मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

कहानी / मौत के बाद / आसिफ़ सईद

मौत के बाद

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(कहानी)

मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो, मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो, क़ासिम की कराहट भरी चीखें फ़लक को तार-तार किए दे रही थीं। लेकिन मलैकुल मौत को उस पर ज़रा भी तरस नहीं आ रहा था। मेरी अम्मी मेरी राह देख रही होंगी मेरे ऊपर बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ हैं, मुझे अभी कई काम-करने हैं, मुझ पर रहम करो मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो, तुम्हें अपने रब का वास्ता मुझे छोड़ दो। मलैकुल मौत जिसे कभी किसी पर तरस नहीं आता, जो किसी की बात का जवाब नहीं देती, क़ासिम की बातों को सुनकर कहती है ''तुम दुनियाँ में पहले इन्सान नहीं जो ज़िम्मेदारियाँ छोड़ कर आए हो, हमारे साथ आने वाले सभी लोग किसी न किसी ज़िम्मेदारी में घिरे रहते हैं तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए कि तुम्हारे ऊपर से दुनियाँ के सभी बोझ उतर गये, और यह अल्लाह का बनाया कानून है जिसकी रूह एक बार जिस्म से निकल गई वह दुबारा दाख़िल नहीं की जा सकती। नहीं-नहीं ऐसा नहीं है आप चाहें तो अल्लाह के हुक्म से सब कुछ हो सकता है, पहले भी कई बार ऐसा हुआ है कि बन्द धड़कन दुबारा चालू हो गईं, और इन्सान फिर जी उठा। नहीं क़ासिम तुम समझ नहीं रहे हो, ऐसा नहीं हो सकता। नहीं मलैकुल मौत ऐसा न कहो, मेरी हालत पर तरस खाओ। मेरा काम तरस खाना नहीं अल्लाह के हुक्म को मानना और उसे अमली जामा पहनाना है। इंसान को दुनियाँ से प्यार नहीं करना चाहिए, दुनियाँ से प्यार उसे अल्लाह से दूर कर देता है, जैसा कि तुम्हारे साथ हुआ है। नहीं मलैकुल मौत मुझे दुनियाँ से लगाव नहीं है, मैं तो अल्लाह का ही बन्दा हूँ पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता था किसी का काम हो तो मदद के लिए भी पीछे नहीं हटता, किसी का बुरा नहीं चाहता था। मलैकुल मौत पर किसी भी बात का कोई असर नहीं होता, वह बिल्कुल नहीं पसीजती और उसकी रूह को खैंच कर ले जाने लगती है। क़ासिम फिर बुरी तरह दहाड़ें मार-मार कर रोता है और अचानक मलैकुल मौत के पैर पकड़ लेता है। छोड़ो-छोड़ो यह क्या करते हो, क़ासिम! नहीं आपको मेरे लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा? अच्छा पैर तो छोड़ो मैं कुछ करता हूँ, और क़ासिम पैर छोड़ देता है, मलैकुल मौत हाथ फैलाकर कुछ पढ़ने लगती है काफ़ी देर बाद जब वह आँखें खोलती है तो कहती है कि अल्लाह ताला के हुक्म से तुम्हें सिर्फ़ छह महीने की ज़िन्दगी और मिलती है, तुम अपने छूटे हुए सभी कामों को पूरा कर लो, मैं तुम्हें यहीं छोड़ कर जा रही हूँ और छह महीने बाद तुम्हें लेने फिर आऊँगी।

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इतना कहने के बाद मलैकुल मौत ग़ायब हो गई, इसके बाद क़ासिम की रूह तेज़ी से ज़मीन की तरफ़ जाने लगी, जहाँ सुबह ऐक्सिडेन्ट में उसकी मौत हुई थी, वहाँ पहुँचने पर उसने देखा कि उस जगह पर कुछ ख़ून पड़ा हुआ है और उसकी बाइक का कहीं आता -पता नहीं है, उसकी रूह कुछ सोचते हुए घर की तरफ़ तेज़ी से चल देती है, जहाँ उसकी लाश को नहलाया जा रहा है, लाश की हालत बड़ी ख़राब है, क़ासिम की समझ में नहीं आ रहा वह लाश के अन्दर कैसे समाए, मलैकुल मौत ने उसे कोई तरक़ीब भी तो नहीं बताई थी, लाश कई जगह से मोट-मोटे टाकों से सिली हुई थी शायद यह सब पोस्टमार्टम के बाद का हाल था उसकी रूह ने लाश के अन्दर घुसने की बहुत कोशिश की लेकिन नाकामयाब रही, पूरे घर में सन्नाटा छाया हुआ था, अन्दर वाले कमरे से कुछ सुबकने की आवाज़ आ रही थी, क़ासिम की रूह ने अन्दर जाकर देखा तो उसकी अम्मी और दोनों बहने दूसरी औरतों के साथ दबी आवाज़ में रो रही थीं, शायद रोते-रोते थक चुकी थीं, अब्बू बाहर आदमीयों के साथ बैठे थे जनाज़ा नहलाया जा चुका था, कुछ लोग बाहर टुकड़ियों में खड़े थे क़ासिम की समझ में नहीं आ रहा था कि मलैकुल मौत ने उसके साथ ऐसा क्यों किया, अगर उसकी रूह जिस्म में दाख़िल नहीं हो सकती थी तो छोड़ा क्यों। सामने मेरा सबसे प्यारा दोस्त अब्दुल उदास खड़ा था उसके साथ कुछ दूसरे दोस्त भी खड़े आपस में बातें कर रहे थे, एक बोला पिछले दिनों पाकिस्तान में एक अजीब हादसा हुआ, दो भाई क़ब्रों में से मुर्दे निकाल कर खाया करते थे यहाँ तक कि अपने बाप की लाश भी क़ब्र में से निकाल ली, और काट कर फ़्रीज में भर ली, पकड़े जाने पर छोटा भाई बोला, मैं गोश्त नहीं खाता था मैं तो बड़े भाई को सिर्फ़ पका कर देता था।

सचमुच क़्यामत आने वाली है इससे ज़्यादा बुरा काम और क्या होगा, दूसरा दोस्त बोला रेशमाँ के बारे में तुम लोगों ने कुछ सुना उसका पैंसठ साल का मियाँ कितना परेशान है, उसकी समझ में बिल्कुल यह बात नहीं आ रहा कि उसकी पहली दो बीवीयाँ जब माँ नहीं बन पाईं, तो रेशमाँ को बच्चा कैसे होने वाला है, दोनों में आजकल बहुत खटपट चल रही है। अचानक अन्दर से रोने की आवाज़ें तेज़ आने लगीं शायद जनाज़ा तैयार है, क़ासिम अपने माँ-बाप का अकेला बेटा था, और उसकी दो बहने हैं, माँ की आँखों का ऑपरेशन होना था, ताकि उसमें रोशनी आ सके, जनाज़ा बाहर आ चुका था, जनाज़े में लोगों की तादात बहुत थी क़ासिम की रूह सब देख रही थी, जनाज़ें में ऐसे लोग भी थे जिनके आने की उम्मीद उसे नहीं थी और कुछ ऐसे ख़ास दोस्त ग़ायब थे कि यक़ीन नहीं आ रहा था, क़ासिम की उम्र तक़रीबन तीस साल रही थी, बहने उससे दोनों छोटी हैं, एम0कॉम0, करने के बाद से वह नौकरी की तलाश में परेशान था, अब्बू उसके सरकारी दफ़्तर में मुंशी हैं जो कुछ ही दिन में रिटायर होने वाले हैं।

जनाज़ा क़ब्रिस्तान पहुँचा, कुछ ओर लोग वहाँ पहले से मौजूद थे, जल्दी ही जनाज़े को दफ़न कर दिया गया, और फ़ातिहा पढ़ी गई, ख़ानदान के काफ़ी लोग अब्बू के साथ थे, जो अब्बू को हौसला दे रहे थे कि हमारे और आप के बस में कुछ नहीं है, सब्र कीजिए, कभी कोई काम हो तो हमें बताइए। और फिर होले-होले सब लोग क़ब्रिस्तान से चले गए, अब्बू भी चचाज़ात भाई समद की गाड़ी पर बैठ कर घर चले गए, क़ासिम की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे, मलैकुल मौत ने तो उससे छह महीने बाद ले जाने की कहा है, उसके यहाँ रहने से अब क्या फ़ायदा वह तो अब किसी की कुछ मदद भी नहीं कर सकता, वह सोचता है- कहाँ जाऊँ, क्या करूँ, घर जाकर देखूँ अम्मी-अब्बू का क्या हाल है। घर पर बहने अम्मी को रोने के लिए मना कर रही हैं, जबकि वह भी होले-होले रो रही हैं, घर के बाहर खड़े लोग अब्बू से माज़रत चाहते हुए जा रहे हैं, घर के अन्दर रिश्तेदारों का जमावड़ा है, रात को अब्बू चचाज़ात भाई समद से खाने के इन्तेज़ाम के लिए कहते हैं, खाना आने के बाद सभी अफ़सुर्दा हालत में थोड़ा बहुत खाना खाते हैं, दूसरे दिन सुबह तीजा होता है, बाहर से आए कुछ मेहमान तीजे के बाद चले जाते हैं, दो-तीन लोग ही हैं जो रूके हुए हैं, दो दिन बाद वह भी चले गए, इस बीच मिलने-मिलाने वालों का सिलसिला चलता रहता है, पुर्से के लिए लोग आते रहते हैं, कुछ ऐेसे दोस्त भी आते हैं जिन्हें देख क़ासिम की रूह को यक़ीन नहीं आता, यह तो उससे हमेशा जलते थे और कुछ ऐेसे ख़ास दोस्त जिन्हें आना चाहिए था वह अब तक आकर नहीं झांके थे, सात दिन हो चुके थे। अब्बू रोज़ समद के साथ फ़ातिहा पढ़ने क़ब्रिस्तान जाते हैं, अम्मी की आँखों का ऑपरेशन होना था, अब्बू को भी आए दिन अपेंडिक्स का दर्द उठता था उनका भी ऑपरेशन होना था और फिर दोनों बहने शादी के लिए जवान थीं, ख़र्चे के लिए सिर्फ़ अब्बू की तनख़्वाह ही थी जो कि रिटायर होने के बाद कम होने वाली थी।

अचानक क़ासिम की रूह को नासिरा का ख़्याल आता है जो उसका जुनून थी, मकसद थी, ज़िन्दगी थी। भले ही नासिरा की नज़र में उसकी मुहब्बत की कोई कीमत न थी, लेकिन क़ासिम ने तो उसे पागलों की हद तक मुहब्बत की थी, उसकी एक झलक के लिए कई-कई घण्टे वह एक टाँग पर खड़ा रहता था। क़ासिम की रूह नासिरा के घर की तरफ़ चल देती है, जहाँ नासिरा टी0वी0 पर कार्टून पिक्चर देख रही है हाथ में चाय का कप है वह छोटे बच्चे की मानिन्द कार्टून देख बार-बार हस रही है, वह बहुत ख़ुश है, क़ासिम की रूह सोचती है कि शायद इसे मेरी मौत की ख़बर नहीं है। थोड़ी देर बाद नासिरा की अम्मी, आकर कहती हैं, तुम्हारी दोस्त फ़रहा आई है। उसे अन्दर भेज दो अम्मी। और फिर दोनों दोस्त एक दूसरे को देखकर बहुत ख़ुश होती हैं, बातों का सिलसिला शुरू हो जाता है, बेटी मैं तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाती हूँ। अम्मी के जाने के बाद नासिरा बोली, मैं तुझे एक ख़ास बात बताने आई थी जो मुझे आज ही पता चली है। फ़रहा के बताने से पहले ही नासिरा उससे कहती है, तू शायद क़ासिम की मौत की ख़बर लायी है। फ़रहा कहती है हाँ, तुझे पता है। नासिरा, मुझे तो मेरे एक दोस्त ने उसी दिन ही बता दिया था जिस दिन वह मरा था, अच्छा हुआ बला टली पीछे ही पड़ गया था, कमबख़्त। फ़रहा उसकी शक्ल देखती रह जाती है और कहती है, वह तुझे कितना चाहता था तुझे उसके मरने का ज़रा भी अफ़सोस नहीं हुआ, तुम तो फ़रहा ऐसे कह रही है जैसे वह मुझे हीरे-जवाहरात देकर भूल गया हो। नासिरा, हीरे जवाहरात न सही उसने तुम्हें पागलों जैसी मुहब्बत तो की थी, और रही कुछ देने की बात तो पचाँसों बार उसने तुम्हें कुछ न कुछ गिफ़्ट तो दी ही, तुम ख़ुद दिखाती थीं। नासिरा बोली, ऐसे तो मुझे न जाने कितने लड़कों ने गिफ़्टें दीं, और न जाने कितने मेरे पीछे पड़े तो क्या मैं सबसे शादी करलूँ, और सबकी मौत पर मातम करूँ। और एक बात समझ लो फ़रहा शादी हमेशा माँ-बाप की मर्ज़ी से करो चाहे बाहर कितना भी एैश करो। मैं तुम्हारी बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखती नासिरा, हमें अल्लाह के घर भी जाना है। तभी किसी लड़के का फ़ोन आता है और नासिरा खिड़की के पास जाकर बड़े ही प्यार से उससे बातें करने लगती है, बात करने का अन्दाज़ कुछ ऐसा था कि सामने वाला इस ग़लतफ़हमी में मुबतिला हो जाए कि वह भी उसे चाहती है, तभी थोड़ी देर बाद अम्मी चाय लेकर कमरे में आती हैं, नासिरा फ़ोन काट देती है और अम्मी से कहती है शबाना का फ़ोन था, अम्मी चाय रखकर चली जाती हैं, फ़रहा नासिरा से कहती है कि तुम क्यों लड़कों को बेवकूफ़ बनाती हो, तुम्हें अल्लाह का ज़रा भी डर नहीं है। नासिरा फ़रहा की तरफ़ बड़े ग़ौर से देखती है और कहती है तुम चाय लो। नहीं मुझे अब चाय नहीं पीनी मैं अब जाऊँगी, लेकिन इतना ज़रूर कहूँगी कि दिलों से खेलना ठीक नहीं है, ऊपर वाले के यहाँ देर है अन्धेर नहीं। और जो लड़की एक खूंटे से बंधकर नहीं रहती, वह कभी अपने शौहर की भी सगी नहीं हो सकती। इतना कहकर फ़रहा चली जाती है, अम्मी कमरे में आकर देखती हैं कि चाय वैसे ही रखी है, फ़रहा ने चाय नहीं पी नासिरा। मरने दो अम्मी, अच्छा हुआ नहीं पी, जब चाहा मुँह उठाए चली आती है, अपने आप को अल्लामा की नवाँसी समझने लगी है, मुझे समझा रही है जबकि मुझसे कम पढ़ी-लिखी है, आगे से आए तो मना कर दिया करो कि मैं घर पर नहीं हूँ। अम्मी चाय लेकर बाहर चली जाती हैं, नासिरा फिर किसी को मिस कॉल मारती है। और दूसरी तरफ़ से फिर मर्दानी आवाज़ आना शुरू हो जाती है और नासिरा उसके साथ बातों में मसरूफ़ हो जाती है। क़ासिम की रूह यह सब देख तड़प उठती है और वहाँ से चल देती है। आज उसे अपने ऊपर शर्म आ रही थी कि उसने मुहब्बत की भी तो किससे, अगर ज़िन्दा होता तो यह सब देख वैसे ही मर जाता, ख़ैर अल्लाह जो करता है बेहतर करता है। रास्ते में उसे ख़ालिद का मकान नज़र आता है जहाँ रात को सब दोस्त इकट्ठा हुआ करते हैं, वहाँ जाकर क़ासिम की रूह देखती है कि सिर्फ़ तीन दोस्त हैं, हामिद, सलीम और ख़ुद ख़ालिद, तीनों का ध्यान टी0वी0 पर आ रही किक्रेट की ख़बरों पर है, तभी निज़ाम और सुहैल आते हैं, निज़ाम कहता है अमा क्या ख़बरें सुन रहे हो ज़रा ''ज़ी-सिनेमा'' पर देखो इमरान हाशिमी की 'मर्डर' आ रही है। और फिर मर्डर लगा दी जाती है तभी ख़ालिद पूछता है कि अब्दुल की कुछ ख़बर, सुहैल कहता है कि उसे तो क़ासिम की मौत का सदमा बैठ गया है, साला रोज़ाना कब्रिस्तान में फ़ातिहा पढ़ने जाता है, और घर भी जाकर का़सिम के अब्बू से पूछता है कि कुछ काम हो तो बताना, निज़ाम बोला, कल मुझे मिला था, मैंने समझाया था कि मरने वाले के साथ ख़ुद थोड़े ही मरा जाता है, लेकिन साला सखी हातिम हो रहा है। सलीम बोला, अरे मैं बहुत समझाता था क़ासिम को कि गाड़ी धीरे चलाया कर लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी, ख़ुद भुगता।

क़ासिम की रूह का वहाँ रूकने का दिल नहीं करता, वह चल देती है, घर जाकर वह देखती है कि अम्मी फिर रो रही हैं और बहने चुप कराने में लगी हैं अभी क्या देखा था मेरे बच्चे ने हर वक़्त तुम्हारी शादी की फ़िक्र में लगा रहता था। कह रहा था अम्मी मैं अपने पैसों से तुम्हारी आँखों का ऑपरेशन कराऊँगा, फिर तुम्हें बिल्कुल साफ़ नज़र आएगा, अब साफ़ देखकर क्या करूँगी, जब मेरा लाल ही नहीं रहा, उनकी बातें सुनकर दोनों बहने भी रोने लगती हैं, आवाज़ें सुनकर दूसरे कमरे से अब्बू आते हैं, और डाटते हुए कहते हैं कि क्या हर वक़्त का रोना धोना लगा रखा है जानती नहीं हो ज़्यादा रोने से मरने वाले की रूह को भी तक़लीफ़ होती है और उनको चुप करा कर वह अपने कमरे में जाकर लेट जाते हैं, और बड़ी ही ख़ामोशी से रोने लगते हैं लेकिन उनके आँसू पौंछने वाला वहाँ कोई नहीं था और थोड़ी देर में रोते-रोते वह सो जाते हैं।

क़ासिम का दसवाँ भी हो जाता है, होले-होले चालीसवें का वक़्त आ जाता है क़ासिम की रूह ऐसे ही भटकती रहती है, एक दिन चचा समद की अम्मी से बोले। मैं सोच रहा हूँ कि समद का रिश्ता भाईजान की बड़ी बेटी शहाना के साथ कर दिया जाए, समद बीच में बोला नहीं मैं शहाना के साथ शादी नहीं करूगाँ। चचा ने डाटते हुए कहा बेवकूफ़़ भाईजान का लाखों का मकान है वो अब दोनों बेटियों को ही मिलेगा यानी आधा मकान तुझे, समझा, वरना तुम जैसे निखट्टू को कौन अपनी लड़की देगा, और शहाना में कमी भी क्या है मकान के लालच में कोई दूसरा हाथ साफ़ कर जाएगा, आई बात समझ में। और फिर रिश्ता करने से हमारी वाह-वाह ही होगी, मैंने बहुत सोच समझ कर यह तैय किया है। पूरी बात समझ समद बोला, अच्छा अब्बा आप कहते हैं तो मैं तैयार हूँ। अब्बा कहते हैं चालीसवें के बाद मैं किसी दिन भी बात छेड़ दूँगा। क़ासिम की रूह दूर खड़ी हुई यह सब सुन रही है। शाहना से छोटी का नाम हुसैना है वह बड़ी ही ख़ूबसूरत है उसने बी.एस.सी. इंजीनियरिंग की है, क़ासिम अपनी इस बहन पर जान छिड़कता था, वैसे भी वह घर में सभी की लाडली थी, चालीसवें वाले दिन घर में बहुत से लोग आते हैं सब से आख़िर में आए एक ख़ूबसूरत नौजवान को देख क़ासिम की रूह बड़ा पेरशान होती है कि यह शख़्स कौन है, इसे किसने बुलाया होगा। अब्बू उसे खाना खिलवाते हैं, वह बड़ी नज़ाकत से होले-होले खाना खाता है, खाना खा चुकने के बाद अन्दर से शाहना की आवाज़ आती है, अब्बू अली को अन्दर भेज देना अम्मी बुला रही हैं, और फिर अली अन्दर चला जाता है जहाँ हुसैना अम्मी के साथ बैठी है, वह भी सलाम करके सामने बैठ जाता है अम्मी कहती हैं, बेटा हुसैना तुम्हारी बड़ी तारीफ़ करती है क़ासिम ज़िन्दा होता तो कितना ख़ुश होता, वो तो हुसैना को बहुत चाहता था। अली बोला, अम्मी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है ऊपर वाले को जो मंज़ूर होता है वही होता है, उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, आप मुझे भी अपना बेटा समझें, कभी कोई बात हो तो आप मुझे बताइये मैंने आप के लिए डॉक्टर से बात कर ली है वह मेरा दोस्त है आँखों का बहुत अच्छा डॉक्टर है, जिस दिन आप फ़्री हों हुसैना के साथ अस्पताल आ जाइए, मैं भी वहीं पहुँच जाऊँगा। पता इस कार्ड पर लिखा है इसे रख लीजिए। थोड़ी देर बातचीत के बाद वह कहता है अच्छा अम्मी अब मैं इजाज़त चाहूँगा, हुसैना दरवाज़े तक उसे छोड़ने आती है दोनों में कुछ बातें होती हैं और अली चला जाता है, दूसरे दिन समद घर पर आता है और बोला, ताया आप किसी दिन मेरे साथ अस्पताल चलिए मुझे आप की बड़ी फ़िक्र रहती है मैं आपका ऑपरेशन कराऊँगा। अब्बा भी हर वक़्त आपकी ही की फ़िक्र में रहते हैं।

समद की इन बातों ने ताया के दिल में घर कर लिया क़ासिम की रूह यह सब नज़ारे बड़ी बारीकि से देख रही थी, कि चाहे कैसे भी सही पर कितनी आसानी से सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी ही रही थीं, वह कितना गिड़गिड़ाया था मलैकुल मौत के सामने जब तक वह जिन्दा था तो कितनी बड़ी लगती थीं यह ज़िम्मेदारियाँ और उसके मरने के कुछ ही दिन में सब कुछ ठीक हो गया, शायद मेरा मरना इन कामों को आसान कर गया, इसीलिए तो कहते हैं अल्लाह जो करता है बेहतर करता है और हाँ हो सकता मलैकुल मौत ने मुझे यह सब देखने के लिए ही ज़मीन पर भेजा हो।

दो महीने बीत चुके थे, अब्बू ने भी अब क़ब्रिस्तान जाना बन्द कर दिया था, दोस्तों को बीच भी उसका ज़िक्र अब कभी-कभी ही होता था अब्दुल भी अब ग्रुप में आकर ख़ालिद के घर बैठने लगा था, घर वालों ने दोनों बहनों की एक साल बाद एक साथ शादी के लिए कह दिया है, अम्मी-अब्बू के कामयाब ऑपरेशन हो गए हैं, हुसैना ज़्यादातर फ़ोन पर लगी रहती है और समद का भी अब घर पर आना बढ़ गया है।

ढाई महीने मे ही क़ासिम का वजूद तक़रीबन पूरी तरह फ़ना हो चुका है, उसकी समझ में नहीं आ रहा कि उसकी रूह अब यहाँ क्या कर रही है उसकी रूह क़ब्रिस्तान पहुँच कर अपनी क़ब्र के पास बैठ जाती है, ढाई महीने में ही क़ब्र ढाई साल पुरानी लग रही थी किसी जानवर ने शायद अपने पैरों से उसे उधेड़ दिया था, अचानक क़ासिम की रूह की आँखों से आँसू निकलने लगते हैं, अल्लाह मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई मुझे माफ़ कर दे, ऐ मलैकुल मौत तू कहाँ है मुझे ले चल, मुझे अल्लाह के पास पहुँचा दे, मैं यहाँ रहना नहीं चाहता और उसकी रूह तड़प-तड़प के चीखने लगती है रोते हुए वह हाथ उठाकर या कभी कानों को पकड़कर माफ़ी माँगती है और बुरी तरह करहाने लगती है, और चीख-चीख कर अल्लाह को पुकारती है। तभी कोई उसे पकड़कर झंझोड़ता है और कहता है कि क्या बात है क़ासिम क्या हुआ बेटा। हुसैना पानी लेकर आ पसीने-पसीने हो रहा है मेरा बच्चा, लगता है यह कोई बुरा ख़्वाब देख रहा था, अब्बू भी क़ासिम के कमरें मे आ जाते हैं क्या बात है। शाहना कहती है अब्बू, भाई ने कोई बुरा ख़्वाब देखा है वह ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रहे थे। क़ासिम हैरत में आँखें फाड़-फाड़ कर सबको देख रहा था वह सोच रहा था कि यह बस क्या था वह अपने ज़िन्दा होने पर ख़ुश हो या फिर अफ़सोस करे।

कुछ देर बाद उठकर वह नहा धोकर तैयार होता है और नाश्ता कर सीधा अब्दुल के घर पहुँचता है अब्दुल एक कम्पनी में मुलाज़िम है और जाने के लिए तैयार खड़ा था। क़ासिम को देख वह कहता है आओ क़ासिम आज इतनी सुबह-सुबह कैसे आए, पाँच मीनट बाद आते तो शायद मैं न मिलता। वह दोनों बाहर ही खड़े होकर एक तरफ़ बात करने लगते हैं, क़ासिम उसे बताता है कि आज रात उसने कितना ख़ौफनाक ख़्वाब देखा था और उसके साथ ख़्वाब में क्या-क्या हुआ। अब्दुल उससे कहता है कि ख़ुद को मरे हुए देखना लम्बी उम्र की निशानी है तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए, मेरे दोस्त तुम्हारी तो उम्र बढ़ गई। क़ासिम कहता है यार अपने बॉस से मेरे लिए बात कर, मैं कब तब टयूशन पढ़ा-पढ़ा कर गुज़ारा करूँ, ख़र्चे दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं। अब्दुल कहता है कि हमारे यहाँ कोई जगह भी तो नहीं है मैं फिर भी बॉस से तेरी बात करूँगा। क़ासिम कहता है अच्छा अब तुम जाओ, लेट हो रहे है शाम को मुलाकात करेंगे।

कुछ दिन में रमज़ान शुरू होने वाले हैं, क़ासिम सोचता है कि इस बार ख़ूब दिल लगा कर इबादत करेगा, हो सकता है अल्लाह सारे हालात ठीक कर दे। वह घर में हुसैना पर अब ज़्यादा निग़ाह रखता है लेकिन वह कभी उसे फ़ोन पर बात करते ही नहीं दीखती, और न हीं समद घर पर कभी आता है, रमज़ान शुरू हो जाते हैं क़ासिम पाबन्दी से जमआत के साथ नमाज़ पढ़ता है, और साथ ही तराबियों का भी पूरा-पूरा अहतराम करता है, रोज़े तो वह बचपन से ही पूरे रखता आया है। और फिर होले-होले रमज़ान ख़त्म हो ईद आ जाती है, इस बार वह नासिरा को ख़ुश करने क लिए सोने की लोंग लाता है, पहले तो वह अगूँठी की सोच रहा था लेकिन जेब की हालत जवाब नहीं दे रही थी दूसरे खर्चे भी बहुत थे, अब्बा से वह पैसे लेता नहीं था। ईद के तीसरे दिन वह नासिरा से एक जगह मिलता है और उसको ईदी की शक्ल मे लोंग देता है। पहले तो वह न नुकुर करती है लेकिन फिर ले लेती है और कहती है मैंने अम्मी से हमारी-तुम्हारी शादी की बात की थी लेकिन वह तैयार नहीं हो रहीं, तुम अच्छी सी नौकरी देखो मैं उन्हें मनाने की कोशिश करती हूँ। क़ासिम जी जान से नौकरी की तलाश में जुट जाता है और कुछ महीने बाद एक कम्पनी में उसका बहुत ही अच्छा इन्टर्वियू होता है। उसे अब पूरी उम्मीद है कि इस कम्पनी में उसको नौकरी मिल जाएगी। वह सोच-सोच बाइक पर ख़ुशी में उड़ा जा रहा था, कि अचानक उसकी निगाह सामने किसी की बाइक पर जा रही बुर्के वाली पर पड़ती है जो कि नासिरा है, वह बेचैन हो बाइक उसके पीछे लगा देता है, नासिरा जिस लड़के के साथ बाइक पर बैठी थी उसकी रफ़्तार बहुत तेज़ थी, क़ासिम ने भी रफ़्तार बड़ा दी, कि अचानक एक बस के पीछे से ट्रक निकला और क़ासिम की बाइक में से आवाज़ आई किर र र र ..... च र र र र ....... ध ध ध धड़ाम। क़ासिम और बाइक दोनों ट्रक के नीचे थे, एक ही झटके में रूह जिस्म के बाहर आ गई, लाश को कुछ देर तड़पने का मौक़ा भी न मिला, दूर मलैकुल मौत खड़ी मुस्करा रही थी, वह कहती है, छह महीने हो गए क़ासिम कितनी ज़िम्मेदारियाँ निभाईं। क़ासिम की रूह भी मुस्कराते हुए ही जवाब देती है, मलैकुल मौत अब मैं जान गया हूँ कि उनके पूरे होने का वक़्त अब आया है। क़ासिम की रूह अपना हाथ मलैकुल मौत के हाथ में दे देती है और दोनों मुस्कराते हुए बादलों के पार चले जाते हैं।

डॉ0 आसिफ़ सईद

जी-4, रिज़वी अपार्टमेन्ट-प्प्

मेडिकल रोड, 202002

अलीगढ़ (उ0प्र0)

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