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माँ तो ऐसी ही होती है / डॉ. अंकिता आचार्य पाठक

ब्रजमोहन आर्य की कलाकृति

उसने गर्भ में पल रहे बच्चे से उसके दुनियाँ में आने से पहले ही कई सारे वादे किए। जिनको पूरा करने के लिए न जाने कितने दर्द, कितनी तकलीफें सही। अपने जीवन साथी के विरोध का सामना किया जब पता चला कि गर्भ में पल रहे जिस बच्चे को वह जीवन देना चाहती है वही उसके अपने जीवन के लिए खतरा बन सकता है। बच्चे के जन्म लेने के बाद अपने परिवार के लोगों का धोखा जो उसे तलाक के रूप में मिला उस दर्द को भी अपने बच्चे की हँसी-किलकारी के साथ भुला दिया। बच्चे की परवरिश, शिक्षा आदि के लिए पारिवारिक, सामाजिक प्रताड़नाओं का दर्द भी वह हँसते-हँसते सहती रही। आखिर वह एक माँ थी।

माँ के कर्तव्यों से वह अनजान नहीं थी क्योंकि दुनिया में उसकी भी अपनी एक माँ थी जो अपने अन्तिम समय में अपनी बेटी के नाम अपना घर कर गई थी जिसके कारण अपने भाई-भाभी की नफरत का कारण भी वह बनी। साथ ही माँ को वचन भी दिया कि उस आशीर्वाद रूपी कोठी को वह कभी नहीं बिकने देगी। उसी कोठी में अपने बच्चे की खुशियाँ व आवश्यकताओं को पूरा करते- करते उसने बेटे को बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया, इंजीनियर बनाया। अपने बेटे को इस मुकाम तक पहुँचाते- पहुँचाते खुद उसकी आंखों की रौशनी धुंधली पड़ गई। फिर भी उसका संघर्ष व दर्द से नाता खत्म नहीं हुआ। बेटे को नौकरी दिलवाने के लिए ली जाने वाली राशि की व्यवस्था उसे अपनी एक किडनी बेचकर करनी पड़ी। बेटे को नौकरी मिली व विदेश जाने का सुनहरा मौका। उसने कभी सोचा भी न था कि उसे अपने बेटे से दूर होना पड़ेगा।

अब बारी थी बेटे से दूर होने के बाद मिलने वे दर्द की............. जिसे न तो वह अपने चेहरे पर न अपनी जुवां पर आने दे सकती थी, क्योंकि कहीं न कहीं बेटे की खुशी उस दर्द पर भारी थी। समय अपनी गति से आगे बढ़ने लगा। बेटे ने अपने विवाह की सूचना माँ को तार द्वारा दी। जहाँ हर माँ अपने बच्चों की शादी के सपने व अरमान अपने दिल में संजोती है वहीं इस माँ का वो अधिकार भी छिन गया। यादों के सहारे समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था ............. एक दिन अचानक माँ के कानों में बेटे की आवाज़ आई... क्षण भर की खुशी ने बरसों के साथी दुख को पीछे कर अपनी पैठ जमाई।

बेटे ने माँ को परदेस साथ चलने के लिए आखिरकार मना ही लिया साथ ही उसने वह कोठी बेचने के लिए भी माँ को राजी कर लिया, जिसे ना बेचने का वह अपनी माँ को वचन दे चुकी थी। कोठी बेच माँ-बेटे परदेस जाने के लिए निकल पड़े, जाते – जाते माँ के दिल में टीस उठ रही थी अपनी माँ को दिए वचन के टूटने की। पर वो विवश थी। स्टेशन पर पहुँच बेटे ने माँ को एक छड़ी थमाई क्योंकि वह भांप चुका था कि आँखों के साथ- साथ माँ का शरीर भी कमजोर हो चुका था। अपनी माँ को एक बैंच पर बिठाकर बेटे ने माँ से कहा मैं तुम्हारी टिकिट और साथ चलने की व्यवस्था करके आता हूँ। माँ ने कहा जा बेटा मैं यहीं तेरा इंतजार करती हूँ।

कई रातें, कई दिन बीत गए। माँ की आस व आँखें पथरा गईं बेटे का इंतजार करते -करते। माँ उठी उसी छड़ी के सहारे जो उसके लाडले बेटे ने उसे दी थी। किसी तरह उसी छड़ी को सहारा बना कर माँ अपनी बेची हुई कोठी पर पहुँची इस आस में कि कभी बेटा अपने घर की याद कर लौटेगा तो कोई तो होना चाहिये उसका ध्यान रखने के लिए। अब तो सर से छत भी छिन चुकी थी, शरीर भी लाचार हो गया था पर माँ का दिल यह सोचकर परेशान हो उठा कि अगर कभी मेरा बेटा अपने घर वापस आएगा, उसे मेरी जरूरत होगी तो वह कहाँ जाएगा। यही सोच जिन लोगों को कोठी बेची थी उन्हीं के घर चौका-बर्तन करने लगी।

दो वक्त की रोटी के साथ जो तनखा उसे मिलती थी उसे बेटे के नाम संजोने लगी।............

क्या करती वो माँ थी.... माँ तो ऐसी ही होती है।......

 

जबलपुर

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