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आखिर तुम क्यों तुम क्यों रूठे केदार / शालिनी मुखरैया

“अरे हरिया की मॉं क्या आज की तारीख में सुबह की चाय नसीब होगी कि नहीं”

रामरतन का ऊँचा स्वर सुन कर सावित्री ने जल्दी से अपनी पूजा समेटी और रसोई की ओर भागीं। यह उन का रोज़ का नियम था । वे सुबह चार बजे ही उठ जातीं और जब तक अपने भोले बाबा को भोग न लगा लेतीं पानी का एक घूँट भी उनके गले से न उतरता ।

सालों हो गये थे उन्हें यह गुस्से से भरी आवाज सुनते हुये । मगर न वो बदलीं और न ही उनके पति । रामरतन भी जानते थे कि जब तक उनकी पत्नी भोले बाबा की पूजा पूरी नहीं कर लेंगी तब तक घर के किसी कार्य को हाथ भी नहीं लगायेंगी । उनकी सुलक्षणा पत्नी की भोले बाबा पर अगाध श्रद्धा थी ।यह भोले बाबा का ही प्रताप था जो आज उनका व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था । रामरतन स्वयं को बहुत भाग्यवान मानते जो ईश्वर ने ऐसी सुघड़ पत्नी दी थी जिसने जीवन के हर मोड़ पर उनका साथ निभाया था ।

“चाय लीजिये” सावित्री के स्वर ने उनके विचारों की श्रृंखला को विराम दिया ।

“कहॉं खोये हुये हैं आप” सुन कर रामरतन मुस्कुरा दिये । उनकी आंखों में अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम की झलक थी यह बात सावित्री भी अच्छे से समझती थीं ।

सुबह के वक्त यही कुछ पल होते थे जब दोनों आपस में घर के विषय में बातचीत कर पाते थे उस के बाद तो रामरतन अपनी दुकान निकल जाते और सावित्री अपने घर के कामों में व्यस्त हो जातीं।

“कल पड़ोस की पण्डिताइन अपनी सुमन के लिये रिश्ता बता रहीं थीं ।”सावित्री ने बात आगे बढ़ाते हुये कहा।

“मगर अभी तो वह बच्ची ही है।” रामरतन ने चौंकते हुये कहा

“कहॉं ? पूरे उन्नीस की तो हो गई है । अबसे लड़का ढूँढना शुरू करोगे तो तब जाकर दो चार बरस में ब्याह हो पायेगा ।”

……।2। ……

रामरतन सहज विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि उनकी फूल सी बच्ची जो उनके घर आंगन में चिड़िया की तरह फुदका करती आज ब्याहने लायक हो गयी है ।

अभी कुछ दिनों पहिले की ही तो बात है । सुमन की इंटर की परीक्षा होने वाली थी और उसके कालेज में कोई समारोह था । रामरतन तो व्यापार में इतने व्यस्त रहते थे कि बच्चे क्या कर रहे हैं किस कक्षा में पढ़ रहे हैं उन्हें इन सब का पता भी नहीं रहता था .इन सब का ध्यान भी सावित्री ही रखा करती थीं । शाम का अंधेरा बढ़ चुका था तभी दरवाजे पर एक गाड़ी आ कर रूकी । उसमें से दो स्त्रियॉं उतरीं और उनमें से एक ने उनके घर का दरवाज़ा खटखटाया । रामरतन कुछ देर पहिले ही अपनी दुकान बढ़ा कर आये थे और अपने वस्त्र बदल रहे थे । वे नवआगंतुकों की आहट पाकर सकपका गये और सावित्री से बोले

“देखो शायद तुम से कोई मिलने आया है ।”

सावित्री रसोई से निकल कर बाहर देखने गईं और हँसते हुये सुमन का हाथ पकड़ कर अंदर ले कर आयीं ।साड़ी पहन कर सुमन अपनी मॉं का ही प्रतिरूप लग रही थी। रामरतन की आंखों से आंसू छलक आये । उनकी फूल सी बिटिया कब बड़ी हो गई कब उसके डोली में बिठाने का वक्त नज़दीक आ गया उन्हें पता ही न चला ।

“अरे आप फिर से उसी बात को याद करने लगे ।” सावित्री ने छलक आईं आंखों को साड़ी के पल्लू से पोंछा । रामरतन भी भावुक हो उठे।

“और छोटा सोनू अपनी किताबें ले आया या नहीं ।” रामरतन ने बातचीत का विषय बदला

“सोनू गणित का ट्यूशन लगाना चाह रहा है जिससे छुट्टियों में उसके बोर्ड की परीक्षा की तैयारी हो जाये।”

“उससे कह दो कि अपने दोस्तों के साथ जाकर बात कर आये अपना नाम लिखा आये। पैसे की चिंता मत करना ईश्वर सब अच्छा ही करेगा।”

“अच्छा अब दुकान को देर हो रही है तुम जल्दी से मेरा नाश्ता लगा दो ।खाना दुकान पर ही भेज देना ।”

……।3। ……

“जी अच्छा” सावित्री भी कह कर उठ लीं और रामरतन स्नान के लिये चल दिये ।

शाम को जब रामरतन घर आये तो सावित्री के पास बहुत सारी बातें कहने को थीं ।

वह तो बस उनके आने का इंतज़ार कर रहीं थी ।थाली परोसते हुये सावित्री बोलीं …

“आपने पंडिताइन के उस प्रस्ताव पर कुछ विचार किया”

“अच्छा उनसे उस लड़के के घर परिवार के बारे में पता करो ।बात कुछ जंचेगी तो बात आगे बढायेंगे ” यह सुन सावित्री मन ही मन खुश हो गईं ।

“मेरे मन में एक और बात आपसे कहने को है ” सावित्री ने सकुचाते हुये कहा ।

“बोलो क्या कहना चाहती हो” रामरतन ने कहा

“हमारे पड़ोस में जो ट्रांसपोर्ट वाले चाचाजी हैं वो चारधाम की यात्रा के लिये पूरी बस ले जा रहे हैं। मेरी बड़ी इच्छा है कि हम सब एक साथ दर्शन को चलें”

रामरतन दुकान की व्यस्तता के कारण कभी अपने बीवी बच्चों को कहीं घुमाने नहीं ले जा पाते थे और सावित्री ने कभी इस बात के लिये कभी कोई शिकायत नहीं की । न जाने उनके मन में क्या विचार आया

“चलो मैं केशव से बात करता हूँ पीछे से दुकान वह संभाल लेगा”

सावित्री बड़े ही प्रसन्नचित्त स्वर में बोलीं ”मैं कल ही उनसे बात कर सारी व्यवस्था कर लेती हूँ” । सावित्री पूरे उत्साह एवं मनोयोग से यात्रा की तैयारी में जुट गईं ।विवाह के इतने वर्षों में पहली बार कभी किसी यात्रा पर जाने का विचार बना था ।संयुक्त परिवार में साथ रहते हुये कभी बाहर जाने का विचार मन में आया भी तो घर की जिम्मेदारियों ने बंधन डाल दिया ।अब तो बच्चे भी बड़े हो गये थे और पहिले वाला संयुक्त परिवार भी नहीं रहा था। बच्चों को जब पता चला तो वे भी उत्साहित थे ।

……।4। ……

मगर नियति के गर्भ में क्या छुपा हुआ था यह किसी को क्या पता था। गंगोत्री यमुनोत्री एवं बद्रीनाथ के दर्शन करने के बाद उनकी बस गौरीकुंड पहुंच गई ।हल्की हल्की बरसात शुरू हो चुकी थी ।पहाड़ों पर ऐसी बरसात आम बात है ।एक दिन विश्राम करने के बाद सोमवार की सुबह केदारनाथ की ओर प्रस्थान किया ।रास्ते के मनोहारी दृश्य सभी को प्रफुल्लित कर रहे थे । केदारनाथ के मंदिर का विहंगम दृश्य तो विस्मृत कर देने वाला था। पूरी हिमालय श्रृंखला मानो अपनी बाहें फैलाये स्वागत को तत्पर थी ।सावित्री तो भोले बाबा की परम् भक्त थीं भावातिरेक में उनकी आंखों से अश्रु की धारा बह निकले। अपनी पहली ही यात्रा में उन्हें अपने आराध्य के दर्शन होंगे इसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

सायं मंदिर में उन्होंने केदारनाथ के विशेष दर्शन किये। बारिश निरंतर जारी थी और मार्ग में सुविधाएं अपेक्षाकृत कम थीं इसलिये सुबह के दर्शन के बाद वापसी का मन बनाया। आरती के उपरांत रामरतन अपने परिवार सहित अलीगढ़ वालों की तिवारी जी की धर्मशाला में विश्राम हेतु लौट गये। आने वाली सुबह कितनी भयानक और निष्ठुर होगी इसका असंख्य लोगों में से किसी को भी अनुमान न था । मृत्यु ही एक ऐसा सच है जिससे संसार का हर प्राणी अंजान रहता है ।

हमेशा की तरह सावित्री सुबह अपने आराध्य के दर्शन के लिये तैयार हो गईं । उनकी वर्षों की मनोकामना इस बार ईश्वर ने पूरी की थी। रामरतन अपने परिवार सहित मंदिर के गर्भगृह में आरती में उपस्थित थे और अपने परिवार की मंगलकामना हेतु भोले बाबा से आशीर्वाद मांग रहे थे । अचानक ही भयानक विस्फोट हुआ और भयावह रौद्र रूप धारण कर अलकनंदा सब कुछ बहा ले जाने को तत्पर हो उठी। चारों ओर अथाह जल राशि ही नज़र आ रही थी हर चीज जल की प्रचण्ड धारा में समाहित हो रही थी ।रामरतन जब तक कुछ समझ पाते संभल पाते चारों ओर हाहाकार मच गया । उन्होंने अपने पुत्र का हाथ थामा मगर जल का वेग इतना प्रचण्ड था कि वे कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं थे । सावित्री और सुमन को उन्होंने जलराशि के साथ बह कर जाते देखा। आसपास चीखपुकार मची हुई थी ।शंकर का प्रलयंकारी महाविनाशकारी रौद्र रूप सामने था मानो उनका तीसरा नेत्र खुल गया हो ।

……।5। ……

रामरतन बड़ी कठिनाई से अपने पुत्र का हाथ थामने की कोशिश कर रहे थे मगर उनके घर के चिराग ने उनकी आंखों को सामने दम तोड़ दिया। उनकी स्थिति पागलों के समान हो गई थी ।रामरतन ने किसी से सहायता की आशा में इधर उधर निगाह दौड़ायी मगर सब व्यर्थ था। किसको ढूंढे किसको बचायें हर व्यक्ति अपने परिचितों को बचाने हेतु प्रयासरत था ।रामरतन ने

बड़े भारी मन से अपने कलेजे के टुकडे. को भारी पत्थर के नीचे रख दिया कि कहीं जल की धारा उनके पुत्र को न बहा कर ले जाये। ऐसा करते में उनका हृदय फटा जा रहा था. उनके शरीर से मानो किसी ने पूरा रक्त निचोड़ लिया हो हर तरफ मृत्यु का ताण्डव था ।रामरतन ने स्वयं किसी पेड़ की शाखा से लटक कर अपनी जान बचायी ।उनकी पत्नी और बेटी का भी कहीं कोई पता नहीं था। जब जलप्रलय का ज्वार थमा तो सब ओर विनाशलीला के निशान थे। जो स्थान दो दिन पूर्व रात्रि में चहल-पहल से गूँज रहा था वहां मृत्यु का भयानक अट्टहास रह-रह कर सुनायी दे रहा था ।रामरतन यह समझ नहीं पा रहे थे कि ईश्वर ने उन्हें यह दिन देखने के लिये क्यों जीवित रखा। प्रकृति का कहर थमने पर सेना के जवानों ने उन्हें बचाया ।वह राहत कैम्पों में अपनी पत्नी और बेटी को इस उम्मीद पर तलाशते कि शायद वे जीवित हों मगर उनका कहीं पता न चला । उनके सारे प्रयास विफल हो गये परंतु कोई सूचना न मिली।

प्रकृति से मानव के खिलवाड़ का इतना भयानक परिणाम भी हो सकता है यह किसी की भी कल्पना से परे था। क्यों शांत हिमालय रौद्र रूप धारण कर बैठा इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं था। वर्षों से हिमालय का दोहन अपने स्वार्थ के लिये मनुष्य करता आ रहा है कभी तो उसका प्रत्यु्त्तर हिमालय देता ही। मगर किया किसने और भोगा किसने इस प्रश्न का उत्तर किसके पास है।

अपना सब कुछ लुटा कर रामरतन अपने शहर लौट आये। उनके परिवार की पहली यात्रा ही उनके जीवन की अंतिम यात्रा बन गई। उन्हें तो अपने परिवार के दाहसंस्कार करने का अधिकार भी ईश्वर ने नहीं दिया। जिसने भी इस घटना को सुना वह सुन कर दौड़ा चला आया। मगर रामरतन को ढाढ़स देने का किसी में सामर्थ्य नहीं था।

……।6। ……

जिस ईश्वर की पूजा के बिना उनके घर में अन्न जल भी ग्रहण नहीं होता था वह इतना निष्ठुर और निर्मोही कैसे हो गया था। आखिर किस कर्म की उन्हें इतनी बड़ी सज़ा मिली जिसकी कीमत उनके पूरे परिवार को चुकानी पड़ी। रामरतन की आस्था एवं विश्वास संपूर्ण रूप से डगमगा गया था। उनके मन में बस एक ही प्रश्न था…………

आखिर तुम क्यों रूठे केदार....

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