रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

कवि बैरागी : दो कविताएँ।

image

 

1.

लोग : जो मार दिए गए…

हम सब मर जायेंगे
एक दिन,
केवल कुछ गुलमोहर ही बचेंगे,
न दिखने वाली सुंदरता के लिए।

आप उस रात आराम से नही सो सकते,
जब कोई अधनंगा लड़का
आपके कान में आकर कह दे
कि
उसकी माँ को मार दिया है – एक घातक उपन्यास ने।
आप कैसे करवटें बदल सकते हैं
आप भी रहते है उस शहर में
जिस शहर में
दीवारें आधी रात को और स्याह हो जाती हैं।

[ads-post]

कोई भी
तीन शब्दों में उत्तर दे सकता है मेरे सवालों का।
मैं शहर की तमाम दीवारों को खा जाना चाहता हूँ।
नोंच लेना चाहता हूँ वो हर बाल
जो धूप के अलावा और किसी भी तरीके से सफेद हो गया हो,
मैं समेट लेना चाहता हूँ हर गली मोहल्ला
अपनी जुबान से
(उस तरह से नही
जैसे वोट समेटने के लिए तीखी और तेज जुबान चाहिए)

लड़की जैसी शक्ल में एक लड़की
अक्सर आपके सपनो में आती होगी;

उस अधनंगे लड़के की एक बहन भी थी
उसने आपके कान में यह नही बताया होगा।
उसकी बहन भी खा जाना चाहती थी
शहर की तमाम विचारधाराओं को।

मैंने कुछ डरावना खेल
देखा था
सपने में।
मैंने कुछ वक़्त सोचा,
कम्बल ओढ़कर चिल्लाऊँ,
किसी पड़ोसी को आवाज़ दूँ,
या फिर दौड़कर उसे पकड़ लूँ जो लड़की के बाल पकड़कर हंस रहा है।

लेकिन मुझे पता है
मेरी गर्दन में एक आठवीं इन्द्रि भी है
शायद इसीलिए ही
ऐसे मौकों पर मैं अपनी जुबान काटकर
फ्रीज़ में रख देता हूँ।

मैं आपको
खुशनसीब समझता हूँ
कि अब तक किसी ने
शब्दभेदी बाण मारकर मेरी अभिव्यक्ति नहीं जलाई,
मेरी विचारधारा जलाकर कर मुझे अंधा नहीं किया।

हम कैसे जान पाएंगे
कि
विकास की गति जन्म लेने के बाद क्यों शरू होती है?
उम्र के अनुसार ही
शरीर और दिमाग का विकास क्यों होता है।
आप सब के
गांव या शहर में
आपकी गलियो में,
स्थिर मौसम के उजाले में एक बलात्कार टाइप का माहोल बन सकता है।
सड़क के बीचों बीच मरे हुए इंसान के चारो और मरे जानवरों (जिन्दा इंसानो) की भीड़ लगते हुए देख सकते हैं।

बिना टीवी के दिखाई जा सकती है;
एक काली कपड़ों में लिपटी विचारधारा।
बलात्कार के उस वक़्त
मरे हुए दिमाग खोपड़ी में लेकर कुछ लोग
एक लड़की के जेहन में बहुत सारी हवस उतार देते हैं
या
उंड़ेलते हैं।
इंसान के दिमाग में कई खाली गर्त होते हैं
लेकिन
उन लोगों के दिमाग में
"एक काला पदार्थ" भर चुका है
वे गर्त धातु के ढक्कनों से ढके हैं।

क्या आप समझ सकते हैं
कट्टरता का जहर इन गर्तों में सड़ता है
और इससे उत्पन्न होती है "जलन"
"हवस की कैद"

वो अधनंगा लड़का
जवान होकर
बांग्लादेश की एक गली
में नाइ की दूकान पर
सुनता है – तसलीमा नसरीन की आवाज़।

वो
सुबक सुबक पर अपनी मरी हुई माँ
से पूछ सकता है
" माँ! तस्लीमा नसरीन कहाँ गई?"

कुछ लेखक/लोग सोच सकते हैं
की ऊँची आवाज़ में
घातक दनीश्वरो का विरोध किया जाये।
दब जाती है वो
आवाज़
लेकिन मरती नही
जिन्दा; हो जाती है अक्सर;
नई क्रांति के लिए।

यह बात आपको उस वक़्त
समझ में नही आयेगी
जब आपकी चमड़ी में घातक कट्टरता के लक्षण प्रकट होंगे।
ऐसे लक्षण
प्रकट होने पर इन नस्लों (बच्चों) की उत्पादकता शायद पहले जैसी न रह जाए।
बड़े तुज़ुर्बे
मार दिये जाते हैं
या दबा दिए जाते हैं कुछ लोग…
जो सच का कलेजा देख लेते हैं

लिहाजा ऐसे मौकों पर
जैविक विविधता को बचाए
रखना और भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि उसके बिना अगली पीढ़ी मज़े कैसे लेगी ?

कुछ कटे हुए सर ही बता सकते हैं
कि
एक उपन्यास जान कैसे ले सकता है।

 

 

2.  मानवता की मौत

आलू खाकर मर सकता है
एक आदमी/
और
बिना जहर पीये मर सकती है
एक औरत।

और बच्चों की मौत का मैं कोई तरीका नही बता पाता हूँ।
(यह आसान है)

भावी आत्महत्या पीड़ितों के लिए/
इन्हें
हासिल करना काफी मुश्किल है।

हम घरों के अंदर तक जायेंगे
खाली पड़े खण्डहरों तक
पहुंचेगी
हमारी कविता/आवाज़
क्योंकि ज्यादातर आत्महत्याएं
शाम को या रात में होती हैं।

हाँ,
बिलकुल
मेरी बाँहों में परमाणु नही है
यह बात
अंदर तक आपको कचोट देगी
आपको ही नही बल्कि विज्ञान के लाखों शोधकर्ताओं को भी

मैं मज़बूर हूँ,
इसलिये कहता हूँ
मेरी बाहों में परमाणु नही है।
आइंस्टीन को अपनी समीकरण वापिस ले लेनी चईये
और गुटेनबर्ग को
अपना छापाखाना भी बन्द कर देना चईये।
आप और हम मिलकर
एक दुसरे चाँद को देख सकते है
हम वहां तक जायेंगे
जैसे घरों तक गए थे।
हमारे साथ एक दूरबीन होगी
और
उसमे हम एक आदमी को दूसरा आदमी काटता देखेंगे।

आपकी नज़रों में आपका बैडरूम दिखाई देगा
और आपके सपनो की
एक -दो लाश भी वहीं पड़ी होगी
यह "सीन" देखकर एक छोटा अमरुद हंसेगा
मैं
उसको हंसने का मतलब पूछता हूँ तो
मेरी दादी की कही बात याद आ जाती है
(इसलिए मैं नही पूछता।)
वहां रेडियो नही होगा
और आदमी कटा हुआ हाथ खाता होगा (अपना वाला)
आप
यह सोचकर दुःखी नही होते
कि
आपकी उम्र का एक एक दिन घटकर मरता जा रहा है
एक दिन का मतलब घड़ी उल्टी घूमती है।

हम सब देख लेंगे/लोगों को लड़ते हुए,
एक लाल लिपस्टिक की भूख के लिए हम,
अवाज़ नहीं करेंगे
और आंदोलन का नाम ऑक्सफ़ोर्ड वाली डिक्सनरी से मिट जायेगा। आपको पता है न
भूख हड़ताल से अंततः मृत्यु हो सकती है।

मैंने कभी नही देखा
कि सूरज और चाँद एक दुसरे का आलिंगन करते हैं,
धरती के सारे जीव मर चुके है,
खाद्य श्रंखला के ऊपर रेड क्रॉस है।

यह एक सार्वभौमिक सत्य कैसे हो सकता है
कि
हमले के बाद अपराधी पकड़े जाने से पहले आत्महत्या कर लेता है।

जब ऐश्वर्या राय
अपने कमरे में लाइट जलायेगी
तो आप अपने
क्रन्तिकारी विचारों के टुकड़ों को
पेपरमिंट में डालकर आत्महत्या होने की संभावित जगह पर रख देंना।
इसकी स्मेल से "हथियारों" का दम घुटेगा/
और
वे मर जाएंगे।

मेरा कोई घर नही था,इसलिये लोगों के घरों में घुसकर
मैंने तीन तिहाई कविताएँ लिखी थी।

रचनाकार
- बृजमोहन स्वामी "बैरागी"
  (हिंदी लेखक)
 
Birjosyami@gmail.com
सम्पर्क - 7339720289

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget