बुधवार, 5 अप्रैल 2017

प्राची - फरवरी 2017 / व्यंग्य / गैस प्रॉब्लम / डॉ. नरेश ऋत्विक

व्यंग्य

गैस प्रॉब्लम

डॉ. नरेश ऋत्विक

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ग्राम+पो.-कटनियां ओझाडीह,

थाना-टुण्डी, जिला-धनबाद (झारखण्ड)-828109

 

स चर जगत में भांति-भांति के जीव हैं और इन जीवों के लिए भांति-भांति के चारे भी. पोपले मुंहवाले, दांतवाले, कमजोर आंतवाले सबों के लिए कुछ न कुछ अन्न-उपअन्न कर्मगत उपलब्धि पर मौजूद है. फिर चाहे वह तरल हो, गरिष्ठ हो, तिक्त, कषाय या फिर निरा खट्टास. पसंद और पैसा जैसी स्वाद वैसा. चरते रहिए जून दो जून या फिर सकल दिवस. चरने तक तो समर्थता अपनी-अपनी जेबों और जुराबों तक की है पर चरनोपरान्त पाचन की शक्ति स्वसाध्य है. इस चर जगत में भांति-भांति के जीव हैं और इन जीवों के लिए भांति-भांति के चारे भी. आप जुगाली करें. हाजमें की गोली खायें. दंड बैठक करें. सुरा के शरण में जायें या फिर उदर सहलाते रहें. पचा तो सिकन्दर नहीं तो प्लेग का चूहा. मारते रहिए सड़ांध! और क्या? सार-सर्वस्व धमनियों में अवशेष शौचागाह या खुले में.

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जब जीवों में सर्वश्रेष्ठ जीव ‘आदमी’ है तो इनका हर कार्य-प्रकार्य भी श्रेष्ठ ही है. कोई इस विशाल चारागाह का अकेला आधिपत्य हासिल करना चाहता तो कोई पुश्त दर पुश्त अपनों के लिए चारे को बचाये रखना चाहता. कई तो ऐसे भी हैं जो पूरा का पूरा बिना डकार लिए चट कर जाते हैं. नीर-क्षीर-विवेकी ‘‘जीव जीवस्य भोजनं’’ कहकर खाद्य-अखाद्य के बीच के फासले को ही मिटा देते हैं. उनके लिए हर तत्व खाद्य है अगर खाया जा सके तो. तत्व और पदार्थ तो छोड़िए जनाब ऐन्द्रिक- पराभावों को भी इन्होंने नहीं बख्शा. शर्म-हया, कसमें-वादे, धक-धर्म, विचार-विवेक और न जाने कितने मानवीय ऐन्द्रिक तत्वों को ये मानव खाते रहे. हां सच भी है कि ऐसे ऐन्द्रिक तत्व जिसने भी खाया उसे पच नहीं पाया. किन्तु यह भी सच है कि खाये कोई उसकी बदहजमी दूसरों को ही होती है, जैसे मुझे हो रही है. दिमाग कितना खाऊँ? सीधी-सी बात है कि इंसान सब कुछ खा सकता है. उसके लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक खाद्य भंडार है. कोई मांसाहारी, शाकाहारी नहीं सभी सर्वाहारी सर्वग्रासी हैं जब तक ये स्वयं काल का ग्रास नहीं बन जाते.

संसार के समस्त जीव कुछ न कुछ खाते हैं. आदमी और पालतु पशुओं को छोड़ शेष सभी प्राणी ईश्वर भरोसे धरा के कटोरे में निहित सभी वस्तुओं को मनोनुकूल ‘स्व’ का जानकर स्वच्छंद खाते हैं. उन्हें मेरा और पराया का कोई भान नहीं है. सब उनका या सब मेरा जो पहले और जितना खा सके. पालतु पालनहार प्रदत्त वस्तुओं की मात्रा पर निर्भर हैं. ये पालतू प्राणी जबरदस्ती किसी के बाड़े में घुसकर खा नहीं सकते. भूल या स्वभाववश खा भी लें तो लाठी, गाली की खुराक मुफ्त में इन्हें मिलती. ‘आदमी’ की बात कुछ निराली है. ये खायेंगे- हक से, भूख से, लोलुपता से, श्रद्धा से, दयार्द्रता से, बलिहारी से, चापलूसी से, मुफ्तखोरी में. ‘पालतू’ हो या पालनकर्ता अपने-अपने इल्म का खाते हैं. ‘आदमी’ मेरे निशाने में हैं इसलिए चर्चा खास है. क्योंकि मैं इन्हीं के खाये हुए में से खाता हूँ. आदमी खाने की तरकीब में रोज दिन इजाफा करता आया है. कोई मेहनत का खाता है तो कोई अपने विवेक का. मेहनत और विवेक की परिधि में ही सारा इल्म आता है. छड़ी हिलाकर खाना, चीर-फाड़ कर खाना, हंसकर हंसाकर, ठगकर, छीनकर, लूटकर, नाचकर, नचाकर, गाल बजाकर, डींग हांक कर, तलवे सहलाकर, कलम चलाकर, हांथ फैलाकर- नाना कर्मकाण्ड दिखाकर लोग खाते हैं और विचारक सत्य शोधन में कह जाते हैं- सभी अपने नसीब का खाते हैं. एक अदना-से आदमी ने महान दार्शनिक की तरह एक वाक्य मेरे सामने रख दिया. बताओ तो आदमी खाता क्यों है? मैंने भी उसी के लहजे में अदना-सा जवाब दे दिया- जीने के लिए. पर, क्या पता? इन दो सरल वाक्य के मध्य एक कठिन यक्ष प्रश्न भी है. फिर आदमी मरता क्यों है? उसने सवाल किया तो मैं चक्कर खा गया. मैंने सीधे हाथ जोड़ लिए. निविड़ान्धकार और कुछ नहीं. मैंने मन ही मन सोचा.

घोर कलियुग है. चौबीसवां संचारी भाव ‘छल’ यहां सर्वत्र व्याप्त है. दूब-रस पीकर जीनेवाले दुर्वासा यहां कहां? छप्पन व्यंजनों का सेवन कर दुर्गंधवासा बनाकर धरा को रख छोड़ा है. इस युग का सबसे पसंदीदा व्यंजन घूस है जिसे मुंह से नहीं टेबल के नीचे से खाया जाता है. यह वायव्य ध्राण रसना रूपी खाद्य जिसे पेट नहीं मन खाता है. घूसरूपी यह खाद्य शुद्ध अरवा है, जिसे बाबू लोग खाते हैं, बिल्कुल सुपाच्य! पर शुक्र है प्रकृति का कि प्रवेश और निकासी के अलग-अलग दो द्वार दिए और अति का सर्वत्र वर्जना भी वरणा बुभुक्षुगण शून्य से आकर शून्य में ही सिमट कर रह जाते. यही यह युग है. जहां अरवा भी पचना मुमकिन नहीं है. अच्छे-अच्छे पदों पर पदस्थापित बाबूओं, साहबों, मंत्रियों जिन्होंने घूसखोर, मुंह में लिया है वे अन्त में हवालात की हवा खा रहे हैं. सेहत बना रहे हैं. आदमी जीने के नाम पर इस विशाल चरागाह के बहुविद् प्रकारों का सेवन करते हैं. उन्हें अपने खाद्य की प्राप्ति में जितनी भयानक त्रासदी झेलनी पड़ती है, उतनी ही त्रासद ऐसे भोज्य पदार्थों के पाच्य में भी झेलनी पड़ती है. असंख्य तरीके अपनाते हैं ताकि खाद्य पदार्थ तृप्ति, पौष्टिकता दे और सुपाच्य भी रहे. कहा भी गया है- ‘पेट साफ तो मन साफ.’ किन्तु जठराग्नि के कोप शान्ति के लिए अगर सही हविशा- नहीं दी गयी तो इसका प्रकोप प्रलयंकारी हो जाता है. आदमी वाद्ययंत्र बन जाता है. सुर, लय और मात्रा की कोई मात्रा नहीं रह जाती. बिना थाप, बिना फूंक, निवृत्तितंत्र की तंत्रिकाओं को छेड़े बिना निनाद घृणाद वातावरण के प्रदूषण में इजाफा करता जाता है. जातिवाद, वर्गवाद, बेरोजगारी, साम्प्रदायिक भावना, भ्रष्टाचार यदि राष्ट्र की समस्या है तो ‘गैस प्रॉब्लम’ व्यक्ति-व्यक्ति की समस्या है. राष्ट्र अपनी समस्या के निदान के लिए वर्षों से योजनाएं बनाती आ रही है; जबकि आदमी के ‘स्व’ ह्रास की यह अनिवार्य समस्या समान रूप से व्याप्त- क्षणीय वृद्धि दर अपनाता जा रहा है. यह समस्या ऊँचे ओहदे से नीचे तबके तक, पंडित-मोमिन से सन्त-सामाजिक तक सबों में है. यह ऐसा ग्रह है जो सबों के कुंडली में विराजमान हैं. किसी-किसी पर पूर्ण कुपित तो किसी-किसी पर आंशिक प्रभाव. किसी-किसी पर तो कोई योग-जाप, मंत्रार्चन क्रिया वैदिक-अवैदिक चूर्ण, कोई इनो कोई हिंगोली काम नहीं करता.

मैंने एक बड़े बाबू को देखा था. ऐसे महामानव दीख जाते हैं. पेट समस्त अंगों से सर्वोत्तम गणेश जी की प्रतिष्ठा दांव पर. मुझे लगता है लम्बोदर की बानगी अब ऐसे ही महामानवों के लिए ही होनी चाहिए थी. हमेशा ढीला-ढाला पायजामा, इतना ढीला की आम आदमी के कई वस्त्र, उपवस्त्र बन सकते थे. ढीला पायजामा का उपयोग सिर्फ इसलिए की गैस रिसाव में दिक्कत न हो. जी हां, उन्हें गैस छोड़ना नहीं था. गैस जलती गैस बत्ती की तरह धुआं छोड़ता जाता था. फर्क सिर्फ इतना था कि इसमें कभी मद्धिम तो कभी उग्रध्वनि वर्तमान रहता था. उनके मित्र परिजन सभी उनकी इस चमत्कृत बीमारी से परिचित थे. अंजान सकुचाते, बच्चे ठिठियाते पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था. कभी-कभी नाक-मुंह सिकोड़ते मित्र से ठिठोली करते कहते- आ हां, गंधहीन, बेरवादार, सिर्फ वायु-प्रवाह.

एक ऐसे ही पड़ोसी है मेरे. एक दम लीकलीक. नब्ज टटोले नहीं मिलता. ठीक ऐसा ही असाध्य है उनका कब्ज. लाख प्रयास के बाद भी उन्हें होता नहीं है.

शौच सोच का विषय है उनके लिए. समय की पाबंदी इस कर्म में बिल्कुल अनुशासित. इतना अनुशासित जीवन के अन्य किसी कर्म में उन्हें नहीं देखा. बेचारे! कभी-कभी बेहद गंभीर और अनमने से बने रहते हैं. अजीब कब्जियत स्वभाव. उनकी कब्ज काव्यानुराग परिस्थिति में जिस दिन सामना पड़ जाता, मानिये उस दिन का जीवन नगरपालिका के कचड़े के ढेर में पिकनिक मना रहे हैं.

दुर्गंधों की दुर्गुणवत्ता अजीब-अजीब.

एक ऐसे ही परम हितैषी स्वजन हैं. सामाजिकता कूट-कूट कर भरी है उनमें. वैसा ही भरा-भरा सा गैस महलनुमा उदर है उनका. कहते हैं जिस दिन उनका गैस जागता है पूरा का पूरा मोहल्ला जागता है. एक विद्यालयी शिक्षक मेरे सन् पचहत्तर के समय अभाव-भाव खूब पकौड़ियां खायी थीं. बेचारे तदुपरान्त सन् पच्चासी से लगातार हर घंटे दीर्घशंका निवारण के लिए शौचालय नित्य दिन जाते थे. उनका अधिकतर समय शौचालय में बीतता था.

अक्सर ऐसे महामानवों से मेरा सामना हुआ है. कुछ ऐसे गैस गोले सहने पड़े हैं, मानो हिरोशिमा, नागासाकी की यंत्रणा झेल रहा हूँ. दुनिया ऐसे दहशतगर्दों से भरी है. वायु-प्रवाह

प्रबंध-निबंध लिखकर नाक कटे या रहे, फिक्र नहीं. नाक होती ही नहीं ऐसी तमन्ना पाल रहा हूँ. वायु-प्रवाह का जन-जीवन पर इतना भयानक कुप्रभाव रहा है कि लगता है संभावित प्रलय की स्थिति का एकमात्र कारण यही हो सकता है. कोई और नहीं. ऐसी प्रलंयकारी परिस्थिति उत्पन्न होने के पीछे एक ही रहस्य है और वह है बुभुक्षा. पेट की क्षुधा, मन की क्षुधा, तन की

क्षुधा, ऐन्द्रिक सुख की क्षुधा मिटाने के पीछे आदमी इतनी रफ्तार से व्यस्त हैं कि भोजन कैसा हो, कब हो और किस गति से खाया जाय इस पर अमल नहीं करते. उल्टा-सीधा जब जैसा मिले वैसा ही दबा लेते हैं. अत्यधिक कमाने के पीछे लोग मिलावट की दुनिया में कौन-सा शुद्ध है, स्वयं भूल गया है. स्वाद और रंग-रोगन देख लोग भोजन के वास्तविक आनन्द से हाथ धो बैठे हैं. शारीरिक क्रिया तो मजदूरों और खिलाड़ियों को छोड़कर कोई नहीं करता. आज आदमी स्वयं एक मलबा से आगे और कुछ भी नहीं है. ये अपने विरल मानव तन को गैस के झोकों में उड़ा रहे हैं. अब तो हर पद और दायित्व के भार से लदे बौद्धिक प्राणी की चेतनारूपी ओजोन मंडल डगमगा रही है. हमारे कवि, साहित्यकार, विचारक, कलाकार अब गैस के ऐसे रूढ़िवादी विचार को ध्वस्त कर रहे हैं. फिल्मों, काव्यों में गैस सहजता से छोड़े जा रहे हैं. मैं और मेरा परिवेश गैस मुक्त हो. मैं ऐसे गैस बंकरों, सिलिंडरों, सैप्टिक टैंकरों, फास्ट-फूडों, जिंक-फूड़ों से मुक्त होना चाहता हूँ. ‘आदमी’ ऐसे व्यंजनों का स्वाद जीने के नाम पर मरने के लिए न खायें. मौत तो शाश्वत है पर प्राणवायु की शाश्वता भी तो घ्राण योग्य होनी चाहिए.

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