सोमवार, 17 अप्रैल 2017

सुरेन्द्र वर्मा के ताज़ा लिमरिक

(0)

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लिमरिक के बिसरिया, अग्रज हमारे

श्री राजनारायण फिर से पधारे

लेकर के, ‘व्यंग्य यात्रा’ में

तुक्तकें खासी मात्रा में

जी, कभी हम भी थे लिमरिक के मारे

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(१)

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मेरे एक मित्र हैं जस्टिस नायक

पिताश्री तीन बच्चों के लायक

पढाई में थे फिसड्डी

बन गए वे फिर भी

नेता, अभिनेता औ’ पार्श्व-गायक

(२)

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ड्राइंग रूम में विराजमान हैं श्रीमती गंधे

हाथों में सलाइयां हैं उचकाती हैं कन्धे

बोलती नहीं मुख से

रहती बड़े सुख से

उलटा-सीधा करती हैं, डालती हैं फंदे

(३)

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हमारे पड़ोस में रहता एक दर्जी है

जब देखो छींकता हो जाती सर्दी है

डाक्टर का कहना है

यह यथावत रहना है

कोई रोग नहीं है आपको सिर्फ एलर्जी है

(४)

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भले आप श्रीमती हों या श्रीमान सभी की बोलचाल है एक समान

सभी के ज़बान

अपनी आन-बान हरेक के हलक कौआ विराजमान

(५)

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सावन बरसे झूम के कभी रिमझिम कभी तेज़

छत छूती है सांवरे, भीगी सारी सेज

हाथों में हाथ धरे क्यों बैठा है बावरे

जल्दी से चपरासी कोई पी.डब्लू.डी भेज

(६)

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ना बादल ना घाम घनी है ना कोई तिनका धूल का

क्या कहना है क्वांर महीना क्वाँरे उनके रूप का

इठलाती आईं छत पर

आँचल डाले हैं सर पर

चमक चांदनी तेज़ लगे है चश्मा पहने धूप का

(७)

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सारे जहां के दर्द से वो छुटकारा चाहता है

एकांत में कहीं दर्शन भगवान का चाहता है

कहाँ कहाँ नहीं गया

जहां कहा वहीं गया

अँधेरे में काले बिलाव को खोजना चाहता है

(८)

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उनका इकलौता बेटा खेलता है क्रिकेट

सिखाता है क्रिकेट खिलाता है क्रिकेट

क्रिकेट में रमा है

मैदान में जमा है

आशिकी है, ओढ़ता-बिछाता है क्रिकेट

(९)

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अंगरेजी के सामने किस का बस है

अंगरेजी प्रतिदिन हिन्दी एक दिवस है,

अंगरेजी दौड़ती है

हिन्दी हांपती है

हिन्दी खटारा है अंगरेजी फास्ट बस है.

(१०)

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बबूल के काँटों में मक्की के फूल

सिरेमिक छिपकली, परदे मैरून

एक अदद केक्टस

सोफा-कम-बैड बस सजाकर रख दो, तैयार ड्राइंग रूम

(११)

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मेवे में मूंगफली, फलों में अमरूद

फूलों में गोभी औ’ मर्दों में मरदूद

चाहे इलेक्शन से

याकि सलेक्शन से

ये ही लगाते हैं, सबसे लम्बी कूद

(१२)

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कहने लगे हकीम जी, बड़ी है मंहगाई

गिज़ा तक तो मिलती नहीं, क्या बिके दवाई

खींसें निपोर कर

लहजे को मोड़ कर

बोले, एक बीड़ी तो ज़रा निकाल भाई

(१३)

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डाक्टर फिलासफी के बीमार देखते हैं

‘होम्यो’ की मीठी मीठी गोली बेचते हैं बोले, करें क्या

भूखों मरें क्या

विद्यार्थी तो मिलते नहीं, मरीज़ खेंचते हैं

(१४)

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कद्दू के सामने ककड़ी बल खा गई

सेठ जी को देखकर पी ए शरमा गई

देह को झटक कर

थोड़ा सा मटक कर

‘अजी बड़े वो हो’, कहकर कतरा गई

(१५)

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छेड़ने की गरज से बोलीं ब्रह्म कुमारी जी

अबला है स्त्री या सबला, ब्रह्मचारी जी

लगे सकपकाने

सर को खुजाने

बोले, बिना उपसर्ग सिर्फ बला है नारी जी

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