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सावरकर ने अंडमान जेल में भी करायी क्रान्ति / रमेशराज

 

[ स्मृति दिवस 26 फरवरी पर ]

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वीर विनायक सावरकर के मन में बचपन से ही क्रान्ति की हिलौरें उठने लगी थीं। वे अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फैंकने के लिये सशस्त्र क्रान्ति के ऐसे पुरोधा बने, जिन्होंने भारत ही नहीं, विदेश में रहकर भी क्रूर अंग्रेज शासकों को सबक सिखाने के लिये उनकी हत्या कराने और उन्हें आतंकित करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी।

वीर सावरकर अहिंसा, सत्याग्रह जैसे उपायों के द्वारा अंग्रेजों को भारत से भगाने के घोर विरोधी थे। उन्होंने बड़े ही गुप्त तरीके से ब्रिटेन में रहकर भारतीय क्रान्तिकारियों को भारत में पिस्तौले उपलब्ध करवायीं। इन पिस्तौलों से भारत में तैनात क्रूर अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतारा गया। यहीं नहीं ब्रिटेन में उनके शिष्य मदनलाल धींगरा ने एक अंग्रेज अफसर की हत्या की। उन्होंने 1857 के क्रान्तिकारियों पर एक ऐसी पुस्तक लिखी जिसे पढ़कर भारत ही नही, अनेक स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ वीरों के मन में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी।

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वीर सावरकर के क्रान्तिकारी मिशन का जब भेद खुला तो अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें अंडमान जेल पानी के जहाज से लाया जा रहा था तो वे जहाज से समुद्र में कूद पड़े। कई दिन समुद्र में तैरते हुए वे फ्रांस की सीमा में पहुँच गये। फ़्रांस की कमजोर सरकार ने उन्हें अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया।

वीर सावरकर अण्डमान जेल में भयावह यातनाओं के शिकार हुए। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे वहाँ भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों में जीजान से जुटे रहे। उन्होंने जेल की दीवारों पर पत्थरों से क्रान्तिकारी कविताएँ लिखीं। अपने अनेक साथियों को जेल के अत्याचारी अफसरों-कर्मचारियों के विरूद्ध लामबन्द किया।

अण्डमान जेल में जब जेल की यातनाओं से तंग आकर उनके साथी आशुतोष लाहिड़ी, भाई परमानंद आदि आमरण अनशन कर प्राण त्यागने पर आमादा थे, तो वीर सावरकर ने उन्हें समझाया, कि ‘इस उपाय से अच्छा है कि ऐसा कोई कार्य करो जिससे अंग्रेज अफसरों को सबक मिले।

अण्डमान जेल में अंग्रेज हिन्दू-मुसलमानों में भेद डालने के लिये ऐसे मुस्लिम वार्डरों की नियुक्ति करते थे जो हिन्दू कैदियों पर तरह-तरह के अमानवीय अतयाचार तो करते ही थे, साथ ही उन्हें हिंन्दू-जाति के प्रति अपशब्द बोलकर मानसिक आघात भी देते थे।

वीर सावरकर ने इस घिनौने कृत्य का जवाब देने के लिये हिन्दू कैदियों को संगठित किया और उनमें हिन्दू जाति और भारतीय गौरव और स्वाभिमान का बीज अंकुरित कर दिया। यह करने के बाद के बाद उन्होंने एक दिन जेलर बारी को चेतावनी दी-‘‘हम वतन पर-मिटने वालों पर चाहे जितने अत्याचार कर लो किन्तु धर्म की आड़ में हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने की चालें बंद कर दो।’’

वीर सावरकर की इस चेतावनी से कैदी क्रान्तिकारियों में अद्भुत साहस का संचार हआ। जेलर बारी की दहाड़ पर थर-थर काँपने वाले कैदियों में से एक कैदी परमानंद ने गाली बक रहे जेलर के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया। इसके बाद अनेक कैदी जेलर के आतंक के खिलाफ अनशन पर बैठ गये। इस घटना पर ‘स्वराज’ के सम्पादक होतीलाल और ‘अभिनव भारत’ संस्था ने अंग्रेजों की क्रूरता भरी चालों और अत्याचारों का काला चिट्ठा छापकर भारत ही नहीं फ्रांस-अमरीका आदि देशों में वितरित करवाया। अंग्रेजी हुकूमत की हर ओर भर्त्सना हुई और कैदियों पर होने वाले अत्याचारों को बन्द कराने का दवाब बढ़ने लगा। परिणाम यह हुआ कि जन विरोध के सम्मुख ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा। जेल पर्यवेक्षकों को नये नियम बनाने पड़े। कठोर परिश्रम जैसे कैदी को कोल्हू में बैल की तरह जोत कर तेल निकलवाना और कैदियों को गालियाँ बकना आदि पर आखिरकार प्रतिबन्ध लग गया।

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