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युवा पीढ़ी को मारने का काम / राजेश कपूर

युवाओं के दम पर हम सशक्त और सबल भावी भारत की कल्पना को साकार करने का दम भरते हैं. पर हमारे युवाओं की दुर्दशा जरा निकट से जाकर देखिये तो सही. वे देश तो क्या, अपना खुद का बोझ ढोने तक में असमर्थ होते जा रहे हैं. कहीं जानबूझकर उन्हें किन्ही शक्तियों द्वारा ऐसा तो नहीं बनाया जा रहा ?
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भारत को अपना बाजार बनाने वाली शक्तियां ऐसा कर सकती हैं.

भारत की प्रतिभा को कुण्ठित करने व दुर्बल बनाने के इच्छुक देश व संगठन ऐसा कर रहे हो सकते हैं.

हमारे आहार पदार्थों में अनेक प्रकार के कार्सीनोजैनिक तथा न्यूरो टॉक्सिक रसायन डले हुए हैं.

व्यापारी कार्पोरेशनें अपने व्यपारिक हितों को साधने के लिये अपने रास्ते की संभावित रुकावटों को दूर करने के लिये आहार पदार्थों में जानबूझकर ऐसे रसायनों का प्रयोग करते हैं जो मानसिक व शारीरिक रूप से दुर्बल बनाने वाले हैं.

 एक भयावह समस़्या हम भारतीयों के लिये मुसीबत बन चुकी है, पर इस पर अभीतक किसी का ध्यान ही नहीं गया है.इस समस्या का निराकरण किये बिना भारत की प्रतिभाओं को बचपन में ही मार देने का काम जारी रहेगा.

– भारत के विद्यालयों के लाखों बच्चों से मैं गत १५ वर्ष में मिला हूं. उनमें से ९५-९८% की सीखने-समझने की क्षमता बहुत दुर्बल हो चुकी है. उनकी शारीरिक व मनसिक रूप से निरंतर और अधिक कमजोर होते जा रहे हैं. निस्तेज चेहरे, बुझी आंखें,पीले व कमजोर दांत, अवसाद व तनाव से ग्रस्त; सूखा दुर्बल या गुब्बारे की तरह फूला बेजान शरीर.

यह दृश्य अधिकांश विद्यालयों का है. ऐसी युवा पीढी देश व स्वयं के लिये बोझ नहीं बनेगी ?

क्यों है ऐसा ?

– विश्व के अनेक वैज्ञानिकों के अनुसार अजीनोमोटो या ‘मोनोसोडियम ग्लूटामेट’ हमारी सीखने-समझने की क्षमता को नष्ट कर देता है. करोडों स्नायूकोष इसके कारण अत्यधिक उत्तेजित होकर नष्ट होजाते हैं. यह

अफीम या स्मैक की तरह नशेड़ी बना देता है और इसके बिना रहना कठिन हो जाता है. बार-बार इसे खाने के लिये हम बाध्य हो जाते

हैं

इस रसायन से लीवर सहित पाचन तंत्र भी नष्ट होता जाता है. शरीर फूलने लगता है या क्षीण हो जाता है.

टॉफी से लेकर पीजा, न्यूडल, बर्गर, हर डिब्बा बन्द आहार में यह विष तथा अन्य अनेक रसायन डले रहते हैं. ये घातक रसायन हमारी पूरी पीढ़ी को मानसिक, शारीरीक रूप से दुर्बल बनाने के इलावा प्रजनन क्षमता को नष्ट कर रहे हैं. इतनी विकराल राष्ट्रीय आपदा पर किसी का भी ध्यान नहीं ?

– इसी प्रकार ऐल्यूमीनियम है. इसके प्रयोग से भी स्नायुकोष, लाल रक्तकण नष्ट होने के साथ और अनेक हानियां होने के प्रमाण वैज्ञानिक दे चुके हैं.

हर घर, होटल में इन्ही बर्तनों का प्रयोग निरंतर बढ़ रहा हैं. भारत के कुछ करोड़पति व अरबपति परिवार इसका अपवाद हैं. आश्चर्य है कि वे मिट्टी के पात्रों का प्रयोग कर रहे हैं.

– सोडियम लॉरिल सल्फेट जैसे अनेक कैंसरकारक रासायनों से युक्त शैम्पू व सौंदर्य प्रसाधनों के घातक प्रभावों को भी करोंडों बच्चे और युवा भुगत रहे हैं.

# मानसिक व शारीरिक क्षमताओं को नष्ट करने वाले इन भयावह “प्रयासों” का समाधान किये बिना अगली पीढ़ी को सक्षम, सशक्त बनाना कैसे सम्भव होगा ?

कार्पोरेटों के इन इन घातक प्रयासों के प्रति जागृत करने का काम अमेरीका में तो डा. जोसेफ मैरकोला जैसे लोग कर रहे हैं. पर भरत तो इन सब से अनजान अपनी बरबादी की इबारत अपने ही हथों लिख रहा है. कौन रोकेगा, कैसो रुकेगा यह गुपचुप बरबादी का अभियान ???

जब जागो तभी सवेरा. सत्य को जाने, समझें, प्रचारित करें तो समाधान के रास्ते भी सूझेंगे.

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