सोमवार, 10 अप्रैल 2017

व्यंग्य / सांपों से मुक्ति / मेंढकी का लिंग परीक्षण / हनुमान मुक्त

सांपों से मुक्ति

बरसाती मौसम चल रहा है। घर के गैराज में मेंढकों ने धमा-चौकड़ी मचा रखी है। इनकी रोज की धमा-चौकड़ी देखने का मैं अभ्यस्त हो गया हूं। मैं जानता हूँ जब तक बरसात है, जब तक ये हैं। इस मौसम में ही इनकी उछल-कूद और टर्र-पौं जारी रहेगी। मौसम बदलते ही ये ऐसे गायब हो जाएंगे जैसे गंजे के सिर से बाल।

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मुझे उनसे कोई परेशानी नहीं है। थोड़ी बहुत परेशानी तब होती है जब मैं अपनी बाइक घर के गैराज से बाहर निकालता हूँ या अंदर रखता हूँ। काफी बचाने के बावजूद भी कुछेक मेंढक बाइक का शिकार हो ही जाते हैं। मुझे नहीं पता कि वे स्वयं आत्महत्या करते हैं या मेरे द्वारा उनकी हत्या की जाती है। लेकिन ऐसा इस सीजन में अक्सर होता ही रहता है। उनके मरने से मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन गैराज की सेहत पर इसका फर्क अवश्य पड़ता है। गैराज में विचित्र प्रकार की चित्रकारी हो जाती है। जिस पर मक्खी भिनभिनाने लगती है। उनकी भिनभिनाहट को देखने के लिए मैं तो हमेशा घर पर नहीं रहता लेकिन मेरी पत्नी घर पर रहती है। उन्हें इससे विशेष तकलीफ होती है। रोजाना गैराज साफ करना पड़ता है। पानी डालकर, रगड़-रगड़कर पोंछना पड़ता है तब जाकर उन बरसाती मेंढकों के चिन्हों से मुक्ति मिल पाती है। पत्नी की इस परेशानी से मैं परेशान हूँ। एक दिन पड़ोस के घर में साँप घुस गया था। मोहल्ले वालों ने बड़ी मुश्किल से उसे बाहर निकाला। मारने की काफी कोशिश की लेकिन बंदा जाने कहां गायब हो गया। उस दिन के बाद से ही मेरी रातों की नींद गायब हो गई है। दिन में भी उस सांप का भय बना रहता है। पत्नी और बच्चों को भी मैंने सचेत कर रखा है। फिर भी सांप तो सांप है। उनका क्या भरोसा।

आज जब गैराज से बाइक निकाल रहा था तो एक मोटा सा मेंढक जोर-जोर से उछल-कूद मचाता हुआ मेरी बाइक के इर्द-गिर्द अठखेलियां कर रहा था। मैं बरसाती छोटे-मोटे मेंढकों का अभ्यस्त हूं। इतने मोटे मेंढक का नहीं। मैं डर गया। उसे बाहर निकालने की कोशिश की लेकिन नहीं निकला। बाप का घर समझकर गैराज में ही इधर से उधर उछल-कूद मचाता रहा। मुझे ऑफिस जाने की जल्दी थी। उसे वहीं छोड़कर मैं ऑफिस निकल गया। ऑफिस में मेरा काम में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। जब भी थोड़ी देर आँखें मूंद कर रीलैक्स होने की कोशिश करता, वही गायब हुआ सांप और मोटा मेंढक मेरे सामने आ जाता। मुंह पर अखबार डालकर खर्राटे लेने की बजाय, आज मैं फाइलों को उलट-पुलट कर रहा था। मुझे ऑफिस में सोने की बजाय फाइलों से उलझते देख, मेरी परेशानी को मेरा मित्र कॉमनसेंस भांप गया।

कॉमनसेंस मेरे पास आया और मुझे चाय-पानी के बहाने से ऑफिस के बाहर जाकर मेरी परेशानी के बारे में पूछने लगा। मैंने मोहल्ले के पड़ोस से गायब हुए सांप और गैराज में घुस आए, मोटे मेंढक के बारे में उसे बताया। मेरी बात सुनकर कॉमनसेंस थोड़ी देर चुप रहा। उसकी चुप्पी मेरी परेशानी बढ़ा रही थी। वह भी ज्यादा देर चुप रहकर मेरी परेशानी को बढ़ाना नहीं चाहता था। बोला, ‘मेंढक से घबराने की जरूरत नहीं है। रास्ता भूल जाते हैं। थोड़ा बहुत कन्फ्यूज हो गया होगा, अपने-आप वापस चला जाएगा।’

‘लेकिन अगर नहीं गया तो’

‘तो घबराने की जरूरत है। मेंढक से नहीं, गायब हुए सांप से। कभी भी मेंढक को निवाला बनाने के लिए तुम्हारे घर पर धावा बोल सकता है।’ कॉमनसेंस की बात सुनकर मैं और डर गया। बोला, ‘अब बचने का क्या उपाय है। उस सांप से अपने आप को कैसे बचाऊं।’

‘मेंढक को घर से निकाल दें’

‘लेकिन मेंढक तो मेंढक होते हैं। उन पर किसी का कोई बस चलता है क्या? जब भी सीजन आता है बाहर आकर अपनी टर्र-टर्र और उछल-कूद मचाना शुरू कर देते हैं। किसी का कोई अंकुश नहीं है उन पर। सीजन के जाते ही अपने-आप गायब हो जाते हैं, कुछ अपनी मौत मारे जाते हैं और कुछ अपने ठिकानों में जाकर कैद हो जाते हैं।’

कॉमनसेंस बोला, ‘तुम्हारी बात ठीक है। हमें मेंढकों से नहीं सांपों से ज्यादा परेशानी है। तुम बता रहे थे कि पड़ोस में एक सांप निकल आया था, जिसे बड़ी मुश्किल से मोहल्ले वालों ने घर से बाहर निकाला। कहीं ऐसा तो नहीं था कि यह मोटा मेंढक पहले उसी घर में रहता हो और वहां से डर कर तुम्हारे घर में आ गया हो।’

उसकी बात सुनकर मैं और डर गया। सांप और मेंढक की दुश्मनी मुझे सबसे ज्यादा परेशान कर रही थी। छुटकारा मैं सांप से चाहता था लेकिन उसका दुश्मन मेरे घर में जबरदस्ती डेरा डाले हुए था। अपने दुश्मन पर कभी भी धावा बोल सकता था। काफी देर बाद कॉमनसेंस के दिमाग में एक आइडिया आया। वह बोला, ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। सांपों का दुश्मन संपेरा है। अगर किसी संपेरे को बुलाकर मोहल्ले के सांपों को पकड़वा दिया जाए तो इस समस्या से तुम्हें ही नहीं, सारे मोहल्ले को निजात मिल सकती है।’

बात सुनकर मेरा बदरंग चेहरा रंगीन हो गया। सांपों से मुक्ति का मुझे आइडिया मिल गया। मेंढकों से कोई खतरा नहीं होता है। खतरा तो सांपों से है। कितना भी दूध पिलाओ, जहर उगलना नहीं छोड़ते। कितनी भी वफादारी करो लेकिन इनसे वफा की उम्मीद बेमानी है।

मैंने कॉमनसेंस को धन्यवाद दिया और किसी अच्छे संपेरे की तलाश में वहां से निकल लिया जो मेरे मोहल्ले के सांपों को पिटारी में बंद कर दूर तक ले जा सके।

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मेंढकी का लिंग परीक्षण

आज फिर मेंढकी को जुकाम हो गई। मेंढक को जुकाम होते कभी नहीं सुना। जब कि बन्दा हमेशा पानी में पड़ा रहता है, कीचड़ में अटखेलियां खेलता रहता है। लेकिन क्या मजाल कभी हल्की-फुल्की छींक भी आई हो। मुझे इस बात का बड़ा आश्चर्य था कि हमेशा जुकाम का सिस्टम मेंढकी को ही क्यों परेशान करता है। यह सोचते-सोचते रात भर नींद नहीं आई। बार-बार सोचता रहा कि मेंढकी के कहीं कोई नर्वस सिस्टम में गड़बड़ है या कोई शारीरिक आंगिक क्रिया में, कि जब भी जुकाम होता है तो मेंढकी को ही होता है।

वैसे मेंढकी भी पानी में रहती है। मेंढक की तरह कीचड़ में अठखेलियां भी करती हैं, उछल कूद करती हैं। साथ ही गाहे-बगाहे मेंढक और मेंढकियों को जन्म भी देती है लेकिन जुकाम का होना। वह भी सिर्फ मेंढकी को। मेरी नींद हराम कर रहा था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जुकाम जैसा रोग सिर्फ मेंढकियों को ही होता है, मेंढकों को नहीं, चूँकि मैं यह अच्छी तरह जानता था कि जुकाम गायनोकोलोजिकल रोग नहीं है जो सिर्फ स्त्रीलिंगिंयों को ही होता हो। यह एक सामान्य रोग है जो कभी भी किसी को भी हो सकता है।

बरसों से चली आ रही इस परिपाटी पर विश्वास नहीं हो रहा था। हो ना हो, कहीं ना कहीं, किसी तरह की गड़बड़ अवश्य है। इस गड़बड़झाले से मुक्ति के लिए मैंने अपने आस-पास की उन सभी मेंढकियों को जिन्हें जुकाम हो रहा था, का लिंग परीक्षण करवाने का मन ही मन निर्णय कर लिया। अब समस्या उन्हें लिंग परीक्षण करने वाले पशु चिकित्सक या पशुविज्ञानी तक ले जाने की थी।

मैं जानता था कि ये मेंढकियां कोई सामान्य, सीधी-साधी मेंढकियां नहीं है। जिन्हें आसानी से, बहला फुसला कर चिकित्सक के पास ले जाया जा सकता है। ये विशिष्ट प्रकार की मेंढकियाँ है, जिन्हें जुकाम हो रही है। इन्हें ले जाने के तरीके भी विशिष्ट ही होने चाहिए।

मैं मेंढकों के मनोविज्ञान को पहचानता हूँ। मेंढकों से मेरा आशय समूची मेंढक जाति से है जिनमें मेंढकियाँ भी शामिल है।

मैंने उन सब मेंढकियों को अपने पास बुलाया और कहा कि कोमनसेंस के फॉर्म हाउस पर मेंढकियाँ आई है, पिकनिक मनाने का मूड हो तो चलो। मेंढकियाँ तुरन्त तैयार हो गई। मेंढकियों के साथ पिकनिक मनाने की इच्छा से अपने आप ही पानी से भरी बाल्टी में आ-आकर गिरने लगी। हर कोई जल्दी से जल्दी वहाँ पहुँचना चाहती थी।

जब मैंने देख लिया कि वे सभी मेंढकियाँ जिन्हें जुकाम होना बताया गया है, बाल्टी में आ गई है तो मैं उन्हें डॉक्टर कॉमनसेंस के क्लिनिक पर उनका लिंग परीक्षण करवाने ले गया।

कॉमनसेंस मुझे अपने हाथ में बाल्टी लटकाए देखकर बड़े प्रसन्न हुए। वे समझ गए कि आज मैं मेंढकियों को झांसा देकर ले ही आया हूँ। उन्होंने आते ही मेरे हाथ से बाल्टी लेकर अपने असिस्टेंट को पकड़ाई और कुछ आवश्यक निर्देश दिए। करीब आधा घण्टे बाद असिस्टेंट मेंढकियों से भरी उस बाल्टी को लेकर आया। उसने बताया कि, ‘सर उस बाल्टी में पड़ी सारी मेंढकियां, मेंढक है।’

उसकी बात सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। आश्चर्य डॉक्टर कॉमनसेंस को क्यों नहीं हुआ। मुझे नहीं पता। कोमनसेंस के चेहरे पर किसी प्रकार के कोई भाव परिवर्तित नहीं हुए। वह निरपेक्ष भाव से अपनी रिवाल्विंग कुर्सी पर बैठा रहा। वह कभी मेरे चेहरे को तो कभी बाल्टी मे पड़े मेंढकों को देख रहा था।

मैने कहा, ‘तुमने परीक्षण तो ठीक से किया है ना? कहीं ऐसा तो नहीं है कि उन्होंने शर्म के कारण तुमसे परीक्षण नहीं कराया हो, तुमने वैसे ही रिपोर्ट बना दी।’

‘नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मुझे बाल्टी के पानी में ही बेहोशी की दवा डालनी पड़ी। ये तो आते ही जोर-जोर से टर्रा-टर्रा कर कह रहे थे। मेंढकियाँ कहाँ है? मेंढकियाँ कहां है? बिल्कुल भी सब्र नहीं था। यदि दवा डालने में थोड़ी भी देरी हो जाती तो ये सब बाहर निकल जाते।’ असिस्टेंट ने कहा।

‘फिर’

‘फिर क्या? बेहोश होने के बाद प्रत्येक का लिंग परीक्षण किया तो पता चला कि ये तो सबके सब मेंढक है। इनमें मेंढकी एक भी नहीं। बेचारी मेंढकियों को सदियों से यूँ ही बदनाम किया जा रहा है। प्रत्येक कहावत और मुहावरे में बेचारियों का नाम उछाला जाता रहा है।’ असिस्टेंट यह कह कर कोमनसेंस की आँखों का इशारा पाकर वहाँ से चला गया।

कम्प्यूटर सेक्शन से रिपोर्ट की प्रति और सारे इन्वेस्टीगेशन की वीडियो क्लिप लिफाफे में तैयार कर मुझे थमा दी गई।

मुझे अभी तक इस रिपोर्ट पर पूरा विश्वास नहीं हो रहा था। मेरा मन यह मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं था कि सारी मेंढकियाँ जिन्हें जुकाम हुई है। मेंढकी नहीं, मेंढक है। एकाध मेंढक होते तो फिर भी चल जाता। आटे में नमक समा जाता है, नमक में आटा नहीं समाता। यहाँ तो सारे नमक को ही आटा बता कर, आटे के साथ घोर बेइंसाफी की जा रही थी। क्रमशः

मैंने इस नाइंसाफी को उजागर करने का मन बना लिया। सारे मीडियाकर्मियों की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। जिन्हें रिपोर्ट की वीडियो क्लिपिंग, रिपोर्ट की प्रति दी गई। साथ ही डॉक्टर कॉमनसेंस की वार्ता भी उनसे कराई। मीडियाकर्मियों में भी दोनों ही तरह के लिंगी थे।

स्त्रीलिंग मीडियाकर्मी मेरे इस रहस्योद्घाटन से बड़ी प्रसन्न थी। वे कह रही थी कि ये पुरुष सदियों से हमें बेवकूफ बनाते आ रहे है। जुकाम उनको होती है, बदनाम हमें करते हैं। कायराना हरकत ये करते हैं। इन हरकतों को नाम दिया जाता है जनाना हरकतों का। अपने समूह में एकत्रित होकर वे अपने शोषण के बारे में और भी बहुत सी बातें कर रही थी और इसका जिम्मेदार पुरुषों को ठहरा रही थी।

उधर पुल्लिंग मीडियाकर्मी मेरे इस रहस्योद्घाटन को बड़ा बेवकूफाना काम बता रहे थे। उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि उन्हें पहले से ही पता था कि जुकाम हमेशा मेंढकों को ही होता है और नाम लिया जाता है मेंढकियों का। वे मुझे पुरुष जाति में पैदा होने पर कलंक बता रहे थे। इतने बरसों से मेंढक और मेंढकी के भ्रम को उजागर कर मेंने समूची पुल्लिंग जाति के प्रति अन्याय किया है। समय आने पर वे इसका परिणाम मुझे अवश्य भुगताएंगे। अपने समूह में इकट्ठा होकर वे और भी बहुत सी बाते मेरे खिलाफ कर रहे थे।

एक स्थान पर कुछ महिला और कुछ पुरुष मीडियाकर्मी शांत चित से बैठे हुए थे, मुझे लग रहा था कि या तो वे स्त्री और पुल्लिंग दोनों ही नहीं हैं या दोनों ही हैं।

मेरा मित्र कोमनसेंस प्रेस क्रांफ्रेंस के इस सारे नाटक को देख रहा था। उसे लगा इस कॉफ्रेंस को सेमिनार बनाना ठीक रहेगा। वह बोला, ‘आप में से कोई अपनी बात यहाँ रखना चाहे तो रख सकता है।’

उसके इतना कहते ही महिला समूह में से एक महिला उठी और बोली, ‘हमारे अब समझ में आया है कि पुरूष हमें किस तरह बदनाम करते आए है। किसी बुजदिल और कायर व्यक्ति को चूड़ी क्यों पहनाते हैं? क्यों महिला और पुरुषों को दी जाने वाली समस्त गालियाँ हम स्त्रियों को केन्द्र में रखकर दी जाती है। गन्दी हरकत ये करें। गालियाँ हमको मिले। बदनाम हमको किया जाए। पुरुषों का बरसों से चला आ रहा हमारे प्रति यह दोगलापन हम सहन नहीं करेगीं। कहने को ये स्त्रियों के सम्मान की बात करते हैं लेकिन इनकी नस-नस में हमारा निरादर समाया हुआ है। स्त्री जाति को बदनाम करने का कोई भी मौका ये नहीं चूकते।’

पुरुषकर्मी उस महिला की बातों से छटपटा रहे थे। वे भी खड़े होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे। डॉक्टर कॉमनसेंस स्थित को भाँप गए अब कुछ देर और सेमिनार चली तो इसे संसद बनने से नहीं रोका जा सकेगा।

बड़ी मुश्किल से अपनी सूझबूझ में डॉक्टर कॉमनसेंस ने उन स्त्री-लिंगियों की प्रतिनिधि शेरनी से अपना उवाच् खत्म करवाया। प्रेस कॉन्फ्रेस समाप्ति की घोषणा की। महिलाकर्मियों ने एक अच्छी खासी कवर स्टोरी जिसमें पुरुषों की महिलाओं के प्रति घिनौनी मानसिकता को हाई लाइट किया गया था, तैयार की।

‘जुकाम होती है मेंढकों को और बदनाम होती है मेंढकियाँ’ सारे परीक्षण की वीडियो क्लिपिंग, पूर्व से लेकर अब तक मेंढक और मेंढकियों की उत्पत्ति, विकास एवं सामाजिक संरचना को बहुत अच्छे से तैयार कर अपने-अपने संपादकों को दे दिया।

पुरुष मीडियाकर्मियों ने इस सारे घटनाक्रम को एक कम दिमाग व्यक्ति की बचकानी हरकत मानते हुए इस पर किसी भी प्रकार का एक्शन लेना उचित नहीं समझा। रिपोर्ट एवं वीडियो क्लिपिंग से रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

अगले दिन मैं टीवी पर आँख गड़ाए प्रत्येक समाचार चैनल को बदल-बदल कर देखता रहा। प्रत्येक अखबार को मैंने खंगाल डाला। मेंढकी को जुकाम से संबंधित प्रकरण की कहीं से कोई गंध नहीं आई।

जानकारी करने पर पता चला कि सभी समाचार-पत्र समूह एवं समाचार चैनलों के मालिक पुरुष थे। वे नहीं चाहते थे कि बरसो से चली आ रही परंपरा का तोड़ा जाए। हिन्दी साहित्य के इतने पुराने मुहावरों, कहावतों से छेड़छाड़ की जाए। उनसे सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि इस काम को करने के लिए महिला संगठन काफी आगे है, वे अपनी बात आगे लाएं। जब पुरुषों ने इतनी मेहनत कर इन कहावतों और गालियों को तैयार किया है तो पहले महिलाओं को भी इस पर पूरी मुस्तैदी से काम करना चाहिए और जब ये पूरी तरह आश्वस्त हो जाए कि उन्होंने सब तरह की कहावतों और गालियों को पुरुषों के ऊपर तैयार कर लिया है तब मेंढकी के लिंग परीक्षण के परिणाम की बात को मीडिया में लीक किया जाए।

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