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उच्च शिक्षा का भगवान ही मालिक (उच्च शिक्षा का बंटाधार ) / यशवंत कोठारी

उच्च शिक्षा गरीब की जोरू की तरह है जिसे हर कोई अपनी दुल्हनिया समझता है. जब मन किया बुला लिया. शिक्षा पर हम लोग रोज़ बहस करते हैं, रोज वक्तव्य आते हैं ,पढ़ते हैं , मगर शिक्षा की स्थिति में कोई सुधार नहीं होता हैं. कोठारी कमीशन की रिपोर्ट के बाद कई आयोग बैठे मगर कोई सुधार नहीं हुआ. श्री लाल शुक्ल ने राग दरबारी में सही लिखा शिक्षा रास्ते पर पड़ी कुतिया है जिसे हर कोई लात मार देता है. वर्तमान शिक्षा मंत्री स्वयं शिक्षा शास्त्री है , उनके परिजन कई संस्थान चलाते थे , फिर भी वे समस्या की जड़ तक नहीं पहुंच पायें . समस्या की असली जड़ अयोग्य लोगों की भीड़ है जो नाना कारणों से इस शिक्षा जगत में घुस गई है. एक अयोग्य कुलपति, एक अयोग्य विभागाध्यक्ष कैसे योग्य शिक्षकों का चुनाव कर सकता है अयोग्य लोग अयोग्यों को चुनने को बाध्य हैं. उदाहरण दूंगा तो लेख किताब बन जायगा .

इसी प्रकार अयोग्य शोध निर्देशक कैसे छात्रों को शोध की सही दिशा दे सकता है? शोध निर्देशकों का आचार व्यवहार भी अजीब व् आर्थिक हो गया है, बिना कुछ लिए दिए थीसिस पास ही नहीं होती. थीसिस भी नकल कर के लिखी जा रही हैं. विश्वविद्यालयों में ठेके पर थीसिस लेखक उपलब्ध है,

निजी संस्थानों की तो हालत और भी खराब हैं , फ़ीस जमा कर दो , डिग्री ले जाओ .डिग्री को बाज़ार में कोई पूछता नहीं. यह हाल केवल कुछ संस्थाओं का ही हो ऐसा नहीं है , यहाँ तो कुएं में ही भांग पड़ी हुई है.

आज़ादी के बाद हमने विकास के नाम पर हर गली मोहल्ले में कालेज , यूनिवर्सिटी खोल दिए. थोड़ा आगे बढ़े तो निजी विश्वविद्यालयों का दौर आया , पैसा दो यूनिवर्सिटी डालो. दूसरे व्यवसायों की तरह यह भी व्यवसाय हो गया. बड़े बड़े उद्योग पति बाज़ार में विश्वविद्यालयों की दुकानें, फेक्टरियाँ ले लेकर आ गये. कोढ़ में खाज सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया. विश्व विद्यालय विष के खान बन गए. यह हाल केवल कला, विज्ञान , या वाणिज्य का ही हो ऐसा नहीं हैं . मेडिकल, इन्जिनीरिंग , प्रबंधन, वैकल्पिक चिकित्सा जैसी सभी शाखाओं का हो गया. इन संस्थाओं की नियामक संस्थाएं यथा –कौंसिल्स, राज्य सरकारें , अनुदान आयोग आदि ने राजनैतिक दबाव के कारण आँखें मूंद ली . शायद यहीं कारण रहा की हमारी संस्थाएं विदेशी शिक्षा संस्थाओं के सामने कही नहीं टिकती .अमेरिका में कई उच्च शिक्षा संस्थानों में जाना हुआ ,वहां पर तीन प्रकार के विश्व विद्यालय है एक सरकारी. दो निजी व् तीन ऐसे निजी जो सरकार से अनुदान लेते है ,सब पर सरकार, समाज का नियंत्रण . निजी विश्व विद्यालय ज्यादा जिम्मेदारी से का म करते है, लगभग हर संस्थान में एक या दो नोबल पुरस्कार विजेता है और वे भी वहां पर गंभीरता से काम करते हैं. हमारे यहाँ हालत ये है की कई निजी विश्व विद्यालयों के चेयर पर्सन्स जेल में है या उन पर मुकदमे चल रहे हैं. कौंसिलों के अध्यक्षों के घरों से टनों सोना बरामद होता है. मुकदमे चलते हैं, नतीजा सिफर.

बड़ी संस्थाओं में योग्य तो छोड़िये आवश्यक स्टाफ भी नहीं है जब कौंसिल की विजिट होती है तो इधर उधर से लोग बुलाये जाते हैं. सरकारी मेडिकल कालेजों तक में यहीं हालत है. तकनीकी संस्थाओं में रिटायर्ड लोगों के नाम लिख दिए जाते हैं. उनको घर बैठे कुछ राशि भेज कर खाना पूर्ति की जाती है , एक ही अध्यापक का नाम कई संस्थाओं में चलता है, 65-70 से भी ज्यादा उम्र के लोग नामांकित हैं.

उच्च शिक्षा में शिक्षकों की कमी के लिए नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी फिक्स होनी चाहिए, राजनीतिक दखलंदाजी बंद होनी चाहिए, लेकिन कैसे बंद होगी , ज्यादातर संस्थान नेताओं या उनके परिजनों के ही हैं. कर्णाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में तो ऐसे कालेजों की भरमार हैं .

केन्द्रीय विश्व विद्यालयों, प्रबंध संस्थानों , आईआई टी जैसी शीर्ष संस्थाओं में ४० प्रतिशत से ज्यादा पद रिक्त हैं इस कारण अध्यापन , शोध, पठन पाठन, विकास योजनायें सब प्रभावित हो रही हैं. हमें १२ करोड़ बच्चों को उच्च शिक्षा देनी है. अच्छे कालेज , अच्छे अध्यापकों की सख्त जरूरत है. शोध तो लगभग बंद ही है. जी डी पी का तीन प्रतिशत हिस्सा इस और जाने पर ही सुधार होगा. विश्व की कुल शोध में भारत का हिस्सा केवल तीन प्रतिशत है. शोध पत्र व् थीसिस नकल मार कर लिखे जाते हैं. भारत के ९० प्रतिशत कालेज व् ७० प्रतिशत यूनिवर्सिटी की स्थिति ठीक नहीं है. सरकार नयी पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहीं है. समर्थ छात्र विदेशों में पढ़ने चले जाते हैं जो लौट कर वापस नहीं आते, लेकिन जो विदेश नहीं जा सकता वो क्या करे.

सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए.

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यशवंत कोठारी८६,लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी

जयपुर -३०२००२

म०-९४१४४६१२०७

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श्रीमान कोठारी जी, यह आपने सत्य फ़रमाया है .. शिक्षा का सही मतलब बहुत कम लोग जानते हैं .. अगर सही लोग सही जगह पर आसीन होते हैं तो लोगों की भली प्रकार से सेवा हो सकती है क्योंकि सही शिक्षा सेवा ही तो सिखाती है ...

इस आलेख के लिए आपका आभार ...

नमन

रविराम

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