रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

विचार और भाव-2 +रमेशराज

clip_image001

 

रस की स्थापना के लिए रस-शास्त्रियों ने रस-सामग्री के रूप में जिस प्रकार भाव, विभाव, संचारी भाव और स्थायी भाव की चर्चा की है और इन भावों के माध्यम से जिस प्रकार से पाठक या श्रोता के कथित हृदय में रस-निष्पत्ति का एक सूत्र या सिद्धान्त गढ़ा है, उससे यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं होता कि आखिर पाठक या श्रोता की उक्त भावदशा किस प्रकार बनती है और इसके पीछे कौन-कौन से कारक अपनी भूमिका निभाते हैं? इन कारकों की क्रिया-प्रणाली किस प्रकार की है? बल्कि इस सारे झंझट से मुक्ति पाने के लिए पाठक या श्रोता में ‘हृदय-तत्व’ की स्थापना करके, यह सिद्ध कर डाला कि पाठक या श्रोता के हृदय में कुछ भाव या मनोविकार सुप्त-अवस्था में पड़े रहते हैं, जो काव्य के क्षेत्र में स्थायी भाव के नाम से जाने जाते हैं। इन रसाचार्यों ने यह समझाने की कोशिश नहीं की कि हृदय तो एक रक्त-संचार का साधनमात्र है, उसका मनुष्य के भावात्मक पक्ष के निर्माण से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। हर प्रकार की भावात्मक प्रक्रिया का मूल आधार तो मानसिक-प्रक्रम है। मन के स्तर पर ही भावों की सुप्तावस्था या गतिशील अवस्था स्पष्ट की जा सकती है।

[ads-post]

पाठक, श्रोता या दर्शक की किसी भी काव्य-सामग्री के पठन-पाठन मंचन आदि के द्वारा सामाजिक में भावदशा बनने से पूर्व कई ऐसी मानसिक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं, जो काव्य तथा आश्रय की अर्थमीमांसा से आबद्ध रहती हैं। रस-निष्पत्ति के लिए किसी भी पाठक या श्रोता के मन में एक वैचारिक प्रक्रिया का उद्भव होता है और यही वैचारिक प्रक्रिया अपने चरमोत्कर्ष पर एक विशेष प्रकार के भाव [ स्थायी भाव ] में बदल जाती है।

स्थायी भाव के निर्माण में विभाव अपनी उद्दीप्त भूमिका का निर्वाह करता है। भरतमुनि के अनुसार-‘‘विभाव वाणी और अंगों के आश्रित अनेक अर्थों का विभावन या अनुभव कराते हैं-

वहवोर्था विभोव्यन्ते वागड.भिनयाश्रयाः।

अनेन यस्मात्तेनायं विभावभूति कथ्यते।।

इसका अर्थ यह हुआ कि नायक और नायिका की वाणी और अंगों से आश्रय जो अर्थ ग्रहण करता है, वह अर्थ ही एक विशेष प्रकार के भाव [ स्थायी भाव ] को जन्म देता है। इस तरह नायक या नायिका की काव्य में वर्णित मनोदशाएँ, प्रवृत्तियाँ, अंग-संचालन की क्रियाएँ और उसके विभिन्न गुणादि आश्रय के मन में भावदशा के निर्माण का आधार बनते हैं। अर्थ यह कि विभाव के रूप में नायक-नायिका की उद्दीपन प्रणाली अर्थात् आलंबन का धर्म ही आश्रय के मन को उद्दीप्त करता है। आश्रय जब आलंबनधर्म को कोई विशेष अर्थ दे लेता है, वही अर्थ या निर्णय भावों का निर्माण करता है। अतः काव्य में वर्णित पात्र या विषय आलंबन जरूर बनते हैं, लेकिन उनकी उद्दीपनक्षमता ही आश्रय के मन को झकझोरती है और उसमें नए-नए रसों का निर्माण करती है। अतः विभाव को परंपरागत तरीके [आलंबनविभाव तथा उद्दीपनविभाव] में वर्गीकृत करने के बजाय आलंबनगत उद्दीपनविभाव तथा प्रकृतिगत उद्दीपनविभाव के रूप में वर्गीकृत किया जाना अधिक वैज्ञानिक और तर्कसंगत रहेगा। बात को स्पष्ट करने के लिए यहाँ कुछ उदाहरण देना परमावश्यक है-

देख सखि अधरन की लाली।

मनि मरकत में सुभग कलेवर, ऐसे हैं वनमाली

मनौ प्रात की घटा साँवरी, तापर अरुण प्रकाश

ज्यों दामिनि बिच चमक रहत है, फहरत पीर्त सुवास।’’

इन पंक्तियों में आश्रय बनी गोपियों के लिए कृष्ण आलंबन जरूर हैं, लेकिन गोपियों के मन में स्थायी भाव रति जागृत करने में उस रूप के विशेष गुण-तत्त्व की भूमिका है, जिसे गोपियाँ श्रीकृष्ण के अधरों पर विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक बिंबों के माध्यम से अनुभव करती हैं। ठीक इसके विपरीत-

तुम्हरे अद्दत तीन तेरह यह देश दशा दरसावें

पै तुमको यदि जन्मधरे की, तब कहुं लाज न आवें।

आरत तुम्हें पुकारत हम सब, सुनत न त्रिभुवनराई

अँगुरी डारि कान में बैठे, धिक् ऐसी निठुराई।

इन पंक्तियों में आलंबन तो कृष्ण ही हैं, लेकिन उनके गुण-तत्त्वों की उद्दीपन-प्रक्रिया बदल जाने के कारण आश्रय में स्थायी भाव रति के स्थान पर, स्थायी भाव आक्रोश उद्बुद्ध हो उठा है। इसी स्थायी भाव आक्रोश की स्पष्ट झलक वर्तमान में इस प्रकार मिलती है-

ऊधौ वंशी राग-रस, नेह प्रेम सब व्यर्थ

अब तौ जानें श्याम बस, वोटों का व्यापार।

उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर यह प्रमाणित किया जा सकता है कि एक आश्रय आलंबन की विभिन्न प्रकार की उद्दीपन क्रियाओं से [मात्र आलंबन से नहीं] जिस प्रकार का अर्थ ग्रहण करता है और उन क्रियाओं के प्रति जिस प्रकार के अंतिम निर्णय लेता है, उसमें उसी प्रकार के स्थायी भाव निर्मित हो जाते हैं। स्थायी भावों की बनती और बिगड़ती स्थिति एक नायक की उन विभिन्न अवस्थाओं में देखी जा सकती है, जिनमें कभी वह क्रोध करता है, कभी शोकाकुल होता है, कभी लोक-कल्याण की बात सोचता है तो कभी उसका चरित्र लोकघाती चरित्र बनकर उभरता है। नायकों का इस प्रकार का चरित्र हमारे वर्तमान खंड-काव्यों, उपन्यासों, नाटकों आदि में सर्वत्र मौजूद है। जिसके अनुसार आस्वादकों की स्थायी भावों की जटिल प्रक्रिया को समझा जाना, विश्लेषित किया जाना एवं उसे रस की कोटि में रखना वैचारिक प्रक्रिया से जोड़े बिना संभव नहीं।

----------------------------------------------------

 

clip_image002

+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

मो.-9634551630

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget