बुधवार, 5 अप्रैल 2017

कुबेर की कविताएँ

1. आदमी की कोटियाँ

दो कोटियाँ प्रचलित हैं आदमी की -
नमक हलाल और नमक हराम
नमक और आदमी का संबंध
कोटियों का संबंध है
आदमी की कोटियाँ तय करता है नमक

नमक चाहता है खून बन जाना
खून चाहता है पसीना बन जाना
और
श्रमशीलों के माथे से
बह जाना
शिव के माथे से बहती है - जैसे गंगा

पसीना बनकर बहता हुआ नमक
आदमी को आदमी बनाता है
पसीना बनकर बहता हुआ नमक
आदमी को शिव बनाता है

पसीना बनकर बह जाना
नमक की सार्थकता है
और पसीना बहाना आदमी की।
000

2.  चिंतागुफा के लोग

हे राम!
तुम्हारी लीलाएँ हम मूढ़मति क्या समझेंगे
तुम्हारे भक्त जरूर समझते हैं

तुम भक्तों पर दया करनेवाले हो, महान कृपालु हो
तुम्हारी दया और कृपा भक्तों पर बरसती है
और तुम्हारे भक्त, रात-दिन
तुम्हारे गुणगान में व्यस्त और मस्त हैं
भक्तों के साथ तुमने कोई गुप्त समझौता किया है?

सबेरे से ही आने लगती है खबरें
तुम्हारे भक्त के मध्याह्न गृहप्रवेश की

आज सारा दिन, सारे चैनलों पर
केवल तुम हो, और हैं तुम्हारे भक्त
चिंतागुफा की चिंता कहीं नहीं है

चिंतागुफा में बच्ची से सामूहिक दुष्कर्म हुआ
पर क्या करें भगवन!
इसे खबर कैसे माना जाय
इसे प्रकाशित करना
तुम्हारे जन्मोत्सव की खबरों के बीच
बड़ा अशुभ नहीं होता?

और तुम्हारे भक्त भी तो नहीं हैं
चिंतागुफा के ये लोग
सूर्पणखा के वंशज होंगे अभागे
नाक कटना ही जिनकी नियति है

हे राम!
तुम्हारी लीलाएँ हम मूढ़मति क्या समझेंगे
परंतु
मंच पर लटक रहे परदे की चित्रावली देखकर
दर्शक समझ जाते हैं
कौन सा अध्याय अभिनीत होनेवाला है
आज तुम्हारे पावन चरित्र का

अंदर का मजमून समझ में आ जाता है
हल्दी लगे लिफाफे और किनारे से कटे कार्ड का
हे राम!
इतना तो तुम भी समझते होगे।
000

3. भक्त या गुलाम

हे! क्षीरसागरी, शेषशायी
सचमुच अगम्य है तुम्हारी दुनिया
अनिर्वचनीय हैं तुम्हारे कार्य
लोग जिसे तुम्हारी लीलाएँ कहते हैं।

ऐसा कहनेवाले तुम्हारी दुनिया देख आये हैं?
तुम्हें लीलाएँ करते देख पाये है?

वस्त्र, रत्न, आभूषण और सारे आयुध
जिसे तुम धारण करते हो
इसी दुनिया के हैं
लक्ष्मी जहाँ से आयी है
वह भी इसी दुनिया में है
ऐश्वर्य तो लिया इस दुनिया से
गरीबी और बेबसी क्यों नहीं ली?
तुम्हारा स्वर्ग, क्षीरसागर और शेषशैया
किस दुनिया के हैं,
जहाँ तुम छिपे हुए हो?
इसका मर्म समझानेवाले
इसे देख आये हैं?
मर्म समझानेवाले
इसका मर्म क्या समझा पायेंगे?

इस समाज की रचना करनेवाले
हे! समाजविहीन
ऋषि कहते हैं तो
समाज की समझ तुम्हें जरूर होगी

तुमने अर्जुन से कहा है -
’’चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धîकर्तारमव्ययम्।।’’
बताओगे, कैसे?
यह सच है?

गाँव-गाँव, गली-गील और मुहल्ले-मुहल्ले में तैनात
तुम्हारे बारे में तरह-तरह की जानकारियाँ देनेवाले
धनसागर और ज्ञानसागर में अवगाहन करनेवाले
मुक्ति का मार्ग बतानेवाले, तुमसे बंधे - अमुक्त लोग
बताओगे
तुम्हारे भक्त हैं,
या तुम्हारे गुलाम?
000
4. सरकार ताप से डरती है

बेजान शरीर ठंडा हो जाता है
ठंडा हो जाना, ताप का गिर जाना है,
ठंडा हो जाना, मर जाना है

ताप को बनाये रखना, जिंदा रहना है
गरमाए रहना, जिंदा रहना है
जानदार शरीर गरम रहता है

सरकार ताप से डरती है
ताप से आग भड़कने का खतरा होता है
सरकार को ठंडा देश चाहिए
सरकार को ठंडी जनता चाहिए
सरकार को मुर्दों की भीड़ चाहिए

सरकार की व्यवस्था हमेशा
पर्याप्त और दुरुस्त रहती है
देश में ठंडकता बनाये रखने के लिए
जनता को ठंडा बनाये रखने के लिए

मुआवजे और सस्ते अनाज 
अग्निशमन यंत्र हैं, सरकार के
आग को यह काबू में रखता है
देश को यह ठंडा बनाये रखता है
जनता इससे ठंडी बनी रहती है

सरकार हमेशा सुरक्षित दूरी बनाकर रखती है
आग और चीजों के बीच में
सरकार हमेशा अग्निशमन यंत्र लगाकर रखती है
आग और लोगों के बीच में

आग को कोई देख न ले
आग को कोई पहचान न ले
आग को कोई पा न ले
इसलिए आग को
और आग की पहचान को
सरकार हमेशा छिपाकर रखती है

सरकार हमेशा
विचार करनेवालों को पटाकर
धमकाकर, गरियाकर, ललचाकर या फिर अंत में
अपने रास्ते से हटाकर रखती है

सरकार हमेशा
विचारों को दबाकर रखती है।
000

कुबेर
व्याख्याता, शा. उ. मा. शाला
कन्हारपुरी, वार्ड 33, राजनांदगांव (छ.ग.)
दिनांक 30 मार्च 2017, मो. 9407685557

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------