारावाहिक आत्मकथा, रतन वर्मा की प्रेरक एवं रोचक है. आत्मकथा के अपने खतरे भी होते हैं- इसका पता आगे चलेगा. सर्वदा की भांति दिनेश बैस का व्यंग्य ‘पहले पन्ने की सूचना’ मजेदार है. इसके अतिरिक्त प्रेमपाल शर्मा और मौसमी जी ने भी अपने आलेखों से ध्यान खींचा. कविताएं सभी और लघुकथाएं भी अच्छी लगीं. सभी को बधाई एवं नव वर्ष की शुभकामनाएं, विशेषकर राकेश जी और भावना जी को.

शिवप्रसाद ‘कमल’, कल्पना मंदिर, चुनार (उ.प्र.)

 

कश्मीर की नब्ज को टटोला

प्राची का दिसम्बर 2016 कर अंक जो कश्मीर पर विशेष सामग्री अंक था, बड़े मनोयोग से पढ़ा. कश्मीर पर अच्छी सामग्री दी जाकर कश्मीर को समझने का अवसर मिला. सचमुच आपके ‘आतंक शून्य भारत’ के संपादकीय ने तथा इन्द्रेश कुमार के वक्तव्य ने कश्मीर की पर्तें खोलकर रख दीं. 370 धारा कैसे स्वतः खत्म होगी, इस पर बेबाक टिप्पणी ने अच्छा विश्लेषण इन्द्रेश कुमार जी ने किया है. सचमुच अब कश्मीर पहले वाला कश्मीर नहीं रहा. कश्मीर पर आधारित कविताओं में अमित पुरी, राजेश जैन राही, सुशीला शिवराण के दोहे, मंजू पांडेय, मीठा मीर डबाल, आचार्य कैलाशनाथ पांडे कश्मीर पर आधारित कविताएं बहुत कुछ कह गईं. इसके अतिरिक्त सुरेश उजाला की गजल, शिवकुमार कश्यप के दोहे, शिवशरण दुबे का नवगीत आदि कविताएं बहुत अच्छी लगीं. कश्मीर पर आधारित कहानियों में काली बर्फ (चन्द्रकांता), दर्द (अर्चना चतुर्वेदी) और जल प्रलय (डॉ. तनुजा चौधरी) सब कुछ कह गईं. इस बहाने कश्मीर की नब्ज को टटोला. इस अंक हेतु बहुत-बहुत बधाई!

रमेश मनोहरा, जावरा (म.प्र.)

मो. 9479662215

 

स्तरीय साहित्य प्राची की पहचान

प्राची का जनवरी-2017 अंक मिला. आवरण पृष्ठ/कलेवर आकर्षक है. सुरुचिपूर्ण साहित्य से ओतप्रोत प्राची आज के भोंडे युग में ‘टार्च’ का काम कर रही है. ‘भ्रमर’ जी के संपादन कौशल को मैं कोटिशः प्रणाम करता हूं. ‘नसबंदी बनाम नोटबंदी’ सम्पादकीय वर्तमान यथार्थ के चित्र को पूरा-पूरा एवं सही-सही उकेरता है. सटीक संपादकीय है. अबनीश सिंह चौहान के नवगीत प्रभावित करते हैं. गजल, लघुकथायें पठनीय हैं. प्राची का स्तरीय साहित्य ही प्राची का ‘पहचान पत्र’ है.

अविनाश ब्यौहार, जबलपुर (म.प्र.)

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