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अशोक गुजराती की लघुकथाएँ

।।लघुकथा।।

नीयत की अनियत नियति


   कहानी पुरानी है. हमारे कस्बे से अंदाज़न पचीस मील दूर बहती थी पूर्णा नदी. वहां कार्तिक पूर्णिमा से एक सप्ताह तक मेला लगता था. हम मित्रों ने तय किया कि जायेंगे. उन दिनों पक्की सड़कें तो थी नहीं, ना ही यातायात के साधन. सो हम लोग शाम में निकल पड़े पैदल-पैदल.


   कुछ-कुछ जंगल जैसा रास्ता था. एक जगह हमको एक अलाव थोड़ा बुझने की स्थिति में दिखाई दिया. ठंड थी ही. आसपास की टहनियां-पत्ते इकट्ठा कर हमने उसे पुनः जीवित कर दिया. ताप ही रहे थे कि हमारे एक दोस्त उदय को कुछ अंतर पर पड़ी कमर में बांधने वाली पर्स-नुमा थैली नज़र आयी. उसने उसे खोल कर देखा- उसमें चांदी के साढ़े छह सौ के सिक्के थे. उस ज़माने में यह बहुत बड़ी रक़म थी. शायद हमसे पहले किसीने अलाव के पास बैठे-बैठे कमर में चुभ रही उस थैली को निकाल रखा और भूल गया होगा.


   उदय ने हम दोस्तों से कह दिया कि वह उस थैली के मालिक को ढूंढ कर उसे वह लौटा देगा. मेले में हम घूमते रहे- बीच-बीच में चिल्लाते हुए कि भैया, किसीकी रुपयों की थैली गुम हुई है क्या?...


   दो दिन बीत गये. हम लगे रहे. तीसरे दिन एक व्यक्ति हमारे पास आया और बोला कि उसकी थैली खो गयी है. हमने उससे शनाख़्त के लिए पूरी जानकारी पूछी, जो सही थी. उदय ने वह थैली उसे सौंप दी. वह बदले में पचास रुपए बतौर इनाम देना चाहता था. उदय ने इनकार कर दिया- ‘अरे भाई, मुझे रखना होता तो सारे साढ़े छह सौ न रख लेता!...’


   इस काम से निपट कर हम ख़ुशी-ख़ुशी नदी के घाट पर नहाने पहुंचे. हम कपड़े उतार ही रहे थे कि एक बुजुर्ग की अपनी कमीज़ निकालते हुए लड़खड़ाहट में कुछ दुअन्नी-चवन्नी-अठन्नी की रेज़गारी खनखनाते हुए फ़र्श पर गिर पड़ी. उदय तुरंत आगे बढ़ा. उस बूढ़े को सहारा दिया. उसके यहां-वहां बिखरे सिक्के उसे उठाकर देने लगा. मैं उसीको देख रहा था. उसने देते समय एक अठन्नी अपने पांव तले दबा ली. बूढ़े के धन्यवाद कहने के पश्चात दूसरी ओर मुड़ते ही उसने वह अठन्नी सबकी नज़र बचाकर उठायी और अपने जेब के हवाले कर दी.
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।।लघुकथा।।

मान

   मिसेज़ मेहरा बहुत परेशान थीं. उनकी काम वाली बाई- कई बार समझाने के बावजूद, ग्यारह-साढ़े ग्यारह को ही आती थी. यह उनका खाना बनाने का समय था. वह बीच में आकर रुकावट पैदा कर उन्हें झुंझला देती थी.


   एक दिन वह लगभग बारह बजे आयी. श्रीमती... न, न.. मिसेज़ मेहरा बेहद ग़ुस्से में थीं. आते ही उसको डांटा. वह बोली, अभी ग्यारह ही तो बजे हैं. मिसेज़ मेहरा अपने-आपको क़ाबू में न रख सकीं. उसका कान उमेठ कर चेहरा दीवार घड़ी की ओर घुमाया- झूठ बोलते शर्म नहीं आती तेरे को... देख, देख घड़ी देख!...


   मिसेज़ मेहरा को बाद में यह ज़रूर लगा कि उसका कान उमेठ कर उन्होंने कुछ ग़लत कर दिया है. लेकिन उनका ऐसा स्वभाव बन गया था कि उनसे कोई चूक हो जाने पर वह स्वयं ही रुठ जाती थीं. पति और बच्चे उन्हें मना लेते थे. वर्ना तो उन्हें अनंत अवधि तक होंठ सिल कर रखने का ख़ूब अभ्यास था. वे ख़ुद कभी अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा-प्रार्थी नहीं होती थीं. धीरे-धीरे उनकी यह आदत बन गयी थी, बल्कि पत्थर की लकीर.


   महीने के शेष दिन आते-जाते रहे पर उन्होंने उस काम वाली से पूरा अबोला रखा. वह भी- हो सकता है, डर के मारे -चुपचाप आती और अपना काम कर चली जाती. अंत में उसने अपना माहाना पैसा मांगा. लेकर बस इतना बोली, मैं कल से पन्द्रह दिनों के लिए गांव जा रही हूं... और चली गयी.


   मजबूरी में दूसरी एक बाई को लगाया. वह ठीक काम नहीं करती थी. किसी तरह उसे तीस दिन निभाया. पति के ज़ोर देने पर मिसेज़ मेहरा ने उनसे पहले वाली बाई को फ़ोन लगवाया. उसने साफ़ कह दिया कि उसके पास कई घर हैं, वक़्त नहीं है, वह नहीं आ सकती.

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।।लघुकथा।।
सच बताना!

   मैं और वह साथ ही बीएससी कर लेंगे. तब तक एक-दूसरे को जानने का भरपूर मौक़ा मिलता रहेगा.
हमारा प्यार परवान चढ़ता रहेगा. इसके पश्चात वह बीएड करेगी. मैं एमएस-सी.


   मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाऊंगा. उसे स्थानीय कान्वेंट में नौकरी मिल जायेगी. मेरा परिश्रम सफल होगा. मैं आईएएस करने के बाद धीरे-धीरे प्रथम श्रेणी का राजपत्रित अधिकारी बन जाऊंगा. तब हम दोनों वैवाहिक सूत्र में बंध जायेंगे. हमारे दीर्घ अतीव प्रेम की इस परिणति पर हम प्रत्येक आगत दिन को जश्न की तरह मनायेंगे.


   हमारे एक बेटा और एक बेटी होंगे. हमारी आय तथा साधन संपन्नता इतनी अधिक रहेगी कि बच्चों के पालन-पोषण में कोई कमी नहीं रहेगी. बच्चे निश्चित ही बेहद ज़हीन होंगे. वे उम्र की सीढि़यां चढ़ते चले जायेंगे. बेटा इंजीनियरिंग करने के उपरांत एमएस करने अमेरिका चला जायेगा. वहीं उसे बढि़या जाब मिल जायेगा. बेटी इस बीच एमबीबीएस, फिर एमएस कर लेगी.


   बेटा अपनी प्रेमिका और बेटी अपने प्रेमी सहपाठियों से शादी के लिए इसरार करेंगे. उनकी उच्च शिक्षा और सुसंस्कृत घरानों को देख हम तुरंत राज़ी हो जायेंगे. एक ही मंडप से हमें शालीन बहू और सुशील दामाद की प्राप्ति हो जायेगी. बेटा कुछ दिनों के बाद बहू को लेकर अमेरिका चला जायेगा. वहां जाकर वह ना कहने के बावजूद काफ़ी पैसे भेजता रहेगा. मोबाइल से, नेट से हमारा हमेशा संपर्क बना रहेगा. दामाद भी चूंकि एमडी होगा, उन्हें मैं एक विशाल हास्पिटल बनवा दूंगा, जहां वे अनेक मरीज़ों की मसीहा बन जायेंगे. 
   सब कुछ सुखद. आने वाले सालों में पोते-पोती, नाती-नातिन के लाड़ में हम पति-पत्नी भी अपने उत्तर काल का आशातीत उपभोग करते रहेंगे...


   यह कथा इस छोर तक आ चुकी होगी. किसी भी रुकावट के बिना. अब आप तय करें कि क्या सब कुछ यूं ही ख़ुशनुमा चला और चलता रहेगा ?
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।।लघुकथा।।
लत


    मेरे जीजाजी का मेडिकल स्टोर था. उस क़स्बे-नुमा ऐतिहासिक तहसील में अकेला. बहुत आमदनी थी. जीजाजी आयुर्वेद के डाक्टर थे. वहीं पर अन्दर की तरफ़ प्रैक्टिस करते थे. उनके दो छोटे भाई स्टोर सम्भालते थे.


    उनका एक पुराना मकान था. पूरा परिवार वहीं रहता था. पैसा आ रहा था तो उन्होंने एक प्लाट ख़रीदा और निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया. हुआ यों- जैसा कि लोग कहते हैं -खुदाई में उन्हें भरपूर सोने की अशर्फि़यां मिलीं. अर्थात् उन्होंने एक विशाल इमारत खड़ी कर दी. एक-एक तल पर एक-एक भाई का परिवार स्थापित हो गया. नीचे के भाग में उन्होंने अपना दवाख़ाना शुरू कर दिया.


   सब कुछ ठीक चल रहा था. नई इमारत में पीछे की ओर एक बड़ा गोदाम था, जिस में यहां से वहां तक विभिन्न दवाइयां रखी होती थीं. सबसे छोटा भाई दिन में कई बार साइकिल से आता और थैले में भर-भरकर ज़रूरत की दवाइयां लेकर स्टोर ले जाता. इस सबके चलते हुआ ऐसा कि जीजाजी घर पर ही बने रहते और दोनों भाई मेडिकल स्टोर पर हमेशा व्यस्त रहते.

 
   उनकी यह दुकान किराये पर थी. मालिक ने उनकी दिन-ब-दिन बढ़ती समृद्धि को देख ऐन चैक में स्थित इस दुकान को ख़ाली करने के लिए कह दिया. इन्होंने इनकार कर दिया. वह कोर्ट में चला गया. और एक दिन इनकी दुकान को अदालत के आदेश पर ताला लग गया.


   ताला लगना था कि दोनों भाइयों ने जीजाजी से सम्पत्ति का हिस्सा-बांटा कर लेने पर ज़ोर लगा दिया. जीजाजी मान गये. उनसे अलग होकर दोनों भाइयों ने एक बिल्डिंग ख़रीद ली और नया बड़ा मेडिकल स्टोर लगा लिया.


   तब जाकर हमारे जीजाजी की समझ में आया कि पिछले कई वर्षों से दोनों भाई मेडिकल से पैसा मारकर अपनी जेब भरने में लगे हुए थे. वर्ना बंटवारे से मिली रक़म से वे इतना निवेश कर ही नहीं पाते. ख़ैर, अब क्या किया जा सकता था...


   बहरहाल, बग़ैर किये वह हुआ, जो उन्होंने सोचा भी नहीं था. दोनों भाइयों को काउंटर से चोरी करने की आदत पड़ चुकी थी. वे अपनी दुकान में भी ऐसा करने से ख़ुद को रोक नहीं पाये.


   अंत यही हुआ कि दोनों आपस में एक दिन झगड़ पड़े और उनकी ग़ैर तरीक़े से हासिल वह दुकान हरदम के लिए बन्द हो गयी.
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।।लघुकथा।।
प्रतिक्रिया


   युवा मनोहर उनका ख़ास नौकर था. मेहनती और ईमानदार. उनकी समस्त खेती-बाड़ी को वही सम्भालता था. मतलब- हल चलाने, बुआई करने, मज़दूरों से काम लेने, फसल की कटाई से लेकर बाज़ार में ले जाने तक का समूचा कार्य उसके ही जि़म्मे था. अर्थात् उनके मार्गदर्शन एवं निरीक्षण के अंतर्गत.


   बदकि़स्मती से उनकी हृदयाघात से अचानक मृत्यु हो गयी.
   उनकी पत्नी सरोज की उम्र ही क्या थी- यही कोई तीस-पैंतीस के बीच. वह इस हादसे से विचलित हो गयी. मनोहर ने पहले से अधिक जि़म्मेदारी से सब कुछ सम्भालना शुरू कर दिया.


   ऐसे तो सारा ठीक ही चल रहा था परन्तु सरोज को पता नहीं क्यों पति की अनुपस्थिति में स्वयं के मालकिन होने का भाव ज़रा ज़्यादा ही उग्र बना गया था. हो सकता है, वह मनोहर की प्रामाणिकता के प्रति कुछ आशंकित रही हो याकि अपने बेसहारा स्त्री होने के कारण अथवा उसका स्वभाव ही ग़ुस्सैल हो.


   ज्यों ही मनोहर दिन भर के कामकाज़ का लेखाजोखा शाम में बताता, वह उसे डांटती-फटकारती रहती कि ‘यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ’ या ‘इसके बजाय वैसा करना चाहिए था’...


   हुआ यों कि उस साल का उत्पादन हलका उन्नीसा हुआ. इस पर उसने मनोहर को गालियां तक दे डालीं. फिर मंडी से बिक्री का दाम भी बनिस्बत ओछा आया. यह उसके लिए नीम पर चढ़े करेले जैसी कड़ुवाहट लेकर आया. उसने आव देखा न ताव, पति का चाबुक निकाला और मनोहर पर चिल्लाते हुए बुरी तरह पिल पड़ी.


   मनोहर ने पांच-छह वार चुपचाप सह लिये. एकाएक पीठ पर सटाक् से लगे चाबुक का छोर उसने पकड़ लिया और तत्पश्चात...
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।।लघुकथा।।

युयुत्सा

   टीवी के एक चैनेल पर युद्ध की ख़बरें लगातार आ रही थीं. दोनों दुश्मन देश की सेनाएं एक-दूसरे पर आधुनिक हथियारों से वार-प्रतिवार करने में मुब्तिला थीं.


   पति ग़ुस्से में पत्नी को डांट रहा था- ‘तुमको इतने सारे ‘फ्ऱेंडस्’ फ़ेसबुक पर बनाने की क्या ज़रूरत है ?..’
   पत्नी पलटवार कर रही थी- ‘ये मेरी अपनी व्यक्तिगत जि़न्दगी है. मैं लेखिका हूं तो दोस्त- चाहे पुरुष हो या स्त्री -बनेंगे ही.’
   दूसरे दिन भी टेलीविज़न वही समाचार पूरे जोशो-ख़रोश से प्रसारित करने में लगा हुआ था. इस देश के इतने ज़ख़्मी हुए, उस देश के इतने मारे गये- इत्यादि.


   पत्नी आग-बबूला थी- ‘मैंने तुम्हारे मोबाइल पर देख लिये हैं सारे संदेश. ये कौन-कौनसी औरतें हैं, जो तुम्हारे संपर्क में बनी हुई हैं ?..’
   पति ने तुरंत कुछ क्रोध में प्रत्युत्तर दिया- ‘ये मेरे ही अधीन कार्य करने वाली हमारी कंपनी की प्रतिष्ठित महिलाएं हैं. मुझे अपने काम के लिए इनके साथ फ़ोन-मेसेज में लगा रहना होता है.’


   एक पखवाड़ा बीता. सभी चैनेलों पर यही दोहराया जा रहा था- ‘युद्ध-विराम घोषित हो गया है.’


   पति-पत्नी की ऊंची-ऊंची आवाज़ें आपस में गड्डमड्ड हो रही थीं-
   ‘तुम कल उसके साथ लंच पर...’
   ‘मैंने भी तुम्हें आज कार में उसके संग...’
   ‘तुम लंच के बाद होटल में क्यों रुकी रही...’
   ‘तुम उसे कार में उसके घर ले जाने पर भीतर दो घण्टे तक...’
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प्रा.डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095.
सचल: 09971744164. ईमेल: ashokgujarati07@gmail.com

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