सोमवार, 24 अप्रैल 2017

मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ

अचानक
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हो गया जब
सामना
खोए हुए ख्वाबों से
लिपट कर मुझ से
यूं चीख कर रो पड़े
अपनी गुमशुदगी
पर हैरान से थे
कितनी शिद्दत से
संवारा था जिन्हें
उन्हें यूँ बिखेर दिए
तोड़ तोड़ कर
अपने सिरहाने
रोज जख्म खाने को
टूटे हुए ख्वाबों के टुकड़े
रोज चुभते है मुझे
मेरे सिरहाने वो बिखर कर
हर रोज जो सो जाते हैं


सांसें
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रखती है
जब से उम्र की
दहलीज पर
कदम
जिस्म की
हरकतों पर
पाबंदी सी
लग गई है
अनगिनत
ख्वाहिशें
वक़्त की
कोख मैं ही
दम तोड़ देती है
उस
भ्रूण की तरह
जो दुनिया
में आने से पहले ही
समाज
के खोखले
रिवाजों की
वेदी पर कुरबान
हो जाते हैं
उसने लड़कपन में कई जख्म खाए होंगे
इतनी संजीदगी क्यों कर उसके चेहरे पर


गुण
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तुम क्यों हथेली
मिलाने की बात
करते हो
जब तक विचारों का
मेल नहीं होता
अग्नि के चारों
तरफ चक्कर
लगवा लो या
छत्तीस गुण
मिलवा लो
बन्धन मजबूत
नहीं बन्धेगा ।
वो अब नहीं कहेगी
प्याज के आंसू हैं
अपने दर्द को लबों से
बयां कर सकती है
अब उसे जुबां
मिल गई है ।
वो अकेले लड़ सकती है
हजारों से
पर अब भरे बाजार में
अपने कपड़े
नहीं उतारने देगी किसी को।
उसका सम्मान करना
ही पड़ेगा अब
क्योंकि वो
सिलेट पर शब्द
मात्र नहीं लिखती हैं
वो अब इतिहास
लिखने लगी है ।
तुम गिराते रहोगे
तुम्हारे कदमों में
पड़ी रहे वो
नहीं अब ये सोच
बदलने की जरूरत है
तुम्हें
वरना तुम उसका
सामीप्य नहीं
पा सकोगे अब
नारी है तो क्या हुआ
अबला बेचारी नहीं
शक्ति की परिभाषा
बन कर , ब्रह्मांड में
छा गई है वो


चाय
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जब कभी
माँ थोड़ी सी
भी चाय
मेरे प्याले मैं
काम डाल देती थी
मैं बहुत नाराज
होकर वो
चाय का प्याला
यूँ ही छोड़ कर
गुस्से से
नहीं पीती थी
जब तक
माँ ज्यादा
दूसरी चाय
नहीं बनाकर दे देती
आज जब
मैं ससुराल में हूँ
तो सभी का
प्याला भरते भरते
बेटी के हिस्से में
आधा कप देती हूँ
तब समझी
ससुराल में
सब का मन
रखने के लिए
अपने मन को
ना जाने
कितनी बार
मारना पड़ता है
ना जाने कितनी
बार अपना सुख भी
परिवार के
बाकी सदस्यों
के हिस्से में
चला जाता है
बेटी को भी
अपनी जैसे अपना
हिस्सा बांटना
सिखाने
त्याग करने
को स्त्री
धर्म समझते हैं
बस बेटियाँ ही
समझदार बने
उन से यही
उम्मीद रखते हैं
हम


अधूरी
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आज ही मिली वो
जो खो चुकी थी ।
एक किताब के कोने में
रंगीन पोटली में
मुझे से मिलने की
ख्वाहिश लिए ,
अपनी पूरी ताकत के साथ
कलम को दबाए
हालांकि चुभ रही थी
उनके दामन में
कुछ अनकही....
जो बहुत अरसे से
चुपचाप बैठी अपने
पूरे होने के इंतजार में
मेरी अधूरी कविता
वो
----
पिघल गयी
कतरा कतरा ,
अपनी मुहब्बत को
जमाने में ।


बाती
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दिये के खातिर
राख हुई
जाती है बाती ।
दिये को फिर भी
भ्रम है
मुझ से ही
पहचान जाती
बाती


आंसू
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तुम क्यों बेवजह
आंखों से गिरते हो
तुम्हें मालूम है ना
जो निगाहों से गिर जाते हैं
वो कभी उठते नहीं
चेहरा आईना है
उम्र के हर पड़ाव का


ये
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दर्द भी
कितना
नासमझ है
सोचता है
ये
दिल के बहुत
करीब है


मैं
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मैं तो गीली
मिट्टी हूँ
जितने की
लालसा नहीं है
पर मैं
हारूंगी नहीं कभी
मैं तो गीली
मिट्टी सी हूँ
आकार कोई भी
दे देना
मैं तो उसमें ढल
जाऊँगी
मेरी
सीमा निर्धारित मत करो
मुझे भी बहने दो
झरनों सी निश्चल
मैं तो नदी हूँ
सागर में आ मिलूंगी
मुझे
काबीलियत
से
मत आंको
मैं तो पानी हूँ
जिस
रंग में रंगोगे
में
उस रंग में रंग जाऊंगी
मुझे
यूं एक जगह पर
रोके
मत रखो
बहने दो
गंगा जल सी
पापों को नष्ट
करने को
अपने प्रेम की
धारा बताऊंगी


कुछ
---
इस तरह
कशमकश में
जी रही थी
तेरी ना होते
हुए भी तेरा
होने की
चाहत लिए
तेरे दीदार की तलब है हर घड़ी हर वक्त मुझे
कितने अरसे से तू ख्यालों में आया ही नहीं ।


मेरे
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सिरहाने पर
कुछ टूटे ख्वाब
कुछ बिखरे सपने
रखे हैं
वो रहने दो
मेरी तिजोरी
यादों से
भरी है
वो भी रहने दो
ऐ चुराने वाले
तुम्हें
यहां बस
इन्तजार ही
मिलेगा चुराने हो
जो बरसों से मेरी
आंखों में भरा


शायद
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हर बार
कुछ फन्दे
छुट जाते है
हकीकत के ।
सपनों को
बुनते बुनते ।
इसलिए हर
बार शुरू से
बुनने पड़ते है मुझे
सपनों के धागे


उम्र
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उम्र भर का तजुर्बा
बांटते रहे
मुझ से उम्र भर
वो लोग

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