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मातृत्व का अनुभव / मीनू पामर

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“ऊपर जिसका अंत नहीं उसे आसमां कहते हैं ,जहाँ में जिसका अंत नहीं उसे माँ कहते हैं “।

मातृत्व का अनुभव वास्तव में स्त्री जीवन का सर्वोत्तम अनुभव है। कहा जाता है कि क्योंकि भगवान सदा हमारे साथ नहीं रह सकते ,इसीलिए उन्होंने माँ को बनाया है। एक स्त्री को जिस दिन यह ज्ञात होता है कि वह माँ बनने वाली है,उसी दिन से उसकी ख़ुशी का टिकाना नहीं रहता। सारी दुनिया मानों उसे अपनी सी लगती है।९ महीने तक बच्चे को गर्भ में रखना,अपनी छोटी छोटी गतिविधियों पर ध्यान रखना ताकि गर्भ के अन्दर पल रही ज़िन्दगी को किसी तरह का नुकसान ना हो बड़ा ही अच्छा अनुभव होता है अक्सर कहा जाता है कि गर्भावस्था के दौरान औरत के चेहरे की चमक दोगुनी हो जाती है।

एक माँ का अपने बच्चे से रिश्ता उसके पिता से ९ महीने अधिक होता है

सम्पूर्णता का एहसास

समय के साथ बदलाव अवश्य आए हैं , परंतु भारतीय माओं में समर्पण भाव आज भी ज्यादा है,वह आज भी अपना दायित्व सही ढंग से निभा रही है। एक भारतीय औरत माँ बनने के उपरांत ही स्वयं को सम्पूर्ण मानती हैं।

आन्तरिक गतिविधियाँ

९ महीने के समय में बच्चे के दुनिया में आने से पहले ही माँ को अपने बच्चे से अति लगाव होने लगता है। वह उसके दुनिया में आने से पहले ही पूरी तरह जिज्ञासु होने लगती है। जैसे जैसे गर्भावस्था का समय बढ़ने लगता है,गर्भ के अन्दर पल रहा बच्चा बड़ा होने लगता है,गर्भ में उछल कूद करने लगता है,यह गुदगुदा सा अनुभव हर माँ के लिए बहुत ही लुभावना होता है। बच्चे की आंतरिक गतिविधियाँ उसे एक क्षण भी यह भूलने नहीं देतीं कि वह माँ बनने वाली है। प्राचीन समय में तो बच्चे की आंतरिक गतिविधियाँ केवल माँ ही महसूस कर सकती थीं,परन्तु आधुनिक समय में पराध्वनिक चित्रण (अल्ट्रासाउंड) की सहायता से उसके शारीरिक अंगों का विकास ,दिल की धड़कन, आंतरिक गतिविधियों को समय समय पर डॉक्टर व पिता भी देख सकते हैं। पराध्वनिक चित्रण से आंतरिक जिज्ञासा और बढ़ जाती है। गर्भ के दौरान ही यदि किसी बच्चे को किसी बीमारी का खतरा हो उसका इलाज भी कुछ हद तक संभव हो जाता है।

माँ का खान पान

गर्भधारी माँ को इस समय में अपने खाने पीने का भी ध्यान रखना पड़ता है। एक गर्भधारी औरत यदि संतुलित आहार लेती है ,तब ही वह पौष्टिक आहार अपने बच्चे को दे पाती है।

समय समय पर डॉक्टर से वार्तालाप कर के उपयुक्त खान पान की सूची बनायी जा सकती है। डिब्बाबंद सामान, मांस मच्छी ,मदिरा का सेवन करने से बचना चाहिए।

माँ का अप्रतिबंधित प्रेम

आखिर के २-३ महीनों में तो माँ को सोने में, उठने बैठने में परेशानियां होने लगती हैं। बच्चे के जन्म के समय जब असहनीय पीड़ा होती है तो कुछ पल के लिए उसे ऐसा लगता है कि उसका यह मुश्किल समय कब समाप्त होगा। बच्चे को जन्म देने जितना दर्द शायद ही दुनिया में कोई और दर्द हो। कुदरत उसे इतना साहस देती है कि उसके जन्मोपरांत उसके रोने की आवाज़ सुनकर,उसका चेहरा देखकर व उसे अपने साथ सोया हुआ देखकर माँ अपनी सारी पीड़ा भूल कर अप्रतिबंधित प्रेम बरसाती है।

आज के दौर में केवल दो बच्चे ही लोग दुनिया में लाना चाहते हैं ,इसीलिए दूसरे बच्चे के समय इन पलों को पहले से भी ज्यादा आनंदमयी ढंग से बिताना चाहिये।

स्थानापन्न मातृत्व

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ४८ मिलियन औरतें जनन अक्षमता के कारण गर्भावस्था का अनुभव नहीं कर सकतीं। उन्हें अपना घर किलकारियों से भरने के लिए स्थानापन्न मातृत्व का आश्रय लेना पड़ता है। यह हमारा सौभाग्य है कि हम अपने जीवन में यह आनंदमयी अनुभव ले सकते हैं। इसीलिए इसे कुदरत का वरदान समझ कर इसका सम्मान करना चाहिए व बच्चे को एक छोटे जीव की तरह देखना ना कि बड़े पेट की तरह महसूस करना अनोखा अनुभव देता है।

कुछ औरतें माँ बन सकने के बाद भी माँ बनना नहीं चाहतीं। उनका मानना है कि माँ बनने के उपरांत उनकी जिम्मेदारियां और बढ़ जायेंगी। उनकी जीवन वृत्ति पर प्रतिबन्ध लग जाएगा। घर, बच्चे व करियर में संतुलन नहीं बना पाएंगे। परंतु बहुत सी ऐसी उदाहरण सामने आती हैं जिनमें औरतों ने बच्चों की परवरिश के साथ साथ अपने करियर में भी सफलता हासिल की। इसीलिए करियर को प्राथमिकता देकर मातृत्व के अनुभव लेने में विलम्ब नहीं करना चाहिए।

अक्सर प्रसूतिशास्री (गायनोकोलोजिस्ट) का यह कहना होता है कि गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं है जिसे इलाज की आवश्यकता है या जिसके होने पर अफ़सोस किया जाये।

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