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बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष" की कविताएँ

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कैद

 

पिंजरे में कैद, उदास सी एक चिड़िया,

न रोती, न हंसती, न  चूँ-चूँ चहकती,

ख़ामोशी की चादर, में तनहा दुबकती,

बहुत फडफडाती, बहुत  तडफडाती,

हालातों की जकडन, नहीं तोड़ पाती,

न जाने उसे, कुछ हो सा गया है ,

शायद उसका, कुछ खो सा गया है,

कोई कटाक्ष, शूल सा बिध गया है, 

अरमानों का दीपक, बुझ सा गया है,

शायद उसे 'कैद' होने का गम है,

अक्ष,

नीड़-मंजिल से निज दूर होने पे नम है||

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क्या लिखूं

 

मै भी कवि बनना चाहूँ,

मगर लिखूं तो क्या लिखूं ...?

 

राम,श्याम, गौतम, नानक,

औ ईसा,कबीर,कुरान लिखूं | 

जाति-धर्म-भाषा औ क्षेत्र में,

बटता हिंदुस्तान लिखूं ||

                                                                                             

कलुषित हैवानों की संकीर्णता से,

धरती लहूलुहान लिखूं, या |

सत्य,अहिंसा  और प्रेम का,

मरता वह इन्सान लिखूं ||

 

भ्रष्ट, नपुंसक,कुर्सी के दल्लालों का,

झूठा यशगान लिखूं, या|

कायरता, लोलुपता औ अन्धानुकरण से,

भारतीयता का होता अपमान लिखूं ||

 

भूखे,चिथड़े में,खुले गगन वालों का,

रोटी कपडा और मकान लिखूं |

या फांसी के फंदे पर झूले,

गरीब, मजदूर,किसान लिखू ||

 

कल्पना लोक की परियों संग खेलूं,

या यथार्थ का गान लिखूं |

झूठ लिखूं या सत्य लिखूं

या फिर झूठा सत्य लिखूं ,

मगर लिखूं तो क्या लिखूं ...?

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नया सफ़र

नए सफ़र पर चला मुसाफ़िर, ले नवजीवन की चाहत|

दृग कोरों में स्नेहाशीष-संग है, मन में है ये ही राहत|

रेल चली छुक-छुक छुक-छुक, छूट रहा अपना घर-गाँव|

नए शहर में अनजानों संग, कहाँ बनेगा अपना ठाँव|

प्रश्न-चिह्न तो बहुत, मगर उत्कर्षित होने अभिलाषा है

जीवन के इन झंझावातों से, पार उतरने की आशा है|

छूट रहे जो ‘मील के पत्थर,’ उन तक फिर-फिर आऊँगा|

अपनों के बिन भला जगत में, और कहाँ सुख पाऊँगा ||

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रक्त पिपाषा


चहुँ ओर छाईं हैं,

धरा पर मौत की काली घटाएँ,

हर ओर बहती,

अपनों की ही रक़्त धाराएँ,

कलुषित ह्रदय की,

स्वार्थ संग संक्रीर्ण इच्छाएँ,

ताकत के मद में,

मानवों पर राज करने की पिपाषाएँ,

इस हेतु, अगणित नारियों के,

सुहाग हैं उजड गए,

कितनें ही घरों के,

चिराग तक तो बुझ गए,

फिर भी नहीं है शान्त ज्वाला,

उन ह्रदय पाषाण की,

शायद्, अभी भी ह्रदय उनके,

रक्त प्यासे रह गए//

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प्रेम

 

दिल किसी का न टूटे  दुआ कीजिए,
बनके राधा के मोहन रहा कीजिए /
प्रेम की  बासुरी गर बजाये कोई,
प्रेमधुन में उसी  के रमा  कीजिए //
 
प्रेम अनमोल है इसकी कीमत नहीं,
धर्म और धन में इसको तो मत तोलिये /
जिन्दगी चार दिन की जियो प्रेम से,
नफरतो का जहर तो है मत घोलिये //
 
प्रेम तो है इबादत उस ईश की,
प्रेम रस में हमेशा गमन कीजिए /
तुमको मिल जाये कोई दिवाना कभी,
उसकी दीवानगी को नमन कीजिए //
 
इस धरा पर है  चहु  ओर संकट बहुत,
प्रेम के हर सुमन से चमन कीजिए /
मिलन हो जाये सबका जरुरी नही,
दूर ही दूर से प्रेम  है   कीजिए //

*****************************

                                            

 

 

मात्-पिता, मातृ-भूमि, मातृ-भाषा, जीवन नैया की मेरी खेवन हार  है,
इनके  चरणों में जीवन निछावर मेरा, यही उत्कर्ष का पहला प्यार है।
इनके आँचल में ही मै फूला-फला, मेरा जीवन तो इनका कर्जदार है,
इनकी  सेवा  जीवन भर करता रहू, ये ही चाहत मेरी बारम्बार है॥
                              *******************
ऐ मेरे देश की माटी, तुझे मैं  प्यार करता हूँ,
तेरी इज्जत हिफाजत को, सदा सर माथे धरता हूँ |
लगाकर जान की बाजी, करूँ रक्षा तेरी हरदम,
शहीदों की शहादत को, नमन सौ बार करता हूँ ||

                     

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बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष"
6/97, डी.डी.ए. फ्लैट्स,
मदनगीर, नई दिल्ली|
मो.-9956171230,9873747215

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