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मंजुल भटनागर की कविता - राम

राम एक शब्द नहीं एक युग है
राम एक सीढी है
सत्ता पाने की
राम एक गणित है
वोटर को भरमानें की
राम उदास है आज .

राम का आयोजन
पुरजोर है
सर्प फन उठाने लगा है
एक और मर्दन
फिर उस पर राजनीति
राम का उदघोष

तुलसी के राम हों या बाल्मिकी  के
संशय  डसता है
सच झूट को मानें या न मानें
यह मानें कि
राम रूप है कल्याण का
कितनी अहिल्या, विभीषण का
करना है उद्धार

सोचती हूँ क्या ?
फिर राम भरोसे रहूँ
प्रतीक्षा करूँ
राम राज्य के स्वप्न बुनूँ
क्या फिर लौटेंगे प्रभु राम ?

मंजुल भटनागर

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मंजुल भटनागर जी,
बहुत करारा व्यंग किया है आज के सामाजिक परिस्थितियों पर.
मुबारक हो.

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