रविवार, 9 अप्रैल 2017

डॉ.अंबेडकर, आरक्षण, दलित और देश ! – अनिल कुमार पारा

14 अप्रैल भारत के इतिहास का वो ऐतिहासिक दिन है जब सन् 1891 में भीमराव अंबेडकर का जन्म मध्यप्रदेश के महू छावनी में हुआ था। बाबासाहेब के नाम से अपनी ख्याति प्राप्त करने वाले इस शख्स के विषय में कुछ भी लिखना सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है। बाबासाहेब को जिस चीज के लिए देश जानता है वो सभी जानते हैं किन्तु भारत राष्ट्र जैसे विशाल देश के संविधान निर्माता डॉ.भीमराव अंबेडकर की दूरदृष्टि और व्यापकता को आज नजरअंदाज किया जाता रहा है।

बाबासाहेब का जन्म हिन्दू धर्म की महार जाति में हुआ था जिसे तब के समाज में अछूत का दर्जा दिया गया था, मगर आज भी आजादी के 69 सालों बाद भी स्थितियाँ बदल गईं हों ऐसा कतई नहीं है। आज भी हमारे समाज में जातिगत गैरबराबरी बदस्तूर जारी है। क्यों कि जिस सामाजिक भेदभाव को डॉ.अंबेडकर मिटाना चाहते थे वह आज भी सामाजिक असमानता, दलित उत्पीड़न, ऊँच-नीच,छुआछूत सहित किसी ना किसी रूप में भारत के हर कोने में फल-फूल रहा है और इसी गैर बराबरी को हटाने दलित उत्पीड़न को रोकने के लिए बाबासाहेब अंतिम सांस तक अनवरत् लड़ते रहे उनका यह संदेश आजादी के दौरान में जितना प्रासंगिक लगता था उससे कही गुना ज्यादा प्रासंगिक मौजूदा दौर में प्रतीत होता है।

सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक असमानता, दलित उत्पीड़न, सहित आरक्षण पर लटकती तलवार इस दौर के बडे़ और गंभीर मुद्दे हैं किन्तु इस दौर में सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक असमानता, दलित उत्पीड़न को खत्म करने की बात कतई नहीं होती है बल्कि इस दौर में शोषित और वंचित वर्ग को मिल रहे आरक्षण को खत्म करने की बात हर उस गली मोहल्ले में होती है जहाँ से आजादी के 69 सालों बाद भी छुआछूत, सामाजिक भेदभाव, दलित उत्पीड़न खत्म नहीं हुआ।

राष्ट्रवाद, हिंदुत्ववाद देश के बडे मुद्दे हो सकते हैं पर डॉ.अंबेडकर, आरक्षण, और दलित उत्पीड़न की बात किसी के हलक से बाहर नहीं आ रही है। राष्ट्रवाद की बात तो तमाम सियासी दल इस दौर में कर चुके हैं और बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर को इससे अलग भी कर चुके हैं इसी राष्ट्रवाद के लिए डॉ.बाबासाहेब ने कहा था कि ‘‘हम सबसे पहले और अंत में भारतीय है’’ संविधान निर्माता की दूरदृष्टि ने भारत में ऐसे समाज की कल्पना की थी जो जाति, धर्म, मजहब, से भी अलग हो जिसमें जाति-पाँति ऊँच-नीच भेदभाव की दीवार ही ना हो।

डॉ.बाबासाहेब ने कहा था कि ‘‘लोग और उनके धर्म सामाजिक नैतिकता के आधार पर सामाजिक मानकों के द्वारा परखे जाने चाहिए,अगर धर्म को लोगों के भले के लिए आवश्यक वस्तु मान लिया जायेगा तो और किसी मानक का मतलब नहीं होगा’’ यानी लोगों का भला मात्र किसी धर्म मात्र के मानने से नहीं हो सकता सामाजिक नैतिकता ही समाज और देश का भला कर सकती है। बाबासाहेब डॉ.अंबेडकर ने यह भी कहा था कि ‘‘समानता एक कल्पना हो सकती है लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा’’ यानी जिस गैरबराबरी को मिटाने की बात डॉ. अंबेडकर ने उठाई वह सुशासन का एक हिस्सा जरूर होना चाहिए। सरकारी नीतियों में सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए उचित स्थान आवश्यक ही नहीं समय की माँग है।

डॉ.अंबेडकर ने यह भी कहा था कि जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी है’’ यानी सामाजिक भेदभाव से छुटकारा मिले बिना कानूनी स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं है। बाबासाहेब का वह कथन भी भुलाया नहीं जा सकता जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और एक सुधारक जो समाज को खारिज कर देता है वो सरकार को खारिज कर देने वाले राजनीतिज्ञों से ज्यादा साहसी है’’ यानी राजनीतिक अत्याचार से बड़ा सामाजिक अत्याचार है। जो जाति-पाँति उँच-नीच, दलित उत्पीड़न की शक्ल में काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आज भी है।

बहरहाल पूरा देश बाबासाहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर की 126वी जयंती समारोह मना रहा है। तमाम राजनैतिक दल इस अवसर की तैयारियों में लगे हुए हैं। कोई डॉ. अंबेडकर को अपना आईकॉन बता रहा है तो कोई डॉ.अंबेडकर को अपना आदर्श। पर इस देश में डॉ.अंबेडकर,आरक्षण, और दलित इनकी हकीकत कुछ और ही हो चली है। ऐसा भी नहीं कि अंबेडकर, आरक्षण, और दलित ये तीनों देश के अंदर ही ना हों पर मौजूदा दौर में हिंदुत्ववाद और विकास की चकाचौंध में डॉ.अंबेडकर आरक्षण और दलित देश से बाहर हो चले हैं। जिस राष्ट्रवाद की चर्चा बीते बरस देश में हुई वह राष्ट्रवाद मात्र हिंदुत्ववाद तक ही सीमित नहीं रहा है उस राष्ट्रवादी विचारधारा ने तो डॉ. अंबेडकर, आरक्षण, और दलितों से दूरी बनाकर हिंदुत्ववाद की नई परिभाषा गढ़ दी है।

भारत में राजनैतिक सुधारों का दौर आजादी के पहले से ही जारी है और आजादी के बाद भी जारी है किन्तु इन कथित सुधारों का लाभ जाति व्यवस्था तथा वर्ण व्यवस्था से पीडि़त वर्गों की मुक्ति से जोड़ने की दूरदर्शिता राष्ट्रीय नेताओं में नजर नहीं आती। आजादी के पहले अंग्रेजी साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, दमन तथा भेदभाव के विरूद्ध उस दौर में मुखर रहने वाले नेता इस विषय पर या तो मौन रहते थे या विरोधी भूमिका निभा लेते थे। मौजूदा वक्त में भी बाबासाहेब डॉ.अंबेडकर,आरक्षण, ओर दलितों के दमन तथा भेदभाव के विरूद्ध आवाज बुलंद करने वाला ना तो कोई सियासी दल ही है और ना ही किसी दल से जुड़ा कोई राजनीतिज्ञ। भारतीय संविधान के इतिहास पर राजर्षी शाहू महाराज का तथा बाद में डॉ.बाबासाहेब अंबेडकर का दूरगामी परिणाम देखने को मिला है।

इन दोनों महापुरूषों ने सुधारों की कड़ी में पिछडे़ वर्गो तथा बहिष्कृत वर्गों की भागीदारी की मांग रखी। विदेशी दासता के विरूद्ध राष्ट्रीयता की भावना, साम्राज्यवाद तथा विदेशी पूंजीवाद के विरूद्ध असंतोष यह उस काल के प्रमुख लक्षण थे। इन महापुरूषों ने दबे कुचले लोगों की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक गुलामी से मुक्ति को भी उसमें जोड दिया। बीते बरस जब रोहित वेमुला के बहाने देश में डॉ.अंबेडकर, आरक्षण और दलितों को याद किया गया उससे तो यही लगता था कि अब देश में दलितों के लिए योजनाएँ भी बनेगीं, उनके विकास का विजन भी तय किया जाएगा। दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर भी लगाम भी लगाई जाएगी। बहुतेरे सपने देश के दलितों को सियासत के मोहरों ने संसद से सड़क तक दिखाए पर सच एक भी नहीं हुआ। और तो और कई राज्यों में नौकरी सहित पदोन्नति में आरक्षण खत्म करने की सियासी चालें कामयाब जरूर हो गईं।

पूरा देश 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती समारोह मनाने जा रहा है ये वह दिन है जिस दिन से दलितों के उत्थान की हर वर्ष एक नई कहानी लिखी जाती है। दलित उत्थान की घोषणाओं को बाबासाहब डॉ.भीमराव अंबेडकर के जन्म दिन से हर साल जोड़ देना देश की सियासत का नया रूप हो चुका है, पर देश में इनके विकास की बात हर वर्ष यहीं से क्यों शुरू होती है? और यहीं पर खत्म क्यों हो जाती है इसका उत्तर भी नकारात्मक ही है। वैसे तो वर्ष के हर दिन दलित उत्पीड़न और अत्याचार की धटनाएँ सामने आतीं रहती हैं पर इन धटनाओं पर कोई बोलने और बहस करने वाला वर्षभर नहीं दिखता है। और जैसे ही 14 अप्रैल का दिन नजदीक आता है तो बाबासाहेब डॉ.अंबेडकर की भी बात होती है, आरक्षण की भी बात होती है और दलित की बात भी होती है।

तो सवाल साफ है - 14 अप्रैल के दिन सियासत के मोहरे अंबेडकरवादी हो जाते हैं? पर विडंबना इस बात की है कि जिस देश में राष्ट्रवाद और विकास की आड़ में डॉ.अंबेडकर, आरक्षण, और दलितों को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है उस देश में मात्र 14 अप्रैल के दिन बाबासाहेब डॉ.अंबेडकर और आरक्षण का नाम भर लेने से दलितों का पेट भला कैसे भर पाऐगा। इस दिन डॉ.अंबेडकर की भी बात होगी, आरक्षण की भी बात होगी और दलितों के विकास की भी बात होगी। पर दिन निकलते ही वे सारी बातें धरी की धरी रह जाएंगी। डॉ.अंबेडकर और आरक्षण और देश का दलित ऐसे शब्द हैं जो हरेक के हलक से नीचे नहीं उतर रहे हैं। अंबेडकरबादी विचारधारा का ढ़ोल पीटते सियासी मोहरे सामाजिक भेदभाव, सामाजिक असमानता, छुआछूत, दलित उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने हेतु आखिर क्यों आगे नहीं आ रहे हैं? क्या देश में राष्ट्रवाद, हिंदुत्ववाद के सामने अंबेडकर और आरक्षण और देश के दलितों से जुडे मुद्दे अब छोटे हो चले हैं?
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अनिल कुमार पारा,

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